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	<title>सम्पादकीय &#8211; Shabd Shakti News</title>
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	<description>Every News Speaks</description>
	<lastBuildDate>Thu, 25 Jun 2026 10:32:51 +0000</lastBuildDate>
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		<title>मोहन यादव पर ‘जमीन प्रकरण’ से भाजपा की बढ़ी चुनौती, क्या होगा अगला कदम ?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 25 Jun 2026 10:31:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[मोहन यादव जमीन प्रकरण]]></category>
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					<description><![CDATA[प्रवीण दुबे देश के प्रतिष्ठित अखबार इंडियन एक्सप्रेस द्वारा मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और उनके परिवार से जुड़ी जमीन खरीद संबंधी रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद मध्यप्रदेश की राजनीति में नया भूचाल आ गया है। कांग्रेस ने इसे बड़ा मुद्दा बनाते हुए सरकार और मुख्यमंत्री को घेरना शुरू कर दिया है, वहीं भाजपा ने शुरुआती [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><strong>प्रवीण दुबे</strong></p>
<p>देश के प्रतिष्ठित अखबार इंडियन एक्सप्रेस द्वारा मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और उनके परिवार से जुड़ी जमीन खरीद संबंधी रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद मध्यप्रदेश की राजनीति में नया भूचाल आ गया है। कांग्रेस ने इसे बड़ा मुद्दा बनाते हुए सरकार और मुख्यमंत्री को घेरना शुरू कर दिया है, वहीं भाजपा ने शुरुआती स्तर पर इन आरोपों को राजनीतिक और तथ्यहीन बताते हुए खारिज कर दिया है।<br />
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने तत्काल प्रतिक्रिया देकर मुख्यमंत्री का बचाव किया, लेकिन सवाल यह है कि जब देश के एक बड़े राष्ट्रीय अखबार ने इस मामले को प्रमुखता से उठाया है तो भाजपा नेतृत्व इस पूरे घटनाक्रम को किस नजर से देख रहा होगा।</p>
<p><strong>भाजपा की कार्यशैली क्या कहती है?</strong></p>
<p>भाजपा की परंपरा रही है कि वह सार्वजनिक रूप से अपने नेतृत्व के साथ खड़ी दिखाई देती है, लेकिन गंभीर आरोपों को पूरी तरह अनदेखा भी नहीं करती। अतीत में हवाला प्रकरण से लेकर बंगारू लक्ष्मण प्रकरण तक पार्टी ने परिस्थितियों के अनुसार संगठनात्मक और राजनीतिक निर्णय लिए हैं।<br />
हालांकि वर्तमान परिस्थितियां भिन्न हैं। यहां मामला किसी न्यायिक निष्कर्ष या एजेंसी जांच का नहीं, बल्कि मीडिया रिपोर्ट और राजनीतिक आरोपों का है। इसलिए पार्टी की पहली प्राथमिकता तथ्यों की आंतरिक पड़ताल हो सकती है।</p>
<p><strong>क्या दिल्ली नेतृत्व तुरंत कोई बड़ा निर्णय लेगा?</strong></p>
<p>राजनीतिक जानकार मानते हैं कि भाजपा नेतृत्व जल्दबाजी में निर्णय लेने से बचता है। विशेषकर ऐसे मामलों में जहां किसी मुख्यमंत्री के खिलाफ प्रत्यक्ष कानूनी कार्रवाई या जांच की स्थिति न हो।<br />
यदि पार्टी नेतृत्व को यह लगे कि मामला केवल राजनीतिक विवाद है तो मुख्यमंत्री के साथ मजबूती से खड़े होने की रणनीति अपनाई जा सकती है। लेकिन यदि रिपोर्ट में उठाए गए सवालों को लेकर संगठन के भीतर कोई गंभीर चिंता उत्पन्न होती है तो आंतरिक स्तर पर तथ्य जुटाने और स्थिति की समीक्षा की जा सकती है।</p>
<p><strong>क्या भाजपा के अंदरूनी समीकरण भी महत्वपूर्ण हैं?</strong></p>
<p>मध्यप्रदेश में 2023 के अंत में नेतृत्व परिवर्तन के बाद से राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गए। शिवराज सिंह चौहान के स्थान पर डॉ. मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाए जाने का निर्णय भाजपा नेतृत्व का बड़ा राजनीतिक प्रयोग माना गया।<br />
इसके बाद कई वरिष्ठ नेताओं—नरेंद्र सिंह तोमर, कैलाश विजयवर्गीय, प्रह्लाद पटेल और अन्य नेताओं की भूमिकाओं में भी परिवर्तन दिखाई दिया। लोकसभा चुनाव के दौरान टिकट वितरण और संगठनात्मक फेरबदल ने भी नए समीकरण बनाए।<br />
राजनीतिक गलियारों में लंबे समय से यह चर्चा रही है कि पार्टी के भीतर विभिन्न शक्ति केंद्र मौजूद हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री से जुड़ा कोई भी विवाद स्वाभाविक रूप से राजनीतिक चर्चाओं को तेज कर देता है।</p>
<p><strong>सिंधिया फैक्टर कितना महत्वपूर्ण?</strong></p>
<p>ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में आने के बाद से मध्यप्रदेश की राजनीति में एक नया शक्ति केंद्र बना। सिंधिया समर्थकों की अपेक्षाएं और उनकी राजनीतिक आकांक्षाएं भी समय-समय पर चर्चा का विषय रही हैं।</p>
<p>हालांकि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व अब तक सामूहिक नेतृत्व की रणनीति पर चलता दिखाई दिया है। इसलिए केवल किसी राजनीतिक विवाद के आधार पर नेतृत्व परिवर्तन की संभावना को मजबूत मानना जल्दबाजी होगी।</p>
<p><strong>ओबीसी राजनीति भी बड़ा कारक</strong></p>
<p>डॉ. मोहन यादव पिछड़ा वर्ग से आते हैं और भाजपा ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाकर प्रदेश की ओबीसी राजनीति में बड़ा संदेश देने की कोशिश की थी। मध्यप्रदेश के साथ-साथ उत्तरप्रदेश की राजनीति में भी यादव समाज का अपना प्रभाव है।<br />
ऐसे समय में यदि विपक्ष इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से उठाता है तो भाजपा को सामाजिक समीकरणों का भी ध्यान रखना होगा। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव और कांग्रेस यदि इसे राजनीतिक तौर पर आगे बढ़ाते हैं तो भाजपा नेतृत्व सामाजिक और राजनीतिक संतुलन को प्राथमिकता दे सकता है।</p>
<p><strong>भाजपा के सामने तीन विकल्प</strong></p>
<p>1. पूरी ताकत से मुख्यमंत्री के साथ खड़ा होना<br />
यदि पार्टी को लगे कि मामला केवल राजनीतिक हमला है तो भाजपा मुख्यमंत्री के समर्थन में आक्रामक रुख अपना सकती है।<br />
2. आंतरिक तथ्य जांच<br />
पार्टी संगठन अपने स्तर पर पूरे मामले की जानकारी जुटा सकता है ताकि भविष्य में कोई राजनीतिक नुकसान न हो।<br />
3. लंबी निगरानी की रणनीति</p>
<p>यदि विवाद कुछ समय तक बना रहता है तो पार्टी परिस्थितियों के अनुसार आगे की रणनीति तय कर सकती है।<br />
सबसे बड़ा सवाल: सच्चाई या राजनीतिक संघर्ष?<br />
इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि क्या रिपोर्ट में उठाए गए प्रश्न केवल राजनीतिक विवाद हैं, या फिर इनके पीछे ऐसे तथ्य हैं जिनकी गहन जांच की आवश्यकता है। इसके साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या यह मामला केवल विपक्ष के हमले तक सीमित है या भाजपा के अंदरूनी समीकरणों से भी इसका कोई संबंध है।</p>
<p>फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि भाजपा नेतृत्व मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को लेकर कोई बड़ा निर्णय करेगा। लेकिन इतना निश्चित है कि राष्ट्रीय स्तर पर उभरे इस विवाद को पार्टी हल्के में नहीं लेगी।<br />
एक तरफ मुख्यमंत्री की राजनीतिक उपयोगिता, ओबीसी नेतृत्व और आगामी चुनावी समीकरण हैं, तो दूसरी तरफ पार्टी की छवि, मीडिया में उठे सवाल और विपक्ष का दबाव भी मौजूद है।<br />
आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह मामला केवल एक राजनीतिक विवाद बनकर रह जाता है या मध्यप्रदेश की राजनीति में किसी बड़े बदलाव की भूमिका तैयार करता है।<br />
Praveen dubey @ shabd shakti news. in</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>वैभव पर अंगुली उठाना गलत, अम्पायर के गलत निर्णय और लंका के खिलाड़ी के उकसावे वाले बोल हैं विवाद की असल वजह </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 16 Jun 2026 06:04:37 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[खेल]]></category>
		<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[वैभव सूर्यवंशी विवाद]]></category>
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					<description><![CDATA[प्रवीण दुबे  वैभव पर अंगुली उठाना गलत, अम्पायर के गलत निर्णय और लंका के खिलाड़ी के उकसावे वाले बोल हैं विवाद की असल वजह  वैभव सूर्यवंशी नहीं, अंपायरिंग फैसले बने विवाद की जड़! जांच का केंद्र खिलाड़ियों का व्यवहार नहीं बल्कि अंपायरों की भूमिका भारत ए और श्रीलंका ए के बीच खेले गए मुकाबले के [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h5 style="text-align: center;"><strong><em>प्रवीण दुबे </em></strong></h5>
<h5></h5>
<h5><strong><em>वैभव पर अंगुली उठाना गलत, अम्पायर के गलत निर्णय और लंका के खिलाड़ी के उकसावे वाले बोल हैं विवाद की असल वजह </em></strong></h5>
<h5><strong><em>वैभव सूर्यवंशी नहीं, अंपायरिंग फैसले बने विवाद की जड़! जांच का केंद्र खिलाड़ियों का व्यवहार नहीं बल्कि अंपायरों की भूमिका</em></strong><br />
<strong><em>भारत ए और श्रीलंका ए के बीच खेले गए मुकाबले के बाद वैभव सूर्यवंशी चर्चा के केंद्र में आ गए हैं, लेकिन मैच से जुड़े घटनाक्रमों पर नजर डालें तो सवाल खिलाड़ी के व्यवहार से अधिक अंपायरिंग फैसलों पर खड़े होते दिखाई देते हैं।</em></strong><br />
<strong><em>मैच के दौरान सबसे बड़ा विवाद खराब रोशनी में खेल जारी रखने को लेकर सामने आया। श्रीलंका की टीम 265 रन पर सिमटने के बाद भारतीय खिलाड़ी दोनों मैदानी अंपायरों के पास पहुंचे थे और कम होती विजिबिलिटी को लेकर चिंता जताई थी। खिलाड़ियों का कहना था कि गेंद स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दे रही थी।</em></strong><br />
<strong><em>इसके बावजूद अंपायरों ने न केवल खेल जारी रखा बल्कि सुपर ओवर कराने का भी फैसला लिया। क्रिकेट के स्थापित मानकों के अनुसार खराब रोशनी में आमतौर पर स्पिन गेंदबाजों को प्राथमिकता दी जाती है, जबकि इस मुकाबले में तेज गेंदबाजों को गेंदबाजी की अनुमति दी गई। यही फैसला पूरे विवाद का मुख्य कारण बनता दिख रहा है।</em></strong><br />
<strong><em>सुपर ओवर के दौरान श्रीलंका ए की पारी की अंतिम गेंद पर थर्ड अंपायर ने हाईट के आधार पर नो-बॉल करार दिया, जबकि मैदानी अंपायर ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया था। इस फैसले ने भारतीय खेमे में नाराजगी और बढ़ा दी। विरोध के कारण खेल रुका और इस दौरान रोशनी की स्थिति और खराब हो गई।</em></strong><br />
<strong><em>रिपोर्ट्स के अनुसार भारतीय टीम की नाराजगी का दूसरा कारण श्रीलंका ए की ओर से सुपर ओवर में बल्लेबाजी के लिए आने में हुई देरी भी थी। इससे खिलाड़ियों का धैर्य प्रभावित हुआ और मैदान पर तनाव बढ़ा।</em></strong><br />
<strong><em>वैभव सूर्यवंशी से जुड़े घटनाक्रम को लेकर भी सामने आया है कि वह वापस जा रहे थे, लेकिन श्रीलंकाई खिलाड़ी की ओर से कथित उकसावे के बाद ही वह दोबारा पलटे। यदि यह तथ्य सही पाया जाता है तो फिर पूरे मामले को केवल वैभव के आचरण तक सीमित करके देखना उचित नहीं होगा।</em></strong><br />
<strong><em>क्रिकेट विशेषज्ञों का मानना है कि इस विवाद की वास्तविक जांच इस बात पर केंद्रित होनी चाहिए कि जब खिलाड़ियों को गेंद दिखाई नहीं दे रही थी तो सुपर ओवर क्यों कराया गया, खराब रोशनी में तेज गेंदबाजों को अनुमति क्यों दी गई और विवादित नो-बॉल फैसले तक स्थिति कैसे पहुंची।</em></strong><br />
<strong><em>ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि मैच प्रबंधन और अंपायरिंग से जुड़े फैसले विवाद की मूल वजह थे, तो जांच का दायरा केवल खिलाड़ियों तक सीमित न रहकर अंपायरों और मैच अधिकारियों की भूमिका तक भी पहुंचना चाहिए।</em></strong></h5>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>कांग्रेस की छाती पीट रुदाली बनाम उल्टा चोर कोतवाल को डांटे</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 01 Jun 2026 07:40:03 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[शब्दों की मर्यादा और विरोध का ढोल]]></category>
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					<description><![CDATA[प्रवीण दुबे  &#8220;उल्टा चोर कोतवाल को डांटे&#8221; — यह कहावत इन दिनों मध्यप्रदेश की राजनीति में पूरी तरह चरितार्थ होती दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के बीच चल रहे वाकयुद्ध को लेकर कांग्रेस जिस तरह नैतिकता और मर्यादा का पाठ पढ़ाने की कोशिश कर रही है, [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><strong>प्रवीण दुबे </strong></p>
<p>&#8220;उल्टा चोर कोतवाल को डांटे&#8221; — यह कहावत इन दिनों मध्यप्रदेश की राजनीति में पूरी तरह चरितार्थ होती दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के बीच चल रहे वाकयुद्ध को लेकर कांग्रेस जिस तरह नैतिकता और मर्यादा का पाठ पढ़ाने की कोशिश कर रही है, वह कई सवाल खड़े करता है।<br />
शाजापुर में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जीतू पटवारी को &#8220;दो कौड़ी का प्रदेश अध्यक्ष&#8221; कहा तो कांग्रेस नेताओं ने इसे मुद्दा बनाकर प्रदेशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए। पुतले जलाए गए, बयानबाजी हुई और मुख्यमंत्री पर अमर्यादित भाषा के प्रयोग का आरोप लगाया गया। लेकिन कांग्रेस यह बताने से बच रही है कि इस विवाद की शुरुआत आखिर किसने की थी?<br />
वास्तविकता यह है कि कुछ दिन पहले सतना में आयोजित कांग्रेस के युवा संवाद कार्यक्रम में जीतू पटवारी ने मुख्यमंत्री मोहन यादव को &#8220;मोहन लाल अभिनंदन यादव&#8221; कहकर संबोधित किया था। केवल इतना ही नहीं, उन्होंने मुख्यमंत्री की विदाई का समय आ जाने और उनकी उल्टी गिनती शुरू होने जैसी टिप्पणियां भी की थीं। राजनीतिक आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन जब व्यक्तिगत कटाक्ष और व्यंग्यात्मक संबोधन शुरू होते हैं तो फिर सामने से आने वाली प्रतिक्रिया पर आश्चर्य कैसा?</p>
<p style="text-align: center;"><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-64113" src="https://shabdshaktinews.in/wp-content/uploads/2026/06/file_000000002bc47206872c743c7e9cd6b2.png" alt="" width="1536" height="1024" srcset="https://shabdshaktinews.in/wp-content/uploads/2026/06/file_000000002bc47206872c743c7e9cd6b2.png 1536w, https://shabdshaktinews.in/wp-content/uploads/2026/06/file_000000002bc47206872c743c7e9cd6b2-300x200.png 300w, https://shabdshaktinews.in/wp-content/uploads/2026/06/file_000000002bc47206872c743c7e9cd6b2-1024x683.png 1024w, https://shabdshaktinews.in/wp-content/uploads/2026/06/file_000000002bc47206872c743c7e9cd6b2-768x512.png 768w, https://shabdshaktinews.in/wp-content/uploads/2026/06/file_000000002bc47206872c743c7e9cd6b2-630x420.png 630w, https://shabdshaktinews.in/wp-content/uploads/2026/06/file_000000002bc47206872c743c7e9cd6b2-696x464.png 696w, https://shabdshaktinews.in/wp-content/uploads/2026/06/file_000000002bc47206872c743c7e9cd6b2-1068x712.png 1068w" sizes="(max-width: 1536px) 100vw, 1536px" /></p>
<p>मुख्यमंत्री ने भी उसी शैली में जवाब देते हुए कहा, &#8220;हां, हम तो अभिनंदन लाल हैं, तुम टपोरी लाल हो।&#8221; इसके बाद उन्होंने पटवारी की चुनावी हार, इंदौर लोकसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार खड़ा न कर पाने और कांग्रेस के संगठनात्मक प्रदर्शन पर भी निशाना साधा। स्पष्ट है कि यह राजनीतिक बयानबाजी थी, जिसकी शुरुआत कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष की टिप्पणी से हुई थी।<br />
विडंबना यह है कि कांग्रेस आज भाषा की मर्यादा को लेकर सबसे अधिक चिंतित दिखाई दे रही है। जबकि राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस और उसके कई नेता वर्षों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए तीखे और विवादित शब्दों का इस्तेमाल करते रहे हैं। कभी &#8220;चौकीदार चोर है&#8221; जैसे नारे, कभी व्यक्तिगत टिप्पणियां और कभी ऐसे बयान जो राजनीतिक शिष्टाचार की सीमाओं को लांघते रहे हैं। ऐसे में जब वही कांग्रेस आज मर्यादा की दुहाई देती है तो उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।<br />
लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार सभी को है। विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना और सरकार का काम जवाब देना है। लेकिन यदि राजनीतिक संवाद की शुरुआत ही कटाक्ष, उपहास और व्यक्तिगत हमलों से होगी तो फिर जवाब भी उसी स्तर पर मिलने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे में केवल प्रतिक्रिया पर हंगामा करना और मूल कारण को छिपाना राजनीतिक ईमानदारी नहीं कहा जा सकता।<br />
कांग्रेस को यदि वास्तव में राजनीतिक भाषा के स्तर की चिंता है तो उसे आत्ममंथन भी करना चाहिए। मर्यादा का आग्रह तब प्रभावी होता है जब वह सभी पर समान रूप से लागू हो, न कि केवल राजनीतिक सुविधा के अनुसार। अन्यथा जनता यही कहेगी कि यह वही स्थिति है जिसमें &#8220;उल्टा चोर कोतवाल को डांटे&#8221; वाली कहावत सटीक बैठती है।<br />
राजनीति में असहमति आवश्यक है, लेकिन यदि मर्यादा की बहस होनी है तो उसकी शुरुआत स्वयं के आचरण से करनी होगी। यही लोकतांत्रिक शिष्टाचार का सबसे बड़ा मापदंड है।हम तो इतना ही कहेंगे पहले शब्दों की मर्यादा तो देखिए, फिर विरोध का ढोल पीटिए</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>शर्मनाक ! धिक्कार है ऐसी राजनीति</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 12 May 2026 07:43:17 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[प्रधानमंत्री मोदी अव्हान]]></category>
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					<description><![CDATA[प्रवीण दुबे प्रधानमंत्री मोदी द्वारा देशवासियों से आर्थिक सुधार के लिए की गई अपील के बाद इस देश के विपक्ष, कुछ कथित बुद्धिजीवी और अर्बन नेक्सलाइट वर्ग ने विरोध का मोर्चा खोल दिया है और इस अपील की आड़ में प्रधानमंत्री मोदी को ही निशाने पर ले लिया है, राष्ट्रहित में किसी प्रधानमंत्री द्वारा जनता [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><strong>प्रवीण दुबे</strong></p>
<p>प्रधानमंत्री मोदी द्वारा देशवासियों से आर्थिक सुधार के लिए की गई अपील के बाद इस देश के विपक्ष, कुछ कथित बुद्धिजीवी और अर्बन नेक्सलाइट वर्ग ने विरोध का मोर्चा खोल दिया है और इस अपील की आड़ में प्रधानमंत्री मोदी को ही निशाने पर ले लिया है, राष्ट्रहित में किसी प्रधानमंत्री द्वारा जनता जनार्दन से की गई अपील के प्रति ऐसा राजनैतिक विद्वेष पूरी दुनिया में शायद ही कहीं देखने को मिला है।</p>
<p>भारत की ही बात करें तो राहुल गांधी से अखिलेश यादव तक की राजनीतिक परम्परा से जुड़े तमाम नेता समय समय पर देशवासियो से राष्ट्रहित में आत्मसंयम से जुड़े ऐसे आव्हान करते रहे हैं और पूरे देश ने कभी इसमें राजनीतिक द्वेष नहीं देखा।<br />
भारतीय इतिहास बताता है कि जब भी देश संकट में आया जनता ने सामूहिक अनुशासन दिखाया,त्याग और सहयोग किया, और नेतृत्व पर विश्वास करके बड़े बदलाव संभव किए।<br />
1964–65 में भारत गंभीर खाद्यान्न संकट से गुजर रहा था। उस समय देश में गेहूं और अनाज की भारी कमी थी। लगातार सूखा पड़ा था और अमेरिका से PL-480 योजना के तहत गेहूं आयात करना पड़ रहा था।<br />
इसी बीच Indo-Pakistani War of 1965 का दौर भी आया, जिससे देश पर आर्थिक दबाव और बढ़ गया।<br />
उस समय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने देशवासियों से रेडियो संदेश के माध्यम से अपील की कि—<br />
“यदि देश का हर नागरिक सप्ताह में एक समय भोजन छोड़ दे या एक दिन उपवास रखे, तो हम अनाज की कमी से लड़ सकते हैं।”</p>
<p>“जय जवान, जय किसान” का नारा भी इसी समय शास्त्री जी ने दिया था</p>
<p>इसका अर्थ था कि देश की सुरक्षा करने वाला जवान और देश का पेट भरने वाला किसान — दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।<br />
यह नारा बाद में भारत की पहचान बन गया और किसानों को अधिक उत्पादन के लिए प्रेरित किया। आगे चलकर इसी सोच ने भारत में हरित क्रांति (Green Revolution) का मार्ग मजबूत किया।<br />
उस समय लोगों ने शास्त्री जी की अपील को बहुत गंभीरता से लिया।<br />
कई घरों में सोमवार या किसी निश्चित दिन उपवास रखा जाने लगा।<br />
होटल और रेस्तरां भी कुछ समय के लिए बंद रखे जाते थे।<br />
लोग भोजन बचाने को राष्ट्रसेवा मानते थे। यह भारतीय समाज में सामूहिक जिम्मेदारी और अनुशासन का उदाहरण बन गया।</p>
<p>महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन के समय अंग्रेज़ी वस्त्रों के बहिष्कार और खादी अपनाने,नमक सत्याग्रह,“अंग्रेजों भारत छोड़ो”और जनता से<br />
“करो या मरो” का आव्हान किया पूरे देश में लाखों लोग इन आंदोलनों से जुड़ गए उन्होंने इसमें राजनीति नहीं देखी गई।<br />
विनोबा भावे ने भूदान आंदोलन के अंतर्गत ज़मींदारों से स्वेच्छा से भूमि दान करने की अपील की थी परिणाम स्वरुप हजारों एकड़ भूमि गरीबों के लिए दान में मिली यह अहिंसक सामाजिक सुधार से जुड़ा अव्हान था जिसको पूरे देश से समर्थन मिला था ।</p>
<p>जयप्रकाश नारायण का “संपूर्ण क्रांति” आंदोलन भी इसका बड़ा उदाहरण कहा जा सकता है 1974 में भ्रष्टाचार और तानाशाही के विरोध में आंदोलन शुरू हुआ। जयप्रकाश नारायण ने<br />
युवाओं और छात्रों से शांतिपूर्ण परिवर्तन के लिए आगे आने को कहा<br />
परिणाम देशव्यापी जनआंदोलन बना।<br />
बाद में आपातकाल विरोधी राजनीति की बड़ी नींव बनी। देश ने कभी इसमें राजनीति नहीं देखी और राष्ट्रहित को ही सर्वोपरी माना।</p>
<p>पोखरण द्वीतिय के बाद जब भारत ने मई 1998 में परमाणु परीक्षण किए, तब अमेरिका सहित कई पश्चिमी देशों ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए। उस समय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने देशवासियों से आत्मविश्वास, स्वाभिमान और स्वदेशी भावना के साथ खड़े रहने का आह्वान किया था। क्या हुआ था?<br />
अमेरिका ने आर्थिक प्रतिबंध लगाए,<br />
कुछ विदेशी सहायता और तकनीकी सहयोग रोक दिए गए, विश्व बैंक और अन्य संस्थाओं पर भी दबाव बनाया गया। लेकिन अटलजी ने स्पष्ट कहा कि भारत अपनी सुरक्षा और स्वाभिमान से समझौता नहीं करेगा।<br />
अटलजी ने देशवासियों से आह्वान किया “भारत एक महान राष्ट्र है। हम कठिनाइयों का सामना अपने बल पर करेंगे।”उन्होंने जनता से स्वदेशीअपनाने,आत्मनिर्भर बनने,<br />
देशी उद्योगों का समर्थन करने,<br />
और धैर्य बनाए रखने की अपील की।<br />
उन्होंने यह संदेश दिया कि आर्थिक दबावों से घबराने की आवश्यकता नहीं है।प्रसिद्ध भावना और संदेश<br />
उस समय अटल जी का यह भाव बहुत चर्चित हुआ “हम भूखे रह लेंगे, लेकिन देश की सुरक्षा और सम्मान से समझौता नहीं करेंगे।”<br />
यह भावना उनके कई भाषणों और जनसभाओं में व्यक्त हुई देशवासियो ने इसका पुरजोर समर्थन किया था विपक्ष ने भी इसका साथ दिया<br />
देश में राष्ट्रगौरव की भावना बढ़ी।<br />
लोगों ने प्रतिबंधों को भारत की शक्ति की परीक्षा माना।भारतीय वैज्ञानिकों और सेना के प्रति सम्मान बढ़ा।<br />
स्वदेशी और आत्मनिर्भरता पर नई चर्चा शुरू हुई।उस समय भारत की अर्थव्यवस्था अपेक्षा से अधिक मजबूत निकली और कुछ वर्षों में प्रतिबंधों का प्रभाव काफी कम हो गया।</p>
<p>साफ है जब-जब देश कठिन दौर से गुजरा, तब-तब भारतीय नेतृत्व ने उस संकट से निपटने जनता से राष्ट्रहित में सहभागिता का आह्वान किया।</p>
<p>आज जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खाड़ी युद्ध के मद्देनजर देशवासियों से आत्मसंयम के द्वारा कुछ प्रतिबंधों की अपील की है तो कुछ राजनैतिक दल और उनके नेता प्रधानमंत्री मोदी पर ही हमलावर हैं जो बहुत ही निंदनीय है ये भूल रहे हैं की प्रधानमंत्री मोदी ने जो आव्हान किया है उसकी जड़ें भारतीय इतिहास की उसी परंपरा में दिखाई देती हैं, जिसे कभी महात्मा गाँधी , लाल बहादुर शास्त्री, जयप्रकाश नारायण और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे कई नेताओं ने अंगीकार किया था और देश ने कभी भी इसमें राजनीति नहीं देखी।<br />
Praveen dubey @ shabd shakti news.in</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>भाजपा में नियुक्तियां :  देर आए दुरुस्त आए</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 27 Apr 2026 04:31:15 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[मध्यप्रदेश भाजपा नियुक्तियां]]></category>
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					<description><![CDATA[प्रवीण दुबे  मध्यप्रदेश भाजपा संगठन की हालिया नियुक्तियों को लेकर यह कहा जा सकता है कि पार्टी ने देर से ही सही, लेकिन एक संतुलित और रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाने की कोशिश की है। “देर आए, दुरुस्त आए” वाली कहावत इस पूरी प्रक्रिया पर काफी हद तक सटीक बैठती नजर आती है। सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div dir="auto" style="text-align: center;"><strong>प्रवीण दुबे </strong></div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">मध्यप्रदेश भाजपा संगठन की हालिया नियुक्तियों को लेकर यह कहा जा सकता है कि पार्टी ने देर से ही सही, लेकिन एक संतुलित और रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाने की कोशिश की है। “देर आए, दुरुस्त आए” वाली कहावत इस पूरी प्रक्रिया पर काफी हद तक सटीक बैठती नजर आती है।</div>
<div dir="auto">सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि संगठन ने विभिन्न गुटों से जुड़े नेताओं को जिम्मेदारियां देकर आंतरिक संतुलन साधने का प्रयास किया है। लंबे समय से चल रही गुटबाजी के बीच यह कदम पार्टी के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। साथ ही, नियुक्तियों में वरिष्ठता (सीनियरिटी) का भी ध्यान रखा गया है, जिससे पुराने और अनुभवी नेताओं को उचित सम्मान देने की कोशिश दिखती है।</div>
<div dir="auto">एक और अहम बिंदु यह रहा कि पूरे घटनाक्रम में “सिंधिया फैक्टर” को पूरी तरह हावी नहीं होने दिया गया। हालांकि ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थकों को नजरअंदाज भी नहीं किया गया। उदाहरण के तौर पर, अशोक शर्मा जैसे नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देकर संतुलन साधा गया है।</div>
<div dir="auto">वहीं दूसरी ओर, सिंधिया के विरोधी माने जाने वाले के पी यादव और राम निवास रावत को भी जिम्मेदारी देकर स्पष्ट संकेत दिया गया है कि संगठन किसी एक धड़े के प्रभाव में नहीं है।</div>
<div dir="auto">खासतौर पर ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में यह रणनीति स्पष्ट दिखाई दे रही है। सबसे ज्यादा चर्चा केपी यादव की नियुक्ति को लेकर है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने तत्कालीन कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को हराया था। बाद में सिंधिया के भाजपा में आने के बाद भी यादव उनके खिलाफ कई मुद्दों पर मुखर रहे, हालांकि समय-समय पर दोनों नेताओं को साथ भी देखा गया।</div>
<div dir="auto">2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा ने केपी यादव का टिकट काटकर सिंधिया को उम्मीदवार बनाया था। इसके बावजूद केपी यादव ने बगावती तेवर नहीं अपनाए। उस दौरान केंद्रीय नेता अमित शाह ने उन्हें भविष्य में बड़ी जिम्मेदारी देने का संकेत दिया था। अब उन्हें सिविल सप्लाईज कॉर्पोरेशन का अध्यक्ष बनाकर पार्टी ने बड़ा संदेश दिया है।</div>
<div dir="auto">इसके साथ ही, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से आने वाले चेहरों को भी संगठन में स्थान दिया गया है, जो भाजपा की वैचारिक जड़ों को मजबूत बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कार्यकर्ताओं की भागीदारी संगठनात्मक मजबूती के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जाती है।</div>
<div dir="auto">जातिगत समीकरण की बात करें तो इस बार ब्राह्मण वर्ग को अपेक्षाकृत कम तवज्जो मिलने की चर्चा है, जबकि ठाकुर (राजपूत) वर्ग का वर्चस्व बढ़ता दिखाई दे रहा है। यह बदलाव आगामी चुनावी रणनीति और सामाजिक समीकरणों को साधने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।</div>
<div dir="auto">हालांकि, यह भी ध्यान देने वाली बात है कि नियुक्तियों की प्रक्रिया अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। संगठन लगातार संतुलन बनाए रखने की कोशिश में है और आने वाले समय में और भी नाम सामने आ सकते हैं।</div>
<div dir="auto">कुल मिलाकर, भाजपा संगठन की यह कवायद अलग-अलग गुटों, विचारधाराओं और सामाजिक समीकरणों के बीच संतुलन बनाने की एक सुनियोजित रणनीति के रूप में देखी जा रही है, जिसका असर आगामी राजनीतिक परिदृश्य में भी देखने को मिल सकता है।</div>
<div dir="auto">राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इन नियुक्तियों के जरिए भाजपा ने साफ संकेत दिया है कि संगठन, संघ,नरेन्द्र तोमर,सिंधिया खुद मुख्यमंत्री समर्थक और नए सहयोगियों सभी को साथ लेकर आगे बढ़ने की रणनीति पर काम किया जा रहा है जो एक अच्छा संकेत है।</div>
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		<title>मंत्री जी मध्यप्रदेश की जनता अब तेवर नहीं परिणाम चाहती है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 11 Apr 2026 07:18:22 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[गुस्सा]]></category>
		<category><![CDATA[मंत्री]]></category>
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					<description><![CDATA[प्रवीण दुबे मध्यप्रदेश की राजनीति इन दिनों एक नए चलन की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है—कैमरे के सामने सख्ती, और कैमरे के पीछे ढिलाई। ग्वालियर में हाल ही में कैबिनेट मंत्री नारायण सिंह का मीडिया के सामने तीखा तेवर दिखाना इसी प्रवृत्ति का एक ताज़ा उदाहरण है। सामान्यतः शांत और शालीन माने जाने वाले [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;">प्रवीण दुबे</p>
<p>मध्यप्रदेश की राजनीति इन दिनों एक नए चलन की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है—कैमरे के सामने सख्ती, और कैमरे के पीछे ढिलाई। ग्वालियर में हाल ही में कैबिनेट मंत्री नारायण सिंह का मीडिया के सामने तीखा तेवर दिखाना इसी प्रवृत्ति का एक ताज़ा उदाहरण है। सामान्यतः शांत और शालीन माने जाने वाले मंत्री का यह बदला हुआ अंदाज़ अचानक नहीं है, बल्कि यह उस राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बनता जा रहा है, जहाँ प्रदर्शन ज्यादा और परिणाम कम दिखाई देते हैं।<br />
यह कोई पहला मामला नहीं है। प्रदेश में कई वरिष्ठ मंत्री वर्षों से कैमरे के सामने अधिकारियों को फटकारते, नाराज़गी जताते और सख्ती का दिखावा करते नजर आते रहे हैं। ऐसे दृश्य जनता को क्षणिक संतोष तो देते हैं—मानो कोई उनकी समस्याओं के लिए लड़ रहा हो—लेकिन असल सवाल यह है कि क्या इन दिखावटी नाराज़गियों से व्यवस्था में कोई ठोस बदलाव आता है?</p>
<div class="youtube-embed" data-video_id=""><iframe title="मंत्रीजी का गुस्सा" width="563" height="1000" src="https://www.youtube.com/embed/oJq33nfN4Eo?feature=oembed&#038;enablejsapi=1" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" referrerpolicy="strict-origin-when-cross-origin" allowfullscreen></iframe></div>
<p>सच्चाई यह है कि मध्यप्रदेश की नौकरशाही पर इन ‘कैमरा-केंद्रित’ कार्रवाइयों का कोई स्थायी असर नहीं पड़ता। नौकरशाही की उदासीनता और जवाबदेही की कमी जस की तस बनी हुई है। हालात यहाँ तक पहुँच चुके हैं कि विकास कार्यों और जनसमस्याओं से जुड़े कार्यक्रमों को भी गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। अधिकारी जानते हैं कि कैमरे के सामने मिली फटकार अक्सर वहीं खत्म हो जाती है—न तो कोई ठोस कार्रवाई होती है और न ही कोई जवाबदेही तय होती है।<br />
इस पूरे घटनाक्रम में मीडिया की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। टीआरपी की दौड़ में ऐसे ‘ड्रामाई’ दृश्य प्रमुखता से दिखाए जाते हैं, जिससे वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। मंत्री का गुस्सा सुर्खियाँ बन जाता है, लेकिन जनता की समस्या जस की तस बनी रहती है।<br />
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब समस्या स्पष्ट है, तो समाधान क्यों नहीं? क्या वजह है कि प्रदेश स्तर पर सख्त नियम और जवाबदेही तय नहीं हो पा रही? क्यों मुख्यमंत्री स्तर पर नौकरशाही की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे?<br />
जरूरत इस बात की है कि दिखावे की राजनीति से आगे बढ़कर प्रणालीगत सुधार पर ध्यान दिया जाए। अधिकारियों की जवाबदेही तय हो, कार्यों की नियमित समीक्षा हो और लापरवाही पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। साथ ही, मंत्रियों को भी यह समझना होगा कि कैमरे के सामने गुस्सा दिखाने से ज्यादा जरूरी है नीतिगत और प्रशासनिक सुधार लाना।<br />
अंततः, लोकतंत्र में जनता केवल दृश्य नहीं, परिणाम चाहती है। अगर गुस्सा सिर्फ कैमरे तक सीमित रहेगा, तो विश्वास भी धीरे-धीरे खत्म होता जाएगा। अब वक्त है कि सरकार और प्रशासन दोनों यह तय करें कि वे नौटंकी की राजनीति करेंगे या नतीजों की राजनीति।</p>
<p>कैमरे के सामने गुस्सा दिखाना आसान है, लेकिन व्यवस्था बदलना कठिन। मध्यप्रदेश की जनता अब तेवर नहीं, परिणाम चाहती है—और यही इस “फटकार राजनीति” की असली परीक्षा है।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>सबसे बड़ा आतंकी पाकिस्तान : नौ सौ चूहे खाये बिल्ली हज को चली</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 10 Apr 2026 04:00:30 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[आतंकी पाकिस्तान]]></category>
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					<description><![CDATA[ प्रवीण दुबे दुनिया की राजनीति में अक्सर ऐसे देश सामने आते हैं जो अपने वास्तविक चरित्र को छुपाकर वैश्विक मंच पर खुद को शांति दूत के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करते हैं। पाकिस्तान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। आज जब खाड़ी क्षेत्र में तनाव और युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं, तब पाकिस्तान [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"> प्रवीण दुबे</p>
<p>दुनिया की राजनीति में अक्सर ऐसे देश सामने आते हैं जो अपने वास्तविक चरित्र को छुपाकर वैश्विक मंच पर खुद को शांति दूत के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करते हैं। पाकिस्तान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। आज जब खाड़ी क्षेत्र में तनाव और युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं, तब पाकिस्तान खुद को “शांति का चौधरी” साबित करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या जिस देश का इतिहास आतंकवाद को पनाह देने का रहा हो, वह वास्तव में शांति का पैरोकार हो सकता है?<br />
आतंकवाद की जड़ में पाकिस्तान की भूमिका<br />
भारत के लिए पाकिस्तान का आतंकी चेहरा कोई नई बात नहीं है। 26/11 Mumbai attacks जैसे भीषण हमलों ने पूरी दुनिया को हिला दिया था। इस हमले के मास्टरमाइंड को पाकिस्तान में संरक्षण मिला—यह तथ्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी स्वीकार किया गया।<br />
इसी तरह, दुनिया के सबसे बड़े आतंकी हमलों में से एक September 11 attacks (वर्ल्ड ट्रेड सेंटर हमला) ने अमेरिका को झकझोर दिया था। इस हमले का मास्टरमाइंड Osama bin Laden वर्षों तक पाकिस्तान के एबटाबाद में छुपा बैठा रहा। यह घटना अपने आप में पाकिस्तान की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करती है कि आखिर कैसे दुनिया का सबसे वांछित आतंकी उसकी धरती पर सुरक्षित रहा?<br />
आतंकी संगठनों की शरणस्थली<br />
पाकिस्तान लंबे समय से कई प्रतिबंधित आतंकी संगठनों का सुरक्षित ठिकाना रहा है। Lashkar-e-Taiba और Jaish-e-Mohammed जैसे संगठन भारत में अनेक हमलों के लिए जिम्मेदार रहे हैं। इन संगठनों को न केवल पाकिस्तान की जमीन मिली, बल्कि उन्हें संसाधन और प्रशिक्षण भी वहीं से प्राप्त हुआ।<br />
खुद अमेरिका ने United States Department of State के माध्यम से कई संगठनों को “Foreign Terrorist Organizations (FTO)” की सूची में शामिल किया है। इनमें लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, अल-कायदा जैसे संगठन शामिल हैं। यह सूची इस बात का प्रमाण है कि वैश्विक स्तर पर भी पाकिस्तान से जुड़े आतंकी नेटवर्क को मान्यता मिली हुई है।<br />
अमेरिका की दोहरी नीति<br />
अमेरिका की नीति इस पूरे मामले में सबसे अधिक सवालों के घेरे में है। एक तरफ वह आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक अभियान का नेतृत्व करता है, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान जैसे देश के साथ रणनीतिक साझेदारी बनाए रखता है। September 11 attacks के बाद भी यदि पाकिस्तान जैसे देश पर पूरी तरह कठोर कार्रवाई नहीं होती, तो यह वैश्विक नीति की विफलता ही मानी जाएगी।<br />
भारत के खिलाफ प्रॉक्सी वार<br />
पाकिस्तान ने सीधे युद्ध के बजाय “प्रॉक्सी वार” यानी परोक्ष युद्ध की नीति अपनाई है। सीमा पार से आतंकियों को भेजना, उन्हें हथियार और प्रशिक्षण देना, और भारत में अस्थिरता फैलाने की कोशिश करना—यह सब उसकी रणनीति का हिस्सा रहा है। Lashkar-e-Taiba और Jaish-e-Mohammed जैसे संगठनों के जरिए भारत में लगातार हमले कराए जाते रहे हैं।<br />
शांति का ढोंग क्यों?<br />
खाड़ी संकट में मध्यस्थ बनने की पाकिस्तान की कोशिशें दरअसल उसकी छवि सुधारने की रणनीति हैं। अंतरराष्ट्रीय मंच पर खुद को जिम्मेदार राष्ट्र दिखाने के लिए वह शांति की बातें करता है, लेकिन उसकी जमीन पर पल रहे आतंकी नेटवर्क उसकी सच्चाई उजागर कर देते हैं।</p>
<p>पाकिस्तान का इतिहास और वर्तमान—दोनों ही यह साबित करते हैं कि वह आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में विश्वसनीय भागीदार नहीं हो सकता। Osama bin Laden का पाकिस्तान में छिपा होना और 26/11 Mumbai attacks जैसे हमलों में उसकी भूमिका इस सच्चाई को और मजबूत करते हैं।<br />
जब तक पाकिस्तान अपनी धरती से आतंकवाद की जड़ों को खत्म नहीं करता, तब तक उसका “शांति दूत” बनने का दावा केवल एक दिखावा ही रहेगा। दुनिया को अब यह तय करना होगा कि वह आतंक के साथ समझौता करेगी या वास्तविक शांति के पक्ष में खड़ी होगी।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>नाकारा नौकरशाही के लिए पूरे मध्यप्रदेश में जरूरी है यह सिंधिया कल्चर</title>
		<link>https://shabdshaktinews.in/62928-2/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 07 Apr 2026 08:38:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[Video]]></category>
		<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[सिंधिया कल्चर]]></category>
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					<description><![CDATA[प्रवीण दुबे केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया एक बार फिर चर्चाओं में हैं उनके संसदीय क्षेत्र  का एक वीडियो जिसमें वे कलेक्टर को हड़काते नजर आ रहे हैं खासा वायरल है इसमें वे कलेक्टर से इस कारण खफा दिख रहे हैं क्यों कि कलेक्टर  सिंधिया की जन सुनवाई में आए जनता के आवेदनों को ठीक प्रकार [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div id="m#msg-a:r-6024723023836228497" class="mail-message expanded">
<div id="m#msg-a:r-6024723023836228497-header" class="mail-message-header spacer" style="text-align: center;">प्रवीण दुबे</div>
<div id="m#msg-a:r-6024723023836228497-content" class="mail-message-content collapsible zoom-normal mail-show-images ">
<div class="clear">
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">
<p>केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया एक बार फिर चर्चाओं में हैं उनके संसदीय क्षेत्र  का एक वीडियो जिसमें वे कलेक्टर को हड़काते नजर आ रहे हैं खासा वायरल है इसमें वे कलेक्टर से इस कारण खफा दिख रहे हैं क्यों कि कलेक्टर  सिंधिया की जन सुनवाई में आए जनता के आवेदनों को ठीक प्रकार से नहीं  रख रहे हैं।</p>
<div dir="auto">जब सिंधिया ने तीखे तेवर दिखाए तब जाकर कलेक्टर साहब ने आवेदनों को ठीक प्रकार से सहेजा।</div>
<div dir="auto">अब जरा सोचिये जब केंद्रीय मंत्री और स्थानीय जनप्रतिनिधि के सामने जनसुनवाई के आवेदनों को सही से नहीं रखा जा रहा है तो आम जनता के साथ मध्यप्रदेश की नौकरशाही क्या स्थिति निर्मित करती होगी ?</div>
<div dir="auto" style="text-align: center;">
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</div>
<div dir="auto">वीडियो news version आपकी आवाज से साभार</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">मध्यप्रदेश के सभी जिलों में प्रत्येक सप्ताह जन सुनवाई होती है चंद मामलों को छोड़ दें तो जन सुनवाई में सामने आई परेशानियों को अधिकारी कर्मचारी गंभीरता से नहीं लेते हैं और जनता परेशान होती रहती है।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">
<p>यही हालात सीएम हेल्पलाइन में दर्ज की गई शिकायतों का भी है कई बार इन शिकायतों का निदान ठीक से नहीं करने और उन्हें गंभीरता से न लेने के कारण कई अधिकारी कर्मचारी सस्पेंड भी किए जाते रहे हैं बावजूद इसके शिकायतों के निराकरण के प्रति इनका रवैया टालम टोल वाला ही नजर आता है।</p>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">नौकरशाही के इन्ही क्रिया कलापों के कारण जहां जन प्रतिनिधियों को जनता का उलाहना सहना पड़ते हैं वहीं सरकार को भी बदनामी झेलना पडती है</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto"> कई बार  कई समस्याओं के समाधान न किए जाने  के  मामलों को जन प्रतिनिधियों की गुटबाजी से जोड़कर देखा जाने लगता है और सरकार की थू-थू होती है जबकि इसके पीछे नौकरशाही का नाकारापन ही मुख्य वजह होती है। जिन कलेक्टर साहब को सिंधिया के गुस्से का सामना करना पड़ा उन्हीं कलेक्टर साहब की एक ओर  नासमझी के कारण सिंधिया की किरकिरी हुई और अब मीडिया  इस मामले को सिंधिया तथा मुख्यमंत्री के बीच अदावत से जोड़कर प्रचारित कर  रहा है</div>
<div dir="auto">लेकिन यहां भी प्रशासनिक अमला पाक साफ बना हुआ है इस मामले में अशोकनगर में उन्हीं विकास कार्यों का फीता पुनः सिंधिया से कटवा दिया गया जिनका पूजन कुछ दिन पूर्व ही मुख्यमंत्री कर चुके थे</div>
<div dir="auto">साफ है प्रशासन सही समय पर चिंता करता तो यह गलती नहीं होती और सरकार में गुटबाजी का आरोप नहीं लगता।</div>
<div dir="auto">समय समय पर ऐसे न जाने कितने मामले सामने आते रहते हैं जहां नौकरशाही की गलतियों के दुष्परिणाम सरकार को झेलना पड़ते है।</div>
<div dir="auto">इस दृष्टि से देखा जाए तो अशोकनगर में सिंधिया ने कलेक्टर साहब को जो गर्मा गर्म सीख दी है वो बिल्कुल उचित है, जनता की तकलीफो के प्रति सजग न रहने वाले अधिकारियों कर्मचारियों को लेकर पूरे मध्यप्रदेश में सिंधिया कल्चर फॉलो करने की जरुरत है।</div>
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		<title>ऐसी स्मार्टनेस से तो भगवान बचाए इनसे तो भट्ट गंवार अच्छे</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 10 Mar 2026 14:43:23 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Video]]></category>
		<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[स्मार्ट सिटी ग्वालियर आग]]></category>
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					<description><![CDATA[&#160; प्रवीण दुबे ऐसी स्मार्टनेस से भगवान बचाए इसे स्मार्ट नहीं भट्ट गंवार कहा जाए तो ज्यादा उपयुक्त होगा जनाब आप सोच रहे होंगे आखिर हम कहना क्या चाहते हैं ? तो हम आपको बता दें कि यहां हम चर्चा कर रहे हैं राजा महाराजाओं बॉस और दादाओं के शहर ग्वालियर की जिसके बारे में [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<p style="text-align: center;">प्रवीण दुबे</p>
<p>ऐसी स्मार्टनेस से भगवान बचाए इसे स्मार्ट नहीं भट्ट गंवार कहा जाए तो ज्यादा उपयुक्त होगा जनाब आप सोच रहे होंगे आखिर हम कहना क्या चाहते हैं ?</p>
<p>तो हम आपको बता दें कि यहां हम चर्चा कर रहे हैं राजा महाराजाओं बॉस और दादाओं के शहर ग्वालियर की जिसके बारे में स्मार्ट सिटी, स्मार्ट सिटी सुन सुनकर कान पक गए लेकिन कभी भी स्मार्टनेस देखने को नहीं मिली हमेशा ढोल में पोल ही नजर आया।</p>
<p>हाल ही की बात करें तो शहर के महाराज बाड़ा से सटे दौलतगंज के एक रिहायशी मकान में हुए अग्निकांड में जो कुछ देखने को मिला उसने जिला प्रशासन सहित ग्वालियर के स्मार्ट सिटी होने के ढिढोरे की पोल खोलकर रख दी है।</p>
<p>शर्मनाक सिस्टम और उसे प्रदेश सरकार से लेकर नगर सरकार तक प्राप्त एव्रीथिंग राइट के सर्टिफिकेट की सच्चाई धरातल पर कितनी झूठी है यह सबने देख लिया है।</p>
<p>इससे ज्यादा शर्मनाक नाकारापन और क्या होगा कि एक ओर भभकती आग के बीच जिंदगी असहाय हो चीख रही थी तो दूसरी ओर घटना स्थल पर पहुँची फायर ब्रिगेड की गाड़ियों के होजरील (पाइप) में कई छेदों की वजह से पानी का प्रेशर कम हो गया और आग पर समय रहते काबू नहीं पाया जा सका परिणाम मौत जीत गई जिंदगी हार गई।</p>
<p>इतना ही नहीं दमकल की गाड़ियाँ घटनास्थल पर देरी से पहुँचीं और इस विलंब के कारण आग ने विकराल रूप धारण किया और जनहानि हुई।</p>
<p>भीड़ भरे महाराज बाड़ा दौलतगंज क्षेत्र में चोतरफा अतिक्रमण भी फायर ब्रिगेड के समय रहते दुर्घटना स्थल तक पहुंचने में बाधक बना और असहाय पुलिस वाले सीटी बजाते इधर उधर भागते दिखाई दिए।</p>
<p><iframe title="ग्वालियर के प्रमुख व्यावसायिक बाजार दौलतगंज के मकान में लगी आग फायर कर्मियों ने आग पर किया काबू " width="696" height="392" src="https://www.youtube.com/embed/C1Z5XbXqTNQ?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" referrerpolicy="strict-origin-when-cross-origin" allowfullscreen></iframe></p>
<div style="width: 696px;" class="wp-video"><video class="wp-video-shortcode" id="video-62070-2" width="696" height="394" preload="metadata" controls="controls"><source type="video/mp4" src="https://shabdshaktinews.in/wp-content/uploads/2026/03/VID-20260310-WA00241-1.mp4?_=2" /><a href="https://shabdshaktinews.in/wp-content/uploads/2026/03/VID-20260310-WA00241-1.mp4">https://shabdshaktinews.in/wp-content/uploads/2026/03/VID-20260310-WA00241-1.mp4</a></video></div>
<p>सबसे बड़ा सवाल चार पहियों की लग्जरी गाड़ियों में बैठकर दौलतगंज से बाड़ा सराफा होकर रोजाना गुजरने वाले बेशर्म नौकरशाहों को इन बाजारों में पसरा अतिक्रमण दिखाई नहीं देता क्या ?</p>
<p>शुक्र है भगवान का कि अभी तक दानाओली दहीमंडी टोपी बाजार नजरबाग सुभाष मार्केट जैसी सैकड़ों कंजस्टेड स्थानों पर कोई अग्निकांड नहीं हुआ भगवान न करे कभी ऐसा हो,</p>
<p>अफ़सोस की बात है कि पिछले वर्षों में मोचीओली इंदरगंज में हुए भीषण अग्निकाडों जिनमें बड़ी जनहानि हुईं लेकिन हमारे नौकरशाहों और जन प्रतिनिधियों ने कोई सबक नहीं सीखा है, ये लोग पिछली बरसात में सड़कों की दुर्दशा के कारण राष्ट्रीय स्तर पर ग्वालियर की नककटी कराने के बावजूद नहीं सुधरे हैं,</p>
<p>और हमारे प्रभारी मंत्री का तो कहना ही क्या शहर में आग लगे , सड़कें तालाब बने या खंदक उनको तो सिर्फ महाराज से ही मतलब है मीडिया सवाल करे तो भड़क उठते हैं,वर्तमान के विषय पर भी उनका यहां आना तो दूर फोन पर सम्पर्क करना भी मुश्किल है</p>
<p>इन सबकी इन्ही हरकतों के कारण ही ग्वालियर पचास वर्ष से भी पीछे जा चुका है और यहां की जनता का जीवन खतरे में पड़ गया है।</p>
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		<title>संघ को लेकर ग्वालियर में बहुत बड़ा खुलासा कर गए सह सरकार्यवाह डॉ कृष्ण गोपाल</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Feb 2026 05:00:52 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[आरएसएस सह सरकार्यवाह]]></category>
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					<description><![CDATA[प्रवीण दुबे अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूर्ण कर चुके संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्य पद्धति से पूरी दुनिया के सैकड़ो देश न केवल प्रभावित हैं बल्कि उसके ऊपर शोध (रिसर्च ) भी किये जा रहे हैं। इससे जुड़ा एक बड़ा खुलासा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ कृष्ण गोपाल ने ग्वालियर में [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;">प्रवीण दुबे</p>
<p>अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूर्ण कर चुके संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्य पद्धति से पूरी दुनिया के सैकड़ो देश न केवल प्रभावित हैं बल्कि उसके ऊपर शोध (रिसर्च ) भी किये जा रहे हैं। इससे जुड़ा एक बड़ा खुलासा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ कृष्ण गोपाल ने ग्वालियर में अपने एक व्याख्यान के दौरान किया उन्होंने बताया कि संघ की व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण की कार्य कार्यप्रणाली पर आज जर्मनी, रूस सहित  दुनिया के 50 देश शोध कर रहे हैं।</p>
<p>आज जबकि भारत में कांग्रेस, कम्युनिस्ट सहित तमाम मुस्लिम संगठन आरएसएस को साम्प्रदायिक और कट्टरवादी हिन्दू संगठन कहकर बदनाम करने में जुटे दिखाई देते हैं ऐसे समय में किसी अधिकृत मंच से संघ के किसी बड़े पदाधिकारी द्वारा यह बताया जाना कि संघ की व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण की कार्य कार्यप्रणाली पर जर्मनी, रूस सहित  दुनिया के 50 देश शोध कर रहे हैं, उन लोगों और संगठनों के मुंह पर करारा तमाचा कहा जा सकता है जो संघ को बदनाम करने की दृष्टि से उसकी कार्यपद्धति पर अंगुली उठाते हैं।</p>
<p>इस बड़े खुलासे के बाद पूरी तरह से यह सिद्ध हो जाता है कि भारत का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन माना जाने वाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अब केवल देश के भीतर ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी शोध और विश्लेषण का महत्वपूर्ण विषय बन चुका है। संगठन की कार्यपद्धति, शाखा व्यवस्था, नेटवर्क संरचना और प्रवासी भारतीय समाज में इसकी भूमिका को लेकर दुनिया के कई देशों में अकादमिक और स्वतंत्र अध्ययन किए जा रहे हैं और कई देशों में ऐसे रिसर्च पूर्ण भी हो चुके हैं, कई देशों में इससे जुड़े विषयों पर पीएचडी भी कराई जा रही हैं।</p>
<p><strong>वैश्विक नेटवर्क पर सबसे बड़ा अध्ययन</strong></p>
<p>हाल के वर्षों में संघ की कार्यप्रणाली पर सबसे व्यापक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन 2025 में सामने आया। यह शोध फ्रांस के प्रतिष्ठित संस्थान Sciences Po और पत्रिका The Caravan के सहयोग से किया गया। लगभग छह वर्षों तक चले इस अध्ययन में संघ से जुड़े 2500 से अधिक संगठनों के वैश्विक नेटवर्क का विश्लेषण किया गया।<br />
शोधकर्ताओं ने पाया कि विभिन्न देशों में सक्रिय इन संगठनों के बीच नेतृत्व, कार्यक्रमों और संरचनात्मक कार्यशैली में स्पष्ट समानताएँ दिखाई देती हैं। यह अध्ययन RSS के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की पहली व्यापक मैपिंग माना जाता है।</p>
<p>संघ की कार्यपद्धति पर “कितने देशों में शोध हुआ” इसका कोई एक आधिकारिक आंकड़ा तो उपलब्ध नहीं है, क्योंकि कई अध्ययन अलग-अलग स्वरूप में किए गए हैं।<br />
हालांकि शाखाओं और संबद्ध संगठनों की उपस्थिति के आधार पर किए गए प्रमुख विश्लेषणों के अनुसार संघ से प्रेरित गतिविधियों पर कम से कम 39 देशों में शोध और अध्ययन हुए हैं। इन देशों में अमेरिका, ब्रिटेन, नेपाल, अफ्रीकी राष्ट्र और मध्य-पूर्व के कुछ देश प्रमुख हैं। लेकिन अब जबकि संघ ने खुद अधिकृत रूप से 50 देशों में शोध की बात कही है अतः इसे बड़ा प्रमाण माना जा सकता है।<br />
विदेशों में विस्तार का इतिहास<br />
इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के अनुसार संघ से प्रेरित गतिविधियों का प्रारंभिक विस्तार स्वतंत्रता से पहले ही विदेशों तक पहुँच चुका था। शुरुआती चरण में केन्या, म्यांमार (तत्कालीन बर्मा) और मॉरीशस जैसे देशों में प्रवासी भारतीयों के बीच संगठनात्मक गतिविधियों का उल्लेख मिलता है।<br />
किन विषयों पर होता है शोध<br />
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर RSS की कार्यपद्धति पर होने वाले अध्ययन मुख्य रूप से चार प्रमुख विषयों पर केंद्रित रहते हैं—<br />
संगठनात्मक संरचना – शाखा प्रणाली, प्रशिक्षण मॉडल और नेतृत्व पद्धति।<br />
सामाजिक नेटवर्क – शिक्षा, सेवा और सांस्कृतिक गतिविधियों का विस्तार।<br />
प्रवासी भारतीय समाज में भूमिका – विभिन्न देशों में भारतीय समुदायों के बीच संगठन की भागीदारी।<br />
वैश्विक समन्वय – अलग-अलग देशों में कार्यरत संबद्ध संगठनों के बीच तालमेल।<br />
<strong>विश्वविद्यालयों में भी विषय बना RSS</strong><br />
अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के कई विश्वविद्यालयों में संघ की कार्यप्रणाली पर केस स्टडी आधारित शोध भी किए गए हैं। इनमें संगठन की संरचना, विचारधारा और सामाजिक प्रभाव का विश्लेषण प्रमुख रूप से शामिल रहता है।<br />
निष्कर्ष<br />
विशेषज्ञों के अनुसार RSS आज विश्व स्तर पर अध्ययन का एक महत्वपूर्ण सामाजिक-राजनीतिक उदाहरण बन चुका है। इसकी शाखा आधारित संगठन प्रणाली और दीर्घकालिक कार्यपद्धति ने इसे वैश्विक शोध जगत में एक अलग पहचान दिलाई है।<br />
कुल मिलाकर, विभिन्न प्रकार के अध्ययनों को देखते हुए कहा जा सकता है कि संघ की कार्यपद्धति पर शोध विश्व स्तर पर हुआ है, जबकि शाखा उपस्थिति आधारित विश्लेषणों में लगभग 39 देशों को प्रमुख अध्ययन क्षेत्र माना जाता है।</p>
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