प्रवीण दुबे
सर्वविदित है कि भाजपा मध्यप्रदेश में जितने लम्बे समय से सत्तासीन है उस दौरान प्रदेश के अधिकांश बड़े नेताओं की नई पीढ़ी न केवल ढाड़ी मूंछ वाली बन गई बल्कि एक विशिष्ट अंदाज में समाज के निकट आकर खुद को अपने पिता या परिवार की राजनीतिक विरासत को अंगीकार करने का संदेश देती भी दिखाई दी है। इनमें कई नेतापुत्र तो अच्छी खासी मेहनत और लगन के साथ जनता के बीच उनके सुख दुख में भी लगातार दिखाई दे रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या नेतापुत्रों या परिवारवाद को लेकर पार्टी ने जो नजरिया अंगीकार किया है क्या वह सही है ? क्या कोई युवा जिसमें की अच्छे राजनीतिज्ञ के गुण विधमान हैं उसे अपने पिता या परिवार की वजह से राजनीति में आने का हक नहीं है ? इन सवालों के जवाब आज नेपथ्य में समा गए हैं। भाजपा हो या कांग्रेस अथवा कोई अन्य राजनीतिक दल वहां सिर्फ इस कारण से किसी युवा को नजरअंदाज करना सही नहीं है कि वह किसी नेता का पुत्र है अथवा किसी विशिष्ट राजनीतिक परिवार का वारिस है। यदि कोई भी युवा जनता के बीच लोकप्रिय है,उसकी ईमानदार छवि है,पढ़ा लिखा है व सदैव जनहित व लोककल्याण के कार्य करता रहा है तो भले ही वह नेतापुत्र क्यों न हो उसे राजनीति में अवसर मिलना ही चाहिए। परिवारवाद उस स्तर पर जरूर भस्मासुर बन जाता है जब पार्टी को एक राजनीतिक दल की जगह प्रायवेट लिमिटेड कंपनी समझ लिया जाता है
किसी भी राजनीतिक दल का अपना संविधान होता है ,कुछ सिद्धान्त होते हैं उसपर अमल करना बहुत अच्छी बात है लेकिन वर्तमान में राजनीति के गिरते स्वरूप ने सब कुछ बदलकर रख दिया है कई बार पार्टियों को इससे समझौता करना होता है देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस इसका बड़ा प्रमाण है, इस दृष्टि से वर्तमान में देश दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा की इस बात के लिए तारीफ की जाना चाहिए यहां अनुशासन व सिद्धांतों को न केवल प्राथमिकता दी जाती है बल्कि उन्हें लागू करने के लिए कठोर निर्णय भी लिए जाते हैं। अब जबकि मध्यप्रदेश में नगरीय निकाय चुनाव की घोषणा हो चुकी है ,अगले वर्ष विधानसभा चुनाव भी होने हैं पार्टी अध्यक्ष जगतप्रसाद नड्डा ने अपने मध्यप्रदेश प्रवास के दौरान पार्टी में परिवारवाद कल्चर पर बड़ी बात कही हालांकि पार्टी संगठनमंत्री और प्रधानमंत्री पहले ही इसपर बोल चुके हैं लेकिन मध्यप्रदेश में जब पार्टी चुनावी मोड पर है उस समय कड़ा संदेश देना काबिले तारीफ है । भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि कोई भी निर्वाचन क्षेत्र किसी नेता की जागीर नहीं रहेगा। पिता के टिकट पर पुत्र का उत्तराधिकार नहीं रहेगा। उन्होंने कहा कि पिता के बाद बेटे को टिकट देने की प्रवृत्ति पर रोक लगाई जाए। नेता पुत्रों को साधुवाद लेकिन सभी जान लें कि टिकट तो कार्यकर्ताओं को ही मिलेगा। उन्होंने हिमाचल प्रदेश और मप्र की दो सीटों के विधानसभा उपचुनाव का उदाहरण देते हुए कहा कि यहां हम परिवारवाद को आगे बढ़ाते तो चुनाव जीत जाते लेकिन हमने हार स्वीकारी। इन बयान को लेकर मध्यप्रदेश में कई दिग्गजों के होश उड़ा दिए हैं। खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह,प्रदेश के दमदार भाजपा नेता व केंद्रीयमंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया एक अन्य छत्रप व केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, प्रदेश सरकार के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा , पार्टी के पूर्व उपाध्यक्ष प्रभात झा,महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुकीं माया , ज्योतिरादित्य सिंधिया की बुआ व प्रदेश सरकार की मंत्री यशोधरा राजे , भाजपा संगठन के बड़े नेता कैलाश विजयवर्गीय सहित कई अन्य बड़े नेताओं को पार्टी अध्यक्ष की यह बात अवश्य कड़वी लगी होगी। सर्वविदित है कि भाजपा मध्यप्रदेश में जितने लम्बे समय से सत्तासीन है उस दौरान प्रदेश के अधिकांश बड़े नेताओं की नई पीढ़ी न केवल ढाड़ी मूंछ वाली बन गई बल्कि एक विशिष्ट अंदाज में समाज के निकट आकर खुद को अपने पिता या परिवार की राजनीतिक विरासत को अंगीकार करने का संदेश देती भी दिखाई दी है। इनमें कई नेतापुत्र तो अच्छी खासी मेहनत और लगन के साथ जनता के बीच उनके सुख दुख में भी लगातार दिखाई दे रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या नेतापुत्रों या परिवारवाद को लेकर पार्टी ने जो नजरिया अंगीकार किया है क्या वह सही है ? क्या कोई युवा जिसमें की अच्छे राजनीतिज्ञ के गुण विधमान हैं उसे अपने पिता या परिवार की वजह से राजनीति में आने का हक नहीं है ? इन सवालों के जवाब आज नेपथ्य में समा गए हैं। भाजपा हो या कांग्रेस अथवा कोई अन्य राजनीतिक दल वहां सिर्फ इस कारण से किसी युवा को नजरअंदाज करना सही नहीं है कि वह किसी नेता का पुत्र है अथवा किसी विशिष्ट राजनीतिक परिवार का वारिस है। यदि कोई भी युवा जनता के बीच लोकप्रिय है,उसकी ईमानदार छवि है,पढ़ा लिखा है व सदैव जनहित व लोककल्याण के कार्य करता रहा है तो भले ही वह नेतापुत्र क्यों न हो उसे राजनीति में अवसर मिलना ही चाहिए। परिवारवाद उस स्तर पर जरूर भस्मासुर बन जाता है जब पार्टी को एक राजनीतिक दल की जगह प्रायवेट लिमिटेड कंपनी समझ लिया जाता है कांग्रेस,समाजवादी पार्टी सहित कई पार्टियां इसका उदाहरण हैं और लगातार पराभव की ओर अग्रसर हैं। परिवारवाद या नेतापुत्रों अथवा किसी अन्य दल से सशर्त एंट्री करने वालों पर पूरी तरह से रोक लगा पाना बेहद कठिन है और कई बार पार्टी को अपनो की ही नाराजगी का सामना भी करना पड़ता है । ऐसी स्थिति को टालने के लिए पार्टी के नीतिनिर्माताओं को गहन मंथन की आवश्यकता है यह भी किया जा सकता है कि परिवारवाद तथा अन्य दलों से सशर्त एंट्री चाहने वालों के लिए पार्टी द्वारा अपने संविधान में कुछ सालों के लिए पहले संगठन में काम करने की प्राथमिकता को अनिवार्य कर दिया जाए,इस दौरान न टिकट न कोई पद केवल पार्टी का संगठनात्मक कार्य ही करना होगा उसपर जो खरा उतरेगा उसे ही सत्ता या संगठन में आगे बढ़ाया जाएगा।