Homeप्रमुख खबरेंयोग से कर्म में कुशलता लाकर बदल सकते हैं भाग्य: हनुमंत राव

योग से कर्म में कुशलता लाकर बदल सकते हैं भाग्य: हनुमंत राव

-दो दिवसीय योग शास्त्र संगम का समापन

ग्वालियर/ योग की शक्ति से अपने कर्म में कुशलता लाकर निर्धारित भाग्य या प्रारब्ध को बदला जा सकता है। इसलिए कहा गया है योग: कर्मसु कौशलम्।
योग एक जीवन पद्धति है।

यह बात विवेकानंद केंद्र कन्याकुमारी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हनुमंत राव ने रविवार को विवेकानंद नीडम में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय स्तर की योग कॉन्फ्रेंस ‘योग शास्त्र संगम 2025’ के समापन समारोह में मुख्य वक्ता की आसंदी से कही। विवेकानंद केंद्र कन्याकुमारी का प्रकल्प विवेकानंद नीडम ग्वालियर एवं शासकीय स्वशासी आयुर्वेदी महाविद्यालय एवं चिकित्सालय ग्वालियर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राजेन्द्र कुमार बानी, विशिष्ट अतिथि जीवाजी विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. राज कुमार आचार्य, आयुर्वेद महाविद्यालय के डीन डॉ. केएल शर्मा थे। मुख्य वक्ता श्री राव ने कहा कि सामान्य वासनाएं स्वयं के स्वार्थ से प्रेरित होती हैं जबकि प्रेम में त्याग एवं नि:स्वार्थता होती है। प्रेम जब समर्पण में रूपांतरित हो जाता है तब उसे भक्ति कहते हैं। भक्त की स्थिति ही मुक्त की स्थिति है। अब वह कुछ भी स्वयं के लिए नहीं चाहता है बल्कि सब कुछ समर्पित करने को सदैव तत्पर रहता है। ये ही उसकी पूर्णता है। उन्होंने तैत्तिरीय उपनिषद का उदाहरण देते हुए कहा कि शरीर अन्न से बनता है, अन्न से ही पोषित होता है और अन्न में वापिस मिल जाता है। मन का जब शरीर से तादात्म्य होता है तब वह इसे अपना कहता है और शरीर से संबंधित सभी विषयों को लेकर आसक्त रहता है। जबकि व्यक्ति का वास्तविक स्वरूप शरीर और क्षण-क्षण बदलते मन के परे शाश्वत आत्मा है। कार्यक्रम का संचालन मुकेश गोस्वामी एवं आभार विवेकानंद नीडम प्रकल्प प्रमुख नितिन मांगलिक ने व्यक्त किया।
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विवेकानंद के विचारों से आती है सकारात्मकता: बानी
मुख्य अतिथि श्री बानी ने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने दुनिया के समक्ष ज्ञान योग, राज योग, कर्म योग एवं भक्ति योग की तार्किक एवं वैज्ञानिक विवेचना प्रस्तुत की। स्वामी विवेकानंद के विचार व्यक्ति के जीवन को सकारात्मता से अनुप्राणित कर देते हैं। विशिष्ट अतिथि डॉ.आचार्य ने कहा कि योग हमें आंतरिक शुद्धता प्रदान करता है। पैरों को गर्दन में लपेटना योग नहीं है बल्कि अपनी चेतना को मन की संकीर्णता से ऊपर उठाने का अभ्यास योग है। डॉ. केएल शर्मा ने कहा कि योग हमारे भीतर आत्मविश्वास को जागृत करता है। वास्तविक शक्ति का स्रोत स्वयं के अंदर ही विद्यमान है। योग इसी अंतर्निहित शक्ति को जागृत करता है।
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कर्म करो फल की चिंता मत करो
मीडिया प्रभारी दिनेश चाकणकर ने बताया कि योग शास्त्र संगम के अंतिम दिन की शुरुआत प्रतिभागियों के चार समूहों में दिए विषयों पर सामूहिक चर्चा एवं उसके निष्कर्षों के प्रस्तुतीकरण से हुई। तत्पश्चात प्रश्नोत्तरी सत्र हुआ जिसकी शुरुआत में विवेकानंद केंद्र कन्याकुमारी के राष्ट्रीय योग संगठक रवि शर्मा ने गीता के कर्म फल के सिद्धांत की व्यावहारिक मीमांसा करते हुए कहा कि कर्म करो फल की चिंता मत करो। इसके बाद प्रतिभागियों के योग सम्बंधित जिज्ञासाओं का समाधान हनुमंत राव ने किया।

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