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क्या इन हिंसाचारियों को अहिंसा के पुजारी की समाधि पर जाने का हक है

प्रवीण दुबे

एक बहुत पुरानी कहावत है “मुंह में राम बगल में छूरी” अर्थात ऊपर से धार्मिक सदभाव का प्रगटीकरण लेकिन भीतर से हिंसक प्रवृत्ति का समावेश। दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन में शामिल उनके अधिकांश नेताओं व समर्थकों पर यह कहावत पूरी तरह से चरितार्थ होती है। वे एकतरफ हिंसा का तांडव कर रहे हैं तो दूसरी ओर अहिंसा के पुजारी बापू की समाधि पर

 

सद्भावना व शांति के लिए उपवास रखने की बात कर हैं। एक तरफ हिंसा और दूसरी तरफ सदभाव के लिए उपवास ,दोनों बातें एकसाथ सम्भव ही नहीं हो सकती इसे तो बापू की पुण्यतिथि पर उन्ही की समाधि पर उनके विचारों का अपमान  निरूपित किया जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होना चाहिए गांधीजी स्वं कहा करते थे ” अहिंसा को पहले अपने जीवन में अंगीकार करो फिर इसके लिए तुम्हें कितना ही बड़ा त्याग क्यों न करना पड़े “। किसान आंदोलनकारियों का चरित्र तो इससे

 

ठीक विपरीत दिखाई देता है। बापू की पुण्यतिथि पर सद्भावना उपवास की घोषणा के बाद उन्होंने न केवल तलवारें लाठियां लहराईं बल्कि अपनी ड्यूटी दे रहे एक पुलिस कर्मी के हाथ में तलवार से ऐसा हमला बोला की वह रक्तरंजित हो गया। पूरे देश ने देखा की 26 जनवरी के राष्ट्रीय पर्व पर इन किसान आंदोलनकारियों ने कैसे हिंसा का नंगा नाच किया तलवारें,फरसे,लोहे की रॉड मोटे मोटे डण्डों से हमला बोला,अपने कर्तव्य पथ पर डटे पुलिस कर्मियों पर ट्रैक्टर चढ़ाने की कोशिश की और सबसे जघन्य अपराध तो यह किया की हमारे देश की आन बान शान के प्रतीक तिरंगे का अपमान कर लाल किले पर बलात कब्जा जमा लिया। तमाम इस प्रकार के भडकाऊ वीडियो सामने आ रहे है जिनमें 26

 

जनवरी पर आयोजित टेक्टर परेड के पूर्व रात्रि को यह आंदोलनकारी अलग अलग गुटों में भडकाऊ भाषण देते दिखाई दे रहे  हैं। जिस दिन से यह आंदोलन दिल्ली पहुंचा है उसी दिन से यहां खालिस्तान समर्थक पोस्टर बैनर लहराए जाने लगे थे। यहां देश के तमाम गद्दारों व अर्बन नक्सलियों की रिहाई के पोस्टर भी खुलेआम लगाए गए यह बात हम यूँही नहीं लिख रहे हैं इसके बाकायदा वीडियो व तस्वीरें मौजूद हैं। इन आंदोलनकारियों में हो सकता है कुछ किसान हों लेकिन इस आंदोलन को पूरी तरह कुछ देश विघातक शक्तियों ने हाईजैक करके इन किसानों को अपना मोहरा बना

लिया है और अब वह इस देश को टुकड़े टुकड़े करने के अपने एजेंडे को साकार करने में जुट गए हैं। इनको न केवल हमारे देश में आस्तीन के सांपो की तरह से छुपे बैठे अर्बन नक्सलियों व टुकड़े टुकड़े गैंग से खाद पानी मिल रहा है बल्कि देश के बाहर कनाडा,अमेरिका पाकिस्तान ,तुर्की जैसे देशों में सक्रीय खालिस्तान समर्थक देश तोडू शक्तियों से भी मदद मिल रही है। कनाडा के राष्ट्राध्यक्ष टूटू तो खुलेआम इनके पक्ष में बयान तक दे चुके हैं। आखिर इस तरह की हिंसक व देश को नुकसान पहुंचाने वाली ताकतों को किसान कैसे कहा जा सकता है। किसान कभी भी अपने राष्ट्रीय ध्वज का अपमान नहीं कर सकते,वे कभी भी खालिस्तान समर्थक पोस्टर झंडे नहीं लहरा सकते , वे कभी भी अपने ही

देशवासियों पर तलवारों से हमला नहीं बोल सकते,वे कभी भी  शांतिपूर्ण तरीके से अपनी डयूटी दे रहे पुलिसकर्मियों पर टैक्टर नहीं चढ़ा सकते और सबसे बड़ी बात तो यह है की इतने लम्बे समय तक कोई भी किसान अपने खेत छोड़कर हिंसक व गलत दिशा में मुड़ चुके किसी धरना प्रदर्शन आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सकते। सबसे बड़ा सवाल तो यह है की इस आंदोलन को केवल पंजाब हरियाणा व पश्चिमी

उत्तरप्रदेश से ही समर्थन क्यों मिल रहा है ? पूरे देश के किसान इसमें शामिल क्यों नहीं हो रहे ? एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह भी है की देश के सबसे बड़े किसान संगठन भारतीय किसान संघ सहित कई अन्य तमाम किसान संगठनों ने साफ तौर पर इस आंदोलन को समर्थन नहीं दिया है । 26 जनवरी की हिंसा व राष्ट्रीय ध्वज के अपमान के बाद आंदोलन में भृमित कर लाए गए कई संगठनों ने खुद को इससे अलग करके घर वापसी का ऐलान कर दिया । यही वजह थी की 26 जनवरी के टेक्टर परेड से पहले सरकार को केंडी बताकर झंडों में मोटे डण्डे लगाकर भडकाऊ भाषण देने वाले राकेश टिकैत ने घड़ियाली आंसूं बहाकर इमोशनल

कार्ड खेला। अब यही लोग अहिंसा के पुजारी बापू की पुण्यतिथि पर उनके समाधिस्थल पर उपवास शांति व सद्भावना की बात कर देशवासियों को भृमित करने का प्रयास कर रहे हैं। क्या वास्तव में इन हिंसाचारियों को अहिंसा के पुजारी की समाधि पर यह ढोंग करने का हक है। इन्हें सबसे पहले तो अपने हिंसक व राष्ट्रविरोधी कृत्य पर देशवासियों से माफी मांगना चाहिए।

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