प्रवीण दुबे
लगता है कि भारतीय जनता पार्टी शीर्ष नेतृत्व ने बंगाल चुनाव से कोई सबक नहीं लिया है । जैसे की संकेत मिल रहे हैं पार्टी नेतृत्व बंगाल चुनाव की ही तर्ज पर उत्तरप्रदेश चुनाव में भी प्रचार हेतु बड़ी संख्या में अन्य प्रदेशों के तमाम छोटे बड़े नेताओं का उपयोग करने का मन बनाती दिख रही है।
मध्यप्रदेश की बात की जाए तो सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार यूपी विधानसभा चुनाव मध्यप्रदेश के BJP नेताओं को बड़ी जिम्मेदारी देने की तैयारी है इसमें केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को 11 जिलों में प्रचार की कमान मिलना तय मानी जा रही है जैसे की संकेत हैं उसके अनुसार झांसी-आगरा बेल्ट की कई सीटों पर सिंधिया के चेहरे का इस्तेमाल पार्टी करेगी।
उधर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी स्टार प्रचारकों की सूची में शामिल करने के साथ साथ केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और प्रदेश के गृहमंत्री डॉ.नरोत्तम मिश्रा पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती को MP की सीमा से सटे जिलों में अहम जिम्मेदारी दिए जाने के संकेत हैं।
मुख्यमंत्री शिवराज 19 दिसंबर को बलिया में जन विश्वास यात्रा का शुभारंभ भी करने जाएंगे। इसी तर्ज पर देश के अन्य प्रदेशों के नेता भी उत्तरप्रदेश में चुनावी दौरे करेंगे।
देशभर से बड़ी संख्या में पार्टी के कार्यकर्ताओं की सूचियां भी तैयार की जा रही हैं जिनको उत्तरप्रदेश में विविध चुनाव कार्य के लिए जिम्मेदार दी जाएंगी।
यूं तो जबसे अमित शाह ने पार्टी के अध्यक्ष की कमान संभाली या यूं कहें की भाजपा में मोदी युग की शुरुआत से ही चुनाव प्रचार के लिए अन्य प्रदेशों के नेताओं कार्यकर्ताओं के उपयोग की परंपरा की शुरुआत हुई और यह प्रयोग सफल भी रहा लेकिन पिछले बंगाल चुनाव में पार्टी की हार के बाद हुई समीक्षा में यह कड़वा सच सामने आया कि बंगाल में बड़ी संख्या में बाहरी नेताओं कार्यकर्ताओं की सक्रीयता भी पार्टी के हर का कारण बनी।
बड़े नेताओं के लगातार दौरों और छोटे छोटे चुनावी कामों की कमान भी बाहरी कार्यकर्ताओं के सुपुर्द होने से स्थानीय नेता व कार्यकर्ता निष्क्रिय हो गये।
उनके बीच यह अंडर करेंट फैल गया कि पार्टी उन पर विश्वास नहीं करती । जो स्थानीय कार्यकर्ता व नेता सक्रीय थे भी वे बाहरी बड़े नेताओं की रैलियों,व अन्य कार्यक्रमों की व्यवस्था में जुटे रहे। परिणामस्वरूप बाहरी नेता कार्यकर्ता जमीनी हकीकत से अनभिज्ञ रहे,जो भीड़ कार्यक्रमों में दिखाई दे रही थी वो वोटों में तब्दील नहीं हो सकी।
परिणाम पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा। कमोवेश उत्तरप्रदेश भी बंगाल की ही तरह एक बड़ा राज्य है । यहां भी भाजपा बंगाल की तर्ज पर ही बाहरी नेताओं का उपयोग करने की रणनीति पर काम कर रही है।
जहां तक स्टार प्रचारकों अथवा चुनावी सभाओं में भीड़ खींचू व जातिगत वर्चस्व वाले नेताओं के उपयोग की बात है वह काफी हद तक सही है और इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता है।
लेकिन उत्तरप्रदेश जैसे राज्य जहां भाजपा का जमीनी स्तर तक बड़ा नेटवर्क है वहां अन्य प्रदेशों के कार्यकर्ताओं नेताओं की रैलियां,सभाएं व अन्य चुनावी कार्यों में स्थाई रूप से उपयोग की रणनीति का स्थानीय पार्टी कार्यकर्ताओं नेताओं पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है।
खासकर के उस परिस्थिति में जब देशभर के तमाम नेता कार्यकर्ता पूर्णकालिक बनकर विधानसभा वार स्थानीय कार्यालयों में डेरा डालेंगे ।
जानकारों जिन्होंने कि बंगाल चुनाव में पार्टी की हार के बाद समीक्षा की यह पाया कि चुनाव के एक दो माह पहले से बड़ी संख्या में बंगाल पहुंचे तमाम नेता कार्यकर्ताओं की फौज ने पार्टी के स्थानीय जमीनी नेतृत्व के दिमाग पर विपरीत प्रभाव डाला।
इतना ही नहीं स्थानीय स्थिति परिस्थितियों के जानकार कार्यकर्ता जिन्हें की चुनावी कार्य में जुटना चाहिए था वह पार्टी के बड़े व बाहरी नेताओं व पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की आव भगत व व्यस्थाओं में लगे रहे यही वजह रही की पार्टी का प्रचार केवल हवा हवाई ही बनकर रह गया ।