प्रवीण दुबे
Facebook, Instagram, WhatsApp और Threads जैसे नामी-गिरामी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की मालिक मेटा की भारत में दादागिरी की हद ही हो गई है। सामान्य लोगों की Facebook और Instagram जैसी पोस्टों को मनमर्जी से डिलीट करने या उनकी पहुंच रोकने की हरकतें करते-करते अब भारत के प्रधानमंत्री का वीडियो संदेश ही फेसबुक से हटा दिया गया।
इसके मालिक मार्क जुकरबर्ग शायद यह भूल गए कि इन सोशल प्लेटफॉर्म की मालिक कंपनी मेटा को पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा मुनाफा भारत से ही प्राप्त होता है। उन्हें शायद यह भी याद नहीं रहा कि पानी में रहकर कभी मगरमच्छ से बैर नहीं किया जाता।
वो भारत से बेतहाशा मुनाफा कमा रहे हैं और यहीं के प्रधानमंत्री की पोस्ट को डिलीट कर रहे हैं। हालांकि, ऐसी अशिष्टता और दादागिरी भारत के सामान्यजन रोज ही भुगतते हैं और अक्सर चुप रह जाते हैं।
अब भारत सरकार ने अपने देश के प्रधानमंत्री के साथ मेटा द्वारा की गई इस कथित अशिष्टता को गंभीरता से लिया है और जुकरबर्ग से माफी मांगने को कहा है।
इलेक्ट्रॉनिक्स एवं इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी मंत्रालय से संबंधित संसदीय समिति ने मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग को एक पत्र भेजा है, जिसमें उन्हें तीन दिन के भीतर माफी मांगने के लिए कहा गया है। यह पत्र 3 अगस्त को हुई संसदीय स्थायी समिति की बैठक के संदर्भ में लिखा गया। मामला प्रधानमंत्री के छात्रों के नाम वीडियो संदेश को फेसबुक से हटाए जाने से जुड़ा है। पत्र में कहा गया है कि यदि जुकरबर्ग माफी नहीं मांगते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
इसी सिलसिले में भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि उन्होंने आईटी मंत्रालय और गृह मंत्रालय को लिखा है कि प्रधानमंत्री का वीडियो हटाना किसी इंटरमीडियरी की नहीं, बल्कि पब्लिशर की जिम्मेदारी थी। इसलिए मार्क जुकरबर्ग को तीन दिनों के भीतर माफी मांगनी चाहिए। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को वर्तमान में मिल रही “सेफ हार्बर” सुरक्षा वापस लेने की कार्रवाई की जा सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि इन प्लेटफॉर्म पर अभद्र भाषा, हिंसा और आपत्तिजनक कंटेंट की भरमार है। यदि ऐसे कंटेंट से प्रभावित प्रत्येक व्यक्ति मेटा प्रमुख के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराए, तो पूरे देश में एफआईआर की बाढ़ आ सकती है और जिम्मेदार लोगों को कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
यह केवल एक वीडियो हटाए जाने का मामला नहीं है, बल्कि यह सवाल भी है कि क्या दुनिया की सबसे बड़ी सोशल मीडिया कंपनियां भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में अपने नियमों का इस्तेमाल निष्पक्ष रूप से कर रही हैं, या फिर मनमाने ढंग से। जब वह प्रधानमंत्री के संदेश को हटाने का दुसाहस कर सकती हैं तो इसमें कड़ा एक्शन होना ही चाहिए