भगवान जगन्नाथ, दाऊ बलराम और बहन सुभद्रा की रथयात्रा आज से शुरू होगी। हर साल की तरह पुरी और देश के अन्य राज्यों में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकाली जाएगी। इस रथयात्रा में शामिल होने के देश-विदेश से लाखों भक्त पुरी पहुंचते हैं और रथ खींचकर सौभाग्य की प्राप्ति करते हैं। रथयात्रा से पहले मंदिर में वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ भगवान जगन्नाथ का नेत्रोत्सव मनाया गया। जिसके बाद भक्तजनों ने प्रभु के दर्शन किए। नेत्रोत्सव से पहले भगवान जगन्नाथ की आंखों पर पट्टी बंधी रहती है। आइए जानते हैं आखिर जगन्नाथ भगवान की आंखों पर पट्टी क्यों बांध दी जाती है….
रथयात्रा तभी शुरू होती है, जब भगवान जगन्नाथ पूरी तरह स्वस्थ होते हैं। दरअसल मान्यता है कि ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा से अमावस्या तक भगवान जगन्नाथजी बीमार रहते हैं और इन 15 दिनों में इनका उपचार शिशु की भांति चलता है, जिसे अंसारा कहते हैं।
आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा को भगवान स्वस्थ हो जाते हैं और द्वितीया तिथि को गुंडीचा मंदिर तक भगवान की रथ यात्रा निकलती है। रथयात्रा से पहले मंदिर में नेत्रोत्सव विधि की जाती है। नेत्रोत्सव विधि में मंदिर के मंहत, पुजारी प्रभु के नेत्र खोलने की पंरपरा निभाते हैं। जिसमें वह भगवान की आंखों पर काजल लगाकर पट्टी को हटाते हैं।
जाता है कि जब भगवान बीमार होते हैं तब उनकी आंखों में जलन होती है, जिस वजह से आंखों पर पट्टी बांध दी जाती है। यह पट्टी 15 दिन तक बंधी रहती है और इस दौरान मंदिर भी बंद रहता है। जब भगवान भगवान स्वस्थ्य होते हैं तब रथयात्रा पर निकलते
भगवान बीमार होते हैं तो मंदिर में कुछ ही लोगों को जाने की इजाजत दी जाती है, जो जगन्नाथजी का इलाज करते हैं। 15 दिन बाद सुबह की मंगला आरती के बाद प्रभु जगन्नाथ, बलराम व देवी सुभद्रा का नेत्रोत्सव पूरा किया जाता है है। नेत्रोत्सव के साथ-साथ मंदिर पर ध्वजा चढ़ाई जाती है और साधु संतों को भोजन कराकर जल्द स्वस्थ की कामना की जाती है।
मान्यता है कि मंदिर के ऊपर लगी धव्जा भगवान की आंख का काम करती है, जिससे वह अपने भक्तों को देखते हैं। मंदिर का झंडा देखने से भी उतना ही पुण्य मिलता है, जितना प्रभु के दर्शन करने से। जिस दिन रथ यात्रा निकलती है, उस दिन स्वर्ग में मौजूद 33 करोड़ देवी-देवता पृथ्वी पर रथयात्रा में शामिल होते हैं।