स्मृति शेष : नहीं रहे जानेमाने साहित्यकार प्रगतिशील चेतना के प्रहरी पत्रकार प्रकाश दीक्षित

 

ग्वालियर के जानेमाने साहित्यकार, प्रगतिशील चेतना के प्रहरी, पत्रकार, कवि, उपन्यासकार,आलोचक और जगन्नाथ प्रसाद मिलन्द व बाबा नागार्जुन की तरह फक्कड़ परम्परा के संवाहक कवि प्रो. प्रकाश दीक्षित को भी आज कोरोना के क्रूर हाथों ने हमसे छीन लिया। अब केवल उनकी स्मृति ही शेष रह गई है। वरिष्ठ पत्रकार डॉ केशव पांडेय ने उन्हे अपनी लेखनी के द्वारा श्रध्दांजलि व्यक्त की है। shabd shakti news इस महान आत्मा को अपने श्रद्धासुमन अर्पित करती है। 

 

श्री प्रकाश दीक्षित का जन्म 26 फरवरी 1936 को अशोक नगर मप्र में हुआ। वे 84 वर्ष के थे।प्रारम्भ में दैनिक निरंजन समाचार पत्र में श्री शंभूनाथ सक्सेना के साथ पत्रकारिता करने वाले प्रो. दीक्षित दैनिक सांध्य समाचार पत्र के सलाहकार संपादक रहे तथा केशव प्रयास पाक्षिक समाचार के संपादक भी रहे।

प्रो. निरंजन सिंह ने प्रो. प्रकाश दीक्षित के साहित्यिक अवदान को लेकर प्रो. संतोष भदौरिया के मार्गदर्शन में पीएचडी की। ऐसे कम लोग होते हैं जो खुद पीएचडी न हों और उनके जीवन पर दूसरे शोधार्थी पीएचडी करें।

प्रो. प्रकाश दीक्षित जगन्नाथ प्रसाद मिलिंद, बाबा नागार्जुन की तरह के फक्कड़ लेखक व कवियों की परंपरा के संवाहक थे।

एक प्रसंग है जब ग्वालियर के वरिष्ठ साहित्यकार श्री महेश कटारे ने अपनी शुरुआत कविता से की। जब श्री महेश कटारे ने प्रो. दीक्षित को अपनी पहली कविता सुनाई तो प्रो. दीक्षित ने उनसे कहा कि कविता तुम्हारे बस की बात नहीं क्योंकि तुम दिसम्बर के महीने में नायिका को झूला झूला रहे हो अगर उसे निमोनिया हो गया तो क्या होगा। श्री कटारे ने उनकी सलाह मान ली और गद्य लिखना शुरू किया। श्री कटारे ने मुर्दा स्थगित जैसी कहानियां, कामिनी काया, कांता जैसे उपन्यास लिखे जो प्रगतिशील लेखक संघ के बड़े उदाहरण बने।

प्रो. दीक्षित को सैकड़ों पुरुस्कार मिले। उनकी आधी खिड़की कृति के लिए उन्हें राज्यस्तरीय सम्मान मिला। उन्होंने लगभग 30 पुस्तकें हस्तलेखन, पोइट्री, व्यंग, उपन्यास आदि साहित्य की विभिन्न विधाओं पर लिखीं जो बड़े बड़े प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित की गईं।

प्रो. दीक्षित ने अंतराष्ट्रीय व राष्ट्रीय विषयों पर लगभग 35 पुस्तकों का जो हिंदी में उपलब्ध नहीं थी, उनका अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद किया। विज्ञान विषयों पर उन्होंने कई पुस्तकों का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद किया । यहां यह उल्लेखनीय है कि प्रो. दीक्षित केवल अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद ही नहीं करते थे अपितु उनके अनुवाद में पुस्तक की मूल आत्मा झलकती थी।

कुछ वर्ष पहले मध्यप्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ ने प्रो. दीक्षित के सम्मान में दो दिन का कार्यक्रम कला बीथिका में आयोजित किया था। केशव प्रयास नामक पाक्षिक समाचार पत्र में डॉ. केशव पांडेय ने प्रो प्रकाश दीक्षित के व्यक्तित्व व कृतित्व पर विशेषांक प्रकाशित किया था। जिसमें देश भर के ख्यातिमान लोगों ने अपने मत व्यक्त किये थे।

प्रो. प्रकाश दीक्षित के एकमात्र पुत्र बॉम्बे में हैं जो फ़िल्म लेखन , निदेशन व कलाकार के रूप में काम करते हैं।आकाश द्वारा निदेशित शांति धारावाहिक जिसके 365 एपिसोड प्रसारित हुए थे । इसके अतरिक्त मृगनयनी सीरियल का भी आकाश ने निदेशन किया। उनकी पुत्री सोनल दीक्षित शिवपुरी में राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर हैं।

उनका आवास ग्वालियर में 135 ललितपुर कालोनी में है यह आवास अपने आप में एक पुस्तकालय है।

आज प्रो. प्रकाश दीक्षित हमारे बीच नहीं रहे। एक कलमकार की कलम हमेशा के लिए अपनी सांसें तोड़ चुकी है। लेकिन उन्होंने जो लिखा उसकी अनुगूंज हमेशा गूंजती रहेगी। प्रो. दीक्षित के नाटक की भावुक पंक्तियां आज मुझे याद आ रही हैं-

उंगलिया भी जो कभी थकती नहीं
वे चरण चलते रहे, चलते रहेंगे।
सर्जना अन्वेषणाओं की सफलता
हम सदा ही गर्व से करते रहेंगे।

मैं उनके श्री चरणों में अश्रुपूरित श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए परम् पिता परमात्मा से प्रार्थना करता हूँ कि उनके परिवार को यह असीम दुख झेलने की शक्ति प्रदान करे।

डॉ. केशव पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व समाजसेवी

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