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	<title>लेख &#8211; Shabd Shakti News</title>
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	<description>Every News Speaks</description>
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		<title>28 मई 1883 दिवस विशेष :स्वत्ववोध पुनर्जागरण के लिये समर्पित स्वातंत्र्यवीर सावरकरजी का जन्म</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 28 May 2026 10:50:11 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[श्रद्धाजंलि]]></category>
		<category><![CDATA[स्वातंत्र्यवीर सावरकरजी का जन्म]]></category>
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					<description><![CDATA[&#8211;रमेश शर्मा स्वातंत्र्यवीर सावरकर जी ऐसे ही महान विभूति थे जिनके जीवन का प्रतिक्षण राष्ट्र और स्वत्व बोध कराने के लिये समर्पित रहा। वे संसार के एक मात्र ऐसे कैदी थे जिन्हें एक ही जीवन में दो आजीवन कारावास का दंड मिला। यह उनके संघर्ष और अंग्रेज सरकार द्वारा दी गई यातनाओं का ही कारण [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;">&#8211;रमेश शर्मा</p>
<p>स्वातंत्र्यवीर सावरकर जी ऐसे ही महान विभूति थे जिनके जीवन का प्रतिक्षण राष्ट्र और स्वत्व बोध कराने के लिये समर्पित रहा। वे संसार के एक मात्र ऐसे कैदी थे जिन्हें एक ही जीवन में दो आजीवन कारावास का दंड मिला। यह उनके संघर्ष और अंग्रेज सरकार द्वारा दी गई यातनाओं का ही कारण था कि उन्हें समाज ने &#8220;स्वातंत्र्यवीर&#8221; जैसे गौरवमयी उपाख्य से सम्मानित किया। लेकिन उनका संघर्ष स्वतंत्रता के बाद भी कम न हुआ। उन्हें गाँधीजी की हत्या के झूठे आरोप में बंदी बनाया गया। यद्यपि फरवरी 49 में अदालत ने उन्हें सम्मान दोषमुक्त कर दिया था लेकिन षड्यंत्र के अंतर्गत उन्हें पूरे जीवन प्रताड़ित किया गया।<br />
भारतीय स्वाभिमान और स्वातंत्र्य वोध जागरण केलिए यूँ तो करोड़ों महापुरुषों के जीवन का बलिदान हुआ है किन्तु उनमें कुछ ऐसे हैं जिनके जीवन की प्रत्येक श्वाँस राष्ट्र के लिये समर्पित रही। सावरकरजी पहले ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने 1901 में ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया की मृत्यु पर नासिक में शोक सभा का विरोध किया था। उन्होंने कहा कि वो हमारे शत्रु देश की रानी थी, हम शोक व्यक्त क्यों करें? सावरकरजी पहले देशभक्त थे जिन्होंने एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक समारोह का उत्सव मनाने वालों को त्र्यम्बकेश्वर में बड़े बड़े पोस्टर लगाकर कहा था कि गुलामी का उत्सव मत मनाओ..! 7 अक्टूबर 1905 को पूना में सावरकर जी ने ही विदेशी वस्त्रों की पहली होली जलाई थी…! उनके द्वारा विदेशी वस्त्रों का दहन करने पर तिलक जी ने अपने पत्र केसरी में उनको शिवाजी के समान बताकर उनकी प्रशंसा की थी सावरकरजी द्वारा आरंभ की गई विदेशी वस्त्र दहन के इसी मार्ग पर गाँधीजी भी चले और 11 जुलाई 1921 को मुंबई के परेल में विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार किया गया। उनके द्वारा आरंभ स्वत्व जागरण अभियान से क्रोधित होकर 1905 में उन्हें पुणे के फर्म्युसन कॉलेज से निकाल दिया गया था। इसके विरोध में हड़ताल हुई। इस घटना पर भी तिलकजी ने अपने समाचार पत्र ‘केसरी’ में सम्पादकीय लिखा था। स्वातंत्र्यवीर सावरकर पहले ऐसे विचारक थे जिन्होंने 1857 की क्राँति को पहला स्वातंत्र्य समर माना और एक ग्रंथ की रचना की। उनसे पहले सब इसे एक विद्रोह लिखा करते थे। यह पहला ऐसा ग्रंथ था जिसपर प्रकाशन से पहले प्रतिबंध लगा दिया गया था। स्वातंत्र्यवीर सावरकर पहले क्रान्तिकारी थे जो समुद्री जहाज में बंदी बनाकर ब्रिटेन से भारत लाते समय आठ जुलाई 1910 को समुद्र में कूद पड़े थे। उन्होंने तैरकर इंग्लिश चैनल पार किया और फ्रांस पहुँच गए थे। वे पहले ऐसे राजनैतिक बंदी थे जिन्होंने अंडमान की काला पानी जेल में 10 साल से भी अधिक समय यातनाएँ सहीं। उन्हें कोल्हू में प्रतिदिन 30 पोंड तेल निकालना होता था। उन्होंने काल कोठरी की दीवारों पर कंकर कोयले से कवितायें लिखीं और 6000 पंक्तियाँ याद कीं। उनकी कोठरी 7 X 11 आकार की थी। मौसम गर्मी का हो या सर्दी का उन्हें जमीन पर ही सोना होता था । इसी कोठरी कोने में शौच और पेशाब करना होती । और इसी में भोजन करना होता था । हाथ में हथकड़ी और पैरों में बेड़ियाँ लगी होती थीं। उसी स्थिति में जो और जैसा मिले, वही भोजन करना होता था । उन्हें प्रतिदिन बैल की भाँति कोल्हू में जोता जाता था। यदि तेल निकालने की मात्रा कम हो तो पिटाई होती थी। भोजन नहीं दिया जाता था। उसी जेल में उनके भाई भी थे पर दोनों भाई एक दूसरे से मिलना तो दूर देख भी नहीं सकते थे। पूरी जेल में सावरकर जी एकमात्र ऐसे कैदी थे, जिनके गले में अंग्रेजों ने एक पट्टी लटका रखी थी । इस पर &#8220;D&#8221; लिखा था । &#8220;D&#8221; अर्थात डेंजरस। यातनाएँ देने का यह चक्र चला लगभग ग्यारह वर्ष चला । इतनी यातनाएँ देने का कारण यह था कि पूना से लेकर लंदन तक उनके जीवन का कोई क्षण ऐसा नहीं बीता जब उन्होंने अंग्रेजों से भारत की मुक्ति का कोई उपक्रम न किया हो । स्वातंत्र्यवीर सावरकर पहले क्रांतिकारी थे जिन्होंने 1901 में ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया की मृत्यु पर नासिक में आयोजित शोक सभा का विरोध किया था और कहा कि वो हमारे शत्रु देश की रानी थी, हम शोक क्यूँ करें? वीर सावरकर पहले देशभक्त थे जिन्होंने एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक समारोह का उत्सव मनाने वालों को त्र्यम्बकेश्वर में बड़े बड़े पोस्टर लगाकर कहा था कि दासता का उत्सव मत मनाओ..! उन्होंने 7 अक्टूबर 1905 को पूना में स्वदेशी अपनाओ आंदोलन छेड़ा और विदेशी वस्त्रों की होली जलाई थी । यह सावरकर जी द्वारा स्वाभिमान और स्वतव जागरण केलिए किये जाने वाले कार्यों का ही प्रभाव था कि तिलक जी ने अपने समाचार पत्र &#8220;केसरी&#8221; में सावरकर जी को छत्रपति शिवाजी महाराज के समान बताकर प्रशंसा की थी । सावरकर जी द्वारा विदेशी वस्त्रों की होली जलाने के कारण उन्हे फर्म्युसन कॉलेज पुणे से निकाल दिया गया था । इसके विरोध में छात्रों ने हड़ताल की । इस समूची घटना पर तिलक जी ने ‘केसरी’ पत्र में सावरकर जी के पक्ष में सम्पादकीय लिखा । वे पहले ऐसे बैरिस्टर थे जिन्होंने ब्रिटेन में परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद ब्रिटेन के राजा के प्रति वफ़ादार होने की शपथ लेने से इंकार कर दिया था । इस कारण उन्हें बैरिस्टर होने की उपाधि का पत्र कभी नहीं मिला । यह घटना 1909 की है । वीर सावरकर पहले ऐसे लेखक थे जिनकी पुस्तक &#8220;1857 का स्वातंत्र्य समर’ पर प्रकाशन के पहले ही प्रतिबंध लगा । वीर सावरकर पहले क्रान्तिकारी थे जो समुद्री जहाज में बंदी बनाकर ब्रिटेन से भारत लाते समय आठ जुलाई 1910 को समुद्र में कूद पड़े थे और तैरकर फ्रांस पहुँच गए थे । लेकिन तट पर बंदी बना लिये गये । सावरकर जी पहले ऐसे क्रान्तिकारी थे जिनका मुकद्दमा अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय हेग में चला। वे भारत के पहले क्राँतिकारी थे जिन्हें अंग्रेजी काल में दो आजन्म कारावास की सजा सुनाई गई। दो जन्म कारावास की सजा सुनते ही हंसकर बोले, “चलो, ईसाई सत्ता ने हिन्दू धर्म के पुनर्जन्म सिद्धांत को मान लिया&#8221; ।<br />
वे अंग्रेजी सत्ता काल में लगभग 30 वर्षों तक विभिन्न जेलों में रहे और स्वतंत्रता के बाद भी 1948 में गाँधीजी की हत्या के आक्षेप में पुनः गिरफ्तार हुये और न्यायालय द्वारा आरोप झूठे पाए जाने के बाद ससम्मान रिहा हुये लेकिन 4 अप्रैल 1950 को पाकिस्तानी प्रधानमन्त्री लियाक़त अली ख़ान के दिल्ली आगमन पर पुनः उन्हें बेलगाम जेल में रोका गया। मई 1952 में पुणे की एक विशाल सभा में उन्होंने अभिनव भारत संगठन को भंग किया गया। 10 नवम्बर 1957 को नई दिल्ली में आयोजित भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम समारोह में वे मुख्य वक्ता रहे। 8 अक्टूबर 1949 को उन्हें पुणे विश्वविद्यालय ने डी०लिट० की मानद उपाधि से अलंकृत किया। 8 नवम्बर 1963 को उनकी पत्नी यमुनाबाई का निधन हुआ। सितम्बर, 1965 से उन्हें तेज ज्वर ने आ घेरा, जिसके बाद इनका स्वास्थ्य गिरने लगा। एक फरवरी 1966 को उन्होंने मृत्युपर्यन्त उपवास करने का निर्णय लिया और 26 फरवरी 1966 को बम्बई में प्रातः 10 बजे पार्थिव शरीर त्यागकर परमधाम को प्रस्थान किया ।<br />
सावरकर जी ने भारत की आज की सभी राष्ट्रीय सुरक्षा सम्बन्धी समस्याओं को बहुत पहले ही भाँप लिया था। 1962 में चीन द्वारा आक्रमण करने के लगभग दस वर्ष पहले ही उन्होंने देश को सतर्क कर दिया था कि चीन भारत पर आक्रमण करने वाला है। भारत के स्वतंत्र हो जाने के बाद गोवा की मुक्ति की आवाज सबसे पहले सावरकर जी ने ही उठायी थी।</p>
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		<title>व्यर्थ की आलोचना छोड़ हम सब राष्ट्रधर्म निभाएं </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 13 May 2026 17:13:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[प्रधानमंत्री की अपील]]></category>
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					<description><![CDATA[ डॉ नीतेश शर्मा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान अमेरिका युद्ध से उपजी बिषम परिस्थितियों के मद्देनजर पेट्रोल डीजल की कम खपत और सोना कम खरीदने का आग्रह क्या किया उनकी व्यापक आलोचना विपक्ष और लेफ्ट बुद्धिजीवियों ने आरम्भ कर दी। 2014 के बाद देश में एक बड़ा राजनीतिक और बौद्धिक वर्ग ऐसा है जो प्रधानमंत्री [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"> डॉ नीतेश शर्मा</p>
<p style="text-align: center;"><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-63704" src="https://shabdshaktinews.in/wp-content/uploads/2026/05/IMG-20260513-WA0026.jpg" alt="" width="640" height="640" srcset="https://shabdshaktinews.in/wp-content/uploads/2026/05/IMG-20260513-WA0026.jpg 640w, https://shabdshaktinews.in/wp-content/uploads/2026/05/IMG-20260513-WA0026-300x300.jpg 300w, https://shabdshaktinews.in/wp-content/uploads/2026/05/IMG-20260513-WA0026-150x150.jpg 150w, https://shabdshaktinews.in/wp-content/uploads/2026/05/IMG-20260513-WA0026-420x420.jpg 420w" sizes="(max-width: 640px) 100vw, 640px" /></p>
<p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान अमेरिका युद्ध से उपजी बिषम परिस्थितियों के मद्देनजर पेट्रोल डीजल की कम खपत और सोना कम खरीदने का आग्रह क्या किया उनकी व्यापक आलोचना विपक्ष और लेफ्ट बुद्धिजीवियों ने आरम्भ कर दी। 2014 के बाद देश में एक बड़ा राजनीतिक और बौद्धिक वर्ग ऐसा है जो प्रधानमंत्री की हर विषय पर आलोचना को ही अपना धर्म मान बैठा है। इस अंध मोदी विरोधी वर्ग ने सामान्य विवेक के साथ देश के हितों पर विचारण की क्षमता भी खो दी है। भारत अपनी जरूरत का 90 फीसदी पेट्रोलियम पदार्थ खाड़ी और दूसरे देशों से मंगाता है। इसी तरह सोना भी लगभग पूरा ही विदेश से आता है।नतीजतन भारत को अपने आयात का अधिकतर हिस्सा इन दोनों पदार्थो पर खर्च करना पड़ता है।प्रधानमंत्री मोदी ने इसी आर्थिकी को ध्यान में रखकर नागरिकों से पेट्रोलियम अनुशासन की अपील की थी। असल में मोदी विरोध की आत्म अग्नि में झुलसते लोगों को यह नही पता कि इस देश में संकट के समय ऐसी अपीलें समय समय पर राष्ट्र के नायक करते रहे हैं और जनता ने इन अपीलों पर अमल भी किया है।</p>
<p>प्रधानमंत्री मोदी इस समय देश के लोकप्रिय नायक है उनकी अपील पर 2015 से अभी तक एक करोड़ से ज्यादा लोग एलपीजी गैस पर मिलने वाली सब्सिडी छोड़ दी है।<br />
इसी तरह 1965 के भारत-पाक युद्ध और अकाल की छाया में लाल बहादुर शास्त्री ने जनता से सप्ताह में एक समय का भोजन त्यागने की अपील की थी। दोनों आह्वान इसलिए खास हैं क्योंकि ये संकट के समय व्यक्तिगत त्याग, सामूहिक एकता और राष्ट्र-प्रथम की भावना को केंद्र में रखते हैं।<br />
मोदी जी ने स्पष्ट कहा, “सोने की खरीद विदेशी मुद्रा खाती है&#8230; देशहित में हम तय करें कि साल भर सोना न खरीदेंगे।” उन्होंने कोविड काल की याद दिलाते हुए वर्क फ्रॉम होम, वर्चुअल मीटिंग्स, पब्लिक ट्रांसपोर्ट, कार पूलिंग, इलेक्ट्रिक वाहनों और स्वदेशी सामानों पर जोर दिया। यह अपील इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत सोने का दूसरा सबसे बड़ा आयातक है (लगभग 70-80 बिलियन डॉलर सालाना) और यह कदम रुपए को मजबूत रखने, फॉरेक्स रिजर्व बचाने तथा आत्मनिर्भर भारत अभियान को गति देने वाला है।<br />
‘जय जवान जय किसान’<br />
1965 का भारत-पाक युद्ध चुनौतीपूर्ण था। 1962 के चीन युद्ध के बाद अर्थव्यवस्था कमजोर, विदेशी मुद्रा भंडार सीमित और अमेरिका ने खाद्यान्न निर्यात रोकने की धमकी दी। लाल बहादुर शास्त्री ने 19 अक्टूबर 1965 को इलाहाबाद में ‘जय जवान जय किसान’ का नारा दिया और राष्ट्रीय अपील की कि सप्ताह में एक दिन एक समय का भोजन न करें। उन्होंने पहले अपने परिवार पर लागू किया—पत्नी ललिता शास्त्री को शाम का खाना न बनाने को कहा। पूरे देश ने ‘शास्त्री व्रत’ अपनाया। रेस्तरां बंद हुए, लोग स्वेच्छा से उपवास रखने लगे।<br />
यह आह्वान इसलिए खास था क्योंकि यह युद्ध के मैदान और खेत दोनों को जोड़ता था। सैनिकों का मनोबल बढ़ा, किसानों ने उत्पादन बढ़ाया। भारत ने युद्ध में पाकिस्तान को रोका और दीर्घकाल में हरित क्रांति की नींव पड़ी। शास्त्री जी की सादगी अदभुत थी। वे प्रधानमंत्री रहते सरकारी वेतन नहीं लेते थे। उन्हें सारा देश अपना नायक मानता था।<br />
दोनों नेताओं ने ‘ऊपर से आदेश’ नहीं, बल्कि स्वैच्छिक त्याग की अपील की। शास्त्री ने परिवार से शुरू किया। शास्त्री की सादगी प्रसिद्ध है। मोदी की ‘चायवाले से प्रधानमंत्री’ छवि आमजन से जुड़ाव दिखाती है। दोनों आह्वान ‘जय जवान जय किसान’ की भावना को विस्तार देते हैं। शास्त्री ने मूल दिया, मोदी ने ‘जय अनुसंधान’ और आर्थिक सुरक्षा जोड़ा। शास्त्री का आह्वान हरित क्रांति का आधार बना। मोदी का आह्वान प्राकृतिक खेती, स्वदेशी और फॉरेक्स सुरक्षा को बढ़ावा दे सकता है।<br />
दोनों में ‘भारत माता की जय’ की चेतना है। जनता ने शास्त्री का साथ दिया; मोदी के आह्वान पर भी व्यापक चर्चा और समर्थन है। शास्त्री का युद्धकालीन, प्रत्यक्ष अस्तित्व-रक्षा का; मोदी का आर्थिक, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का। 1965 में भारत गरीब था, आज उभरती अर्थव्यवस्था (5 ट्रिलियन डॉलर लक्ष्य) है।<br />
ये दोनों आह्वान भारतीय लोकतंत्र की उस अनूठी परंपरा को दर्शाते हैं जिसमें प्रधानमंत्री जनता को सेवक की भूमिका में संबोधित करते हैं। मोदी जी का आह्वान आधुनिक संकट में पुरानी भावना (त्याग) को प्रासंगिक बनाता है, जबकि शास्त्री जी का आह्वान साबित करता है कि छोटा कद, बड़ा दिल राष्ट्र को एकजुट कर सकता है। समानता इस भावना में है कि संकट ‘हमारा’ है, समाधान भी ‘हमारा’। असमानता विकास चरण में है। बेशक, 1965 अस्तित्व की लड़ाई थी, अब वह स्थिति नहीं है।<br />
भारतीय इतिहास में ऐसे आह्वान विरले हैं जो पीढ़ियों को प्रेरित करें। राष्ट्र-प्रथम में छोटे त्याग बड़े परिणाम लाते हैं। शास्त्री जी ने कहा था, “भूख से मरना पसंद, लेकिन स्वाभिमान से समझौता नहीं।” मोदी जी इसे आर्थिक स्वाभिमान में बदल रहे हैं। यह परंपरा भारत को मजबूत बनाती रहेगी।<br />
मोदी जी का विरोध करने वाले भूल जाते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी ऐसे ही आह्वान कर चुकी हैं।<br />
पूर्व गृह मंत्री पी चिदम्बरम के वीडियो आज उपलब्ध है जिनमें वह भी देश के लोगों से सोने की खरीद कम करने की अपील कर रहे है।<br />
सुखद ही है कि देश की भाजपा शासित सरकारों ने प्रधानमंत्री की अपील पर अमल आरम्भ कर दिया है।आम नागरिकों में भी इस अपील का असर दिखने लगा है।<br />
<strong>लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और स्तंभकार हैं</strong></p>
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		<title>हर सत्ता अपना अंत स्वयं लिखती है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 05 May 2026 06:49:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[बंगाल नतीजे]]></category>
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					<description><![CDATA[विजय मनोहर तिवारी बंगाल के नए नेतृत्व को &#8220;पोरिबर्तन&#8217; के कुछ सूत्र हेमंता बिस्वासरमा से लेने ही पड़ेंगे, कुछ पाठ योगी आदित्यनाथ से सीखने होंगे और थोड़ा सा पुष्कर सिंह धामी की पहली कक्षा में झांकते हुए आगे बढ़ना होगा। इन तीनों सीनियर्स में एक को तीसरी बार चुना गया है, दूसरे दूसरी पारी खेल [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;">विजय मनोहर तिवारी</p>
<p style="text-align: center;"><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-63598" src="https://shabdshaktinews.in/wp-content/uploads/2026/05/FB_IMG_1777963574775.jpg" alt="" width="644" height="627" srcset="https://shabdshaktinews.in/wp-content/uploads/2026/05/FB_IMG_1777963574775.jpg 644w, https://shabdshaktinews.in/wp-content/uploads/2026/05/FB_IMG_1777963574775-300x292.jpg 300w, https://shabdshaktinews.in/wp-content/uploads/2026/05/FB_IMG_1777963574775-431x420.jpg 431w" sizes="(max-width: 644px) 100vw, 644px" /></p>
<p>बंगाल के नए नेतृत्व को &#8220;पोरिबर्तन&#8217; के कुछ सूत्र हेमंता बिस्वासरमा से लेने ही पड़ेंगे, कुछ पाठ योगी आदित्यनाथ से सीखने होंगे और थोड़ा सा पुष्कर सिंह धामी की पहली कक्षा में झांकते हुए आगे बढ़ना होगा। इन तीनों सीनियर्स में एक को तीसरी बार चुना गया है, दूसरे दूसरी पारी खेल रहे हैं और तीसरे पहली बार के सीएम हैं।</p>
<p>पश्चिम बंगाल की राजनीति पाप का एक ऐसा घड़ा भर रही थी, जो कब का लबालब हो चुका था। उसे इतनी ही जोर से फूटना ही था। अब तक तीन ताकतें ही बंगाल में काबिज रहीं। पहले कांग्रेस, फिर कम्युनिस्ट और फिर टीएमसी। तीनों ही अलग नहीं हैं। तीसरी ताकत पहली से टूटकर ही बनी। पहली और दूसरी की यारी ईमान पर टिकी थी। ईमान का यह तत्व टीएमसी में जन्मजात था। ईमान को मजबूत बताने की होड़ तय करती थी कि घुसपैठियों के प्रति कौन कितना दयावान है। इन नतीजों ने देश के दूसरे हिस्सों में पहले ही दिवालिया हो चुके &#8220;मजहबी वोट बैंक&#8217; की एक और मजबूत ब्रांच को उजाड़ दिया है।</p>
<p>कम्युनिस्टों के लंबे कब्जे में आने के बाद कलकत्ता धीरे-धीरे एक कबाड़खाना ही बन गया। नाजायज कब्जों और वसूली का ऐसा मॉडल शायद ही देश में कहीं हो। शानदार शोरूमों वाले भीड़ भरे बाजारों के चौड़े फुटपाथ अतिक्रमण में ऐसी दुकानों को दे दिए गए, जिनके मुंह शोरूम की तरफ थे। पूरे कलकत्ता में यह एक समांतर अर्थव्यवस्था है, जिसकी सत्ता कम्युनिस्टों के हाथ से खिसककर टीएमसी के हाथ में आ गई क्योंकि हारने के बाद गलियों के सारे कम्युनिस्ट गिरोह टीएमसी की तगाड़ी उठाने लग गए। कुछ नहीं बदला। पोरिबर्तन केवल एक नारा साबित हुआ था।</p>
<p>अंग्रेज आर्किटेक्ट और टाउन प्लानर आज के कलकत्ता में राइटर्स बिल्डिंग से होकर तीन-चार किलोमीटर चारों ओर के बाजारों और फुटपाथों पर घूमकर देखें तो एक स्वर कहेंगे-&#8220;ये इसी लायक थे।&#8217;</p>
<p>केवल कलकत्ता ही नहीं दूसरे शहरों में भी बंगाल विचित्र है। रेलवे स्टेशनों पर आपने कब्जे बाहर देखे होंगे मगर स्टेशन मास्टर के ऑफिस से सटकर दोनों तरफ प्लेटफॉर्मों पर रेल के डिब्बों की तरफ खुलती दुकानों का बाजार देश में कहीं नहीं देखा होगा। रेलवे की जमीन पर प्लेटफार्मों पर कब्जों का यह अनूठा प्रयोग केवल बंगाल में ही संभव हुआ। रेलमंत्री या मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता बनर्जी के &#8220;पोरिबर्तन&#8217; में यह कोई विषय ही नहीं था। नशे के फैलाव के कारण पंजाब को एक फिल्म में &#8220;उड़ता हुआ पंजाब&#8217; कहा गया। बंगाल की कई यात्राओं के बाद मैंने बहुत दुख से इसे &#8220;सड़ता हुआ बंगाल&#8217; कहा था। ये नतीजे बता रहे हैं कुछ उम्मीद बाकी है। वह पूरी तरह सड़ा नहीं है।</p>
<p>जनवरी में मेरा वेलूर मठ और दक्षिणेश्वर जाना हुआ। पहले भी गया हूँ और कोलकाता के वे स्थान, जहाँ स्वामी विवेकानंद की स्मृतियाँ ताजा हैं। महर्षि अरविंदो, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, बंकिमचंद्र, शरतचंद्र के अलावा बड़ा बाजार की पुरानी इमारतों के बीच ठाकुरबाड़ी, जहाँ गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर के परिवार की अनगिनत यादें हैं। हर बार मैं सोचता रहा कि ये विभूतियाँ अगर आज के बंगाल की हालत देखें तो क्या सोचेंगी? इतने गहरे सांस्कृतिक संस्कारों और सरोकारों वाले पुनर्जागरण की भूमि को यह कौन सा अभिशाप जकड़े हुए है?</p>
<p>बंकिम अपनी मातृभूमि का वंदन करने के लिए उस सरहद के किस तरफ मुंह करेंगे, जिसकी दूसरी ओर से आने वाले अवैध घुसपैठिए इस तरफ के बंगाल का राजनीतिशास्त्र,अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र उलटने में लगे हैं और उन्हें पोसने वाले यहाँ वंदनवार सजाए हुए हैं। उन्हें कलकत्ता से ढाका तक देखना होगा कि डायरेक्ट एक्शन से रक्तरंजित उनकी मातृभूमि किस बुरे हाल से गुजरी है और रक्तबीजों की अमरबेल कहाँ-कहाँ लिपटी पड़ी है। अतीत में झाँकना हर समय सुखद नहीं होता मगर वह ब्लैक एंड व्हाइट में कुछ निष्कर्ष हमें जरूर देता है।</p>
<p>कोई भी राजनीतिक दल सीटों की संख्या के हिसाब से सिमटना और सिकुड़ना बाद में शुरू करता है, पहले वह वैचारिक रूप से दिवालिया होता है। विचार ही राजनीति में महत्वपूर्ण है। आजादी के बाद का इतिहास हर दशक में हर राज्य में अपनी परतें उघाड़ता है।</p>
<p>स्वाधीनता संघर्ष की खुमारी सत्ता में जितना टिकाए रख सकती थी, टिकाया मगर भारत के लिए कोई नया और मौलिक विचार उस दौर की राजनीति पैदा नहीं कर सकी। सत्ता ही विचार में थी, जो केंद्र के बाद राज्यों में भी परिवार केंद्रित होती गई। इसलिए आपातकाल तक आते-आते सब बिखरने लगा। विचारहीन राजनीति कोई सबक सीखने लायक भी नहीं बचती। बूढ़े दरख्त की सूखी शाखें ठूँठ हो जाती हैं। हरी कोंपले वहाँ नहीं आती। रात के वक्त वहाँ बैठे उल्लू सिर घुमाकर आँखें चमकाते हैं।</p>
<p>आजादी के बाद हुए हजारों छोटे-बड़े आंदोलनों को देखें। ऐसे आंदोलन जिन्होंने देश की राजनीति को स्थाई रूप से प्रभावित और परिवर्तित किया। अयोध्या के राम मंदिर आंदोलन को आप किस कसौटी पर रखेंगे? एक विचार को लेकर कुछ नेता एक नई-नई पार्टी बनाकर देश में घूमते-भटकते रहे। उन्हें दकियानूसी कहा गया, जिनका आधुनिक विश्व की जरूरतों से कोई सरोकार नहीं था। वे बार-बार की हार से भी नहीं हारे। हार-हारकर भी अपने विचार पर टिके रहे-तुष्टिकरण का विरोध, कश्मीर में 370, समान नागरिक संहिता और अयोध्या में एक मंदिर। सब हँसते थे। गरियाते थे। मजाक उड़ाते थे। मगर उनके पास कोई दूसरा मौलिक विचार भी नहीं था। सत्ता में उनके परिवार थे। दिल्ली, लखनऊ, पटना, श्रीनगर, चेन्नई, चंडीगढ़ में सत्ता परिवारों के पास थी। विचारहीन पारिवारिक रियासतें, जिनके लिए सत्ता ही विचार थी।</p>
<p>बंगाल पर लौटते हैं। बंगाल एक कठिन और जटिल राजनीतिक भूमि है। दशकों की बिगड़ी आदतें हैं, जो रक्त में समा गई हैं और इनका शुद्धिकरण सरल नहीं है। दो सौ पार का यह परिणाम बेचैन बंगालियों की अनंत अपेक्षाओं का एक भारी-भरकम बोझ भी है, जो अब नए कंधों पर है। मगर असंभव को संभव बनाना भी केवल राजनीति से ही संभव है। बिहार, यूपी और असम में एक जैसी समस्याओं का विस्तार है, जिनमें डेमोग्राफी सबसे चिंतानक है। वोट बैंक बनाकर तुष्टिकरण की राजनीति ने इस घुन को लगभग पूरे देश में फैलने के लिए अनुकूल जमीन तैयार की है, जिसके बुरे परिणाम पूरे देश में उबलते देखे जाते हैं।</p>
<p>बंगाल के नए नेतृत्व को वास्तविक पोरिबर्तन के लिए असम, यूपी और उत्तराखंड के तजुर्बों से बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है। परिणाममूलक पोरिबर्तन के कुछ सूत्र हेमंता बिस्वासरमा से लेने ही पड़ेंगे, कुछ पाठ योगी आदित्यनाथ से सीखने होंगे और थोड़ा सा पुष्कर सिंह धामी की पहली कक्षा में झांकते हुए आगे बढ़ना होगा। इन तीनों सीनियर्स में एक को तीसरी बार चुना गया है, दूसरे दूसरी पारी खेल रहे हैं और तीसरे पहली बार के सीएम हैं। इस गुरुकुल में केवल ये तीन ही बंगाल के नए नेतृत्व के लिए अनुकरणीय पाठशालाएँ हैं और सबसे ऊपर दिल्ली के कुलाधिपति। कठोर अनुशासन, सुविचारित योजना, निर्णय क्षमता और निडरता से क्रियान्वयन कुछ ऐसे मंत्र हैं, जो सबके लिए प्रभावी होते हैं। इन पर अमल के लिए किसी ने किसी को नहीं रोका है।</p>
<p>बंगाल लंबे समय के लिए अवसर देता है। वह दूसरे उन राज्यों जैसा नहीं है, जहाँ एक बार ये और दूसरी बार वो। बंगाल बार-बार के बदलाव में यकीन नहीं करता। वह एक बार ही झाड़ू फेर देता है। आजादी के बाद कांग्रेस सिरमौर रही, तीन दशक तक कम्युनिस्टों को सिर पर बैठाया और डेढ़ तक टीएमसी को लादे रहा। अक्ल देर से आती है मगर आती जरूर है। जब आई तो दोनों को हुगली में डुबो भी दिया मगर दोनों के चक्कर में कीमती 50 साल बरबाद भी हो गए। देश कहाँ से कहाँ पहुँच गया और बंगाल किस चक्रव्यूह में फँसा रहा।</p>
<p>अब अगले खिलाड़ी विजेता बनकर आ रहे हैं तो 80 साल के इन तजुर्बों से कुछ सीखकर वे उम्मीदें जगा सकते हैं। एक लंबी पारी उनके हिस्से में है। 15 साल पहले टीएमसी ने बड़े जोर से पोरिबर्तन का नारा कम्युनिस्टों के कुशासन से मुक्ति के रूप में दिया गया था। मगर टीएमसी ने कम्युनिस्टों की राजनीतिक टेम्पलेट से ही काम चलाकर बंगाल की बदहाली को और बढ़ा दिया। पोरिबर्तन के अब तक नारे सुनता रहा बंगाल क्या सचमुच में पोरिबर्तन का स्वाद चख पाएगा?</p>
<p>सत्ता अपना आरंभ स्वयं लिखती है और अपना अंत भी। बंगाल में एक अंत लिखा गया है और एक आरंभ भी!</p>
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		<item>
		<title>3 मई जयंति  विशेष : व्यक्ति, समाज, राष्ट्र निर्माण और साँस्कृतिक मूल्यों के लिये समर्पित संवाद कला में पारंगत संसार के सबसे पहले संवाददाता देवर्षि नारद</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 03 May 2026 05:39:57 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[नारद जयंति]]></category>
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					<description><![CDATA[संवाद सूत्र पत्रकारिता में हों अथवा समाज के प्रबुद्ध जनों में, उनका ध्येय व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण तथा साँस्कृतिक मूल्यों की रक्षा होना चाहिए जिससे मानवीय मूल्यों की रक्षा और पूरे विश्व का कल्याण हो । देवर्षि नारद का पूरा जीवन और उनकी संवाद शैली इसी लक्ष्य के लिए समर्पित यही । जिस [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>संवाद सूत्र पत्रकारिता में हों अथवा समाज के प्रबुद्ध जनों में, उनका ध्येय व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण तथा साँस्कृतिक मूल्यों की रक्षा होना चाहिए जिससे मानवीय मूल्यों की रक्षा और पूरे विश्व का कल्याण हो । देवर्षि नारद का पूरा जीवन और उनकी संवाद शैली इसी लक्ष्य के लिए समर्पित यही ।</p>
<p>जिस प्रकार ज्ञान और अज्ञान, अंधकार और प्रकाश साथ चलते हैं उसी प्रकार दैवीय और आसुरी प्रवृत्तियाँ भी सदैव साथ चलतीं हैं। दैवीय प्रवृत्ति सकारात्मक होती है, प्राणी और प्रकृति दोनों को उनके मौलिक स्वरूप के अनुरूप जीवन विकास में सहायक होती है । जबकि आसुरी प्रवृत्ति हिंसक होती है, बलपूर्वक सत्ता पर अधिकार करती है, विध्वंसक होती है और सबको अपने रंग में रंगना चाहती है । जैसा हिरण्यकश्यपु ने इन्दारासन पर अधिकार करने और नारायण की पूजा उपासना बंद कराने का प्रयास किया या रावण ने कुबेर की लंका पर बलपूर्वक अधिकार करके सबको अपने रंग में रंगने का प्रयास किया । इन दोनों घटनाओं में लाखों वर्षों का अंतर है किंतु नारदजी दोनों स्थानों पर मिलते हैं। इन दोनों ही नहीं अपितु नारदजी प्रत्येक युग में नकारात्मक शक्तियों के विरुद्ध जन जागरण करने और सकारात्मक शक्तियों को चैतन्य करने के लिये सामने आते हैं। उनकी संवाद शीलता और साहित्य रचना दोनों इसी धारा पर है । वे सनातन संस्कृति के विकास विस्तार के लिये सदैव जाने गये। उनकी उपस्थिति हर युग में रही। भारत का कोई ग्रंथ ग्रंथ में उनके उल्लेख के बिना पूरा नहीं होता है। कुछ ग्रंथों के प्रेरणाकार और कुछ के संपादक वही हैं।<br />
समाज, धर्म, संस्कृति, राष्ट्र रक्षा और मानवीय जीवन मूल्यों की स्थापना के लिये समर्पित नारदजी का प्राकट्य दिवस ज्येष्ठ माह कृष्णपक्ष की द्वितीया है जो इस वर्ष 3 मई को पड़ रही है। उनकी गणना ब्रह्मा जी के उन सात मानस पुत्रों में होती है जो सृष्टि निर्माण के साथ सबसे पहले संसार में आये । इन सात दिव्य विभूतियों में सर्वाधिक सक्रिय और व्यापक चिरंजीवी नारदजी का व्यक्तित्व बहुआयामी है। उनके लिये कहीं कोई बंधन न था। देव, दानव और मनुष्य सहित प्रकृति के सभी प्राणियों से उनकी भाषा में संवाद करते थे। वे सृष्टि के प्रत्येक भाग में विचरण करते थे और किस कौने में कौन नकारात्मक आचरण और अंहकार में डूबकर दूसरों के अधिकारों का हरण कर अपने रंग में रंगने का प्रयास कर रहा है, इसकी जानकारी रखते, पहले उसे समझाने का प्रयास करते और यदि बात न बनती तो त्रिदेवों को सूचना देते, सकारात्मक शक्तियों को जाग्रत करते जिससे दुष्टों के अंत का मार्ग प्रशस्त होता। देव और दैत्य प्रवृत्ति में यह संघर्ष हर युग में रहा और इस संघर्ष में समाधान कारक मार्ग नारद जी ने ही निकाला।<br />
संसार को श्रेष्ठ बनाने के लिये नारद जी ने सकारात्मक संदेश का सदैव आदान प्रदान किया ।<br />
उन्होंने केवल नकारात्मक भूमिका निभाने वालों को ही बिना किसी भय के समझाने का प्रयत्न नहीं किया अपितु जन कल्याण के लिये सकारात्मक शक्तियों को भी उचित मार्गदर्शन किया। देवराज इन्द्र, अवतारी परशुराम, दशरथ नंदन राम, यशोदानंदन कृष्ण, ही नहीं युधिष्ठर से उनके संवाद इसका प्रमाण हैं। जब आसुरी शक्तियों के आतंक से सकारात्मक शक्तियाँ क्षीण हो जाय तब प्रह्लाद जैसे व्यक्तित्व का निर्माण करके सत्य और धर्म की स्थापना का मार्ग नारदजी ने ही निकाला। एक अच्छे राज्य संचालन और समाज निर्माण का संदेश महाराज इक्ष्वाकु और नारद संवाद में मिलता है। तो अपने पूर्वजों एवं परिजनों के कल्याण के लिये भागीरथ को तप करने की सलाह भी नारद जी ने दी थी। कोई शासक या समाज प्रमुख मार्ग से भटका तो उसे सतर्क करने के लिये सबसे पहले नारद जी ही पहुँचते थे । उनके मार्गदर्शन से ही राजकुमार ध्रुव आसमान में सितारे के रूप में चमक रहे हैं, नारदजी के मार्गदर्शन से ही बाल्मीकि जी के जीवन की दिशा बदली और महर्षि बने, नारद जी के सुझाव पर ही बाल्मीकि जी ने रामायण की रचना की। यह ग्रंथ आज भी एक आदर्श व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण का आदर्श सूत्र है। सृष्टि का सफल संचालन केलिये महर्षि भृगु की बेटी श्री लक्ष्मी का विवाह श्रीहरि विष्णु से और हिमाचल राज की पुत्री सती का विवाह देवाधिदेव महादेव से कराने वाले भी नारद जी हैं।<br />
उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे सर्व सम्मानीय थे। जो लोग नास्तिक थे या स्वयं को ही भगवान् घोषित करते थे वे भी नारद को आदर और आसन देते थे। यदि राजाओं में परस्पर युद्ध हो, मन मुटाव हो तो नारदजी दोनों पक्षों से मिलकर उन्हें समझाने का प्रयत्न करते थे। उनकी जिव्हा पर सदैव नारायण का नाम होता था । कितने शासक ऐसे हुये जिन्होंने नारायण के अस्तित्व को ही चुनौती देते थे फिर भी यदि नारायण नारारण कहते हुये नारदजी वहां पहुँचे तो उन्होने नारद जी का आदर आसन अवश्य दिया है। आधुनिक पत्रकारिता के लिये नारद जी का जीवन, संवाद शैली और साहित्य रचना तीनों एक आदर्श हैं।</p>
<p>पुराणों के अनुसार नारदजी का व्यक्तित्व और उनकी रचनाएँ</p>
<p>नारदजी का व्यक्तित्व बहुत विराट और बहुआयामी है । व्यक्ति, परिवार, समाज और आदर्श संस्कृति निर्माण में उनका अद्भुत योगदान है। वेद उपनिषद और पुराणों की रचनाओं में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही। उन्हें &#8220;देव-ऋषि&#8221; माना जाता है। श्रीमद्भगवत गीता के दसवें अध्याय में भगवान कृष्ण ने अपनी विभूतियों में से एक नारदजी को भी माना है । वेदों में ऋचाओं के वर्गीकरण और उन्हें विभिन्न मंडल एवं सूक्त में निर्धारित करने वाले नारद जी हैं। वे वेद और उपनिषदों के मर्मज्ञ तथा पुराण रचना के मार्गदर्शक हैं । उनके द्वारा रचित ग्रंथ सभी विधाओं पर हैं । जिनमें में न्याय और धर्म के तत्त्‍‌वज्ञ, शिक्षा, व्याकरण, आयुर्वेद, ज्योतिष विद्वान, संगीत की विधा का विवरण और मार्गदर्शन है । उन्होनें बृहस्पति जैसे महाविद्वानों की शंकाओं का भी समाधान किया है। वे धर्म,अर्थ, काम और मोक्ष चतुर्पुरुषार्थ के ज्ञाता, सांख्य एवं योग के सम्पूर्ण रहस्य को संसार से अवगत कराने वाले हैं। क‌र्त्तव्य और अक‌र्त्तव्य के बीच भेद का जो वर्णन नारद जी ने किया वह कालजयी है और आज भी उपयोगी । अठारह पुराणों में नारद जी द्वारा रचित एक पुराण &#8220;नारद पुराण&#8221; भी है जिसमें बाइस हजार श्लोक हैं। यद्यपि इस पुराण में कुल पच्चीस हजार श्लोक का वर्णन आता है पर तीन हजार श्लोक उपलब्ध नहीं हैं। एक अन्य ग्रंथ नारद संहिता है। सांख्य, योग, ज्योतिष और नीति की जो विवेचना नारदजी ने कि आगे उसी का विस्तार अन्य विद्वानों ने किया ।<br />
लेकिन भारत में एक षड्यंत्र चला । भारतीय ऋषियों और मनीषियों के बारे में कूटरचित प्रचार का जिससे उनके व्यक्तित्व की गरिमा कम हो । यह क्रम मध्यकाल से आरंभ हुआ और अंग्रेजीकाल में सातवें आसमान पर रहा। इसी षड्यंत्र के अंतर्गत विभिन्न धार्मिक चलचित्रों और धारावाहिकों में नारद जी का चरित्र-चित्रण एक विदूषक अथवा यहाँ की वहाँ खबरें देने वाले नकारात्मक प्रस्तुति की जाती है। देवर्षि की महानता के विपरीत उनके व्यक्तित्व एकदम बौना बताया जाता है। नारद जी के पात्र को जिस प्रकार से प्रस्तुत किया जा रहा है, उससे आम आदमी में उनकी छवि लडा़ई-झगडा़ करवाने वाले व्यक्ति अथवा विदूषक की बन गई है। यह उनके प्रकाण्ड पांडित्य एवं विराट व्यक्तित्व के प्रति अन्याय है। नारद जी का उपहास उडाने वाले श्रीहरि के इन अंशावतार की अवमानना के दोषी है। नारद जी प्रत्येक यूग के साक्षी हैं और संस्कृति एवं मानवीय मूल्य स्थापित करने वालों के अनन्य सहयोगी रहे हैं। वे भगवान के पार्षद होने के साथ देवताओं के प्रवक्ता भी हैं। नारद जी वस्तुत: सही मायनों में देवर्षि हैं।<br />
नारदजी का जीवन, उनकी कार्यशैली आज के मीडिया कर्मियों, साहित्य रचना कारों और नीति निर्माताओं केलिए एक आदर्श है। आज कुछ शक्तियाँ भारत और विश्व जिस दिशा में मोड़ने का प्रयास कर रहीं हैं इसमें निष्पक्ष, निर्भीक और सकारात्मक संवाद शैली बहुत आवश्यक है। ताकि प्रकृति का संरक्षण हो और व्यक्ति, परिवार और समाज को ऐसी दिशा मिले जिससे भारत पुनः उस स्थान पर प्रतिष्ठित हो सके जिस पल पहले कभी रहा है। शब्द सृजन और संवाद शीलता की यह धारा न केवल नारद जी की आराधना है अपितु आज भारत के सामने उपस्थित हो रही चुनौतियों का सामना करने केलिये भी आवश्यक है ।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<item>
		<title>जन्मदिन विशेष :आग्नेय अस्त्रों और संसार के पहले समाज शास्त्र की रचना करने वाले अग्नि अविष्कारक महर्षि भृगु</title>
		<link>https://shabdshaktinews.in/63530-2/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 01 May 2026 04:35:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[अग्नि अविष्कारक महर्षि भृगु]]></category>
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					<description><![CDATA[&#8211;रमेश शर्मा जिनमें नारायण ने अपना स्वरूप को देखा उन महर्षि भृगु का अवतरण दिवस वैशाख पूर्णिमा है। वे ब्रह्मा द्वारा प्रथम मन्वंतर में उत्पन्न किये गये आठ प्रचेताओं में प्रथम हैं। ऋग्वेद में उनसे संबंधित अनेक ऋचायें हैं। वे अग्नि और आग्नेय अस्त्रों के अविष्कारक भी हैं। इसीलिए अग्नि का एक नाम &#8220;भृगि&#8221; भी [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;">&#8211;रमेश शर्मा</p>
<p>जिनमें नारायण ने अपना स्वरूप को देखा उन महर्षि भृगु का अवतरण दिवस वैशाख पूर्णिमा है। वे ब्रह्मा द्वारा प्रथम मन्वंतर में उत्पन्न किये गये आठ प्रचेताओं में प्रथम हैं। ऋग्वेद में उनसे संबंधित अनेक ऋचायें हैं। वे अग्नि और आग्नेय अस्त्रों के अविष्कारक भी हैं। इसीलिए अग्नि का एक नाम &#8220;भृगि&#8221; भी है। भृगि अर्थात भृगु से उत्पन्न।<br />
ऐसे महान ऋषि का धरती पर अवतरण वैशाख पूर्णिमा को माना जाता है। पुराणों के अनुसार वैशाख पूर्णिमा वह महत्वपूर्ण तिथि है जब सृष्टि का पूर्ण निर्माण करने के बाद ब्रह्मा जी ने मनुष्य को योग्य बनाने केलिये ऋषि परंपरा का आरंभ किया। इसके लिये सप्त ऋषियों को उत्पन्न किया जो संसार में जन्म लेने वाले मनुष्यों को योग्य बनाएँ। सभ्यता के विकास केलिये आरंभ मन्वंतर परंपरा में प्रथम मन्वंतर में ब्रह्माजी नै जो सप्त ऋषि उत्पन्न किये उनमें भृगुजी सबसे प्रथम हैं। इसलिये भृगु जी को ज्ञान विज्ञान का ही नहीं अग्नि का अविष्कारक भी माना जाता है। ऋग्वेद के अनुसार महर्षि भृगु ने हक अरण्णियों में बल लगाकर अग्नि उत्पन्न की एक अन्य ऋचा के अनुसार वे मातरिश्वन् से अग्नि लेकर पृथ्वी पर आये। इसी कारण यज्ञ के माध्यम से अग्नि की आराधना करने का श्रेय भृगु कुल के ऋषियों को ही दिया जाता है। उन्हीं के माध्यम से संसार भर को अग्नि का परिचय मिला। कुछ स्थानों पर महर्षि अंगिरा को भी महर्षि भृगु का ही पुत्र बताया गया है इसके पीछे तर्क यह है कि ऋग्वेद में भृगु अंगिरस् नाम आया है। इसके दो ही अर्थ हो सकते हैं। एक तो भृगु को अंगिरस की उपाधि हो सकती है जो अग्नि के अविष्कारक होने के नाते कहे गये। दूसरा महर्ष अंगिरा भी भृगु परंपरा का अंग हो सकते है। यद्यपि पुराणों मे महर्षि अंगिरा को भृगु के समान ही प्रचेता ही लिखा गया है, अंगिरा भी सप्त ऋषियों में एक हैं जो महर्षि अंगिरा को भी महर्षिभृगु के समतुल्य दर्शाता है। पर यदि महर्षि अंगिरा महर्षि भृगु के पुत्र के नहीं तो महर्षि अंगिरा का महर्षि भृगु से कोई गहरा संबंध अवश्य है। देवगुरु बृहस्पति इन्हीं अंगिरा के पुत्र हैं। बहुत संभव है कि महर्षि भृगु की परंपरा में कोई ऋषि उत्पन्न हुये जिनका नाम भी अंगिरा हो और नाम की एकरूपता में कोई भ्रम न इसलिये इन ऋषि का नाम भृगु अंगिरस लिखा हो। यह अंतर ऋग्वेद की भृगु वारिणी ऋचाओं में भी है। जिससे लगता है कि महर्षि भृगु का संबंध वरुण से है।<br />
पुराणों में एक कथा और है । जब यह निर्णय होना था कि ब्रह्मा विष्णु और शिव में से सबसे सात्विक कौन है जिसे कभी क्रोध या रोष नहीं आता । तब इन त्रिदेवों के परीक्षक के रूप यह दायित्व महर्षि भृगु को ही मिला। परीक्षा के लिये ही महर्षि भृगु ने नारायण के वक्ष पर पद प्रहार किया और वे पद चिन्ह नारायण अपने हृदय पर धारण करते हैं। इसी आधार पर य। निधारित हुआ कि कौन किस गुण का प्रतीक है। महर्षि भृगु की सलाह पर ही नारायण संसार को संदेश देने के लिये समय समय पर मनुज अवतार लेते हैं । संसार में परमपिता ब्रह्मा का पूजन न हो, यह निर्णय भी महर्षि भृगु ने ही लिया था। श्रीमद्भगवद्गीता के दसवें अध्याय में भगवान् ने कहा &#8220;मैं ऋषियों में भृगु हूँ&#8221;। महर्षि भृगु को संसार का पहला प्रचेता लिखा गया है । विष्णु पुराण के अनुसार नारायण को ब्याहीं श्रीलक्ष्मी महर्षि भृगु की ही बेटी थीं । समुद्र मंथन से जो लक्ष्मी प्रगट हुईं वे तो माता लक्ष्मीकी आभा मात्र हैं । भृगु वंश में ही महर्षि मार्कण्डेय, शुक्राचार्य, ऋचीक, विधाता,दधीचि, त्रिशिरा, जमदग्नि, च्यवन और नारायण का ओजस्वी अवतार परशुरामजी का जन्म हुआ । सूर्य पुत्र मनु उनके शिष्य हैं । महर्षि भृगु ने ही महाराज मनु को मानव आचार संहिता रचने को प्रेरित किया। इसीलिए मनु स्मृति के अंत में महर्षि भृगु के प्रति आभार प्रकट किया गया है उससे यह पुष्ट होता है कि संसार की यह पहली मानव आचार संहिता महर्षि भृगु के निर्देशन में ही रची गई।<br />
महर्षि भृगु को अंतरिक्ष, चिकित्सा और नीति शास्त्र का भी जनक माना जाता है। अंतरिक्ष के ग्रहों और तारागणों की गणना का पहला शास्त्र भृगु संहिता है। इस संबंधी ताम्रपत्र पर एक प्रमाण नेपाल में सुरक्षित है। इसके अतिरिक्त भृगु स्मृति, भृगु सूत्र, भृगु गीता, भृगु उपनिषद आदि ग्रंथों का उल्लेख मिलता है पर ये उपलब्ध नहीं हैं। भृगुसंहिता को ज्योतिष का पहला शास्त्र माना जाता है। जो यह संकेत करता है कि भारत में अंतरिक्ष और ग्रहों की गति का ज्ञान लाखों वर्ष पहले से रहा है । महर्षि भृगु चिकित्सा शास्त्र के अद्भुत ज्ञाता थै। मृत संजीवनी औषधि खोजने वाले शुक्राचार्य उन्ही के पुत्र हैं। महर्षि भृगु के तीन विवाहों का वर्णन मिलता है। उनका पहला विवाह देवी ख्याति से हुआ । इनसे दो पुत्र धाता, विधाता और पुत्री श्रीलक्ष्मी हैं। महर्षि भृगुआ का दूसरा विवाह महर्षि कश्यप की पौत्री और दैत्यों के अधिपति हिरण्यकश्यप की पुत्री दिव्या से हुआ। संजीवनी विद्या के ज्ञाता और दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य इन्हीं के पुत्र हैं । इन्हीं शुक्राचार्य के पुत्र विश्वकर्मा हैं जिन्होंने दिव्य स्वर्ग की रचना की। महर्षि भृगु का तीसरा विवाह पुलोम ऋषि की पुत्री पौलमी से हुआ। कहीं कहीं पुलोम ऋषि को दानवों का स्वामी भी लिखा है । इनसे महर्षि च्यवन का जन्म हुआ और इसी परंपरा में आगे चलकर भगवान परशुराम का अवतार हुआ। च्यवन ऋषि आगे चलकर खम्भात की खाड़ी के स्वामी बने तब से इस क्षेत्र को भृगुकच्छ-भृगु क्षेत्र के नाम से जाना जाने लगा। भड़ौच में नर्मदा के तट पर भृगु मन्दिर बना है। यह माना जाता है कि नर्मदा क्षेत्र महर्षि भृगु परंपरा के ऋषियों की तपोस्थली रही है । इसलिये नर्मदा के पूरे क्षेत्र में आज भी भृगु आश्रमों के अवशेष मिलते हैं।<br />
भगवान शिव ने जब ज्ञान सभा के लिये नैमिषारण्य को सुनिश्चित किया तब इसके अधिपति होने का दायित्व महर्षि भृगु को ही सौंपा। संसार हर कोने में महर्षि भृगु के अपभ्रंश नाम पाये जाते हैं। जो यह प्रमाणित करता है कि महर्षि भृगु ज्ञान के पहले प्रकाश पुंज थे और संसार भर में ज्ञान का प्रकाश भारत की धरती से ही प्रतिबंधित हुआ। इसकी पुष्टि उन्नीसवी शताब्दी के शोध कर्ता मैक्समूलर का वह कथन भी है भारत से ज्ञान पहले ईरान में गया और ईरान से पूरे संसार में। मैक्समूलर का यह कथन उनकी पुस्तक &#8221; हम भारत से क्या सीखें&#8221; में है ।<br />
ऐसे महान अविष्कारक महर्षि भृगु के चरणों में कोटिशः नमन ।</p>
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		<title>स्टार्टअप की दुनिया और आज का नया भारत</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 18 Apr 2026 09:16:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[स्टार्टअप भारत]]></category>
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					<description><![CDATA[&#160; &#8211; डॉ. मयंक चतुर्वेदी भारत आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां नवाचार और उद्यमिता राष्ट्र निर्माण की धुरी बन चुकी हैं। देश में स्टार्टअप्स की तेजी से बढ़ती संख्या, उनके द्वारा सृजित रोजगार और वैश्विक स्तर पर उनकी पहचान इस बात का प्रमाण है कि भारत एक नए ‘आर्थिक युग’ में [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<p style="text-align: center;">&#8211; डॉ. मयंक चतुर्वेदी</p>
<p>भारत आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां नवाचार और उद्यमिता राष्ट्र निर्माण की धुरी बन चुकी हैं। देश में स्टार्टअप्स की तेजी से बढ़ती संख्या, उनके द्वारा सृजित रोजगार और वैश्विक स्तर पर उनकी पहचान इस बात का प्रमाण है कि भारत एक नए ‘आर्थिक युग’ में प्रवेश कर चुका है।</p>
<p>इस संदर्भ में कहना होगा कि 16 जनवरी 2016 को शुरू की गई “स्टार्टअप इंडिया” पहल ने इस परिवर्तन को दिशा और गति प्रदान की है। इस पहल का उद्देश्य एक ऐसा मजबूत इकोसिस्टम तैयार करना था, जहां नए विचारों को पंख मिलें, निवेश को प्रोत्साहन मिले और उद्यमियों को हर स्तर पर सहयोग प्राप्त हो सके। केंद्र की मोदी सरकार ने समय को पहचानते हुए नीतियों को सरल बनाया, वित्तीय सहायता, कर में छूट और बाजार तक पहुंच जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया और एक नया क्षितिज अपने देश के युवाओं के लिए खोल दिया, जिनके लिए नवाचार से उद्यमिता में सफलता जैसे कोई स्‍वप्‍न था!</p>
<p>वस्‍तुत: आज इस यात्रा का परिणाम हमारे सामने मौजूद है। वित्त वर्ष 2025-26 में 55,200 से अधिक “स्टार्टअप्स” को राज्‍यवार मान्यता मिल गई है। कह सकते हैं कि वर्ष 2026 से शुरू हुई “स्टार्टअप्स” की यात्रा में यह किसी एक वर्ष में अब तक की सर्वाधिक संख्या है। यह पिछले वित्त वर्ष 2024-25 के 36,400+ स्टार्टअप्स की तुलना में 51.6 प्रतिशत की प्रभावशाली वृद्धि को दर्शाता है। यह आंकड़ा न‍िश्‍चि‍त ही उस विश्वास और ऊर्जा का प्रतीक है, जोकि वर्तमान भारत के युवाओं में दिखाई दे रही है।</p>
<p>यही कारण है, रोजगार सृजन के क्षेत्र में भी स्टार्टअप्स ने उल्लेखनीय योगदान दिया है। वित्त वर्ष 2025-26 में लगभग 4,99,400 प्रत्यक्ष नौकरियां सृजित हुईं हैं, आंकड़ा कहता है कि यह पिछले वर्ष की तुलना में 36.1 प्रतिशत अधिक हैं। 31 मार्च 2026 तक कुल 2.23 लाख से अधिक मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स ने 23.36 लाख से अधिक प्रत्यक्ष रोजगार सृजित किए हैं।</p>
<p>देश के विभिन्न राज्यों में स्टार्टअप्स का विस्तार भारत के संतुलित विकास की कहानी कहता है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और गुजरात जैसे राज्य इस क्षेत्र में अग्रणी बनकर उभरे हैं। इन राज्यों में हजारों स्टार्टअप्स सक्रिय हैं, जिनके माध्‍यम से सिर्फ लाखों भारतीयों को ही नहीं, कई विदेशियों को भी रोजगार मिल रहा है। इसमें अच्‍छी बात यह भी है कि अब छोटे शहरों और दूरदराज के क्षेत्रों से भी स्टार्टअप्स उभर रहे हैं, जोकि भारत के आर्थिक विकास को व्यापक और समावेशी बना रहे हैं।</p>
<p>सरकार की विभिन्न योजनाएं इस विकास को मजबूत आधार प्रदान कर रही हैं। फंड ऑफ फंड्स फॉर स्टार्टअप्स (एफएफएस) के तहत 7,000 करोड़ रुपये से अधिक का वितरण किया जा चुका है, जिससे 1,420 से अधिक स्टार्टअप्स में 26,900 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश संभव हुआ है। इस सफलता को देखते हुए 10,000 करोड़ रुपये के कोष के साथ एफएफएस 2.0 की शुरुआत की गई है, जो भविष्य में और अधिक स्टार्टअप्स को सहयोग प्रदान करेगा। क्रेडिट गारंटी स्कीम फॉर स्टार्टअप्स (सीजीएसएस) का विस्तार भी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। गारंटी कवर को 10 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 20 करोड़ रुपये कर दिया गया है, जिससे स्टार्टअप्स के लिए पूंजी जुटाना आसान हो गया है। 2025-26 तक 1,250 करोड़ रुपये से अधिक के ऋणों की गारंटी दी जा चुकी है, जो इस योजना की प्रभावशीलता को दर्शाता है।</p>
<p>स्टार्टअप इंडिया सीड फंड स्कीम (एसआईएसएफएस) के तहत 219 इनक्यूबेटरों के माध्यम से 3,400 से अधिक स्टार्टअप्स को 605 करोड़ रुपये से अधिक की सहायता प्रदान की गई है। कहना होगा कि यह योजना उन स्टार्टअप्स के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो शुरुआती चरण में होते हैं और जिन्हें वित्तीय सहायता की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। वहीं महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में भी यह क्रांति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। 1.07 लाख से अधिक स्टार्टअप्स में कम से कम एक महिला निदेशक या भागीदार है, जिसे आंकड़ों के हिसाब से हम कुल स्टार्टअप्स का लगभग 48 प्रतिशत मान सकते हैं। यह संख्‍या बता रही है कि महिलाओं की बढ़ती भागीदारी अब नेतृत्व की भूमिका में है। यह परिवर्तन सामाजिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण है।</p>
<p>यही कारण भी है जो नवाचार के क्षेत्र में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। स्टार्टअप्स द्वारा दायर पेटेंट आवेदनों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि इसका साक्षात प्रमाण है। वित्त वर्ष 2024-25 में जहां 2,850+ पेटेंट आवेदन दायर किए गए थे, वहीं 2025-26 में यह संख्या बढ़कर 4,480+ हो गई है। कुल मिलाकर 19,400 से अधिक पेटेंट आवेदन दाखिल किए जा चुके हैं, जो यह दर्शाता है कि भारत अब नवाचार के क्षेत्र में भी अपनी मजबूत पहचान बना रहा है। सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) ने भी स्टार्टअप्स को नई संभावनाएं प्रदान की हैं। 38,600 से अधिक स्टार्टअप्स इस प्लेटफॉर्म से जुड़े हैं, जिससे उन्हें सरकारी खरीद में भाग लेने का अवसर मिला है। 2025-26 में 1,40,260 से अधिक ऑर्डर दिए गए, जिनका कुल मूल्य 19,190 करोड़ रुपये से अधिक रहा। यह सरकारी समर्थन का एक सशक्त उदाहरण है, जिसने स्टार्टअप्स को बाजार तक पहुंचने में मदद की है।</p>
<p>अब यदि इस पूरे परिदृश्य को व्यापक दृष्टि से देखें, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत ने अपनी विशाल जनसंख्या को एक उत्पादक शक्ति में बदलने की दिशा में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। युवाओं की ऊर्जा, सरकार की नीतियां और तकनीकी प्रगति, वस्‍तुत: इन तीनों के समन्वय ने भारत को आज वैश्‍विक स्‍तर पर इस दिशा में एक नई पहचान दिलाई है। आज भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते स्टार्टअप इकोसिस्टम में शामिल होकर वैश्विक नवाचार के मानचित्र पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है।</p>
<p>उम्‍मीद है कि आने वाले वर्षों में भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम और अधिक सशक्त होगा, जोकि देश को आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी रूप से नई ऊंचाइयों तक ले जाएगा। एक तरह से देखें तो वर्तमान भारत में “स्टार्टअप क्रांति” न सिर्फ आर्थिक विकास की कहानी है, बल्कि यह आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की दिशा में एक मजबूत और निर्णायक कदम है; कहना होगा कि एक ऐसा कदम, जोकि आने वाली पीढ़ियों के लिए नए अवसरों के द्वार खोल रहा है और भारत दिनो-दिन सशक्‍त हो रहा है, अर्थ के साथ वैश्‍विक प्रभाव में भी।</p>
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		<title>14 अप्रैल जन्मदिन विशेष : बाबासाहेब के प्रति नेहरू-गांधी का शत्रुता भाव</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 13 Apr 2026 13:12:44 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[अम्बेडकर जयंती विशेष]]></category>
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					<description><![CDATA[प्रवीण गुगनानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बाद यदि, स्वतंत्र भारत की राजनीति व समाज को किसी ने सर्वाधिक प्रभावित किया है वे हैं पहले गांधी जी व दूजे अंबेडकर जी। कांग्रेस द्वारा बाबासाहेब की घोर उपेक्षा के बाद भी भारतीय राजनीति में उनकी लगातार बढ़ती स्वीकार्यता का इतिहास पढ़ना हो तो एक और व्यक्ति का [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-63127" src="https://shabdshaktinews.in/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260413-WA0007.jpg" alt="" width="440" height="550" srcset="https://shabdshaktinews.in/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260413-WA0007.jpg 440w, https://shabdshaktinews.in/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260413-WA0007-240x300.jpg 240w, https://shabdshaktinews.in/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260413-WA0007-336x420.jpg 336w" sizes="(max-width: 440px) 100vw, 440px" /></p>
<p style="text-align: center;">प्रवीण गुगनानी</p>
<p>राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बाद यदि, स्वतंत्र भारत की राजनीति व समाज को किसी ने सर्वाधिक प्रभावित किया है वे हैं पहले गांधी जी व दूजे अंबेडकर जी।<br />
कांग्रेस द्वारा बाबासाहेब की घोर उपेक्षा के बाद भी भारतीय राजनीति में उनकी लगातार बढ़ती स्वीकार्यता का इतिहास पढ़ना हो तो एक और व्यक्ति का उल्लेख आवश्यक हो जाता है। वे हैं जोगेंद्रनाथ मंडल। कांग्रेस की सतत उपेक्षा के शिकार जोगेंद्रनाथ मंडल ने यदि स्वतंत्रता पूर्व की भारतीय राजनीति में बाबासाहेब को सफलतापूर्वक स्थापित न किया होता तो आज भारत में दलित चिंतन का स्वरूप आमूलचूल भिन्न होता।<br />
प्रारंभ से ही दलित चिंतन को उपेक्षा की दृष्टि से देखने वाली कांग्रेस ने जब बाबासाहेब के प्रति बेहद अपमानजनक रवैया अपनाते हुये संविधान सभा में भेजे गए प्रारंभिक 296 सदस्यों में अंबेडकर को जगह नहीं दी थी तब जोगेंद्रनाथ मंडल ने अंबेडकर जी को संविधान सभा में भेजने की भूमिका बनाई थी।<br />
जब कांग्रेस ने संविधान सभा में अंबेडकर जी के प्रवेश को रोकने हेतु प्रपंच प्रारंभ किये तब मंडल ने बंगाल के खुलना-जैसोर से अपनी सीट खाली करके बाबासाहेब को संविधान सभा में भेजा था।<br />
विभाजन में यह तय हुआ था कि जिन क्षेत्रों में हिंदू जनसंख्या 51% से अधिक है वे क्षेत्र भारत में रहेंगे। इसके बाद भी कांग्रेस ने तब हद दर्जे की गलती करते हुये बाबा साहेब को संविधान सभा में षड़यंत्रपूर्वक अप्रासंगिक करने हेतु बंगाल के खुलना-जैसोर को 71% हिंदू बहुल वाला क्षेत्र होने के बाद भी पाकिस्तान को सौंप दिया और तब बाबासाहेब तकनीकी तौर पर पाकिस्तानी संविधान सभा के सदस्य माने गये थे। बाबासाहेब ने इसका विरोध किया, जिसके बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप से बाबासाहेब बंबई राज्य से एमएस जयकर द्वारा खाली की गई सीट से चुनकर भारतीय संविधान सभा में पहुंच पाये थे।<br />
बाबासाहेब प्रारंभ से ही अखंड भारत के पक्ष में थे। उन्होंने बंटवारे के लिए एक पैर पर तैयार और तत्पर गांधीजी और जवाहरलाल नेहरू के साथ जिन्ना का भी पुरजोर विरोध किया। उनकी पुस्तक “थॉट्स ऑन पाकिस्तान” में इसका पूरा विवरण है, जिसमें उन्होंने लिखा है कि मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के चलते कांग्रेस ने देश का बंटवारा कर डाला।<br />
बाबासाहेब की स्पष्ट मान्यता थी कि जब धार्मिक आधार पर बंटवारा हो चुका है, तब पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं को भारत आ जाना चाहिए। उन्होंने यह यह भी आशंका जताई थी कि धर्म के आधार पर देश के बंटवारे से हिंदुओं को गंभीर क्षति पहुंचेगी और ऐसा हुआ भी। बंटवारे के बाद पाकिस्तान में बचे ज्यादातर दलित या तो मार डाले गए या फिर उनसे बलात् धर्म परिवर्तन कराया गया। तब जोगेन्द्रनाथ मंडल अपनी ही हुकूमत में चीखते-चिल्लाते रह गए थे। तब न पाकिस्तान सरकार न भारत की नेहरू सरकार ने दलित हिंदुओं की मदद की थी।<br />
इस प्रकार देश में प्रथम मुस्लिम-दलित राजनीति का प्रयोग हुआ जो कि बेहद असफल व निराशाजनक रहा किंतु यह प्रयोग अब भी यदा कदा यहां-वहां ‘भीम मीम’ नाम से प्रयुक्त होता रहता है।<br />
बाबा साहेब और सुभाषचंद्र बोस के प्रति गांधी जी का व्यवहार उनके उपनाम ‘महात्मा’ शब्द के अनुरूप कतई नहीं था।<br />
वर्ष 2013 में प्रकाशित पुस्तक “डॉ. बाबा साहब आंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेस” के 17वें खंड के पृष्ठ संख्या 366 से 369 बड़े ही उल्लेखनीय हैं। 27 नवंबर, 1947 को बाबासाहेब ने लिखा कि ‘मुझे पाकिस्तान और हैदराबाद की अनुसूचित जातियों के लोगों की ओर से असंख्य शिकायतें मिल रही हैं और अनुरोध किया जा रहा है कि उनको दुख और परेशानी से निकालने के लिए मैं कुछ करूं। पाकिस्तान से उन्हें आने नहीं दिया जा रहा है और जबरन उन्हें इस्लाम में परिवर्तित किया जा रहा है। हैदराबाद में भी उन्हें जबरन मुसलमान बनाया जा रहा है, ताकि मुस्लिम आबादी की ताकत बढ़ाई जाए।’<br />
अंबेडकर जी ने लिखा, अनुसूचित जातियों के लिए जैसी स्थिति भारत में है वैसी ही पाकिस्तान में है, वह आगे लिखते हैं, ‘मैं यही कर सकता हूं कि उन सभी को भारत आने के लिए आमंत्रित करूँ। पृष्ठ 368 पर बाबासाहेब लिखते हैं कि ‘जिन्हें हिंसा के द्वारा इस्लाम धर्म में परिवर्तित कर दिया गया है, मैं उनसे कहता हूं कि आप अपने बारे में यह मत सोचिए कि आप हमारे समुदाय से बाहर हो गए हैं। मैं वादा करता हूं कि यदि वे वापस आते हैं तो उनको अपने समुदाय में सम्मिलित करेंगे और वे उसी तरह हमारे भाई माने जाएंगे जैसे मतांतरण के पूर्व माने जाते थे।<br />
बाबासाहेब ने 18 दिसंबर, 1947 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को एक पत्र लिखा था कि “पाकिस्तान सरकार अनुसूचित जाति के लोगों को भारत आ आने से रोकने के लिए हर हथकंडे अपना रही है। मेरी नजर में इसका कारण यह है कि वह उनसे निम्न स्तर का काम कराने के साथ यह भी चाहती है कि वे भूमिहीन श्रमिकों के रूप में उनकी जमीनों पर काम करें। नेहरू जी से उन्होंने अनुरोध किया कि वह पाकिस्तान सरकार से कहें कि भारत आने के इच्छुक लोगों को भारत आने में कोई रुकावट पैदा न करे।”<br />
नेहरू जी अपनी तुष्टिकरण की राजनीति के चलते पाकिस्तान में छूट गये हिंदुओं के संदर्भ में कभी भी गंभीर नहीं रहे।<br />
बाबासाहेब ने अपनी पुस्तक ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ में भारत के धार्मिक आधार पर पूर्ण विभाजन के आशय से पृष्ठ 103 पर लिखा “यह बात स्वीकार कर लेनी चाहिए कि पाकिस्तान बनने से हिंदुस्तान सांप्रदायिक समस्या से मुक्त नहीं हो जाएगा”। सीमाओं का पुनर्निर्धारण करके पाकिस्तान को तो एक सजातीय देश बनाया जा सकता है, परंतु हिंदुस्तान तो एक मिश्रित देश बना ही रहेगा। वे स्वतंत्र विभाजित भारत में मुस्लिम समाज के रहने के खतरों का स्पष्ट आभास कर रहे थे व इसके प्रति देश को चेता भी रहे थे, उनकी अटल मान्यता थी कि जनसंख्या की धार्मिक आधार पर पूर्ण अदला-बदली के बिना भारत एक पूर्ण सजातीय देश नहीं बन सकता।<br />
बाबासाहेब राइटिंग्स एंड स्पीचेस के पृष्ठ 367 पर लिखा है- “अनुसूचित जातियों के लिए चाहे वे पाकिस्तान में हों या हैदराबाद में उनका मुसलमानों तथा मुस्लिम लीग पर विश्वास करना घातक होगा। अनुसूचित जातियों का यह सामान्य व्यवहार हो गया है कि वे चूंकि हिंदुओं को नापसंद करते हैं, इसलिए मुस्लिमों को मित्र के रूप में देखने लगते हैं। यह गलत सोच है। मुसलमान एवं मुस्लिम लीग जितनी तेजी से हो सके अपने को शासक वर्ग बनाने के लिए तत्पर हैं, इसलिए वे कभी अनुसूचित जाति के दावों पर विचार नहीं करेंगे। यह मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूं”।<br />
दलित मुस्लिम एकता की राजनीति के पीछे छिपे हुये भारत पर शासन करने व कब्जा करने व यूज एंड थ्रो की नीति को जितना बाबासाहेब ने समझा व इस बात को अपने समुदाय को समझाने का प्रयास किया उतना स्वातंत्र्योत्तर भारत में कोई अन्य नहीं कर पाया। किंतु, नेहरू व गांधी जी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने कभी भी अंबेडकर जी के इन सरोकारों व संवेदनाओं को नहीं समझा व सतत उनकी उपेक्षा करती रही थी।<br />
<strong><em>लेखक डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी, क्षेत्रीय महामंत्री, अखिल भारतीय साहित्य परिषद्</em></strong></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>भाजपा-संघ जहरीले सांप ? : फिर कांग्रेस अध्यक्ष का अनर्गल प्रलाप</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 08 Apr 2026 09:23:33 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[कांग्रेस खड़गे]]></category>
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					<description><![CDATA[&#160; &#8211; डॉ. मयंक चतुर्वेदी भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है, किंतु जब यह प्रतिस्पर्धा तथ्यों, नीतियों और विचारों से हटकर कटु, उग्र और विभाजनकारी भाषा में बदल जाए, तब समझलीजिए वह लोकतंत्रीय चेतना को आहत करने लगी है। कहना होगा कि कांग्रेस के रार्ष्‍टीय अध्‍यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा असम की एक चुनावी सभा [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<p style="text-align: center;">&#8211; डॉ. मयंक चतुर्वेदी</p>
<p>भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है, किंतु जब यह प्रतिस्पर्धा तथ्यों, नीतियों और विचारों से हटकर कटु, उग्र और विभाजनकारी भाषा में बदल जाए, तब समझलीजिए वह लोकतंत्रीय चेतना को आहत करने लगी है। कहना होगा कि कांग्रेस के रार्ष्‍टीय अध्‍यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा असम की एक चुनावी सभा में भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को “जहरीला सांप” बताने वाला बयान इसी गिरते राजनीतिक स्तर का परिचायक है। यह टिप्पणी देखा जाए तो संपूर्ण लोकतांत्रिक मर्यादाओं और सामाजिक सौहार्द पर आज प्रश्नचिह्न खड़ा करती र्हु दिखाई देती है।</p>
<p>असम के नीलांबाजार में दिए गए इस बयान में खड़गे ने धार्मिक संदर्भ का उपयोग करते हुए मुसलमानों से यहां तक कह दिया कि “कुरान में लिखा है कि नमाज पढ़ते समय अगर कोई जहरीला सांप दिख जाए, तो उसे तुरंत मार देना चाहिए।” इसी तर्ज पर उन्होंने भाजपा-आरएसएस को “खत्म करने” की बात कही। बोले, “बीजेपी-आरएसएस वह जहरीला सांप है। अगर इन्हें नहीं मारा तो जान बचाना मुश्किल हो जाएगा।” यह भाषा राजनीतिक आलोचना कहीं से भी नहीं है, बल्‍कि एक खतरनाक संकेत समाज में वैमनस्य फैलाने के संबंध में है।</p>
<p>यदि इस पूरे विवाद को तथ्यों और जमीनी हकीकत के संदर्भ में देखा जाए, तब सच स्‍वयं में प्रकाशमान हो उठता है, समझ आता है कि कांग्रेस के रार्ष्‍टीय अध्‍यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का लगाया गया आरोप कितना विद्वेशपूर्ण और असत्‍य है। भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर अक्सर अल्पसंख्यक खासकर (मुसलमान और ईसाई) विरोधी होने का आरोप लगाया जाता है, किंतु सरकारी योजनाओं और उनके लाभार्थियों के आंकड़े इस दावे को कमजोर करते हैं। वहीं राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के हर विपदा के दौरान एवं सहज स्‍थ‍िति में समाज जीवन के हित जो कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, वे इस झूठ को सिरे से नकारने के लिए पर्याप्‍त हैं।</p>
<p>पिछले एक दशक में केंद्र सरकार द्वारा चलाई गई प्रमुख जनकल्याणकारी योजनाओं पर नजर डालें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इनका लाभ बिना किसी भेदभाव के समाज के हर वर्ग तक पहुंचा है। उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 2015 से 2024 के बीच लगभग 03 करोड़ से अधिक पक्के मकानों का निर्माण हुआ। विभिन्न राज्यों के आंकड़ों के अनुसार, इन लाभार्थियों में अल्पसंख्यक समुदाय की हिस्सेदारी कई स्थानों पर उनकी जनसंख्या के अनुपात से कहीं अधिक रही है। उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में कई जिलों में मुस्लिम लाभार्थियों की हिस्सेदारी 25 फीसद से 35 प्रतिशत के बीच दर्ज की गई, जबकि उनकी जनसंख्या लगभग 18–20% के आसपास है।</p>
<p>इसी प्रकार प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत 9.6 करोड़ से अधिक गैस कनेक्शन वितरित किए गए। पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, इनमें बड़ी संख्या में मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक महिलाओं को लाभ मिला। कई सामाजिक अध्ययनों में यह पाया गया कि ग्रामीण मुस्लिम परिवारों में उज्ज्वला योजना का प्रभाव विशेष रूप से सकारात्मक रहा, जिससे धुएं से होने वाली बीमारियों में कमी आई।</p>
<p>किसी को नहीं भूलना चाहिए कि स्वास्थ्य क्षेत्र में आयुष्मान भारत योजना एक ऐतिहासिक पहल रही है। इस योजना के अंतर्गत 50 करोड़ से अधिक लोगों को 05 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा कवरेज दिया गया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अब तक 06 करोड़ से अधिक अस्पताल उपचार इस योजना के तहत हो चुके हैं। इनमें अल्पसंख्यक समुदाय की भागीदारी उल्लेखनीय रही है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां आर्थिक रूप से पिछड़े मुस्लिम समुदाय बड़ी संख्या में रहते हैं।</p>
<p>आर्थिक सशक्तिकरण के क्षेत्र में प्रधानमंत्री मुद्रा योजना का प्रभाव भी उल्लेखनीय है। इस योजना के तहत अब तक 40 करोड़ से अधिक ऋण स्वीकृत किए गए हैं, जिनमें से लगभग 60 फीसद लाभार्थी महिलाएं हैं। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, मुस्लिम समुदाय के छोटे व्यापारियों और कारीगरों ने इस योजना का व्यापक लाभ उठाया है। कई राज्यों में मुद्रा लोन प्राप्त करने वालों में मुस्लिम उद्यमियों की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत तक पहुंची है।</p>
<p>शिक्षा के क्षेत्र में भी केंद्र सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों के लिए चलाई जा रही छात्रवृत्ति योजनाएं उल्लेखनीय हैं। प्री-मैट्रिक, पोस्ट-मैट्रिक और मेरिट-कम-मीन्स स्कॉलरशिप के तहत हर वर्ष लाखों छात्रों को सहायता दी जाती है। 2014 से 2023 के बीच 05 करोड़ से अधिक छात्रवृत्तियां वितरित की गईं, जिनमें बड़ी संख्या मुस्लिम छात्रों की रही है। इसके बाद के सालों में भी यही स्‍थ‍िति देखने को मिलती है, वस्‍तुत: यह दर्शाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भाजपा सरकार की प्राथमिकता “समावेशी विकास” है, न कि “चयनात्मक लाभ” किसी को प्रदान करना है।</p>
<p>अब एक सरल उदाहरण से भी इसे समझ लेते हैं, मान लीजिए किसी राज्य में मुस्लिम आबादी 20 पतिशत है, किंतु जब सरकारी योजनाओं के लिए आवेदन आते हैं, तो उनमें से 30–40 प्रतिशत लाभार्थी मुस्लिम समुदाय से होते हैं। इसका कारण यह है कि ये योजनाएं धर्म के आधार पर नहीं, आर्थिक और सामाजिक जरूरत के आधार पर लागू की जाती हैं। यानी जो गरीब है, वंचित है, वही प्राथमिकता में आता है चाहे वह किसी भी धर्म-समुदाय का ही क्‍यों न हो। राज्य स्तर पर भी यही प्रवृत्ति दिखाई देती है। असम में हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में चल रही योजनाओं में सभी समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित की गई है। वहीं उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार के दौरान कानून-व्यवस्था और योजनाओं के वितरण में पारदर्शिता आई है, जिससे सभी वर्गों को समान रूप से लाभ मिला है। मध्‍य प्रदेश, राजस्‍थान, उत्‍तराखण्‍ड, दिल्‍ली, गुजरात, उड़ीसा, छत्‍तीसगढ़, महाराष्‍ट्र आज आप किसी भी भाजपा शासित राज्‍य के आंकड़ों को उठाकर देख कसते हैं। जनसंख्‍या के अनुपात में सबसे अधिक सरकारी योजनाओं का लाभ उल्‍पसंख्‍यक विशेषकर मुसलमानों के द्वारा ही उठाया जा रहा है।</p>
<p>इसके विपरीत, कांग्रेस का राजनीतिक नैरेटिव लंबे समय से “भय” और “भ्रम” पर आधारित रहा है। अल्पसंख्यकों में उसके द्वारा खासतौर पर मुसलमानों और ईसाईयों के बीच यह संदेश देने की कोशिश की जाती रही है कि भाजपा और संघ उनके विरोधी हैं। किंतु जब वास्तविकता में योजनाओं का लाभ सीधे लोगों तक पहुंचता है, तो यह नैरेटिव कमजोर पड़ता है।</p>
<p>राजनीतिक विमर्श में भाषा की मर्यादा अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। “जहरीला सांप” और “मार देना चाहिए” जैसे शब्द सीधे तौर पर उकसावे की श्रेणी में आते हैं। यह लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करते हैं और समाज में विभाजन को बढ़ावा देते हैं। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में इस प्रकार की भाषा बोलना पूरी तरह से अनुचित और खतरनाक है। यह सभी समझ लें कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा पर यदि निष्पक्ष दृष्टि से विचार किया जाए, तो उसका मूल उद्देश्य राष्ट्र को संगठित करना और उसे सशक्त बनाना है। संघ की प्रार्थना में प्रतिदिन “भारत को परम वैभव तक पहुंचाने” की कामना की जाती है। यही दृष्टिकोण भारतीय जनता पार्टी की नीतियों में भी परिलक्षित होता है, जहां “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” उसकी नीति का आधार है।</p>
<p>ऐसे में अब प्रश्न यही उठता है कि आखिर समाज में “जहर” कौन फैला रहा है? कौन समाज को बांटने वाली भाषा का उपयोग कर रहा है? या वह जो विकास और समावेशन की बात कर रहा है? वस्‍तुत: कहना होगा कि आज मल्लिकार्जुन खड़गे का बयान कांग्रेस की वर्तमान स्थिति को भी दर्शाता है, जहां ठोस मुद्दों की बजाय भावनात्मक और विभाजनकारी भाषा का सहारा लिया जा रहा है। कांग्रेस को यह समझ लेना होगा कि भारत की जनता अब पहले से अधिक जागरूक है। वह भाषण से कहीं अधिक काम देखती है। आरोपों से अधिक वह परिणामों का मूल्यांकन करती है।</p>
<p>देश में पिछले वर्षों के दौरान व्‍यापक स्‍तर पर जिस प्रकार से जनकल्याणकारी योजनाओं का विस्तार हुआ है और उनका लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचा है, उसने आज विकास की राजनीति को टिकाऊ बना दिया है। यही कारण है जो भाजपा लगातार राज्‍यों में अपनी जीत दर्ज करा रही है। यहां समग्रता से कांग्रेस के लिए कहना यही है कि वह समय के साथ “अनर्गल प्रलाप” और झूठ फैलाना बंद करे। “वास्तविक विकास” बनाम विकास विहीन समाज के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझ ले, अन्‍यथा ऐसा न हो कि कांग्रेस जो अभी विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी है, उसके लिए स्‍वयं का अस्‍तित्‍व भी बचाए रखना मुश्‍किल हो जाए, क्‍योंकि जनता सब देख रही है, वो सब जानती है!</p>
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		<item>
		<title>25 जनवरी 1761 : पानीपत में चालीस हजार तीर्थ यात्रियों की हत्या कर अहमदशाह अब्दाली ने दिल्ली में किया था प्रवेश</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 25 Jan 2026 05:48:31 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[पानीपत दिल्ली मराठा]]></category>
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					<description><![CDATA[इस भयानक युद्ध में सदाशिवराव भाऊ के अतिरिक्त विश्वास राव पेशवा, जनकोजी राव सिंधिया और मराठा तोपखाना के प्रभारी इब्राहिम खान गार्दी  बलिदान हुये &#8211; वर्ष 1761 में जनवरी माह का पूरा अंतिम पखवाड़ा हमलावर अहमदशाह अब्दाली की भारत में लूट, सामूहिक नरसंहार और अत्याचार से भरा है । इसी पखवाड़े में पानीपत का तीसरा [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h3><strong><span style="color: #ff0000;">इस भयानक युद्ध में सदाशिवराव भाऊ के अतिरिक्त विश्वास राव पेशवा, जनकोजी राव सिंधिया और मराठा तोपखाना के प्रभारी इब्राहिम खान गार्दी  बलिदान हुये</span></strong></h3>
<p style="text-align: center;">&#8211;</p>
<p>वर्ष 1761 में जनवरी माह का पूरा अंतिम पखवाड़ा हमलावर अहमदशाह अब्दाली की भारत में लूट, सामूहिक नरसंहार और अत्याचार से भरा है । इसी पखवाड़े में पानीपत का तीसरा युद्ध हुआ था । जिसमें मराठों की हार हुई । अब्दाली सामूहिक नरसंहार करके आगे बढ़ा और जनवरी के अंतिम सप्ताह दिल्ली पहुँचा । उसने 25 जनवरी को नगर में प्रवेश किया । पूरा दिन हत्या लूट और महिलाओं के अपहरण का सिलसिला चला ।<br />
भारत के इतिहास में कुछ ऐसी घटनाएं दर्ज हैं जिनके स्मरण मात्र से रोंगटे खड़े हो जाते हैं । पानीपत के तीसरे युद्ध और उसके बाद का समूचा घटनाक्रम ऐसा ही है । अपनी जीत के बाद हमलावर अहमदशाह अब्दाली ने पंजाब से लेकर दिल्ली तक लाशों के ढेर लगा दिये थे । अब्दाली का यह आक्रमण 1760 में हुआ था । अब्दाली के भारत पर कुल छै आक्रमण हुये । लेकिन इस बार उसने क्रूरता के सारे रिकार्ड तोड़ दिये थे । वह अक्टूबर 1760 में गजनी से चला था और नवम्बर तक पंजाब आ गया था । उसने मराठों को घेरने के लिये पानीपत में मोर्चा बंदी कर ली थी । भारत के दो शासक एक रूहेलखंड का नजीबुद्दौला और दूसरे अवध के नबाब सिराजुद्दीन उसकी मदद कर रहे थे । इस युद्ध की पृष्टभूमि में इतिहास की दो घटनाएँ थीं। एक घटना 1757 की थी । अब्दाली का आक्रमण हुआ, उसने दिल्ली पर अधिकार कर लिया था । लेकिन मराठों की मार से भागा । इस युद्ध में रोहेलों ने मराठों की सहायता की थी । युद्घ के बाद दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था मराठों के पूरी तरस नियंत्रण में थी । लेकिन आगे चल कर रुहेलों ने राजस्व रोक दिया था । लेकिन मराठे अनुशासन प्रिय थे । उनकी दृष्टि में राजस्व रोकना विद्रोह की सीमा में था । दत्ताजी शिन्दे के नेतृत्व में मराठ सेना ने सख्ती से राजस्व वसूला था । इससे रुहेले बाहरी तौर पर तो झुके पर भीतरी तौर पर षड्यंत्र करने लगे । नजब खाँरुहेले ने अब्दाली से गुप्त संधि की और दत्ताजी को दिल्ली बुलाया । धोखे से हत्या करके दिल्ली अपने आधीन कर ली । दिल्ली पर पुनः अधिकार पाने के लिये सदाशिव भाऊ के नेतृत्व मराठा सेना पूना से रवाना हुई और पुनः दिल्ली को अपने नियंत्रण में ले ली । यह बात एक धर्मगुरु शाह वलीउल्लाह को पसंद नहीं थी वह मराठों को काफिर कहता था और दिल्ली को मराठों से मुक्त चाहता था । उसने मराठों से दिल्ली की मुक्ति केलिये अब्दाली को पत्र लिखा । (वलीउल्लाह के पत्र की प्रति रामपुर के पांडुलिपि संग्रहालय में उपलब्ध है )। यह जानकारी अवध के नबाब सिराजुद्दौला और रूहेलखंड के नबाब नजीबुद्दौला को भी हुई । अंततः मराठा शक्ति को समाप्त करने की रणनीति बनी । दुर्योग से उन दिनों मराठा साम्राज्य के भीतर अनेक आंतरिक मतभेद उभरे इससे पेशवा का ध्यान दिल्ली से कम हुआ । सूचना तंत्र भी कमजोर हुआ । इसका पूरा लाभ उठाकर नजब खाँ रुहेले ने अवध के नबाब तथा दिल्ली के कुछ मुगल सैनिकों से तालमेल बिठाकर अब्दाली को आक्रमण केलिये आमंत्रण भेज दिया । अब्दाली को जब ये आमंत्रण मिले तो उसने युद्ध की तैयारी आरंभ कर दी । इसकी खबर पेशवा को लगी तो मराठा सेना भी तैयार होने लगी। मराठा साम्राज्य की कमान पेशवा बालाजी बाजीराव के हाथ में थी । उन्होंने सदाशिव राव भाऊ के नेतृत्व में मराठा सेना रवाना की । इस सेना में पेशवा का पुत्र विश्वासराव भी साथ था । मराठों की फौज पूरे वेग से आगे बढ़ी और दिल्ली पहुँची । मराठों ने रुहेलों से दिल्ली को मुक्त किया, दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था बनाई । और पंजाब की ओर बढ़े । इस बार मराठा सेना को स्थानीय शासकों की सहायता कम थी । इससे उन्हें पूरे रास्ते में अपनी चौकियाँ बनाना पड़ीं । रास्ते में व्यवस्था बनाने के लिये अपने सैनिक तैनात करने के कारण उनके सैनिकों की संख्या कम होती गयी । मराठा सेना की शरण में वे हजारों तीर्थ यात्री स्त्री पुरुष भी आ गये, जो तीर्थ के लिये निकले थे लेकिन आक्रमणों के कारण यहाँ वहाँ छुप गये थे । मराठा सेना ने उन्हें अपना संरक्षण दिया और आगे बढ़ी । इस व्यवस्था में भी सैनिक लगे। इतिहास कार मानते हैं कि मराठा सेना में बड़ी संख्या में भेदिये थे जो अब्दाली को मराठा सेना की सभी गतिविधियों की जानकारी दे रहे थे।<br />
अब्दाली मराठों से पहले पानीपत पहुँच गया था । उसने अपनी मोर्चाबंदी पहले कर ली थी । मराठा सेना भी पानीपत पहुँची दिसम्बर 1760 के प्रथम सप्ताह में दोनों सेनाओं का आमना सामना हुआ । दोनों के बीच यह घेराबंदी लगभग डेढ़ माह चली। आमने सामने के युद्ध को लंबा खींचना अब्दाली की योजना थी । इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि मराठा सेना में कुछ विश्वासघाती महत्वपूर्ण पद पर होंगे जिन्होंने सदाशिव भाऊ को सीधे युद्ध से रोका होगा । इस मोर्चा बंदी के कुछ दिनों बाद मराठा सेना की रसद रुकने लगी । रोहिलाओं ने न केवल मराठों को रसद मिलने का रास्ता रोका अपितु वे मराठा चौकियों पर छापामार हमले करने लगे । इससे मराठा सेना का पूरा तंत्र ध्वस्त हो गया । इस घेराबंदी से मराठों को अतिरिक्त सैन्य सहायता या रसद मिलना तो दूर सूचनाएँ मिलना भी बंद हो गयीं थीं । भोजन की गंभीर समस्या उत्पन्न हो जाने के बाद मराठों ने सीधा युद्ध करने का निर्णय लिया । मराठा सेना मैदान में आई और भयानक युद्ध छिड़ गया । यह तिथि 14 जनवरी 1761 थी। मराठा सेना कम थी । फिर भी मराठे वीरता से लड़े और भारी पड़े । उन्होंने अब्दाली की सेना का राशन छीन लिया । सदाशिव भाऊ हाथी पर सवार होकर और विश्वास राव घोड़े पर युद्ध कर रहे थे । तभी बंदूक की एक गोली विश्वास राव को लगी । यह गोली शत्रु सेना से नहीं आई थी बल्कि मराठा सेना के भीतर मौजूद अब्दाली के किसी भेदिये ने चलाई थी । विश्वासराव को गिरते हुये सदाशिव राव भाऊ ने देख लिया था । वे तुरन्त हाथी से उतरे और विश्वासराव का शव ढूँढने लगे । जब मराठा सेना ने अपने सेनापति का हाथी खाली देखा उनमें घबराहट हुई और अफरा तफरी मच गयी । मौके का फायदा अब्दाली ने उठाया उसने ऐलान करा दिया कि सदाशिव भाऊ का सिर काट लिया गया है । इससे हमलावर सैनिकों का जोश बढ़ा और मराठा सेना में भगदड़ शुरू हुई । इसी भगदड़ में किसी ने सदाशिव राव भाऊ का भी सिर काट लिया । यह घटना भी मराठा सेना के भीतर किसी विश्वासघाती का काम था । अब्दाली ने यह ऐलान भी कराया कि जो हथियार डाल देगा उसकी जान बख़्शी जायेगी । मराठा सेना में जो भेदिये थे उन्होंने मराठा सैनिकों को हथियार डालने केलिये प्रेरित किया । मराठा सैनिक घेर लिये गये बड़ी मुश्किल से होल्कर बीस महिलाओं को सुरक्षित निकाल पाये । दोपहर तीन बजे तक यह सब हो गया । इसके बाद महिलाओं को अलग करके पुरूषो का नर संहार हुआ । जो मराठा सैनिक पकड़े गये थे उनमें किसी को जीवित न छोड़ा गया। आसपास के सभी गाँवों में लूट और हत्याओं का दौर चला । अनुमान है कि एक लाख से अधिक लोगों की हत्या की गई । इनमें लगभग चालीस हजार तीर्थयात्री थे । यह मराठा सेना की सबसे बड़ी क्षति थी । जिन महिलाओं को बंदी बनाया गया था उनमें से कुछ को दर्दनाक मौत दी और कुछ को गुलामों के बाजार में बेचने केलिये भेज दिया गया ।<br />
पानीपत में खून की नदियाँ बहा कर और कटे हुये सिरों का ढेर लगाकर अहमदशाह दिल्ली रवाना हुआ । वह 24 जनवरी को दिल्ली पहुँचा। दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था मराठा सैनिकों के हाथ में थी। दिल्ली में तैनात सैनिकों ने रोकने का प्रयास किया लेकिन दोपहर से अधिक मुकाबला न चल सका पूरे नगर में अब्दाली और रुहेले सैनिक फैल गये । सभी मराठा सैनिक और उनके समर्थक बंदी बना लिये गये । शाम तक यह सब हो गया ।अब्दाली ने अगले दिन 25 जनवरी को दिल्ली में प्रवेश किया । उसके सैनिकों ने दिल्ली के सुरक्षा कर्मियों का पकड़कर मारना आरंभ किया 25 जनवरी को पूरे दिन किले के भीतर नर संहार हुआ । मराठों द्वारा नियुक्त एक भी सैनिक जीवित न छोड़ा गया। पूरे नगर की लूटपाट करके अब्दाली बादशाह के महल में घुसा । बादशाह को अपमानित किया और खजाने पर अधिकार कर लिया । दिल्ली में अब्दाली का यह आतंक फरवरी 1761 तक चला । इस आतंक का वर्णन उस समय के मशहूर शायर मीर तकी मीर ने किया है । यह विवरण ‘जिक्र-ए-मीर’ में सुरक्षित हैं। जिसमें कहा गया है- &#8220;बंदा अपनी इज्जत थामे शहर में बैठा रहा। शाम के बाद मुनादी हुई कि बादशाह ने अमान दे दी है। रिआया को चाहिए कि परेशान न हो मगर जब घड़ी भर रात गुजरी तो गारतगरों ने जुल्मओ-सितम ढाना शुरू किए। शहर को आग लगा दी। सुबह, जो कि कयामत की सुबह थी, तमाम शाही फौज और रोहिल्ले टूट पड़े और कत्ल व गारत में लग गए। मैं कि फकीर था अब और ज्यादा दरिद्र हो गया, सड़क के किनारे जो मकान था वह भी ढहकर बराबर हो गया&#8221;।<br />
इस भयानक युद्ध में सदाशिवराव भाऊ के अतिरिक्त विश्वास राव पेशवा, जनकोजी राव सिंधिया और मराठा तोपखाना के प्रभारी इब्राहिम खान गार्दी भी बलिदान हुये । इस युद्ध में मराठा सेना को जो क्षति हुई उसकी भरपाई फिर कभी न हो सकी ।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<title>पुण्यतिथि :वीरता साहस स्वाभिमान का प्रतीक महाराणा प्रताप जिनके रहते अकबर चित्तौड़ पर अधिकार  नहीं कर पाया</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 19 Jan 2026 04:43:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[पुण्यतिथि महाराणा प्रताप]]></category>
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					<description><![CDATA[19 जनवरी 1597 महाराणा प्रताप का निधन : राष्ट्र संस्कृति रक्षा केलिये जीवन समर्पित &#160; भारतीय इतिहास के एक प्रकाशमान नक्षत्र हैं चित्तौड़ के राणा प्रताप। जो न किसी प्रलोभन से झुके और न किसी बड़े आक्रमण से भयभीत हुये । उन्होंने स्वाधीनता और स्वाभिमान के लिये जीवन भर संघर्ष किया और अकबर को पराजित [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>19 जनवरी 1597 महाराणा प्रताप का निधन : राष्ट्र संस्कृति रक्षा केलिये जीवन समर्पित</strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<p>भारतीय इतिहास के एक प्रकाशमान नक्षत्र हैं चित्तौड़ के राणा प्रताप। जो न किसी प्रलोभन से झुके और न किसी बड़े आक्रमण से भयभीत हुये । उन्होंने स्वाधीनता और स्वाभिमान के लिये जीवन भर संघर्ष किया और अकबर को पराजित किया ।<br />
मुगल सेना ने चित्तौड़ पर चार बड़े आक्रमण किये। लेकिन किसी आक्रमण में वह चित्तौड़ पर अधिकार न कर पाया। चित्तौड़ पर मुगलों अधिकार राणाजी के जीवनकाल के बाद ही हो पाया। अकबर ने चार संदेश वाहक भी भेजे भारी प्रलोभन के साथ इनमें तीन राजा टोडरमल, बीरबल और राजा मानसिंह थे । पर कोई भी प्रलोभन उन्हे न डिगा सका और न किसी धमकी से वे भयभीत हुये ।<br />
उनका जन्म 9 मई 1540 को और चित्तौड़ में राज्याभिषेक 28 फरवरी 1572 को हुआ। उनके जन्म स्थान के बारे में इतिहासकारों के दो अलग-अलग मत हैं। जेम्स टाॅड ने राणा जी का जन्म स्थान कुम्भलगढ किला माना है। जबकि इतिहासकार विजय नाहर ने पाली के राजमहल को राणा जी का जन्म स्थान माना। पाली राजमहल राणा जी का ननिहाल था । उनकी माता जयवंति बाई पाली महाराज सोनगरा की बेटी थीं।<br />
इतिहासकार विजय नाहर की पुस्तक हिन्दुवा सूर्य महाराणा प्रताप के अनुसार महाराणा प्रताप के पिता महाराणा उदय सिंह ने युद्ध की नयी पद्धति &#8220;छापामार युद्धप्रणाली&#8221; आरंभ की थी। इसका कारण यह था कि भारतीय राजाओं के पास साधन कम थे और लगातार आक्रमणों से शक्ति क्षीण हो गई थी। जबकि हमलावरों के पास तोपखाने थे। इसलिये छापामार युद्ध शैली विकसित हुई। इसका उपयोग करके ही महाराणा प्रताप, महाराणा राज सिंह एवं छत्रपति शिवाजी महाराज ने मुगलों पर सफलता प्राप्त की ।<br />
इतिहास कार विजय नाहर ने दावा किया है कि महाराणा प्रताप मुग़ल सम्राट अकबर से कभी नहीं हारे। उलटे मुगल सेनापतियो को धूल चटाई । हल्दीघाटी के युद्ध में भी महाराणा प्रताप ही जीते और अकबर पराजित हुआ । हल्दीघाटी में मुगल सेना के पराजित होने के बाद अकबर स्वयं वर्ष 1576 में जून माह से से दिसम्बर तक तीन बार विशाल सेना के साथ चित्तौड पर आक्रमण करने आया, परंतु अकबर और उसकी सेना महाराणा को खोज ही नहीं पाए, बल्कि महाराणा के जाल में फँसकर मुगल सेना को पानी भोजन का भारी अभाव का सामना करना पड़ा। थक हारकर अकबर बांसवाड़ा होकर मालवा चला गया। पूरे सात माह मेवाड़ में रहने के बाद भी जब महाराणा प्रताप पर विजय न पा सका तो हाथ मलता हुआ अफगानिस्तान की ओर चला गया। मुगलों की ये सेनायें तीन बार शाहबाज खान के नेतृत्व में चित्तौड़ आईं थीं। पर असफलता ही हाथ लगी । उसके बाद अब्दुल रहीम खान-खाना के नेतृत्व में सेना भेजी गई । यह सेना भी भारी नुकसान उठाकर लौटी। 9 वर्ष तक निरन्तर अकबर पूरी शक्ति से महाराणा के विरुद्ध चित्तौड़ पर आक्रमण करता रहा। नुकसान उठाता रहा अन्त में थक हार कर उसने मेवाड़ की और देखना ही छोड़ दिया। यह महाराणा प्रताप का ही भय था कि अकबर अपनी राजधानी लाहौर ले गया। महाराणा प्रताप की मृत्यु केबाद अकबर पुनः अपनी राजधानी दिल्ली ले आया।<br />
सम्राट अकबर किसी भी प्रकार राणा प्रताप को को अपने अधीन लाना चाहता था इसलिए अकबर ने प्रताप को समझाने के लिए चार राजदूत नियुक्त किए जिसमें सर्वप्रथम सितम्बर 1572 ई. में जलाल खाँ प्रताप के पास गये । 1573 में राजा मानसिंह, और राजा, भगवानदास तथा राजा टोडरमल को प्रताप के पास समझाने के लिए भेजा। लेकिन राणा प्रताप ने चारों को निराश किया । इस तरह राणा प्रताप ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने से इंकार कर दिया । इसी के बाद हल्दी घाटी का ऐतिहासिक युद्ध हुआ।<br />
इतिहास कार विजय नाहर ने दावा किया है कि ऐसा कुअवसर प्रताप के जीवन में कभी नहीं आया कि उन्हें अकबर को सन्धि के लिए पत्र लिखना पड़ा हो। इन्हीं दिनों महाराणा प्रताप ने सुंगा पहाड़ पर एक बावड़ी का निर्माण करवाया और सुन्दर बगीचा लगवाया । महाराणा की सेना में एक राजा, तीन राव, सात रावत, 15000 अश्वरोही, 100 हाथी, 20000 पैदल और 100 वाजित्र थे। इतनी बड़ी सेना को खाद्य सहित सभी व्यवस्थाएँ महाराणा प्रताप करते थे। इतिहासकार का दावा है कि यह कुप्रचार अकबर की ओर से इतिहासकारों ने लिखा होगा कि अबकवर ने घास की रोटियाँ खाई और संधि प्रस्ताव भेजा । भवा बताइये यदि घास की रोटी खाते तच फिर ऐसा निर्माण कैसे हो सकता था जो उन्होंने किये । यदि संधि प्रस्ताव भेजते तो चित्तौड पर मुगलों का झंडा होता जो महाराणा जी जीवन में कभी न फहराया । उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में चित्तौड़ के किले की मरम्मत की, सम्पूर्ण मेवाड़ पर सुशासन स्थापित करते हुए उन्नत जीवन जिया ।<br />
यदि राणा जी अकबर से पराजित होते या अभाव होता तो यह विकास और समृद्धि प्रयास संभव ही नहीं थे । अंततः 19 जनवरी 1597 में स्वाभिमान के साथ उन्होंने देह त्यागी। कहीं कहीं तिथि 29 जनवरी भी लिखी है।<br />
कोटिशः नमन् परम् वीर यौद्धा राणा प्रताप जी को ।</p>
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