Homeत्वरित टिप्पणीया मौला उन्हे सदबुद्धि दे

या मौला उन्हे सदबुद्धि दे

त्वरित टिप्पणी: प्रवीण दुबे

किसी भी व्यक्ति को निचली  अदालत के निर्णय पर असहमति के बाद ऊपरी अदालत में अपील करने का अधिकार है। आज इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा काशी ज्ञानवापी परिसर में एएसआई ASI सर्व को अनुमति दिए जाने के फैसले पर भी यह नियम लागू होता है। मुस्लिम पक्ष इसके खिलाफ सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाने का हकदार है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या मुस्लिम पक्ष को ऐसा करना चाहिए ?

यह सवाल वर्तमान में देश के सांप्रदायिक माहौल को देखते हुए बेहद जरूरी है। यह उस बात को कसौटी पर कसने का समय है जिसमें यह कहा जाता रहा है कि देश में गंगा जमुनी तहजीब कायम रखने के लिए सभी तैयार हैं। आज अहम बात यह है कि ज्ञानवापी मस्जिद के भीतर से तमाम ऐसे चिन्ह सामने आए हैं जो सीधे सीधे यह संकेत करते हैं कि वहां कोई न कोई हिंदू पूजास्थल था।
मीडिया के माध्यम से ज्ञानव्यापी परिसर से जो तस्वीरें सामने आ रही हैं उनमें साफ तौर पर त्रिशूल,चक्र, पुष्प सहित दीवारों में मंदिर की आकृति जैसा स्ट्रक्चर दिखाई देता है। जब इस्लाम में मूर्ति पूजा को स्वीकार नहीं किया जाता तो मस्जिद में हिंदुओं की पूजा से जुड़े प्रतीक चिन्ह कैसे स्वीकार किए जा सकते हैं। यह बात हिंदू पक्ष की उस दलील को सही साबित करते हैं कि वह एक मंदिर है और वहां मुगल आक्रांता ने तोड़फोड़ करके बलात ढंग से मस्जिद खड़ी की जिसमें हिंदू मंदिर के स्ट्रक्चर का ही उपयोग किया गया।
इस बात को केंद्र में रखते हुए यदि इलाहाबाद हाईकोर्ट के आज के निर्णय को देखा जाए तो मुस्लिम पक्ष के सामने देश के सांपदायिक माहौल और गंगा जमुनी तहजीब पर बड़ा दिल दिखाते हुए मोहर लगाने का बड़ा मौका है। मुस्लिम पक्ष आगे आकर हिंदू पक्ष की उस बात को जो कि सप्रमाण कही जा रही है को खुशी खुशी स्वीकार करे और ज्ञानवापी परिसर हिंदुओं को सौंप दे।
यदि वे ऐसा करते हैं तो पूरी दुनिया में हिंदुस्तान के  सांप्रदायिक भाईचारे का बड़ा संदेश जाएगा। लेकिन फिलहाल आज आए निर्णय के बाद कुछ मुस्लिम नेताओं , मोलानाओं आदि के बयान सामने आ रहे हैं उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि मुस्लिम पक्ष इस बात को यहीं समाप्त करने के पक्ष में दिखाई नहीं देता वह इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जाने के मूड में है। यह ठीक उसी प्रकार है जैसा कि अयोध्या की रामजन्म भूमि मंदिर को बावरी ढांचा निरूपित करके सालों साल लड़ाई लड़ी गई और इस वजह से देश की गंगा जमुनी तहजीब को हो रहे नुकसान व तनाव की चिंता नहीं की गई। जबकि वहां भी सारे प्रमाण इस बात की गवाही दे रहे थे कि वहां मस्जिद नहीं मंदिर था। भगवान न करे कि देश में एकबार फिर 6 दिसंबर 1992 जैसी स्थिति निर्मित हो प्रभू उन्हें सदबुद्धि दे।
उल्लेखनीय है कि ज्ञानवापी मस्जिद जिसे कभी कभी आलमगीर मस्जिद भी कहा जाता है, वाराणसी मे स्थित एक विवादित मस्जिद है। यह मस्जिद, काशी विश्वनाथ मंदिर से सटी हुई है। 1669 मे मुग़ल आक्रमणकारी औरंगजेब ने प्राचीन विश्वेश्वर मंदिर को तोड़ कर यह ज्ञानवापी मस्जिद बना दी। ज्ञानवापी एक संस्कृत शब्द है इसका अर्थ है ज्ञान का कुआं। 1991 से इस मस्जिद को हटाकर मंदिर बनाने की कानूनी लड़ाई चल रही है। पर 2022 मे सर्वे होने बाद ये ज्यादा चर्चों मे है। दावा किया जा रहा की मस्जिद के वाजुखाने मे 12.8 व्यास का शिवलिंग प्राप्त हुआ है जिसे आक्रमण से बचाने के लिए तत्कालीन मुख्य पुजारी ने ज्ञानवापी कूप मे छुपा दिया गया था
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