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भाजपा में नियुक्तियां : देर आए दुरुस्त आए

प्रवीण दुबे 
मध्यप्रदेश भाजपा संगठन की हालिया नियुक्तियों को लेकर यह कहा जा सकता है कि पार्टी ने देर से ही सही, लेकिन एक संतुलित और रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाने की कोशिश की है। “देर आए, दुरुस्त आए” वाली कहावत इस पूरी प्रक्रिया पर काफी हद तक सटीक बैठती नजर आती है।
सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि संगठन ने विभिन्न गुटों से जुड़े नेताओं को जिम्मेदारियां देकर आंतरिक संतुलन साधने का प्रयास किया है। लंबे समय से चल रही गुटबाजी के बीच यह कदम पार्टी के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। साथ ही, नियुक्तियों में वरिष्ठता (सीनियरिटी) का भी ध्यान रखा गया है, जिससे पुराने और अनुभवी नेताओं को उचित सम्मान देने की कोशिश दिखती है।
एक और अहम बिंदु यह रहा कि पूरे घटनाक्रम में “सिंधिया फैक्टर” को पूरी तरह हावी नहीं होने दिया गया। हालांकि ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थकों को नजरअंदाज भी नहीं किया गया। उदाहरण के तौर पर, अशोक शर्मा जैसे नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देकर संतुलन साधा गया है।
वहीं दूसरी ओर, सिंधिया के विरोधी माने जाने वाले के पी यादव और राम निवास रावत को भी जिम्मेदारी देकर स्पष्ट संकेत दिया गया है कि संगठन किसी एक धड़े के प्रभाव में नहीं है।
खासतौर पर ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में यह रणनीति स्पष्ट दिखाई दे रही है। सबसे ज्यादा चर्चा केपी यादव की नियुक्ति को लेकर है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने तत्कालीन कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को हराया था। बाद में सिंधिया के भाजपा में आने के बाद भी यादव उनके खिलाफ कई मुद्दों पर मुखर रहे, हालांकि समय-समय पर दोनों नेताओं को साथ भी देखा गया।
2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा ने केपी यादव का टिकट काटकर सिंधिया को उम्मीदवार बनाया था। इसके बावजूद केपी यादव ने बगावती तेवर नहीं अपनाए। उस दौरान केंद्रीय नेता अमित शाह ने उन्हें भविष्य में बड़ी जिम्मेदारी देने का संकेत दिया था। अब उन्हें सिविल सप्लाईज कॉर्पोरेशन का अध्यक्ष बनाकर पार्टी ने बड़ा संदेश दिया है।
इसके साथ ही, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से आने वाले चेहरों को भी संगठन में स्थान दिया गया है, जो भाजपा की वैचारिक जड़ों को मजबूत बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कार्यकर्ताओं की भागीदारी संगठनात्मक मजबूती के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जाती है।
जातिगत समीकरण की बात करें तो इस बार ब्राह्मण वर्ग को अपेक्षाकृत कम तवज्जो मिलने की चर्चा है, जबकि ठाकुर (राजपूत) वर्ग का वर्चस्व बढ़ता दिखाई दे रहा है। यह बदलाव आगामी चुनावी रणनीति और सामाजिक समीकरणों को साधने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
हालांकि, यह भी ध्यान देने वाली बात है कि नियुक्तियों की प्रक्रिया अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। संगठन लगातार संतुलन बनाए रखने की कोशिश में है और आने वाले समय में और भी नाम सामने आ सकते हैं।
कुल मिलाकर, भाजपा संगठन की यह कवायद अलग-अलग गुटों, विचारधाराओं और सामाजिक समीकरणों के बीच संतुलन बनाने की एक सुनियोजित रणनीति के रूप में देखी जा रही है, जिसका असर आगामी राजनीतिक परिदृश्य में भी देखने को मिल सकता है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इन नियुक्तियों के जरिए भाजपा ने साफ संकेत दिया है कि संगठन, संघ,नरेन्द्र तोमर,सिंधिया खुद मुख्यमंत्री समर्थक और नए सहयोगियों सभी को साथ लेकर आगे बढ़ने की रणनीति पर काम किया जा रहा है जो एक अच्छा संकेत है।
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