प्रवीण दुबे
मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं इस बात को दृष्टिगत रखकर भारतीय जनता पार्टी में यदि सर्वाधिक चर्चा किसी व्यक्ति की है तो वह हैं केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, जैसा कि पार्टी से जुड़े सूत्र बताते हैं सिंधिया एक बार फिर अपने समर्थकों को ज्यादा से ज्यादा टिकट दिलाने की योजना बना चुके हैं और इस बात की जानकारी मध्यप्रदेश के पार्टी नेतृत्व को भी है।
उधर इस बात की भनक भाजपा के मूल कार्यकर्ता और नेताओं को भी पता लगने से पार्टी के भीतर माहौल गर्माया हुआ है। पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी के पुत्र दीपक जोशी का पार्टी छोड़ कर जाना इस बात का प्रमाण है कि सिंधिया फैक्टर ने भाजपा के भीतर कितने बड़े स्तर का बवाल खड़ा कर रखा है। गौरतलब है कि दीपक जोशी जिस हाटपिपलिया विधानसभा सीट से उम्मीदवार थे, वहां से अब बीजेपी मनोज चौधरी को मैदान में उतारने का मन बना चुकी है. सिंधिया समर्थक मनोज चौधरी के बीजेपी में आने के बाद से ही दीपक जोशी को अपना राजनीतिक भविष्य खतरे में दिखाई दे रहा था. पूर्व मंत्री दीपक जोशी ने कहा था वह केवल सम्मान के लिए कांग्रेस ज्वॉइन कर रहे हैं।
आज कमोवेश ग्वालियर चंबल संभाग की 34 विधानसभा सीटों सहित मध्य प्रदेश के अन्य कई विधानसभा क्षेत्रों के भाजपा कार्यकर्ताओं में भी दीपक जोशी जैसी ही स्थिति नजर आती है वह इस बात को लेकर भयभीत हैं कि पार्टी पूरी तरह से ज्योतिरादित्य सिंधिया के दबाव में आकर उनकी अनदेखी कर सकती है।
भाजपा के मूल कार्यकर्ताओं के बीच सिंधिया के कारण व्याप्त भय की स्थिति कितनी गंभीर है इसका अंदाजा पार्टी के पुराने नेता व इंदौर के मेयर रह चुके कृष्ण मुरारी मोघे के बयान से भी लग जाता है जिसमें उन्होंने मीडिया के सामने यह स्वीकार किया था कि सिंधिया फेक्टर के कारण भाजपा के लोगों में भय की स्थिति है हालांकि यह बात भी कही थी कि पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव में केवल जीतने वाले लोगों को ही टिकट देगी।
इस बयान के यदि निहितार्थ लगाए जाएं तो साफ है भाजपा नेतृत्व पिछले उपचुनावों की तर्ज पर सिंधिया के मनमाफिक प्रत्याशी चयन नहीं करेगी और सिंधिया के चहेतों के टिकट भी काटे जाएंगे।
यदि ऐसा होता है तो फिर सिंधिया क्या करेंगे ? क्या वे चुपचाप इसे स्वीकार कर लेंगे ?
इस बारे में तमाम राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि श्री सिंधिया की जो फितरत रही है उसके मुताबिक वे चुपचाप बैठने वाले नहीं हैं और भाजपा के लिए वे उसी प्रकार के हालात पैदा कर सकते हैं जैसे कि उन्होंने कांग्रेस में किया था। चुनाव के समय इस प्रकार की स्थिति भाजपा के लिए बेहद परेशानी वाली हो सकती है। पार्टी पार्टी नेतृत्व के सामने जहां एंटी इनकंबेंसी से निपटने की चुनौती है तो दूसरी ओर सिंधिया फैक्टर से उत्पन्न स्थिति को नियंत्रित करने की ।
जिस प्रकार के संकेत तमाम सर्वे और प्रदेश के माहौल से मिल रहे हैं उसे देखकर पार्टी पहले से ही खासी पशोपेश में है पार्टी के अंदर रूठों को मनाने के लिए आयोजित की गई बैठकों मैं जिस प्रकार के असंतोष के स्वर सुनाई दिए वे बेहद परेशानी वाले हैं।
कुल मिलाकर कहा जाए तो भाजपा के लिए विधानसभा चुनाव से पूर्व एक तरफ कुआ और दूसरी तरफ खाई जैसे हालात बन गए हैं। यदि सिंधिया समर्थकों को ज्यादा कृतार्थ किया जाता है तो न जाने कितने दीपक जोशी तैयार बैठे हैं और यदि सिंधिया की अनदेखी की गई तो अंतर कलह का खतरा पार्टी प्रत्याशियों के लिए संकट पैदा कर सकता है। देखना दिलचस्प होगा की भाजपा इस चक्रव्यूह से कैसे बाहर आती है ?