त्वरित टिप्पणी : प्रवीण दुबे
महंगाई से राहत या बड़ी जनकल्याणकारी घोषणा का इंतजार रहा अधूरा, उपलब्धियों और 2014 पूर्व की नाकामियों पर ज्यादा जोर
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्र के नाम संबोधन से देशवासियों को महंगाई से राहत, रोजगार, आम जनता के लिए किसी बड़ी राहत अथवा नई जनकल्याणकारी योजना की घोषणा की उम्मीद थी। लेकिन प्रधानमंत्री के पूरे संबोधन में ऐसी कोई बड़ी घोषणा सामने नहीं आई, जिससे आम आदमी को तत्काल राहत मिलने की उम्मीद बंधती।
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में पिछले 12 वर्षों के शासन की उपलब्धियों को प्रमुखता से गिनाया और 2014 के पहले की स्थिति पर भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि 2014 तक भारत को दुनिया ने ‘फ्रैजाइल फाइव’ में शामिल कर दिया था, लेकिन पिछले 12 वर्षों में देश ने नई गति हासिल की है।
प्रधानमंत्री के मुताबिक, पिछले 12 वर्षों में डिफेंस उत्पादन चार गुना, खादी और ग्रामोद्योग का कारोबार पांच गुना तथा मोबाइल फोन का उत्पादन 33 गुना बढ़ा है। डिजिटल इनोवेशन के क्षेत्र में भारत ने अपनी पहचान बनाई है। उन्होंने यह भी कहा कि देश में पेटेंट ग्रांट की संख्या चार गुना और डिजिटल ट्रांजैक्शन 100 गुना बढ़े हैं।
प्रधानमंत्री ने सरकार की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए कहा कि हर साल औसतन 15 गुना तेज रफ्तार से लोगों तक नल से जल पहुंचाया गया।
हालांकि, भाषण का सबसे ज्यादा ध्यान युवाओं पर रहा। प्रधानमंत्री ने युवाओं का कई बार उल्लेख किया और जनकल्याणकारी घोषणा के रूप में एक महत्वपूर्ण ऐलान किया। उन्होंने कहा कि एक वर्ष में एक करोड़ युवाओं को AI स्किल ट्रेनिंग देने के साथ मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग का नेटवर्क खड़ा किया जाएगा।
यह घोषणा निश्चित रूप से युवाओं के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन स्वतंत्रता दिवस के भाषण से महंगाई, रोजगार, आम परिवारों की आर्थिक मुश्किलों और तत्काल राहत से जुड़ी बड़ी घोषणाओं की उम्मीद कर रहे लोगों के लिए यह संबोधन अपेक्षाकृत निराशाजनक रहा।
राजनीतिक नजरिए से देखें तो प्रधानमंत्री का यह संबोधन भविष्य की नई घोषणाओं से ज्यादा सरकार के 12 वर्षों के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड और 2014 से पहले की सरकारों की नाकामियों का राजनीतिक संदर्भ प्रस्तुत करने वाला भाषण नजर आया।
सवाल यही है कि जब देश का आम नागरिक महंगाई, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजमर्रा के बढ़ते खर्च से राहत की उम्मीद लगाए बैठा था, तब स्वतंत्रता दिवस जैसे महत्वपूर्ण अवसर पर उसे उपलब्धियों के आंकड़ों के अलावा तत्काल राहत का क्या संदेश मिला?
यही इस बार के स्वतंत्रता दिवस संबोधन का सबसे बड़ा राजनीतिक और सामाजिक सवाल बनकर सामने आया है।