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केवल एकदूसरे पर ठीकरा फोड़ने से नहीं मिटने वाला ग्वालियर की हार का बदनुमा दाग

प्रवीण दुबे

चौतरफा अनकूल परिस्थियां ,कद्दावर नेताओं के साथ खुद मुख्यमंत्री के प्रवास, विकास कार्यों की लंबी जुमलेबाजी और प्रशासन के  रूप में  सजी चतुरंगिणी सेना का साथ फिर भी हार का दाग निःसंदेह बेहद चिंतनीय कहा जा सकता है।

 

मोदी राज में कहीं से भी कमल दल प्रत्याशी की हार की हल्के में नहीं लिया जाता फिर यह तो ग्वालियर की हार है अर्थात वह ग्वालियर जिसे कमल दल का गढ़ कहकर प्रचारित किया जाता है ,यह वह ग्वालियर है जहां सिंधिया का शोर और नरेंद्र सिंह के कसीदों की गूंज देश की राजधानी तक में सुनाई देती है यह वह ग्वालियर है जहां भगवादल की मातृ संस्था आरएसएस की पाठशाला में राजनीति का ककहरा सीखने वाले पवैया और सांसदी के आसन को सुशोभित करने वाले शेजवलकर की संगठन निष्ठा की मिसालें दी जाती हैं। यह वही ग्वालियर है जहां 57 वर्षों में शहर के प्रथम नागरिक की कुर्सी पर सिर्फ भगवा चोलाधारी का ही विजयी परचम लहराता रहा। 

चौतरफा अनकूल परिस्थियां ,कद्दावर नेताओं के साथ खुद मुख्यमंत्री के प्रवास, विकास कार्यों की लंबी जुमलेबाजी और प्रशासन के  रूप में  सजी चतुरंगिणी सेना का साथ फिर भी हार का दाग निःसंदेह बेहद चिंतनीय कहा जा सकता है।
 आखिर कौन है इसके लिए जिम्मेदार ?जनता ने क्यों नकार दिया प्रथम नागरिक के रूप में प्रस्तुत चेहरे को ? कहां चूक हो गई ? अब इसको लेकर ग्वालियर से भोपाल और दिल्ली तक छाती पीट रुदाली सुनाई दे रही है। 
कोई प्रशासन को जिम्मेदार ठहरा रहा है तो कोई पर्ची मैनेजमेंट को ,इस हार के पीछे जातिवाद और पार्टी की खेमेबंदी को भी दोषी ठहराया जा रहा है ।
बड़े बड़े होटलों  में बैठकर खाओ पीयो मौज करो की संस्कृति तथा शीर्ष नेतृत्व को हवाई सब्जबाग का संदेश प्रेषित करके आंखों में धूल डालने की बात भी अब सामने आ रही है।
 यह भी सुनाई दे रहा है कि पार्टी को सम्भाग स्तर से सँगठन मंत्रियो को वापस बुलाने का खामियाजा भुगतना पड़ा है।  जितने मुंह उतनी ही बातें की जा रही हैं। 
पार्टी के कर्ता धर्ताओं को इन सबकी जानकारी क्या पहले से नहीं थी ? ग्वालियर में मुख्यमंत्री से लेकर केंद्रीय मंत्रियों ने चुनाव से पूर्व दौरा किया क्या उन्हें कार्यकर्ताओं और जनता के बीच धधकती आग का अहसास नहीं हुआ ? 
क्या इसकी जान बूझकर अनदेखी नहीं की गई ? इसके प्रति कड़ा रुख अपनाने के बजाए पट्ठेबाजी के लिए लामबंदी का खेल  खेला जाता रहा ,कार्यकर्ताओं की नाराजगी को दूर करने के  मन से कोई प्रयास नहीं किये गए। 
इस हार के बाद प्रशासन के क्रियाकलापों पर भी अंगुली उठाई जा रही है, यदि प्रशासन ने ठीक से काम नहीं किया तो यह किसकी विफलता है ,मत भूलिए पूरे प्रदेश में आप ही की सरकार है,आप ही के प्रभारी मंत्री हैं यदि प्रशासन आपके ही ताबूत में कील ठोंकने का काम कर रहा है तो यह आपकी ही घोर असफलता और नाकारापन का प्रतीक है। 
प्रशासनिक अमले की इस नाकारापन्ती का शिकार शहर की जनता न जाने कितने समय से होती आ रही है लेकिन हमारे प्रभारी मंत्री से लेकर तमाम मंत्री ,जन प्रतिनिधि इसके प्रति आंख मूंदे रहे अब हालात यहां तक आ पड़े कि चुनाव तक में प्रशासनिक अमला सत्ताधारी दल के लिए ही भस्मासुर बन गया।
 अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि पार्टी नेतृत्व ग्वालियर में हुई फजीहत व छीछालेदर से कैसे निपटने वाला है चूंकि अगले वर्ष चुनाव है अतः कमियों पर आंख मूंदकर बैठने अथवा यह कह देने से काम नहीं चलने वाला की प्रशासन ने विकास कार्य नहीं किए इस कारण महापौर हारीं । 
प्रशासन ने क्यों काम नहीं किया ? आखिर प्रशासन के नाकारापन को पूरी सरकार चुपचाप क्यों देखती रही ?  
अब समय नहीं है प्रशासनिक अधिकारियों के साथ मंत्रियों व तमाम जन प्रतिनिधियों को वाट्सएप पर लुभावनी फोटो डालकर जनता को बेवकूफ बनाने का काम बंद करना ही होगा अन्यथा विधानसभा चुनाव में भी महापौर चुनाव की भांति ये प्रशासन नस्तर बनकर आपको समाप्त कर देगा। 
अब जनता व कार्यकर्ताओं की पीढ़ा का अहसास भी सत्ताधारी दल को हो जाना चाहिए होटलों में बैठकर हवाई संस्कृति को छोड़ कार्यकर्ताओं व जनता के बीच जाने का क्रम तुरन्त शुरू करने की जरूरत है।
 केवल पन्ना प्रमुख बनाकर ऊपर जानकारी भेजने व किसी बड़े संगठन नेता के आगमन पर अपने चंद पट्ठों के बीच होटलों में स्वादिष्ट भोजन करके जमीनी हकीकत पर पर्दा डालने के खेल को तत्काल विराम देना होगा ।
पार्टी को मूल रीतियों नीतियों पर लौटाने की जिम्मेदारी और जवाबदेही तय करने का समय आ गया है यदि इसमें तनिक भी देर की गई तो आने वाले विधानसभा के परिणाम और अधिक घातक हो सकते हैं।

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