गुना में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के सामने सड़क की समस्या लेकर पहुंचे एक व्यक्ति की बात और सिंधिया के जवाब का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।
सड़क ठीक कराने के लिए ज्ञापन देने पहुंचे व्यक्ति ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा कि यदि सड़क ठीक नहीं हुई तो वह चुनाव में वोट नहीं डालेगा। इस पर सिंधिया ने उसे रोकते हुए कहा कि “इस भाषा का इस्तेमाल मेरे साथ कभी नहीं करना, आप निवेदन कीजिए।”
बस… यहीं से शुरू हो गया सवाल—जनता सड़क के लिए निवेदन करे या अपने वोट के अधिकार की बात भी न करे?
अब लोग इसे व्यंग्यात्मक लहजे में चर्चा कर रहे हैं
महाराज से निवेदन किया जाता है, गुहार लगाई जाती है।
सड़क चाहिए तो निवेदन कीजिए, बिजली चाहिए तो निवेदन कीजिए, पानी चाहिए तो निवेदन कीजिए… और उम्मीद रखिए कि महाराज आपकी समस्या सुनेंगे।
लेकिन लोकतंत्र में एक छोटा-सा सवाल है—निवेदन करना जनता की जिम्मेदारी है या व्यवस्था की जिम्मेदारी निभाना जनप्रतिनिधियों की?
सिंधिया की इस बात की तारीफ की जा सकती है कि उन्होंने समस्या को लेकर निवेदन करने और जिम्मेदारी निभाने की बात कही। लेकिन सवाल यह भी है कि अगर जनता को सड़क, बिजली और पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए बार-बार निवेदन करना पड़े, तभी जिम्मेदारी सक्रिय होगी तो फिर जनता सवाल कब पूछेगी?
और जब जनता कहती है—“सड़क ठीक नहीं हुई तो वोट नहीं देंगे”, तो वह कोई एहसान नहीं मांग रही। वह अपने लोकतांत्रिक अधिकार की बात कर रही है।
चुनाव में वोट देना मतदाता का अधिकार है और किसे वोट देना है, यह उसका फैसला है। इसलिए सड़क की मांग को वोट से जोड़ना भी लोकतंत्र की राजनीति का हिस्सा है।
काश! सड़क, बिजली और पानी जैसी मूलभूत जरूरतों के लिए निवेदन करने से पहले ही जिम्मेदारी समझ ली जाती।
फिर शायद न जनता को अपनी परेशानी लेकर ‘महाराज’ के दरबार में पहुंचना पड़ता, न वोट की बात करनी पड़ती और न ही उसे यह नसीहत सुननी पड़ती कि “इस भाषा का इस्तेमाल मत कीजिए।”
आखिर सवाल सिर्फ भाषा का नहीं है।
सवाल यह है कि जनता की भाषा—‘सड़क चाहिए’—कब सुनी जाएगी?
और हां महाराज…
निवेदन जनता कर देगी, गुहार भी लगा देगी, लेकिन लोकतंत्र में अपनी बात कहने का अधिकार भी जनता के पास ही रहेगा।