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पत्रकारों का शोषण करते मीडिया संस्थान, पेट पालने बेचने को मजबूर हैं पोहा चाय और पान

प्रवीण दुबे
हिंदी चैनल जी न्यूज को 2018 में दिए एक खास इंटरव्यू में पीएम मोदी ने राजनीति, अर्थव्यवस्था, अंतराष्ट्रीय मसले और कूटनीति से लेकर रोजगार तक के मुद्दों पर बात की थी। उनसे जब एंकर सुधीर चौधरी ने सरकार द्वारा किए गए रोजगार के अवसर पैदा करने के वादे के मामले पर सवाल किया था तब पीएम मोदी ने पकौड़ा तलने का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा था कि अगर जी टीवी के बाहर कोई व्यक्ति पकौड़ा बेच रहा है तो क्या वह रोजगार होगा या नहीं? प्रधानमंत्री मोदी की बात 100 फ़ीसदी सच कही जा सकती है। शायद उसी का अनुसरण करते एक मजबूर पत्रकार ने देश के एक बड़े मीडिया संस्थान के बाहर पोहे बेचने का ठेला ज़रूर लगा लिया है। इससे पहले भी बड़े मीडिया संस्थानों के शोषण का शिकार हो चुके कुछ अन्य मीडिया पर्सन के भी पान ,चाय आदि बेचे जाने की खबरें सामने आ चुकी हैं।
लेकिन कोई पत्रकार ऐसा करने को मजबूर हो जाए तो यह बेहद चिंता का विषय कहा जा सकता है। एक के बाद एक ऐसे मामले देखने को मिल रहे हैं जब पत्रकार कलम छोड़कर पोहा बेचने चाय का ठेला लगाने और पान की दुकान सजाने जैसे कार्य करने को मजबूर हो रहे हैं सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर वह कौन सी बात है जो पत्रकारों को ऐसा करने के लिए मजबूर कर रही है ?  दरअसल, सोशल मीडिया पर इन दिनों एक फोटो काफी वायरल हो रही है. इस फ़ोटो में एक स्टॉल दिख रहा है, जिस पर लिखा है ‘पत्रकार पोहा वाला’. इस पोहा स्टाल के मालिक हैं दद्दन विश्वकर्मा, जो इस काम को शुरू करने से पहले पत्रकार थे. 37 वर्षीय इंदौर निवासी ददन विश्वकर्मा ने IIMC यानी Indian Institute of Mass Communication से अपनी पत्रकारिता की पढ़ाई की है. उनकी FB प्रोफाइल के मुताबिक उन्होंने पढ़ाई पूरी करने के बाद कई बड़े मीडिया संस्थान में काम करते हुए जीवन के लगभग 13 साल पत्रकारिता को समर्पित किये हैं.दद्दन विश्वकर्मा अपने जीवन और अपने इस नए बिजनेस के संबंध में बताया कि, “उनकी पत्नी ने 1 महीने पहले ही बच्चे को जन्म दिया है. पत्नी की डिलीवरी के कारण उन्हें हमेशा उनके साथ रहना पड़ता था. इसके लिए उन्हें लगातार छुट्टियों की जरूरत थी लेकिन ज्यादा छुट्टी मिलने में उन्हें दिक्कत हो रही थी. जिस कारण उन्होंने नौकरी छोड़ दी. घर में बच्चे के जन्म के बाद उन्होंने दोबारा नौकरी ज्वाइन करने का फैसला किया लेकिन उन्हें नौकरी नहीं मिली.” 
पत्रकार से पत्रकार पोहा वाले बने दद्दन अब यूपी के नोएडा में एक न्यूज चैनल के ऑफिस के सामने पोहे का स्टॉल लगा रहे हैं. उन्होंने अपने फेसबुक अकाउंट पर ठेले की फोटो डालकर अपने नए बिजनेस की जानकारी दी है. उनके ठेले का ही नाम अनोखा नहीं बल्कि उनके पोहे भी अनोखे हैं. इनके यहां दो तरह के पोहे मिलते हैं. एक एडिटर स्पेशल पोहा और दूसरा रिपोर्टर स्पेशल पोहा.
जहां तक विश्वकर्मा की बात है उन्होंने बड़ा दिल दिखाते हुए पोहे का ठेला लगाकर अपना परिवार पालने का जज्बा दिखाया, लेकिन कितने लोग ऐसे हैं जो लगातार 13 साल की नौकरी करने के बाद ठेला लगाने का दुस्साहस कर पाते हैं। इस कार्य में वह कितने सफल होंगे यह तो समय ही बताएगा लेकिन देश के बड़े मीडिया संस्थानों का पत्रकारों के प्रति क्या रवैया है  उसकी सच्चाई इस प्रसंग ने जरूर उजागर कर दी है। 
लगातार वर्षों तक काम कराने के बावजूद बड़े मीडिया संस्थानों से जुड़े मालिक  पत्रकारों के साथ फटे कपड़ों  जैसा व्यवहार करते हैं यूज एंड थ्रो की रणनीति पर काम करने  वाले यह मीडिया हाउस बहुत कम सैलरी पर पत्रकारों से काम कराते हैं।
 लगातार कई कई घंटों तक काम साथ में शोषण युक्त व्यवहार और जरूरत पड़ने पर असहयोग या फिर बाहर का रास्ता यह है इनकी कार्यशैली। जो पूरे समाज नेता अभिनेता सबकी बात प्रचारित करता है उस पत्रकार के अंतर्मन का दुख सुनने समझने वाला कोई नहीं। 
विदित है कि कोरोना कॉल में सैकड़ों पत्रकारों की जान गई सैकड़ों को नौकरी छोड़ना पड़ी और जिनकी नौकरी गई उन्हें आज तक वापस काम पर नहीं लिया गया। आखिर पत्रकार जाए तो जाए कहां ऐसी स्थिति में पत्रकारों की बहुत बड़ी बिरादरी ऐसी है जो यादों भूखों मरने को मजबूर है अथवा अपना मूल पठन-पाठन का कार्य छोड़कर पोहा, चाय, पान का ठेला लगाने को मजबूर है क्या प्रताड़ित पत्रकारों के प्रति और बड़े मीडिया संस्थानों की हठधर्मिता और मनमानी के प्रति सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं।
यहां बताना उपयुक्त होगा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर 11नवंबर 2011 से देश में पत्रकारों व मीडिया संस्थानों के लिए मजीठिया आयोग की अनुशंसा को लागू किया गया था इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि पत्रकारों की दम पर धंधेबाजी करने वाले बड़े मीडिया हाउसों द्वारा मजीठिया आयोग की अनुशंसा को लगातार नजर अंदाज किया गया । इसको लेकर देशभर के  लेबर कोर्ट मैं सैकड़ों प्रकरण प्रकरण लटके हुए हैं ना तो उन्हें न्याय मिला और ना ही मजीठिया आयोग की अनुशंसा के अनुसार वेतन और नौकरी। उल्टा तमाम मीडिया हाउस द्वारा पत्रकारों की छटनी और प्रताड़ना की कार्रवाई तेज कर दी गई सैकड़ों को नौकरी से हटा दिया गया और तमाम ने  कांटेक बेस पर पत्रकारों को नौकरी के लिए मजबूर कर दिया। परिणाम हमारे सामने है।
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