प्रवीण दुबे
“जस की तस धर दीनी चदरिया ”
आज के भौतिकता वादी युग में बहुत कम लोगों पर उक्त लोकोक्ति खरी उतरती है लेकिन शिक्षाविद डॉ प्रशांत दुबे ने अपने कार्य क्षेत्र व समाज जीवन में शुचिता, कर्मठता, ईमानदारी की ऐसी लकीर खींची की संबंधित लोकोक्ति चरितार्थ हो उठी।
वे एक महान शिक्षाविद तो थे ही साथ ही अपने छात्र जीवन में एक अच्छे खिलाड़ी छात्रनेता, शोधार्थी भी थे।
बड़े अफसोस की बात है जब हमारी देश की पुरातन शान कहे जाने वाली गणित विषय के प्रति हमारी आने वाली पीढ़ी कमजोर ओर भयभीत सी दिखाई देती है उसके लिए यह विषय अरुचिकर होता जा रहा है ऐसे में डॉ प्रशांत दुबे जैसे कुशल गणितज्ञ का असमय अचानक चले जाना समाज के लिए एक बड़ी क्षति कही जा सकती है।
29 दिसंबर 1961 में जन्में डा प्रशांत दुबे का बचपन से ही शिक्षा के प्रति विशेष लगाव था।
चूंकि उनके बाबा डॉक्टर विद्यासागर दुबे देश के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक थे ओर रात दिन पठन पाठन व शोध में व्यस्त रहते थे
अतः बालक प्रशांत के जीवन पर उनकी गहरी छाप पड़ी । बचपन से ही उन्होंने अपनी कुशाग्र बुद्धिमता का परिचय देते हुए स्कूली शिक्षा अच्छे अंकों से पूर्ण की।
चूंकि उन्हें गणित विषय अत्यंत प्रिय था अतः ग्वालियर में उस समय के सर्वश्रेष्ठ विज्ञान महाविद्यालय में शामिल साइंस कॉलेज में गणित विषय के साथ प्रवेश मिल गया।
यहां से उन्होंने स्नातक की उपाधि प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इसके साथ ही एक अच्छे क्रिकेट खिलाड़ी और डिवेडर के रूप में भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी ।
आगे के अध्यन के लिए डॉ प्रशांत दुबे ने जीवाजी विश्वविद्यालय अध्यन शाला में प्रवेश लिया ।
अपने शानदार कार्य व्यवहार और मेधाविता के कारण वे विद्यार्थियों के बीच बहुत लोकप्रिय थे सभी साथियों की सहमति के साथ उन्होंने विश्वविद्यालय छात्रसंघ का चुनाव लड़ा और विजय होने के साथ एक अच्छे छात्र नेता के रूप में भी अपनी पहचान स्थापित की।
जीवाजी विश्वविद्यालय से एमएससी की उपाधि प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के बाद शोध कार्य के लिए डॉ प्रशांत दुबे ने आगरा की ओर रुख किया उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय के जाने माने गणितज्ञ डॉक्टर गोकुल चंद शर्मा के मार्गदर्शन में शोधकार्य प्रारंभ किया ।
यहां उन्होंने एम फिल और उसके बाद पीएचडी की उपाधि प्राप्त की इसके साथ ही उनके कई शोधपत्र भी दुनियाभर की शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए।
डॉ दुबे के छात्र जीवन का अधिकांश समय जहां शैक्षणिक गतिविधियों को समर्पित रहा वहीं अपनी आजीविका संचालन के लिए भी डॉ दुबे ने शिक्षा क्षेत्र को ही चुना उन्होंने महाविद्यालयीन शिक्षक के रूप में नौकरी की शुरुआत छत्तीसगढ़ के धुर आदिवासी जशपुर नगर जो कि तत्कालीन समय में संयुक्त मध्यप्रदेश का हिस्सा था से की,बाद में उन्होंने ग्वालियर के मुरार गर्ल्स कॉलेज ,आलमपुर महाविद्यालय और आदर्श विज्ञान महाविद्यालय में एक श्रेष्ठ शिक्षा विद के रूप में अपने उत्कृष्ठ कार्य व्यवहार की छाप छोड़ी। डॉ दुबे जहां अपने सहयोगियों के प्रति सदैव सम्मान का भाव रखते थे वहीं निम्न श्रेणी कर्मचारियों के लिए भी उदारमन से सहयोग करते थे। उनके द्वारा जहां तमाम आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों की फीस,पुस्तक आदि देकर मदद की जाती थी वहीं अनेक विद्यार्थियों को निशुल्क कोचिंग भी वे पढ़ाते थे।
डॉ दुबे ने अपने सम्पूर्ण जीवन में सदैव ही शैक्षणिक कार्य को पूजा की तरह समर्पित होकर किया। कितना ही जरूरी कार्य क्यों न हो डॉ दुबे सदैव अपने नियमित शैक्षणिक कार्य को ही प्राथमिकता देते रहे।
1 फरवरी 2022 को जिस समय उन्हें ब्रेन हेमरेज हुआ वे अपनी कक्षा में पढ़ाने जाने की तैयारी कर रहे थे,किसे मालूम था डॉ दुबे का कॉलेज में आज अंतिम दिन है।
वे अचानक बेहोश होकर गिर पड़े उनके सहयोगी अस्पताल लेकर पहुंचे ,फिर दिल्ली ले जाया गया लम्बे इलाज के बाद वे धीरे धीरे स्वस्थ हो रहे थे तभी 28 जुलाई को अचानक काल के क्रूर आगमन ने उन्हें हमसे छीन लिया।
उनका उत्कृष्ठ कार्य व्यवहार और शिक्षा को समर्पित उनका पूरा जीवन सम्पूर्ण समाज को प्रेरणा देता रहेगा। उन्हें सादर श्रद्धांजलि।