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ग्वालियर चम्बल में उपचुनाव से पहले ही कहीं कांग्रेस का न हो जाए सूपड़ा साफ

सम्पादकीय

ज्योतिरादित्य सिंधिया के खासम खास विधायकों मैं से एक प्रधुम्न सिंह तोमर की बात पर विश्वास किया जाए तो जुलाई के प्रथम सप्ताह में ग्वालियर चम्बल समभाग में कमलनाथ की कांग्रेस अनाथ होने की स्थिति में पहुंच सकती है। प्रधुम्न सिंह तोमर ने हाल ही में मीडिया के सामने खुलासा किया है की उनके नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया जुलाई के प्रथम सप्ताह में अपने गृह नगर ग्वालियर आएंगे और उसी दौरान अंचल में कांग्रेस के भीतर बैठे उनके लगभग ढाई हजार समर्थक एक साथ कांग्रेस छोड़कर भाजपा की सदयस्ता लेंगे। यह बयान इस दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है की आने वाले समय में 24 सीटों पर होने वाले उपचुनाव में 16 सीटें ग्वालियर चम्बल अंचल से ही आती हैं। यदि इतना बड़ा पलायन कांग्रेस से भाजपा में होता है तो उपचुनाव में कांग्रेस के झंडाबरदार बने बैठे  कमलनाथ व दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं को यहां से लेने के देने पड़ सकते हैं। वैसे भी ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा जॉइन करने के बाद से ग्वालियर चम्बल अंचल में कांग्रेस के पास कोई भी दमदार जन समर्थन जुटाने की ताकत रखने वाला चेहरा नहीं बचा है। एक दो नाम जो लिए भी जा सकते है वे भी अपनी अनदेखी के कारण खिन्न बैठे हैं। ऐसा ही एक नाम गोविन्द सिंह का है जो जनता के बीच थोड़ी पकड़ रखते हैं लेकिन उनका नाम जब नेता प्रतिपक्ष के लिए सामने आया तो कमलनाथ ने खुद इस पद पर काबिज होने के लिए विरोध के घोड़े खोल दिये उन्होंने प्रजापति, सज्जन वर्मा,जीतू पटवारी के साथ मिलकर गोविंद सिंह को पटखनी देदी और खुद नेता प्रतिपक्ष का पद कबाड़ लिया। अब सूत्रों का कहना है की गोविंद सिंह अपनी अनदेखी से खिन्न हो गए हैं वे उपचुनाव में कांग्रेस रूपी डूबती नय्या में सवार होंगे इस पर अब प्रश्नचिन्ह लग गया है। ऐसा अकेले गोविंद सिंह के साथ ही नहीं हुआ प्रदेश कांग्रेस में कार्यकर्ता हो या नेता, उसकी उपेक्षा की शिकायतें   लगातार बढ़ रही हैं। इन्हीं शिकायतों के कारण कमल नाथ सरकार को गिराने वाले गैर ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक विधायकों ने पार्टी छोड़ने का आरोप लगाया था। अब प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) के कोषाध्यक्ष गोविंद गोयल भी यही आरोप लगाकर पद को छोड़ चुके हैं। कई ऐसे अन्य नेता हैं, जिन्हें ऐसी ही शिकायतें हैं, लेकिन वे खुलकर बयान देने से बचते हैं। उपेक्षा की एक वजह कांग्रेस की गुटीय राजनीति भी है, जिसमें कार्यकर्ता को उसके नेता के कमजोर होने पर उपेक्षित कर दिया जाता है।

प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में 2018 में सरकार बनने के बाद तेजी से घटनाक्रम बदला और मुख्यमंत्री कमल नाथ बने तो पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भी शक्ति केंद्र बन गए। इससे दिग्विजय सिंह के विरोधियों में नाराजगी बढ़ती गई। ज्योतिरादित्य सिंधिया का सरकार में दखल रहा, लेकिन लोकसभा चुनाव हारने के बाद उनकी पूछपरख में कमी आई। दिग्विजय सिंह को तवज्जो मिलने से उनके विरोधियों के साथ सिंधिया व उनके समर्थक भी नाराज होते गए। इसका आभास सरकार के रहते कांग्रेस संगठन को भी नहीं हुआ, क्योंकि सत्ता और संगठन दोनों के सूत्र कमल नाथ के हाथ में थे।  प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कई पदाधिकारी पद होने के बाद भी जिम्मेदारी नहीं मिलने से दुखी रहे, जो आज भी उसी स्थिति में हैं।

सरकार व संगठन में उपेक्षा और अनसुनी के आरोप मार्च के पहले सााह में दो दर्जन नेताओं के सत्ता पलटने के लिए भाजपा से हाथ मिलने पर खुलकर सामने आए। उसमें तत्कालीन विधायकों ने सरकार में मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों के पास उनके लिए समय नहीं होने के आरोप लगे। यही स्थिति संगठन में भी बन रही थी, जो पीसीसी के खंजाची (कोषाध्यक्ष) गोविंद गोयल के प्रदेश अध्यक्ष कमल नाथ को पत्र लिखे जाने से साफ हो चुकी है। कुछ पदाधिकारी अभी भी दुखी हैं, जो दबी जुबान में पीसीसी में अपनी उपेक्षा को लेकर आक्रोशित हैं। पदाधिकारी दो साल में एक भी बार कार्यसमिति की बैठक नहीं होने से नाराज भी हैं, जिसमें वे अपनी शिकायत रख सकें। प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में आज भी कई पदाधिकारी जिम्मेदारी सौंपने की मांग करते नजर आ जाते हैं।

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