छठवें चरण के मतदान के बाद अब ग्वालियर अंचल की चार लोकसभा सीटों ग्वालियर, मुरैना,भिंड ओर गुना में प्रत्याशियों का भाग्य EVM में बंद हो गया है। इसके साथ ही अब अंचलवासियों की निगाह 23 मई पर टिकी हुई हैं जब चुनाव परिणाम EVM से बाहर आएंगे।
इन चार लोकसभा सीटों की बात करें तो यहां से दो लोकसभा सीटें ऐसी हैं जिनपर पूरे देश की निगाहें लगी हुई है। यह सीटें हैं गुना और मुरैना की। गुना से कांग्रेस महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया मैदान में हैं तो मुरैना से मोदी कैबिनेट के नवरत्नों में से एक नरेंद्र सिंह तोमर की साख दांव पर है। दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही चेहरों का सीधा सम्बन्ध ग्वालियर से है और दोनों ही ने ग्वालियर की जगह मुरैना और गुना से चुनाव लड़ा है।
दोनों ही प्रत्याशियों के भविष्य की बात करें तो हमेशा की तरह गुना संसदीय सीट से ज्योतिरादित्य सिंधिया की जीत लगभग तय मानी जा रही है,इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए की श्री सिंधिया मध्यप्रदेश में जीत का नया रिकॉर्ड बना डालें ।
जहां तक नरेंद्र तोमर की बात है उन्होंने अपना 2014 का संसदीय छेत्र ग्वालियर को छोड़कर मुरैना से चुनाव लड़ा। इसके पीछे मुख्य वजह यह मानी जा रही है कि श्री तोमर ग्वालियर से अपनी जीत के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त नहीं थे।
अब जबकि चुनाव हो चुका है और जिस प्रकार की खबरें मुरैना से प्राप्त हुई हैं उन्हें देखकर साफतौर पर यह कहा जा सकता है कि नरेंद्र तोमर के लिए दिल्ली की राह उतनी आसान नजर नहीं आती जितनी की उन्होंने सोचकर ग्वालियर छोड़ मुरैना का दामन थामा था। जैसा की राजनीतिक पण्डित कह रहे हैं की इस चुनाव में ब्राह्मण ठाकुर सहित भाजपा के अन्य परम्परागत वोटर की नाराजी यदि EVM तक पहुंच गई होगी तो नतीजे चोंकाने वाले आ सकते हैं।
इधर ग्वालियर लोकसभा सीट पर भी प्रत्याशियों का भविष्य EVM में बंद हो चुका है। यहां से ग्वालियर के महापौर विवेक नारायण शेजवलकर और अशोक सिंह के बीच सीधा मुकाबला है। ऊंट किस करवट बैठेगा अभी कुछ भी कहना मुश्किल है लेकिन इस लोकसभा के अंतर्गत आने वाली आठ विधानसभा में से पांच पर ग्रामीण वोटरों का प्रभाव है।
चूंकि भाजपा प्रत्याशी विवेक शेजवलकर का राजनीतिक प्रभाव केवल ग्वालियर शहर तक सिमटा है ऐसे हालात में कांग्रेस का पलड़ा भारी पड़ सकता है। शहरी इलाकों में भी दो बार महापौर रहने के बावजूद कोई भी बड़ी उपलब्धि न होना भी विवेक शेजवलकर के लिए परेशानी का कारण है। मगर इतना होने के बावजूद जो एक सबसे बड़ी बात उन्हें जीत की किरण दिखा रही है वह है पूरे देश की तरह ग्वालियर में भी प्रधानमंत्री मोदी का जादू वोटरों के सिर चढ़कर बोलना। कांग्रेस प्रत्याशी अशोक सिंह का दिग्विजयसिंह गुट का होना भी उनके लिए परेशानी वाला रहा है। लेकिन वे ज्योतिरादित्य सिंधिया के सामने जिस प्रकार शरणम गच्छम हुए उसने दिग्विजय फेक्टर वाले नुकसान को काफी हद तक कन्ट्रोल किया जिससे उनके वोटों की संख्या शहरी इलाकों में भी बढ़ी ।
कुल मिलाकर ग्वालियर सीट जो की पिछले कई वर्षों से भाजपा की रही है इसबार भाजपा के लिए फंसे में कही जा सकती है। यदि इस सीट पर परिणाम भाजपा खासकर विवेक शेजवलकर के विपरीत आता है तो सर्वाधिक झटका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छवि को लगेगा । ऐसा इसलिए क्योंकि श्री शेजवलकर को टिकट दिलाने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा से जुड़ी मध्यप्रदेश की एक खास जातिगत लॉबी का हाथ रहा है भाजपा के प्रदेश संगठन मंत्री सुहास भगत जो की श्री शेजवलकर के निकट रिश्तेदार होने के साथ इसी लॉबी से हीे जुड़े हैं उन्होंने पार्टी के नेताओं को दरकिनार कर शेजवलकर को टिकट दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई यही स्थिति ग्वालियर में रहने वाले संघ के एक बड़े प्रांतीय अधिकारी की रही ,अगर परिणाम उलट आते हैं तो सबसे ज्यादा झटका इन्हीं को लगेगा और भाजपा में संघ के बढ़ते दखल पर भी माहौल गर्माएगा।
ग्वालियर अंचल की भिंड लोकसभा सीट पर भाजपा सबसे सुरक्षित नजर आ रही है। यहां कांग्रेस प्रत्याशी के कन्हैया कुमार वाले विचार उसके लिए सबसे घातक साबित हुए और जैसे जैसे चुनाव नजदीक आया मुकाबला लगभग एकतरफा हो चला।


