नई दिल्ली /सांस रोककर जिसका इंतज़ार हो रहा था, वो ख़बर आ ही गई. पिछले साल भारत की जीडीपी में गिरावट आशंका से कम रही है और साल की चौथी तिमाही में जितने सुधार का अनुमान लगाया गया था, उससे कुछ बेहतर आंकड़ा सामने आया है.
लेकिन यह जीडीपी के मोर्चे पर पिछले 40 साल से भी ज़्यादा वक़्त का सबसे ख़राब प्रदर्शन है.
फिर भी आंकड़ों पर नज़र रखने वाले अर्थनीति के जानकार कुछ चैन की सांस ले रहे हैं.
वजह यह है कि वित्त वर्ष 2020-21 के लिए जहां क़रीब 8 फ़ीसदी गिरावट का अनुमान लगाया जा रहा था. वहीं यह आंकड़ा 7.3 प्रतिशत पर ही थम गया है. और उस साल की चौथी तिमाही में यानी जनवरी से मार्च के बीच जहां 1.3% बढ़त का अंदाज़ा था वहां 1.6% बढ़त दर्ज हुई है.
साल की पहली दो तिमाहियों में ज़बर्दस्त गिरावट के बाद तीसरी तिमाही यानी अक्टूबर से दिसंबर के बीच भारत की जीडीपी में मामूली बढ़त दर्ज हुई थी.
0.4% की यह बढ़त उत्साहजनक तो नहीं थी लेकिन इतना संतोष ज़रूर देती थी कि लगातार तीसरी तिमाही मंदी में नहीं बीती. अब संशोधित अनुमान में यह आंकड़ा 0.5% हो गया है. यानी कुछ और बेहतर. और यही भारत की अर्थव्यवस्था के मंदी से उबरने का औपचारिक संकेत भी था.
क्या मानकर चल रहे जानकार
ज़्यादातर जानकारों को उम्मीद यही थी कि फ़रवरी 2021 में कोरोना की दूसरी लहर शुरू होने के बावजूद पिछले वित्त वर्ष की चौथी तिमाही यानी इस साल जनवरी से मार्च के बीच भी इकोनॉमी में कुछ सुधार ही नज़र आएगा.
स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया का नाउकास्टिंग मॉडल यानी भविष्यवाणी के बजाय वर्तमान का हाल बताने वाले गणित के हिसाब से इस दौरान जीडीपी में 1.3% की बढ़त दिखनी चाहिए थी.
ज़ाहिर है तस्वीर बेहतर दिख रही है. लेकिन इन्हीं आंकड़ों में कुछ गहरी चिंताएं भी छिपी हैं. ख़ासकर चौथी तिमाही में जो ग्रोथ रेट दिख रही है वो परेशान करने वाली है.
याद रखिए कि पिछले साल मार्च में लगा लॉकडाउन जून में ख़त्म हो गया था और जुलाई से अनलॉक यानी दोबारा काम धंधे शुरू करने का काम चल रहा था. दिसंबर आते आते क़रीब क़रीब सब कुछ खुल चुका था.
कोरोना की दूसरी लहर का नामोंनिशान भी नहीं था और हालात सामान्य हो चुके थे. कम से कम मान तो लिया ही गया था कि सब कुछ ठीक है. ऐसे में उस तिमाही के लिए सिर्फ़ 1.6% की ग्रोथ दिखाती है कि अर्थव्यवस्था की हालत नाज़ुक है