प्रवीण दुबे
मध्यप्रदेश की धरती से 10 सितंबर को एक नए राजनीतिक दल का उदय होना यूं तो चुनाव के समय होने वाली सामान्य राजनीतिक घटना कही जा सकती है,लेकिन तमाम राजनीतिक विश्लेषक इस पर पैनी नजर रखे हुए हैं ऐसा इसलिए क्यों कि नए राजनीतिक दल का गठन कोई सामान्य चेहरों द्वारा नहीं किया गया है। इसको गठन करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रचारक हैं और प्रचारक पद से हटने के बाद लगभग 16 वर्षों से सामाजिक जीवन में उसी प्रकार सक्रिय हैं जैसे संघ का प्रचारक रहता है। इन लोगों द्वारा समय समय पर पर्यावरण सहित कई अन्य समसामयिक विषयों पर आंदोलन भी किया और एक सामाजिक संगठन के माध्यम से राष्ट्रहित के कार्यों में लगातार सक्रिय भी रहे हैं।
राजनीतिक पंडितों की दृष्टि इस बात पर है कि नया राजनीतिक दल मध्यप्रदेश की सत्ताधारी भाजपा को कितना नुकसान पहुंचाता है ?
ऐसा इसलिए क्यों कि 10 सितंबर को भोपाल में नए राजनीतिक दल की घोषणा के समय आयोजित प्रेस वार्ता में इस दल के प्रमुख अभय जैन ने साफ तौर पर यह स्पष्ट कर दिया था कि हम पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों का अक्षरशः पालन करेंगे और राजनीति में एक नया उदाहरण पेश करेंगे।
साफ है कि भाजपा भी पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों को अंगीकार करके चलने वाला दल है। पार्टी की घोषणा वाले दिन भी बैठक में करीब 200 लोग आए थे और इनमें ज्यादा संघ के स्वयंसेवक थे. इनमें एमपी के भोपाल, इंदौर, शाजापुर, उज्जैन, आगर आदि से लोग आए थे तो वहीं झारखंड से भी काफी संख्या में लोग थे।
पार्टी के प्रमुख अभय जैन ने गठन के समय ही भाजपा की कार्यपद्धति पर निशाना साधकर अपने इरादे साफ कर दिए थे ।उन्होंने कहा था कि देश की जनता आज एक स्वच्छ राजनीति की ओर देख रही है और नेता आज जनता से जुड़े मुद्दों को उठाना भूल गए हैं।
उन्होने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा भाजपा की ही बात की जाए तो पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसे महान विचारकों ने जिन विचारों पर पार्टी की स्थापना की थी वह विचार आज भाजपा में कहीं भी नजर नहीं आते हैं।
हम पंडित दीनदयाल उपाध्याय के इन्हीं विचारों का अक्षरशः पालन करेंगे और राजनीति में एक नया उदाहरण पेश करेंगे ।अभय जैन ने शिक्षा, स्वास्थ्य, दंडनीति, अर्थ व्यवस्था, जैसे विषयों पर अपनी पार्टी के विचार केंद्रित होने की बात भी कही थी।

नवगठित जनहित पार्टी के संस्थापक आरएसएस के तीन पूर्व प्रचारक

इसके बाद इंदौर और अब 24 सितंबर को ग्वालियर में सम्मेलन आयोजित करके पार्टी पूरी तरह से मैदान में आ गई है ।जैसी की जानकारी है पार्टी एक पंजीकृत दल के रूप में चुनाव की कागजी तैयारी में जुटी है तो दूसरी ओर भाजपा और संघ परिवार के तमाम लोग इस पार्टी के संपर्क में हैं हालांकि अभी भाजपा और संघ में सक्रीय तमाम बड़े चेहरे खुलकर सामने नहीं आए हैं लेकिन जैसा माहौल बनता दिख रहा हैं यह नया राजनीतिक दल आने वाले चुनाव से पूर्व भाजपा संघ के तमाम असंतुष्ठों और टिकिट न मिलने पर निराश नेताओं के लिए बड़ा राजनीतिक प्लेटफार्म बन सकता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि राजनीतिक क्षेत्र में भाजपा अथवा संघ के विचारों से प्रेरित नए राजनीतिक दल बनाने की बात कई सारे प्रश्न खड़े करती है। जहां तक दीनदयाल उपाध्याय के विचारों को अंगीकार करके भाजपा से इतर राजनीति करने की बात है तो जनसंघ जैसे उदासीन हो चुके दल को पुनः जीवित करके ऐसा किया जा सकता था।
बताना लाजिमी होगा कि जिस जनसंघ से अलग होकर भाजपा बनी वह जनसंघ अभी भी एक राजनीतिक दल के रूप में पंजीकृत है। भाजपा के गठन के बाद, जनसंघ के संस्थापक सदस्य बलराज मधोक ने चुनाव आयोग से दीपक का चुनाव चिह्न प्राप्त करके जनसंघ का अस्तित्व बरकरार रखा। वह 2016 तक इस दल के अध्यक्ष पद पर काबिज रहे और फिर उनकी मृत्यु के पश्चात वर्तमान में डॉ. आचार्य भारतभूषण पाण्डेय इसके अध्यक्ष हैं।
जहां तक नए राजनीतिक दल बनाकर अपनी अलग पहचान स्थापित करने की बात है तो पूर्व में उमाभारती और कल्याण सिंह भी यह काम कर चुके हैं ।कल्याण सिंह भी संघ के पूर्णकालिक रहे तो उमाभारती भी इस विचारधारा को समर्पित कट्टर भगवा संत हैं लेकिन न तो उमाभारती भाजपा को चुनौती दे सकीं और न ही कल्याण सिंह का दल कुछ खास कर सका अंततः दोनों को ही दीनदयाल जी के विचारों पर आधारित सबसे बड़े समुद्र भाजपा में ही लौटना पड़ा। जनसंघ को भले ही इसी विचाधारा महान विचारक बलराज मधोक ने जीवन पर्यंत जीवित रखा और आज भी वह जिंदा है लेकिन भाजपा के सामने उसकी हस्ती शून्य है।
नए राजनीतिक दल को लेकर संघ परिवार से लेकर आमजन के बीच एक चर्चा यह भी है कि जब 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं और अगले वर्ष लोकसभा चुनाव होने हैं ऐसे समय उसी विचारधारा पर आधारित एक नए राजनीतिक दल की घोषणा से पहले उन लोगों को थोड़ा परहेज करना चाहिए था जो इस विचारधारा को देश में फलता फूलता देखना चाहते हैं ।
लोगों का मानना है कि इस समय प्रधानमंत्री मोदी की राष्ट्रवादी नीतियों को फलीभूत होता देख तमाम विरोधी ताकतें बेहद परेशान हैं। भले ही मोदी सरकार संघ या दीनदयाल जी के बहुत सारे वैचारिक विषयों को शत प्रतिशत लागू कराने में सुस्त रही है लेकिन इसके बावजूद वह वैचारिक विषयों से जुड़ी राजनीति पर कायम है साथ ही तमाम ऐसे वैचारिक मुद्दों को उसने उठाया है और लागू कराया है जिनकी आजादी के बाद से अबतक अनदेखी होती रही है इनमें राम मंदिर का निर्माण धारा 370 का हटाया जाना समान नागरिक संहिता जैसे विषय प्रमुख हैं।
ऐसी स्थिति में सम विचारी राजनीतिक दल के गठन से इस विचार की विरोधी ताकतों को एक मुद्दा मिल गया है साथ ही राष्ट्रवादी सोच के वोटबेंक के बिखरने का खतरा भी पैदा हो गया है जो उस विचारधारा के लिए भी ठीक नहीं है जिस पर कि नया राजनीतिक दल चलने की बात कर रहा है।