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इस छापामार कार्यवाही पर विधवा विलाप क्यों ?

 प्रवीण दुबे

आज प्रातः से ही देश के लीडिंग अखबारों में से एक दैनिक भास्कर के विभिन्न कार्यालयों पर आयकर की छापेमारी की खबर सरगर्म है इसके साथ ही इसपर राजनीति भी शुरू हो गई है। हमेशा की तरह कांग्रेस ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर सरकार का हमला निरूपित किया है। बड़ी हैरानी होती है साथ ही आश्चर्यजनक भी लगता है जब कांग्रेस की तरफ से इस प्रकार की प्रतिक्रियाएं आए दिन सुनने को मिलती है। एक कहावत भी कांग्रेस के इस कृत्य पर ध्यान आ जाती है “सूप बोले सो बोले छलनी क्या बोले जिसमें बहात्तर छेद” इस बात से कतई इंकार नहीं है कि देश में अभिव्यक्ति की आजादी होना ही चाहिए हमारा संविधान भी इसका समर्थन करता है ,लेकिन यह भी उतना ही सच है कि किसी भी विषय पर अपने विचार अभिव्यक्त करने के पहले देशहित के साथ देश काल परिस्थितियों का ध्यान रखना भी बेहद आवश्यक है। अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में वह सब लिखने बोलने की अनुमति किसी को नहीं दी जा सकती जिससे देश की छवि पूरी दुनिया में खराब होती है।  फिलहाल कांग्रेस व वामपंथी विचारों के पालित पोषित लोगो  के अलावा यह कोई नहीं कह सकता कि भास्कर पर जारी आयकर की छापेमारी के पीछे सरकार की कोई राजनीतिक मंशा अथवा सरकार के खिलाफ लिखने बोलने वालों की बोलती बंद करना उद्देश्य है। यह सामान्य सरकारी प्रक्रिया भी हो सकती है ,लेकिन जिस तरह से कांग्रेस ने इसपर हमला बोला है उसने जरूर इस घटनाक्रम को राजनीतिक रंग  दे दिया है। इस तरह की प्रक्रिया व सीधे सरकार पर हमला बोलने से पहले देश की इस सबसे पुराने राजनीतिक दल ने यह भी विचार नहीं किया कि वह खुद आजादी के बाद लगभग सत्तर वर्षों से भी अधिक समय तक सत्तासीन रही है। इस दौरान उसने एक नहीं अनेक मौकों पर न केवल तानाशाही का खुला प्रदर्शन किया बल्कि अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने के दुनिया में सबसे  काले अध्याय आपातकाल  की जनक भी खुद कांग्रेस ही रही है। यह वही कांग्रेस है जिसने देश पर आपातकाल थोपकर न केवल लोकतंत्र का गला घोंटने का काम किया था बल्कि देशभर के मीडिया हाउसेस पर ताला डलवा दिया था अखबारों के तमाम रिपोर्टर व सम्पादकों को जेल में डालकर उन्हें यातनाएं देने का काम एक दो दिन नहीं बल्कि पूरे उन्नीस महीनों तक इसी कांग्रेस ने किया। अभिव्यक्ति की आजादी की बात करने वाली कांग्रेस यह भूल रही है कि उसने कैसे व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए  नेशनल हेराल्ड जैसे अखबार को पलीता लगा दिया। आज कांग्रेस “नो सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली” कहावत को चरितार्थ कर रही है। पूरे देश ने यह देखा है कि जब कोरोना महामारी के समय देश में मातम छाया हुआ था बड़े बड़े विशेषज्ञ सकारात्मक माहौल बनाने पर जोर दे रहे थे तब देश के कुछ मीडिया हाउस लीड स्टोरी बनाकर श्मशान में जलती लाशों  को छाप रहे थे,गंगा में तैरती लाशों पर विश्लेषण करके देश की परेशान जनता में भय का वातावरण निर्मित किया जा रहा था। बाद में इसी सामग्री का विदेशी मीडिया ने उपयोग करके पूरी दुनिया में भारत की छवि खराब करने का षडयंत्र किया गया। यह बात हम नहीं लिख रहे हाल ही में भारतीय जनसंचार संस्थानआई आई एम सी के दुनिया भर में कराए गए एक सर्वेक्षण में भी यह  बात सामने आईं है। अतः जरूरी है कि मीडिया हाउसेस भी देश काल परिस्थिति के अनुसार अपनी जिम्मेदारियों को समझे। 

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