प्रवीण दुबे
विधानसभा चुनाव से पूर्व आदर्श आचार संहिता की संभावित तिथि सामने आने के बाद मध्यप्रदेश में सत्ताधारी दल भाजपा के नीतिनिर्धारकों की धड़कनें तेज होती दिखाई दे रही हैं। सम्भागीय कार्यालय 38 रेसकोर्स रोड से लेकर पार्टी गतिविधियों के संचालन से जुड़े सभी प्रमुख केंद्रों पर आचार संहिता को दृष्टिगत रखकर कार्यक्रम तय होते देखे जा सकते हैं।
सबसे ज्यादा चिंता सरकारी मशीनरी को लेकर है। यहां बताना उपयुक्त 94होगा कि आचार संहिता लागू होने के बाद सत्तातंत्र का सरकारी तंत्र पर से सीधा हस्तक्षेप लगभग समाप्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में पूर्व स्वीकृत विकास कार्यों को ही अंजाम दिया जा सकता है। यही वजह है कि सत्ताधारी दल ज्यादा से ज्यादा विकास कार्यों को स्वीकृत कराकर उनका लोकार्पण शिलान्यास जैसे कार्य शीघ्र कराने की हड़बड़ाहट में रहते हैं।
इतना ही नहीं आचार संहिता के बाद आईएस आईपीएस सहित तमाम नोकरशाहों को मनमानी से तबादले करने और उन्हें मनपसन्द स्थान व कार्यों के लिए तैनात करने की छूट भी सत्तातंत्र को नहीं रहती है इसके इनकी कमान सीधे तौर पर चुनाव आयोग के हाथ में आ जाती है।
चुनाव आचरण संहिता लागू होने के बाद विभिन्न निगम मण्डल आयोग व शासकीय निकायों में नियुक्त जन प्रतिनिधियों के अधिकार भी समाप्त हो जाते हैं यही वजह है कि यह तमाम जरूरी व विवादित फाइलों को समय रहते निपटाने के काम में जुट गए है । यही स्थिति उच्च नोकरशाहों की भी है।
जैसे कि संकेत मिल रहे हैं कि मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए आचार संहिता 4 से 6 अक्टूबर के बीच लग सकती है। जबकि चुनाव 26 से 30 नवंबर के बीच होने की संभावना है। मध्यप्रदेश के साथ ही राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में भी विधानसभा चुनाव साथ होंगे। राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि यह समय चुनाव की दृष्टि से सबसे अनुकूल है। पार्टियां चाहती हैं कि वोटिंग से पहले ही दिवाली (7 नवंबर) और ईद (21 नवंबर) के त्योहार हो जाएं, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग मतदान में हिस्सा ले सकें।
मध्यप्रदेश में एक और छत्तीसगढ़ में दो चरणों में विधानसभा चुनाव हो सकते हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले विधानसभा चुनाव में आयोग ने 4 अक्टूबर 2013 को चुनावी कार्यक्रम जारी किया था। अधिसूचना एक नवंबर और वोटिंग 25 नवंबर 2013 को हुई थी। सूत्रों का कहना है कि इन्हीं तिथियों के आसपास इस बार भी आचार संहिता लगने की संभावना है। वोटिंग भी 26 से 30 नवंबर के बीच हो सकती है। अक्टूबर के आखिरी हफ्ते में अधिसूचना जारी होने के साथ ही नामांकन भरने का काम शुरू हो जाएगा। इधर, कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी 17 सितंबर से मप्र में चुनावी शंखनाद करने जा रहे हैं, जबकि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष 25 सितंबर को जंबूरी मैदान में हो रहे कार्यकर्ता महाकुंभ से चुनावी अभियान का ऐलान करेंगे।
प्रचार के लिए समय बढ़ाने पर विचार
राजनीतिक दल चुनाव प्रचार के लिए आयोग से अधिक समय मांग रहे हैं। प्रेक्षकों के मुताबिक अभी तक नाम वापसी से लेकर वोटिंग तक 15 दिन का वक्त प्रचार के लिए मिलता है। इसे 20 दिन करने की मांग हो रही है। आयोग भी सहमत है, पर वह कितना समय देगा, इस पर विचार किया जा रहा है। मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत से चुनाव कार्यक्रम को लेकर मीडिया द्वारा पूछे गए सवाल को यह कहकर टाल दिया कि जब भी कोई बात तय होगी तो सबसे पहले मीडिया को इसकी जानकारी देंगे।
