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भाजपा के लिए सिर दर्द बनी एंटी इनकंबेंसी, क्या पिछड़ा कार्ड खेलने की तैयारी में है शीर्ष नेतृृत्व ?

प्रवीण दुबे

भारतीय   राजनीति में एंटी इनकंबेंसी शब्द से बड़े-बड़े धुरंधरों तक की रूह कांपती है, वर्तमान की बात करें तो मध्यप्रदेश से लेकर दिल्ली तक इस शब्द ने सत्ताधारी दल भाजपा के नीति निर्धारकों की नींद उड़ा रखी है। इसका समाधान खोजने के लिए  मध्यप्रदेश में कभी विकास यात्राएं निकाली जा रही हैं तो कभी पार्टी अध्यक्ष से लेकर संगठन के सबसे बड़े चेहरे द्वारा मुख्यमंत्री शिवराज के साथ माथा जोड़ी की जा रही है क्योंकि आलाकमान के पास मध्य प्रदेश की वरिष्ठ नौकरशाही और अन्य एजेंसियों से प्राप्त फीडबैक में यह स्पष्ट रूप से संकेत मिल रहे हैं की आगामी अक्टूबर माह मैं होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर मध्यप्रदेश में वातावरण कुछ ठीक नहीं है ।एंटी इनकंबेंसी सर चढ़कर बोल रही है और यदि इस बार पुनः पिछले चुनावों की  तरह के परिणामों को टालना है तो पार्टी को एंटी इनकंबेंसी का समाधान खोजना ही होगा। यही वजह है कि पार्टी आलाकमान से लेकर पार्टी के किंगमेकर अमित शाह की नजरें मध्य प्रदेश पर हैं और इसी के चलते शिवराज सिंह को भोपाल से दिल्ली तक लगातार भागा दौड़ी करना पड़ रही है।

शिवराज सिंह चौहान पहली बार 29 नवंबर 2005 को मुख्यमंत्री बने. उसके बाद 8 से 13 दिसंबर 2013 सीएम रहे फिर 14 दिसंबर 2013 से 17 दिसंबर 2018 तक मुख्यमंत्री बने रहे. 2018 में कमलनाथ की सरकार बनी, जो कि 15 महीने में गिर गई. इसके बाद 23 मार्च 2020 को चौथी बार शिवराज सीएम बने और उनका कार्यकाल अभी जारी है.

हाल हाल ही की बात की जाए तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने दिल्ली पहुंचकर पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात की है और पार्टी के सबसे बड़े संगठनात्मक चेहरे बी संतोष ने भी शिवराज सिंह को तलब किया है इससे पहले भी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की संघ प्रमुख मोहन भागवत से नागपुर में मुलाकात हो चुकी है । चूंकि यह चुनावी वर्ष है अतः जो राजनीति में थोड़ी बहुत समझ भी रखता है वह  साफ तौर से इन सारी सरगरयों को देख यह समझ  सकता सकता है कि शिवराज सिंह की आखिर समस्या क्या है और पार्टी किस दिशा में सोच रही है।

राजनीति के चतुर खिलाड़ी अमित शाह पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा संगठन मंत्री बी संतोष और इससे पहले संघ सुप्रीमो मोहन भागवत से मेल मुलाकातों की सच्चाई नकारी नहीं जा सकती जिस प्रकार की खबरें छनकर आ रही है उसे देखकर साफ तौर पर यह कहा जा सकता है की शिवराज से ही यह पूछा जा रहा है की पार्टी की चुनावी नैया आखिर कैसे पार होगी ? हालांकि जो गणित सामने हैं उसके मुताबिक मंत्रिमंडल मैं चार मंत्रियों की नियुक्तियां होनी है साथ ही लंबे समय से सत्ता मैं बैठे मंत्रियों को संगठन के उपयोग हेतु स्थानांतरण करने का भी यही समय है। इसको वह शांतिपूर्ण तरीके से कैसे अंजाम देंगे?

पार्टी यह भी भली प्रकार जानती है की जब सत्ता और संगठन में परिवर्तन किया जाता है तो बहुत सारे लोगों की नाराजगी का भी सामना करना पड़ता है या नाराजगी इस कारण और भारी पड़ती पड़ जाती है जब सिर पर चुनाव होते हैं ऐसी स्थिति में पहले से ही एंटी इनकंबेंसी की लटकती तलवार झेल  रहा भयभीत पार्टी नेतृत्व कोई नई समस्या  मोल नहीं लेना चाहेगा।

यह सब करना इतना आसान नहीं है सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि शिवराज सिंह की जगह आखिर कौन लेगा ? केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर दूसरे केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया व अमित शाह के नजदीकी माने जाने वाले नरोत्तम मिश्राअथवा संगठन का चेहरा वीडी शर्मा जैसे नाम प्रमुखता से लिए जा सकते हैं लेकिन यहां भी पार्टी को यह दृष्टिगत रखना होगा की यदि नरेंद्र सिंह मुख्यमंत्री बनते हैं तो ज्योतिरादित्य सिंधिया को कैसे साधा जाएगा या फिर श्री सिंधिया के सर ताज बंधता है तो  भाजपा मैं आयतित नेताओं को लेकर आवाज उठाने वालों को कैसे संतुष्ट किया जाएगा ? पार्टी नेतृत्व चुनावी वर्ष में इतने बड़ेअसंतोष को निर्मित करने का साहस दिखाएगी ऐसा लगता नहीं आखिर फिर क्या होगा? सब ऐसे ही चलता रहेगा और शिवराज सिंह के नेतृत्व में ही विधानसभा चुनाव होंगे?

पार्टी से जुड़े सूत्रों का कहना है की पार्टी के दिग्गज नीति निर्धारक इतनी आसानी से सामने दिख रही समस्या से  मुंह मोड़ कर चुप नहीं बैठने वाले अंदर ही अंदर इसको लेकर गंभीरता से मंथन चल रहा है और शिवराज सिंह चौहान भी इस मंथन का एक मुख्य चेहरा भी है यही वजह है कि उन्हें लगातार नागपुर और दिल्ली तलब किया जा रहा है। सूत्रों की माने तो गंभीर होती इस समस्या के समाधान के रूप में पार्टी कोई ऐसा चेहरा सामने ला सकती है जो सबको आश्चर्यचकित कर सकता है पार्टी ने बिहार हो या गुजरात अथवा और अन्य कई प्रदेशों में पहले भी ऐसा प्रयोग किया भी है ।पार्टी की उच्च प्राथमिकता वाले अनुसूचित जाति, जनजाति अथवा अन्य पिछड़ा वर्ग से जुड़ा कोई चेहरा भी मुख्यमंत्री के रूप में पार्टी सामने ला सकती है । क्योंकि ग्वालियर चंबल संभाग की 34 सीटों पर पार्टी की स्थिति बहुत ज्यादा अच्छी नहीं है इस कारण से इस वर्ग से जुड़े किसी व्यक्ति को सामने लाया जा सकता है ।सूत्रों का कहना है की पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारियों मैं शामिल लाल सिंह आर्य का नाम भी इस दृष्टि से लिया जा सकता है। ऐसा करके पार्टी जनता में और अपने वोट बैंक में बड़ा संदेश तो  देने की स्थिति मैं  रहेगी ही साथ ही पार्टी के बड़े छत्रपों के बीच संभावित जंग से होने वाले नुकसान से भी बच जाएगी। इसके अलावा मंत्रिमंडल में भी नए चेहरे के अनुसार लोगों को स्थान दिया जा सकेगा साथ ही कुछ लंबे समय से सत्ता का सुख भोग रहे लोगों को संगठन के कार्य मैं भी लगाया जा सकेगा।

माना जा रहा है कि मौजूदा मंत्रिमंडल से करीब 6 से 8 चेहरों को संगठन में भेजा जा सकता है. जबकि 10 से 12 नए चेहरों को मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है. फिलहाल सामाजिक समीकरण के हिसाब से 10 राजपूत, 8 ओबीसी, 4 एसटी, 3 एससी और दो ब्राह्मण चेहरों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है. इस समीकरण को और व्यवस्थित करने की तैयारी चल रही. फिलहाल अंतिम फैसला नहीं लिया गया है. इसके लिए एक दौर की बैठक अभी और हो सकती है जिसके बाद ही मंत्रिमंडल विस्तार तय होगा.

आपको बता दें कि इसी साल अक्टूबर महीने में मध्य प्रदेश समेत राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव  होने हैं. ऐसे में भारतीय जनता पार्टी के लिए मध्य प्रदेश राजनीतिक लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है. 230 विधानसभा सीटों वाले मध्य प्रदेश में फिलहाल भारतीय जनता पार्टी के 122 विधायक हैं, जबकि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के अलावा 30 मंत्री हैं. फिलहाल मंत्रिपरिषद में 4 पद खाली हैं. यानी मंत्रिमंडल की संख्या अधिकतम 35 की जा सकती है. मौजूदा मंत्रिमंडल को देखें तो सरकार में सामाजिक समीकरण बैठाने की कोशिश की गई है. लेकिन लंबे समय से मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार होने के चलते एंटी इनकंबेंसी की भी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है. यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी मार्च में बड़े कैबिनेट फेरबदल की तैयारी में है.

 

 

 

 

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