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	<title>सम्पादकीय &#8211; Shabd Shakti News</title>
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	<description>Every News Speaks</description>
	<lastBuildDate>Mon, 27 Apr 2026 04:36:11 +0000</lastBuildDate>
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		<title>भाजपा में नियुक्तियां :  देर आए दुरुस्त आए</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 27 Apr 2026 04:31:15 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[मध्यप्रदेश भाजपा नियुक्तियां]]></category>
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					<description><![CDATA[प्रवीण दुबे  मध्यप्रदेश भाजपा संगठन की हालिया नियुक्तियों को लेकर यह कहा जा सकता है कि पार्टी ने देर से ही सही, लेकिन एक संतुलित और रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाने की कोशिश की है। “देर आए, दुरुस्त आए” वाली कहावत इस पूरी प्रक्रिया पर काफी हद तक सटीक बैठती नजर आती है। सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div dir="auto" style="text-align: center;"><strong>प्रवीण दुबे </strong></div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">मध्यप्रदेश भाजपा संगठन की हालिया नियुक्तियों को लेकर यह कहा जा सकता है कि पार्टी ने देर से ही सही, लेकिन एक संतुलित और रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाने की कोशिश की है। “देर आए, दुरुस्त आए” वाली कहावत इस पूरी प्रक्रिया पर काफी हद तक सटीक बैठती नजर आती है।</div>
<div dir="auto">सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि संगठन ने विभिन्न गुटों से जुड़े नेताओं को जिम्मेदारियां देकर आंतरिक संतुलन साधने का प्रयास किया है। लंबे समय से चल रही गुटबाजी के बीच यह कदम पार्टी के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। साथ ही, नियुक्तियों में वरिष्ठता (सीनियरिटी) का भी ध्यान रखा गया है, जिससे पुराने और अनुभवी नेताओं को उचित सम्मान देने की कोशिश दिखती है।</div>
<div dir="auto">एक और अहम बिंदु यह रहा कि पूरे घटनाक्रम में “सिंधिया फैक्टर” को पूरी तरह हावी नहीं होने दिया गया। हालांकि ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थकों को नजरअंदाज भी नहीं किया गया। उदाहरण के तौर पर, अशोक शर्मा जैसे नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देकर संतुलन साधा गया है।</div>
<div dir="auto">वहीं दूसरी ओर, सिंधिया के विरोधी माने जाने वाले के पी यादव और राम निवास रावत को भी जिम्मेदारी देकर स्पष्ट संकेत दिया गया है कि संगठन किसी एक धड़े के प्रभाव में नहीं है।</div>
<div dir="auto">खासतौर पर ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में यह रणनीति स्पष्ट दिखाई दे रही है। सबसे ज्यादा चर्चा केपी यादव की नियुक्ति को लेकर है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने तत्कालीन कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को हराया था। बाद में सिंधिया के भाजपा में आने के बाद भी यादव उनके खिलाफ कई मुद्दों पर मुखर रहे, हालांकि समय-समय पर दोनों नेताओं को साथ भी देखा गया।</div>
<div dir="auto">2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा ने केपी यादव का टिकट काटकर सिंधिया को उम्मीदवार बनाया था। इसके बावजूद केपी यादव ने बगावती तेवर नहीं अपनाए। उस दौरान केंद्रीय नेता अमित शाह ने उन्हें भविष्य में बड़ी जिम्मेदारी देने का संकेत दिया था। अब उन्हें सिविल सप्लाईज कॉर्पोरेशन का अध्यक्ष बनाकर पार्टी ने बड़ा संदेश दिया है।</div>
<div dir="auto">इसके साथ ही, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से आने वाले चेहरों को भी संगठन में स्थान दिया गया है, जो भाजपा की वैचारिक जड़ों को मजबूत बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कार्यकर्ताओं की भागीदारी संगठनात्मक मजबूती के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जाती है।</div>
<div dir="auto">जातिगत समीकरण की बात करें तो इस बार ब्राह्मण वर्ग को अपेक्षाकृत कम तवज्जो मिलने की चर्चा है, जबकि ठाकुर (राजपूत) वर्ग का वर्चस्व बढ़ता दिखाई दे रहा है। यह बदलाव आगामी चुनावी रणनीति और सामाजिक समीकरणों को साधने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।</div>
<div dir="auto">हालांकि, यह भी ध्यान देने वाली बात है कि नियुक्तियों की प्रक्रिया अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। संगठन लगातार संतुलन बनाए रखने की कोशिश में है और आने वाले समय में और भी नाम सामने आ सकते हैं।</div>
<div dir="auto">कुल मिलाकर, भाजपा संगठन की यह कवायद अलग-अलग गुटों, विचारधाराओं और सामाजिक समीकरणों के बीच संतुलन बनाने की एक सुनियोजित रणनीति के रूप में देखी जा रही है, जिसका असर आगामी राजनीतिक परिदृश्य में भी देखने को मिल सकता है।</div>
<div dir="auto">राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इन नियुक्तियों के जरिए भाजपा ने साफ संकेत दिया है कि संगठन, संघ,नरेन्द्र तोमर,सिंधिया खुद मुख्यमंत्री समर्थक और नए सहयोगियों सभी को साथ लेकर आगे बढ़ने की रणनीति पर काम किया जा रहा है जो एक अच्छा संकेत है।</div>
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		<title>मंत्री जी मध्यप्रदेश की जनता अब तेवर नहीं परिणाम चाहती है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 11 Apr 2026 07:18:22 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[गुस्सा]]></category>
		<category><![CDATA[मंत्री]]></category>
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					<description><![CDATA[प्रवीण दुबे मध्यप्रदेश की राजनीति इन दिनों एक नए चलन की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है—कैमरे के सामने सख्ती, और कैमरे के पीछे ढिलाई। ग्वालियर में हाल ही में कैबिनेट मंत्री नारायण सिंह का मीडिया के सामने तीखा तेवर दिखाना इसी प्रवृत्ति का एक ताज़ा उदाहरण है। सामान्यतः शांत और शालीन माने जाने वाले [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;">प्रवीण दुबे</p>
<p>मध्यप्रदेश की राजनीति इन दिनों एक नए चलन की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है—कैमरे के सामने सख्ती, और कैमरे के पीछे ढिलाई। ग्वालियर में हाल ही में कैबिनेट मंत्री नारायण सिंह का मीडिया के सामने तीखा तेवर दिखाना इसी प्रवृत्ति का एक ताज़ा उदाहरण है। सामान्यतः शांत और शालीन माने जाने वाले मंत्री का यह बदला हुआ अंदाज़ अचानक नहीं है, बल्कि यह उस राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बनता जा रहा है, जहाँ प्रदर्शन ज्यादा और परिणाम कम दिखाई देते हैं।<br />
यह कोई पहला मामला नहीं है। प्रदेश में कई वरिष्ठ मंत्री वर्षों से कैमरे के सामने अधिकारियों को फटकारते, नाराज़गी जताते और सख्ती का दिखावा करते नजर आते रहे हैं। ऐसे दृश्य जनता को क्षणिक संतोष तो देते हैं—मानो कोई उनकी समस्याओं के लिए लड़ रहा हो—लेकिन असल सवाल यह है कि क्या इन दिखावटी नाराज़गियों से व्यवस्था में कोई ठोस बदलाव आता है?</p>
<div class="youtube-embed" data-video_id=""><iframe title="मंत्रीजी का गुस्सा" width="563" height="1000" src="https://www.youtube.com/embed/oJq33nfN4Eo?feature=oembed&#038;enablejsapi=1" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" referrerpolicy="strict-origin-when-cross-origin" allowfullscreen></iframe></div>
<p>सच्चाई यह है कि मध्यप्रदेश की नौकरशाही पर इन ‘कैमरा-केंद्रित’ कार्रवाइयों का कोई स्थायी असर नहीं पड़ता। नौकरशाही की उदासीनता और जवाबदेही की कमी जस की तस बनी हुई है। हालात यहाँ तक पहुँच चुके हैं कि विकास कार्यों और जनसमस्याओं से जुड़े कार्यक्रमों को भी गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। अधिकारी जानते हैं कि कैमरे के सामने मिली फटकार अक्सर वहीं खत्म हो जाती है—न तो कोई ठोस कार्रवाई होती है और न ही कोई जवाबदेही तय होती है।<br />
इस पूरे घटनाक्रम में मीडिया की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। टीआरपी की दौड़ में ऐसे ‘ड्रामाई’ दृश्य प्रमुखता से दिखाए जाते हैं, जिससे वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। मंत्री का गुस्सा सुर्खियाँ बन जाता है, लेकिन जनता की समस्या जस की तस बनी रहती है।<br />
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब समस्या स्पष्ट है, तो समाधान क्यों नहीं? क्या वजह है कि प्रदेश स्तर पर सख्त नियम और जवाबदेही तय नहीं हो पा रही? क्यों मुख्यमंत्री स्तर पर नौकरशाही की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे?<br />
जरूरत इस बात की है कि दिखावे की राजनीति से आगे बढ़कर प्रणालीगत सुधार पर ध्यान दिया जाए। अधिकारियों की जवाबदेही तय हो, कार्यों की नियमित समीक्षा हो और लापरवाही पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। साथ ही, मंत्रियों को भी यह समझना होगा कि कैमरे के सामने गुस्सा दिखाने से ज्यादा जरूरी है नीतिगत और प्रशासनिक सुधार लाना।<br />
अंततः, लोकतंत्र में जनता केवल दृश्य नहीं, परिणाम चाहती है। अगर गुस्सा सिर्फ कैमरे तक सीमित रहेगा, तो विश्वास भी धीरे-धीरे खत्म होता जाएगा। अब वक्त है कि सरकार और प्रशासन दोनों यह तय करें कि वे नौटंकी की राजनीति करेंगे या नतीजों की राजनीति।</p>
<p>कैमरे के सामने गुस्सा दिखाना आसान है, लेकिन व्यवस्था बदलना कठिन। मध्यप्रदेश की जनता अब तेवर नहीं, परिणाम चाहती है—और यही इस “फटकार राजनीति” की असली परीक्षा है।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<title>सबसे बड़ा आतंकी पाकिस्तान : नौ सौ चूहे खाये बिल्ली हज को चली</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 10 Apr 2026 04:00:30 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[आतंकी पाकिस्तान]]></category>
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					<description><![CDATA[ प्रवीण दुबे दुनिया की राजनीति में अक्सर ऐसे देश सामने आते हैं जो अपने वास्तविक चरित्र को छुपाकर वैश्विक मंच पर खुद को शांति दूत के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करते हैं। पाकिस्तान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। आज जब खाड़ी क्षेत्र में तनाव और युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं, तब पाकिस्तान [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"> प्रवीण दुबे</p>
<p>दुनिया की राजनीति में अक्सर ऐसे देश सामने आते हैं जो अपने वास्तविक चरित्र को छुपाकर वैश्विक मंच पर खुद को शांति दूत के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करते हैं। पाकिस्तान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। आज जब खाड़ी क्षेत्र में तनाव और युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं, तब पाकिस्तान खुद को “शांति का चौधरी” साबित करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या जिस देश का इतिहास आतंकवाद को पनाह देने का रहा हो, वह वास्तव में शांति का पैरोकार हो सकता है?<br />
आतंकवाद की जड़ में पाकिस्तान की भूमिका<br />
भारत के लिए पाकिस्तान का आतंकी चेहरा कोई नई बात नहीं है। 26/11 Mumbai attacks जैसे भीषण हमलों ने पूरी दुनिया को हिला दिया था। इस हमले के मास्टरमाइंड को पाकिस्तान में संरक्षण मिला—यह तथ्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी स्वीकार किया गया।<br />
इसी तरह, दुनिया के सबसे बड़े आतंकी हमलों में से एक September 11 attacks (वर्ल्ड ट्रेड सेंटर हमला) ने अमेरिका को झकझोर दिया था। इस हमले का मास्टरमाइंड Osama bin Laden वर्षों तक पाकिस्तान के एबटाबाद में छुपा बैठा रहा। यह घटना अपने आप में पाकिस्तान की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करती है कि आखिर कैसे दुनिया का सबसे वांछित आतंकी उसकी धरती पर सुरक्षित रहा?<br />
आतंकी संगठनों की शरणस्थली<br />
पाकिस्तान लंबे समय से कई प्रतिबंधित आतंकी संगठनों का सुरक्षित ठिकाना रहा है। Lashkar-e-Taiba और Jaish-e-Mohammed जैसे संगठन भारत में अनेक हमलों के लिए जिम्मेदार रहे हैं। इन संगठनों को न केवल पाकिस्तान की जमीन मिली, बल्कि उन्हें संसाधन और प्रशिक्षण भी वहीं से प्राप्त हुआ।<br />
खुद अमेरिका ने United States Department of State के माध्यम से कई संगठनों को “Foreign Terrorist Organizations (FTO)” की सूची में शामिल किया है। इनमें लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, अल-कायदा जैसे संगठन शामिल हैं। यह सूची इस बात का प्रमाण है कि वैश्विक स्तर पर भी पाकिस्तान से जुड़े आतंकी नेटवर्क को मान्यता मिली हुई है।<br />
अमेरिका की दोहरी नीति<br />
अमेरिका की नीति इस पूरे मामले में सबसे अधिक सवालों के घेरे में है। एक तरफ वह आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक अभियान का नेतृत्व करता है, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान जैसे देश के साथ रणनीतिक साझेदारी बनाए रखता है। September 11 attacks के बाद भी यदि पाकिस्तान जैसे देश पर पूरी तरह कठोर कार्रवाई नहीं होती, तो यह वैश्विक नीति की विफलता ही मानी जाएगी।<br />
भारत के खिलाफ प्रॉक्सी वार<br />
पाकिस्तान ने सीधे युद्ध के बजाय “प्रॉक्सी वार” यानी परोक्ष युद्ध की नीति अपनाई है। सीमा पार से आतंकियों को भेजना, उन्हें हथियार और प्रशिक्षण देना, और भारत में अस्थिरता फैलाने की कोशिश करना—यह सब उसकी रणनीति का हिस्सा रहा है। Lashkar-e-Taiba और Jaish-e-Mohammed जैसे संगठनों के जरिए भारत में लगातार हमले कराए जाते रहे हैं।<br />
शांति का ढोंग क्यों?<br />
खाड़ी संकट में मध्यस्थ बनने की पाकिस्तान की कोशिशें दरअसल उसकी छवि सुधारने की रणनीति हैं। अंतरराष्ट्रीय मंच पर खुद को जिम्मेदार राष्ट्र दिखाने के लिए वह शांति की बातें करता है, लेकिन उसकी जमीन पर पल रहे आतंकी नेटवर्क उसकी सच्चाई उजागर कर देते हैं।</p>
<p>पाकिस्तान का इतिहास और वर्तमान—दोनों ही यह साबित करते हैं कि वह आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में विश्वसनीय भागीदार नहीं हो सकता। Osama bin Laden का पाकिस्तान में छिपा होना और 26/11 Mumbai attacks जैसे हमलों में उसकी भूमिका इस सच्चाई को और मजबूत करते हैं।<br />
जब तक पाकिस्तान अपनी धरती से आतंकवाद की जड़ों को खत्म नहीं करता, तब तक उसका “शांति दूत” बनने का दावा केवल एक दिखावा ही रहेगा। दुनिया को अब यह तय करना होगा कि वह आतंक के साथ समझौता करेगी या वास्तविक शांति के पक्ष में खड़ी होगी।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>नाकारा नौकरशाही के लिए पूरे मध्यप्रदेश में जरूरी है यह सिंधिया कल्चर</title>
		<link>https://shabdshaktinews.in/62928-2/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 07 Apr 2026 08:38:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[Video]]></category>
		<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[सिंधिया कल्चर]]></category>
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					<description><![CDATA[प्रवीण दुबे केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया एक बार फिर चर्चाओं में हैं उनके संसदीय क्षेत्र  का एक वीडियो जिसमें वे कलेक्टर को हड़काते नजर आ रहे हैं खासा वायरल है इसमें वे कलेक्टर से इस कारण खफा दिख रहे हैं क्यों कि कलेक्टर  सिंधिया की जन सुनवाई में आए जनता के आवेदनों को ठीक प्रकार [&#8230;]]]></description>
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<div id="m#msg-a:r-6024723023836228497-header" class="mail-message-header spacer" style="text-align: center;">प्रवीण दुबे</div>
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<div class="clear">
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">
<p>केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया एक बार फिर चर्चाओं में हैं उनके संसदीय क्षेत्र  का एक वीडियो जिसमें वे कलेक्टर को हड़काते नजर आ रहे हैं खासा वायरल है इसमें वे कलेक्टर से इस कारण खफा दिख रहे हैं क्यों कि कलेक्टर  सिंधिया की जन सुनवाई में आए जनता के आवेदनों को ठीक प्रकार से नहीं  रख रहे हैं।</p>
<div dir="auto">जब सिंधिया ने तीखे तेवर दिखाए तब जाकर कलेक्टर साहब ने आवेदनों को ठीक प्रकार से सहेजा।</div>
<div dir="auto">अब जरा सोचिये जब केंद्रीय मंत्री और स्थानीय जनप्रतिनिधि के सामने जनसुनवाई के आवेदनों को सही से नहीं रखा जा रहा है तो आम जनता के साथ मध्यप्रदेश की नौकरशाही क्या स्थिति निर्मित करती होगी ?</div>
<div dir="auto" style="text-align: center;">
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</div>
<div dir="auto">वीडियो news version आपकी आवाज से साभार</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">मध्यप्रदेश के सभी जिलों में प्रत्येक सप्ताह जन सुनवाई होती है चंद मामलों को छोड़ दें तो जन सुनवाई में सामने आई परेशानियों को अधिकारी कर्मचारी गंभीरता से नहीं लेते हैं और जनता परेशान होती रहती है।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">
<p>यही हालात सीएम हेल्पलाइन में दर्ज की गई शिकायतों का भी है कई बार इन शिकायतों का निदान ठीक से नहीं करने और उन्हें गंभीरता से न लेने के कारण कई अधिकारी कर्मचारी सस्पेंड भी किए जाते रहे हैं बावजूद इसके शिकायतों के निराकरण के प्रति इनका रवैया टालम टोल वाला ही नजर आता है।</p>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">नौकरशाही के इन्ही क्रिया कलापों के कारण जहां जन प्रतिनिधियों को जनता का उलाहना सहना पड़ते हैं वहीं सरकार को भी बदनामी झेलना पडती है</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto"> कई बार  कई समस्याओं के समाधान न किए जाने  के  मामलों को जन प्रतिनिधियों की गुटबाजी से जोड़कर देखा जाने लगता है और सरकार की थू-थू होती है जबकि इसके पीछे नौकरशाही का नाकारापन ही मुख्य वजह होती है। जिन कलेक्टर साहब को सिंधिया के गुस्से का सामना करना पड़ा उन्हीं कलेक्टर साहब की एक ओर  नासमझी के कारण सिंधिया की किरकिरी हुई और अब मीडिया  इस मामले को सिंधिया तथा मुख्यमंत्री के बीच अदावत से जोड़कर प्रचारित कर  रहा है</div>
<div dir="auto">लेकिन यहां भी प्रशासनिक अमला पाक साफ बना हुआ है इस मामले में अशोकनगर में उन्हीं विकास कार्यों का फीता पुनः सिंधिया से कटवा दिया गया जिनका पूजन कुछ दिन पूर्व ही मुख्यमंत्री कर चुके थे</div>
<div dir="auto">साफ है प्रशासन सही समय पर चिंता करता तो यह गलती नहीं होती और सरकार में गुटबाजी का आरोप नहीं लगता।</div>
<div dir="auto">समय समय पर ऐसे न जाने कितने मामले सामने आते रहते हैं जहां नौकरशाही की गलतियों के दुष्परिणाम सरकार को झेलना पड़ते है।</div>
<div dir="auto">इस दृष्टि से देखा जाए तो अशोकनगर में सिंधिया ने कलेक्टर साहब को जो गर्मा गर्म सीख दी है वो बिल्कुल उचित है, जनता की तकलीफो के प्रति सजग न रहने वाले अधिकारियों कर्मचारियों को लेकर पूरे मध्यप्रदेश में सिंधिया कल्चर फॉलो करने की जरुरत है।</div>
<div dir="auto">
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</div>
</div>
</div>
</div>
</div>
</div>
</div>
</div>
<div id="m#msg-a:r-6024723023836228497-footer" class="mail-message-footer spacer collapsible"></div>
</div>
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		<title>ऐसी स्मार्टनेस से तो भगवान बचाए इनसे तो भट्ट गंवार अच्छे</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 10 Mar 2026 14:43:23 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Video]]></category>
		<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[स्मार्ट सिटी ग्वालियर आग]]></category>
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					<description><![CDATA[&#160; प्रवीण दुबे ऐसी स्मार्टनेस से भगवान बचाए इसे स्मार्ट नहीं भट्ट गंवार कहा जाए तो ज्यादा उपयुक्त होगा जनाब आप सोच रहे होंगे आखिर हम कहना क्या चाहते हैं ? तो हम आपको बता दें कि यहां हम चर्चा कर रहे हैं राजा महाराजाओं बॉस और दादाओं के शहर ग्वालियर की जिसके बारे में [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<p style="text-align: center;">प्रवीण दुबे</p>
<p>ऐसी स्मार्टनेस से भगवान बचाए इसे स्मार्ट नहीं भट्ट गंवार कहा जाए तो ज्यादा उपयुक्त होगा जनाब आप सोच रहे होंगे आखिर हम कहना क्या चाहते हैं ?</p>
<p>तो हम आपको बता दें कि यहां हम चर्चा कर रहे हैं राजा महाराजाओं बॉस और दादाओं के शहर ग्वालियर की जिसके बारे में स्मार्ट सिटी, स्मार्ट सिटी सुन सुनकर कान पक गए लेकिन कभी भी स्मार्टनेस देखने को नहीं मिली हमेशा ढोल में पोल ही नजर आया।</p>
<p>हाल ही की बात करें तो शहर के महाराज बाड़ा से सटे दौलतगंज के एक रिहायशी मकान में हुए अग्निकांड में जो कुछ देखने को मिला उसने जिला प्रशासन सहित ग्वालियर के स्मार्ट सिटी होने के ढिढोरे की पोल खोलकर रख दी है।</p>
<p>शर्मनाक सिस्टम और उसे प्रदेश सरकार से लेकर नगर सरकार तक प्राप्त एव्रीथिंग राइट के सर्टिफिकेट की सच्चाई धरातल पर कितनी झूठी है यह सबने देख लिया है।</p>
<p>इससे ज्यादा शर्मनाक नाकारापन और क्या होगा कि एक ओर भभकती आग के बीच जिंदगी असहाय हो चीख रही थी तो दूसरी ओर घटना स्थल पर पहुँची फायर ब्रिगेड की गाड़ियों के होजरील (पाइप) में कई छेदों की वजह से पानी का प्रेशर कम हो गया और आग पर समय रहते काबू नहीं पाया जा सका परिणाम मौत जीत गई जिंदगी हार गई।</p>
<p>इतना ही नहीं दमकल की गाड़ियाँ घटनास्थल पर देरी से पहुँचीं और इस विलंब के कारण आग ने विकराल रूप धारण किया और जनहानि हुई।</p>
<p>भीड़ भरे महाराज बाड़ा दौलतगंज क्षेत्र में चोतरफा अतिक्रमण भी फायर ब्रिगेड के समय रहते दुर्घटना स्थल तक पहुंचने में बाधक बना और असहाय पुलिस वाले सीटी बजाते इधर उधर भागते दिखाई दिए।</p>
<p><iframe title="ग्वालियर के प्रमुख व्यावसायिक बाजार दौलतगंज के मकान में लगी आग फायर कर्मियों ने आग पर किया काबू " width="696" height="392" src="https://www.youtube.com/embed/C1Z5XbXqTNQ?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" referrerpolicy="strict-origin-when-cross-origin" allowfullscreen></iframe></p>
<div style="width: 696px;" class="wp-video"><video class="wp-video-shortcode" id="video-62070-2" width="696" height="394" preload="metadata" controls="controls"><source type="video/mp4" src="https://shabdshaktinews.in/wp-content/uploads/2026/03/VID-20260310-WA00241-1.mp4?_=2" /><a href="https://shabdshaktinews.in/wp-content/uploads/2026/03/VID-20260310-WA00241-1.mp4">https://shabdshaktinews.in/wp-content/uploads/2026/03/VID-20260310-WA00241-1.mp4</a></video></div>
<p>सबसे बड़ा सवाल चार पहियों की लग्जरी गाड़ियों में बैठकर दौलतगंज से बाड़ा सराफा होकर रोजाना गुजरने वाले बेशर्म नौकरशाहों को इन बाजारों में पसरा अतिक्रमण दिखाई नहीं देता क्या ?</p>
<p>शुक्र है भगवान का कि अभी तक दानाओली दहीमंडी टोपी बाजार नजरबाग सुभाष मार्केट जैसी सैकड़ों कंजस्टेड स्थानों पर कोई अग्निकांड नहीं हुआ भगवान न करे कभी ऐसा हो,</p>
<p>अफ़सोस की बात है कि पिछले वर्षों में मोचीओली इंदरगंज में हुए भीषण अग्निकाडों जिनमें बड़ी जनहानि हुईं लेकिन हमारे नौकरशाहों और जन प्रतिनिधियों ने कोई सबक नहीं सीखा है, ये लोग पिछली बरसात में सड़कों की दुर्दशा के कारण राष्ट्रीय स्तर पर ग्वालियर की नककटी कराने के बावजूद नहीं सुधरे हैं,</p>
<p>और हमारे प्रभारी मंत्री का तो कहना ही क्या शहर में आग लगे , सड़कें तालाब बने या खंदक उनको तो सिर्फ महाराज से ही मतलब है मीडिया सवाल करे तो भड़क उठते हैं,वर्तमान के विषय पर भी उनका यहां आना तो दूर फोन पर सम्पर्क करना भी मुश्किल है</p>
<p>इन सबकी इन्ही हरकतों के कारण ही ग्वालियर पचास वर्ष से भी पीछे जा चुका है और यहां की जनता का जीवन खतरे में पड़ गया है।</p>
]]></content:encoded>
					
		
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			</item>
		<item>
		<title>संघ को लेकर ग्वालियर में बहुत बड़ा खुलासा कर गए सह सरकार्यवाह डॉ कृष्ण गोपाल</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Feb 2026 05:00:52 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[आरएसएस सह सरकार्यवाह]]></category>
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					<description><![CDATA[प्रवीण दुबे अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूर्ण कर चुके संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्य पद्धति से पूरी दुनिया के सैकड़ो देश न केवल प्रभावित हैं बल्कि उसके ऊपर शोध (रिसर्च ) भी किये जा रहे हैं। इससे जुड़ा एक बड़ा खुलासा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ कृष्ण गोपाल ने ग्वालियर में [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;">प्रवीण दुबे</p>
<p>अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूर्ण कर चुके संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्य पद्धति से पूरी दुनिया के सैकड़ो देश न केवल प्रभावित हैं बल्कि उसके ऊपर शोध (रिसर्च ) भी किये जा रहे हैं। इससे जुड़ा एक बड़ा खुलासा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ कृष्ण गोपाल ने ग्वालियर में अपने एक व्याख्यान के दौरान किया उन्होंने बताया कि संघ की व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण की कार्य कार्यप्रणाली पर आज जर्मनी, रूस सहित  दुनिया के 50 देश शोध कर रहे हैं।</p>
<p>आज जबकि भारत में कांग्रेस, कम्युनिस्ट सहित तमाम मुस्लिम संगठन आरएसएस को साम्प्रदायिक और कट्टरवादी हिन्दू संगठन कहकर बदनाम करने में जुटे दिखाई देते हैं ऐसे समय में किसी अधिकृत मंच से संघ के किसी बड़े पदाधिकारी द्वारा यह बताया जाना कि संघ की व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण की कार्य कार्यप्रणाली पर जर्मनी, रूस सहित  दुनिया के 50 देश शोध कर रहे हैं, उन लोगों और संगठनों के मुंह पर करारा तमाचा कहा जा सकता है जो संघ को बदनाम करने की दृष्टि से उसकी कार्यपद्धति पर अंगुली उठाते हैं।</p>
<p>इस बड़े खुलासे के बाद पूरी तरह से यह सिद्ध हो जाता है कि भारत का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन माना जाने वाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अब केवल देश के भीतर ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी शोध और विश्लेषण का महत्वपूर्ण विषय बन चुका है। संगठन की कार्यपद्धति, शाखा व्यवस्था, नेटवर्क संरचना और प्रवासी भारतीय समाज में इसकी भूमिका को लेकर दुनिया के कई देशों में अकादमिक और स्वतंत्र अध्ययन किए जा रहे हैं और कई देशों में ऐसे रिसर्च पूर्ण भी हो चुके हैं, कई देशों में इससे जुड़े विषयों पर पीएचडी भी कराई जा रही हैं।</p>
<p><strong>वैश्विक नेटवर्क पर सबसे बड़ा अध्ययन</strong></p>
<p>हाल के वर्षों में संघ की कार्यप्रणाली पर सबसे व्यापक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन 2025 में सामने आया। यह शोध फ्रांस के प्रतिष्ठित संस्थान Sciences Po और पत्रिका The Caravan के सहयोग से किया गया। लगभग छह वर्षों तक चले इस अध्ययन में संघ से जुड़े 2500 से अधिक संगठनों के वैश्विक नेटवर्क का विश्लेषण किया गया।<br />
शोधकर्ताओं ने पाया कि विभिन्न देशों में सक्रिय इन संगठनों के बीच नेतृत्व, कार्यक्रमों और संरचनात्मक कार्यशैली में स्पष्ट समानताएँ दिखाई देती हैं। यह अध्ययन RSS के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की पहली व्यापक मैपिंग माना जाता है।</p>
<p>संघ की कार्यपद्धति पर “कितने देशों में शोध हुआ” इसका कोई एक आधिकारिक आंकड़ा तो उपलब्ध नहीं है, क्योंकि कई अध्ययन अलग-अलग स्वरूप में किए गए हैं।<br />
हालांकि शाखाओं और संबद्ध संगठनों की उपस्थिति के आधार पर किए गए प्रमुख विश्लेषणों के अनुसार संघ से प्रेरित गतिविधियों पर कम से कम 39 देशों में शोध और अध्ययन हुए हैं। इन देशों में अमेरिका, ब्रिटेन, नेपाल, अफ्रीकी राष्ट्र और मध्य-पूर्व के कुछ देश प्रमुख हैं। लेकिन अब जबकि संघ ने खुद अधिकृत रूप से 50 देशों में शोध की बात कही है अतः इसे बड़ा प्रमाण माना जा सकता है।<br />
विदेशों में विस्तार का इतिहास<br />
इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के अनुसार संघ से प्रेरित गतिविधियों का प्रारंभिक विस्तार स्वतंत्रता से पहले ही विदेशों तक पहुँच चुका था। शुरुआती चरण में केन्या, म्यांमार (तत्कालीन बर्मा) और मॉरीशस जैसे देशों में प्रवासी भारतीयों के बीच संगठनात्मक गतिविधियों का उल्लेख मिलता है।<br />
किन विषयों पर होता है शोध<br />
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर RSS की कार्यपद्धति पर होने वाले अध्ययन मुख्य रूप से चार प्रमुख विषयों पर केंद्रित रहते हैं—<br />
संगठनात्मक संरचना – शाखा प्रणाली, प्रशिक्षण मॉडल और नेतृत्व पद्धति।<br />
सामाजिक नेटवर्क – शिक्षा, सेवा और सांस्कृतिक गतिविधियों का विस्तार।<br />
प्रवासी भारतीय समाज में भूमिका – विभिन्न देशों में भारतीय समुदायों के बीच संगठन की भागीदारी।<br />
वैश्विक समन्वय – अलग-अलग देशों में कार्यरत संबद्ध संगठनों के बीच तालमेल।<br />
<strong>विश्वविद्यालयों में भी विषय बना RSS</strong><br />
अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के कई विश्वविद्यालयों में संघ की कार्यप्रणाली पर केस स्टडी आधारित शोध भी किए गए हैं। इनमें संगठन की संरचना, विचारधारा और सामाजिक प्रभाव का विश्लेषण प्रमुख रूप से शामिल रहता है।<br />
निष्कर्ष<br />
विशेषज्ञों के अनुसार RSS आज विश्व स्तर पर अध्ययन का एक महत्वपूर्ण सामाजिक-राजनीतिक उदाहरण बन चुका है। इसकी शाखा आधारित संगठन प्रणाली और दीर्घकालिक कार्यपद्धति ने इसे वैश्विक शोध जगत में एक अलग पहचान दिलाई है।<br />
कुल मिलाकर, विभिन्न प्रकार के अध्ययनों को देखते हुए कहा जा सकता है कि संघ की कार्यपद्धति पर शोध विश्व स्तर पर हुआ है, जबकि शाखा उपस्थिति आधारित विश्लेषणों में लगभग 39 देशों को प्रमुख अध्ययन क्षेत्र माना जाता है।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>संघ प्रमुख की तरह मोदी क्यों दूर नहीं करते उम्र और पद के संशय को ?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Feb 2026 04:44:30 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[मोहन भागवत मोदी उम्र]]></category>
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					<description><![CDATA[प्रवीण दुबे भारतीय जनता पार्टी के जन्मदाता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख डॉ मोहन भागवत द्वारा पिछले एक वर्ष के दौरान कम से कम पांच मौकों पर 75 की उम्र पूरी होने अथवा इसी तारतम्य में  दायित्व छोड़ने की बात अब खासा चर्चा का विषय बन गया है। जुलाई 2025 में उन्होंने कहा था, &#8216;जब [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;">प्रवीण दुबे</p>
<p>भारतीय जनता पार्टी के जन्मदाता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख डॉ मोहन भागवत द्वारा पिछले एक वर्ष के दौरान कम से कम पांच मौकों पर 75 की उम्र पूरी होने अथवा इसी <span style="font-family: -apple-system, blinkmacsystemfont, 'segoe ui', roboto, oxygen, ubuntu, 'helvetica neue', arial, sans-serif;">तारतम्य </span>में  दायित्व छोड़ने की बात अब खासा चर्चा का विषय बन गया है।</p>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">जुलाई 2025 में उन्होंने कहा था, &#8216;जब आपको 75 साल पूरे होने पर शॉल ओढ़ाई जाती है, तो समझिए कि दूसरों को मौका देने का समय आ गया है। आपको किनारे होना चाहिए।&#8217; इस बार रविवार को मुंबई में उन्होंने कहा कि संघ ने उनसे उनकी उम्र के बावजूद काम जारी रखने को कहा है, लेकिन पद छोड़ने को कहा जाएगा तो वह तुरंत छोड़ देंगे।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">अब सवाल यही है कि मोहन भागवत बार-बार रिटायरमेंट की बात क्यों कर रहे हैं? क्या यह प्रधानमंत्री की ओर एक वैचारिक संकेत है कि अब रिटायरमेंट पर गंभीरता से सोचने का वक्त आ गया है?</div>
<div dir="auto">सीधे तौर पर इसे प्रधानमंत्री पर निशाना कहना ठीक नहीं लगता और अपने परिवार संगठनों पर  इस तरह से सार्वजनिक मंचों से कोई बात कहना संघ की परम्परा भी नहीं है।  दूसरा यह कि खुद डॉ मोहन भागवत 75 के हो चुके हैं अतः पद छोड़ने या रिटायरमेंट की बात उनपर भी लागू होती है।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto"><span style="font-family: -apple-system, blinkmacsystemfont, segoe ui, roboto, oxygen, ubuntu, helvetica neue, arial, sans-serif;">सवाल वही कि आखिर संघ प्रमुख क्यों 75 की बात बार बार कह रहे हैं?  साफ है कि संघ प्रमुख एक तरफ भारतीय परम्परा को बताना चाहते हैं तो दूसरी ओर संगठन सर्वोपरि है उससे बड़ा कुछ नहीं यह भी समझाना चाहते हैं।</span></div>
<div dir="auto"><span style="font-family: -apple-system, blinkmacsystemfont, segoe ui, roboto, oxygen, ubuntu, helvetica neue, arial, sans-serif;"> </span></div>
<div dir="auto"><span style="font-family: -apple-system, blinkmacsystemfont, segoe ui, roboto, oxygen, ubuntu, helvetica neue, arial, sans-serif;">पहली बात अर्थात भारतीय परम्परा की स्थापना को केंद्र में रखते हुए देखें तो </span>जुलाई 2025 में उन्होंने कहा था, &#8216;जब आपको 75 साल पूरे होने पर शॉल ओढ़ाई जाती है, तो समझिए कि दूसरों को मौका देने का समय आ गया है। आपको किनारे होना चाहिए।&#8217;</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto"><span style="font-family: -apple-system, blinkmacsystemfont, segoe ui, roboto, oxygen, ubuntu, helvetica neue, arial, sans-serif;">दूसरी बात अर्थात संगठन सर्वोपरि को केंद्र में रखते हुए देखें तो </span>इस बार रविवार को मुंबई में उन्होंने खुद की उम्र और पद को लेकर कहा कि संघ ने उनसे उनकी उम्र के बावजूद काम जारी रखने को कहा है, लेकिन पद छोड़ने को कहा जाएगा तो वह तुरंत छोड़ देंगे।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto"><span style="font-family: -apple-system, blinkmacsystemfont, segoe ui, roboto, oxygen, ubuntu, helvetica neue, arial, sans-serif;">साफ है यहां उन्होंने.75 की उम्र पूर्ण करने के बावजूद संगठन की इच्छा पर खुद के सरसंघचालक पद पर बने रहने के असमंजस को साफ किया।</span></div>
<div dir="auto"><span style="font-family: -apple-system, blinkmacsystemfont, segoe ui, roboto, oxygen, ubuntu, helvetica neue, arial, sans-serif;"> </span></div>
<div dir="auto"><span style="font-family: -apple-system, blinkmacsystemfont, segoe ui, roboto, oxygen, ubuntu, helvetica neue, arial, sans-serif;">इस दृष्टि से प्रधानमंत्री मोदी की उम्र 75 होने के बावजूद उनके पद छोड़ने अथवा रिटायरमेंट की बात की जाए तो यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या मोदी संगठन की इच्छा से पद पर हैं ?</span></div>
<div dir="auto"><span style="font-family: -apple-system, blinkmacsystemfont, segoe ui, roboto, oxygen, ubuntu, helvetica neue, arial, sans-serif;"> इस सवाल का जवाब तो अब सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत की तरह से प्रधानमंत्री मोदी को भी देश की जनता को बताना चाहिए।</span>भले रिटायरमेंट का कोई औपचारिक बंधन न हो, लेकिन भारतीय परम्पराओं के अनुसार वैचारिक अपेक्षा तो मौजूद है ही। देश जानना चाहता है प्रधानमंत्री मोदी ने जो निर्णय आडवाणी, जोशी जैसे नेताओं को लेकर लिए उनके प्रति वे खुद अपने लिए  कितनी साफगोई रखते हैं।इस बारे में जितना जल्दी वे संशय दूर करेंगे उतना ही भाजपा के लिए बेहतर होगा।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto"></div>
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<div dir="auto">
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<div>
<div></div>
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</div>
</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto"></div>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>यह बेहद शर्मनाक और अक्षम्य कृत्य है जिसे कभी माफ नहीं किया जाना चाहिए</title>
		<link>https://shabdshaktinews.in/%e0%a4%af%e0%a4%b9-%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%b9%e0%a4%a6-%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%95-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%85%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%ae%e0%a5%8d/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 05 Feb 2026 07:17:53 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[सैन्य प्रमुख पुस्तक विवाद]]></category>
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					<description><![CDATA[प्रवीण दुबे देश के पूर्व सैन्य प्रमुख जनरल नरवाणे की पुस्तक फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी. पर संसद में विवाद की स्थिति बनी हुई है। इस किताब में प्रकाशित सामग्री में क्या सच है और क्या झूठ यह तो जांच का विषय है लेकिन एक पूर्व सेना अध्यक्ष द्वारा अपनी सेवानिवृति के बाद देश की सुरक्षा [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: center;"><strong>प्रवीण दुबे</strong></h3>
<h3>
<strong>देश के पूर्व सैन्य प्रमुख जनरल नरवाणे की पुस्तक फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी. पर संसद में विवाद की स्थिति बनी हुई है। इस किताब में प्रकाशित सामग्री में क्या सच है और क्या झूठ यह तो जांच का विषय है लेकिन एक पूर्व सेना अध्यक्ष द्वारा अपनी सेवानिवृति के बाद देश की सुरक्षा से जुड़े विषय को सरकार की रोक के बावजूद किसी पुस्तक में कोड करना और सरकार की रोक के बावजूद उसे सार्वजनिक करना बेहद शर्मनाक और अक्षम्य कृत्य कहा जा सकता है।</strong></h3>
<h3><strong>इस किताब के प्रकाशक पेंग्विन रेंडम हाउस हैं. ये किताब 2023-24 में प्रकाशित होने वाली थी, लेकिन ये अब तक अप्रकाशित है।अप्रैल 2024 में प्रकाशित होने वाली इस पुस्तक के कुछ अंश समाचार एजेंसी पीटीआई द्वारा दिसंबर 2023 में प्रकाशित किए गए थे जो कि राष्ट्रहित को प्रभावित करने वाले थे संवेदनशील खुलासों के कारण रक्षा मंत्रालय और सेना हेडक्वार्टर ने किताब की प्री-पब्लिकेशन रिव्यू कराई जिस पर अभी तक क्लियरेंस नहीं मिला है. अक्टूबर 2025 में जनरल नरवाणे ने खुद कहा, मेरा काम किताब लिखना था. अब गेंद पब्लिशर और रक्षा मंत्रालय के पाले में है।</strong></h3>
<h3><strong>अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि रोक के बावजूद सेना प्रमुख की पुस्तक कैसे प्रकाशित हुई?</strong></h3>
<h3><strong>सेना के नियमों में रिटायर्ड अधिकारियों के लिए स्पष्ट नियम नहीं लिखे हैं. लेकिन व्यवहार में लेफ्टिनेंट जनरल और ऊपर के रैंक के अफसरों को किताब के लिए रक्षा मंत्रालय और सेना मुख्यालय से प्री-पब्लिकेशन सिक्योरिटी क्लियरेंस लेना पड़ता है. अगर किताब में संवेदनशील ऑपरेशन, चाइना, पाकिस्तान संबंधी डिटेल, नीति-निर्माण या आंतरिक चर्चा हो तो रिव्यू करना अनिवार्य है। आश्चर्यजनक है कि इतने बड़े पद पर आसीन रहे एक एक सैन्य अधिकारी सरकार को (प्रधानमंत्री) को नीचा दिखाने देश की सुरक्षा जुड़े आंतरिक विषय को सार्वजनिक करने में तनिक भी नहीं हिचकिचाये इस मामले में जम्मू-कश्मीर के पूर्व डीजीपी एस.पी. वैद का बयान बेहद ध्यान देने योग्य है उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जनरल नरवणे को नसीहत देते हुए कहा कि एक पूर्व सेना प्रमुख को ज्यादा समझदारी दिखानी चाहिए थी. उन्होंने लिखा कि सेना में रहते हुए जो संवेदनशील बातें पता चलती हैं, वे अक्सर कब्र के साथ ही दफन हो जानी चाहिए. अगर हर कोई ऐसी बातों को सार्वजनिक करने लगे तो सरकारें मुश्किल में पड़ सकती हैं</strong></h3>
<h3></h3>
<h3></h3>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>ताली बजाने से पहले जान लें फटाफट क्रिकेट का काला सच</title>
		<link>https://shabdshaktinews.in/%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%82/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 04 Feb 2026 06:19:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[T 20 विश्वकप]]></category>
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					<description><![CDATA[क्रिकेट की आड़ मेंओद्योगिक घरानों,बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के विज्ञापनों अनुबंधों का    फलता फूलता काला साम्राज्य प्रवीण दुबे &#160; भारत ही नहीं अब पूरी दुनियां की नजरें टिकी हैं टी20 विश्वकप 2026 पर, 8 जनवरी से शुरु होने जा रहे फटाफट क्रिकेट के इस सबसे बड़े आयोजन की मेज़बानी भारत और श्रीलंका संयुक्त रूप से करने [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: left;"><strong><span style="color: #800000;">क्रिकेट की आड़ मेंओद्योगिक घरानों,बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के विज्ञापनों अनुबंधों का    फलता फूलता काला साम्राज्य</span></strong></h3>
<p style="text-align: center;"><strong>प्रवीण दुबे</strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<p>भारत ही नहीं अब पूरी दुनियां की नजरें टिकी हैं टी20 विश्वकप 2026 पर, 8 जनवरी से शुरु होने जा रहे फटाफट क्रिकेट के इस सबसे बड़े आयोजन की मेज़बानी भारत और श्रीलंका संयुक्त रूप से करने जा रहे हैं यही वजह है कि पूरे भारतीय उप महाद्वीप में इसकी चर्चाएं हैं। बड़ा सवाल है कि क्रिकेट की तुलना में अन्य खेलों को इतना प्रोत्साहन क्यों नहीं मिलता ? ओलम्पिक सहित अन्य स्पर्धाओं में शानदार रिकॉर्ड के बावजूद हमारे राष्ट्रीय खेल हॉकी के विश्वकप से लेकर बड़े अंतर्राष्ट्रीय मुकाबलों की भी न तो मीडिया में चर्चा होती है न उस पर देशवासी भी कोई ज्यादा रूचि नहीं दिखाते?</p>
<p>इन सारे सवालों का एकमात्र जवाब है कि क्रिकेट अब खाली खेल नहीं अरबों रूपये का आर्थिक कारोबार बन चुका है जहां खिलाड़ियों की खरीद फरोक्त से लेकर,सट्टेबाजी,मैच फ़िक्सिंग और बड़े बड़े ओद्योगिक घरानों की सहभगिता तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के विज्ञापनों अनुबंधों का काला साम्राज्य फलफूल रहा है।</p>
<p>एक खेल की दृष्टि से क्या यह सब सकारात्मक कहा जा सकता है?<br />
आईसीसी टी20 विश्वकप आज दुनिया के सबसे बड़े खेल आयोजनों में से एक बन चुका है लेकिन इस इसके आड़ में सीमा से परे किए जा रहे व्यापार के साथ कई नकारात्मक असर भी जुड़े हैं।</p>
<p>सर्वविदित है कि आईसीसी और बीसीसीसीआई दुनियां की सबसे धनवान संस्थाएं हैं क्रिकेट के सहारे अरबों डॉलर की ‘आर्थिक साम्राज्य इन्होने खड़ा कर लिया है लेकिन असली मुनाफा किसका?</p>
<p>टी20 विश्वकप 2024 की बात करें तो स्थानीय स्तर पर टूर्नामेंट का आर्थिक मुनाफा लगभग $1.66 बिलियन लगभग ₹14,000+ करोड़ दर्ज किया गया था</p>
<p>दूसरी ओर, ICC ने 2024 टी20 विश्वकप से लगभग $691 मिलियन अर्थात करीब ₹5,800+ करोड़ की आमदनी की रिपोर्ट दी थी।</p>
<p>यह भी सामने आया कि इस “बिज़नेस” का सबसे अधिक लाभ मीडिया अधिकार और स्पॉन्सरशिप करने वाली बड़ी बड़ी कंपनियों को गया, न कि छोटे हितधारकों को।<br />
यह भी सामने आ चुका है कि ICC के मुनाफे का सबसे बड़ा हिस्सा भारत जैसे बड़े बाजारों से आता है,<br />
इसका मतलब पूरे अरबों का ‘सफल आयोजन’ केवल क्रिकेट बोर्ड और मीडिया कंपनियों के लिए मुनाफे का स्त्रोत है, जो विश्व भर में टी20 ब्रांड को बेचते हैं।</p>
<p><strong>खेल नहीं, विज्ञापन का मंच बनी क्रिकेट</strong></p>
<p>टी20 विश्वकप में आज जो सबसे बड़ा पैसा कमाया जाता है, वह मीडिया राइट्स (टेलीविजन/डिजिटल) स्पॉन्सरशिप पैकेज कॉर्पोरेट प्रमोशन और विज्ञापन स्लॉट से आता है। 2024 के आँकड़ों के अनुसार स्पॉन्सरशिप राजस्व लगभग $61 मिलियन तक गया, जबकि मीडिया के अधिकारों की कुल संख्या और मूल्य इससे कहीं ऊपर बताया गया है।यानी साफ है अब क्रिकेट खेल से कहीं अधिक “विज्ञापन और ब्रांडिंग प्लेटफ़ॉर्म” बन चुका है।</p>
<p><strong>जनता से ही कमाई और जनता को ही नहीं देखने दिया जाता मैच</strong></p>
<p>“विज्ञापन और ब्रांडिंग से इस करोड़ों की कमाई के बावजूद डिजिटल,टीवी और अन्य मीडिया प्लेटफार्म पर मैच देखने के लिए जनता से पैसे वसूले जाते हैं स्थिति यहां तक जा पहुंची है कि किसी भी देश के सरकारी टेलीविज़न जैसे कि भारत में दूरदर्शन को भी मैच का सीधा प्रसारण करने का अधिकार नहीं होता इसके लिए उसको पैकेज का पैसा भरना जरूरी होता है साफ है जिन क्रिकेट प्रेमियों के पास पैसा नहीं वे डिजिटल या दूरदर्शन पर भी मैच नहीं देख पाते।</p>
<p><strong>स्थानीय अर्थव्यवस्था को फायदे का सफेद झूठ</strong></p>
<p>कहा जाता है कि इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को फायदा पहुँचता है पर कड़वा सच है कि इससे स्थानीय स्तर पर दीर्घकालिक बोझ बढ़ता है होस्ट शहरों में होटल, ट्रैवल और खाद्य खर्च बढ़ता है<br />
इन खर्चों को अक्सर महंगे टिकट दाम और महंगी सेवाएँ बना देते हैं, जिससे स्थानीय लोग महंगाई झेलते हैं। सबसे बड़ी बात बड़े कॉर्पोरेट पैकेज स्थानीय छोटी दुकानों को वह हिस्सा नहीं देते जो प्रायोजकों को मिलता है। अतः स्थायी विकास में निवेश अक्सर कम रह जाता है, जबकि आयोजन खर्च अधिक हो जाता है।</p>
<p><strong>खेल से पुरस्कार कम कारोबार से बहुत अधिक मुनाफा</strong></p>
<p>भले ही आयोजन का कुल व्यापार अरबों का हो रहा है, खिलाड़ियों को मिलने वाला वास्तविक पुरस्कार राशि अपेक्षाकृत कम है।<br />
उदाहरण के लिए, विश्व स्तर के टी20 विश्वकप में टीम को मिलने वाली प्राइज मनी सैकड़ों करोड़ रुपये तक नहीं पहुँचती इसका एक हिस्सा लाखों/करीब $1.6 मिलियन तक ही होता है। मतलब<br />
खिलाड़ी और देश कुल आर्थिक कारोबार के लिए कम हिस्सेदारी पाते हैं, जबकि बाकी का पैसा बड़े मध्यस्थ ICC, मीडिया कंपनियां, कॉर्पोरेट प्रायोजक ले जाते हैं।</p>
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		<title>शिक्षा सुधार से अधिक वर्ग संघर्ष की आशंका को जन्म देता यूजीसी  का ये अध्यादेश</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 22 Jan 2026 15:31:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
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					<description><![CDATA[प्रवीण दुबे हाल ही में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग UGC द्वारा लागू किया गया “Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026” के कारण पूरे देश में बेचैनी दिखाई दे रही है। विशेषकर सवर्ण समाज से जुड़े संगठन और व्यक्ति यहां तक की कई शिक्षाविद इससे नाराज दिखाई दे रहे हैं कई प्रदेशों में इसके [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div dir="auto" style="text-align: center;"><strong>प्रवीण दुबे</strong></div>
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<div dir="auto">हाल ही में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग UGC द्वारा लागू किया गया “Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026” के कारण पूरे देश में बेचैनी दिखाई दे रही है। विशेषकर सवर्ण समाज से जुड़े संगठन और व्यक्ति यहां तक की कई शिक्षाविद इससे नाराज दिखाई दे रहे हैं कई प्रदेशों में इसके खिलाफ प्रदर्शन की भी खबरें आ रहीं हैं आशंका यह भी व्यक्त की जा रही है कि यदि सरकार ने इस तरफ गंभीरता नहीं दिखाई तो बड़े पैमाने पर प्रदर्शन आंदोलन के हालात पैदा हो सकते हैं। चिंतनीय और चौंकाने वाली बात यह है कि यह अध्यादेश एक ऐसे समय में आया है जब भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था पहले ही शैक्षणिक गुणवत्ता, स्वायत्तता और राजनीतिक हस्तक्षेप जैसे प्रश्नों से जूझ रही है और जो तत्व इसका लाभ उठाना चाहते हैं उनके हाथ एक और हथियार आ गया है।</div>
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<div dir="auto">इस सारे घटनाक्रम के बीच  यूजीसी और इसका समर्थन करने वालों का मत भी जानना बहुत आवश्यक है इनका  दावा है कि यह अध्यादेश उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव को समाप्त करने और समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए लाया गया है।</div>
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<div dir="auto">लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि क्या केवल कह देने मात्र से इसे सही ठहरा दिया जाना उचित होगा ?</div>
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<div dir="auto"> प्रथम दृष्टया  इसके प्रावधान कई गंभीर सवाल भी खड़े करते हैं। देशभर से जिस प्रकार की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं उन्हें देखकर यह कहा जा सकता है कि समाज का सवर्ण समाज और उससे जुड़े तमाम संगठन बेहद उद्वेलित हैं ऐसे में यह जानना बेहद आवश्यक है कि Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 में आखिर है क्या?</div>
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<div dir="auto">अध्यादेश के मुख्य प्रावधान</div>
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<div dir="auto">नए यूजीसी अध्यादेश के अंतर्गत</div>
<div dir="auto">हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में Equal Opportunity Centre (EOC) स्थापित करना अनिवार्य किया गया है।इसके अंतर्गत Equity Committee का गठन होगा जिसमें सामाजिक वर्गों का प्रतिनिधित्व तय किया गया है।</div>
<div dir="auto">छात्र, शिक्षक और कर्मचारी किसी भी प्रकार के भेदभाव की शिकायत कर सकते हैं।</div>
<div dir="auto">नियमों का पालन न करने पर संस्थान की मान्यता, फंडिंग और डिग्री प्रदान करने का अधिकार छीना जा सकता है।</div>
<div dir="auto">काग़ज़ पर ये प्रावधान आकर्षक लगते हैं, लेकिन व्यवहार में इनके प्रभाव कहीं अधिक जटिल हैं।</div>
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<div dir="auto">सबसे बड़ा सवाल विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता</div>
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<div dir="auto">भारतीय विश्वविद्यालयों की आत्मा उनकी शैक्षणिक स्वतंत्रता है।</div>
<div dir="auto">यूजीसी का यह अध्यादेश प्रशासनिक नियंत्रण को इतना विस्तृत कर देता है कि</div>
<div dir="auto">आंतरिक शैक्षणिक निर्णयों पर बाहरी हस्तक्षेप बढ़ सकता है शिक्षक और प्रशासनिक अधिकारी निर्णय लेने से पहले डरेंगे हर अनुशासनात्मक या अकादमिक मतभेद को “भेदभाव” की श्रेणी में डालने का ख़तरा रहेगा</div>
<div dir="auto">यह अध्यादेश शिक्षा संस्थानों को ज्ञान के केंद्र से अधिक निगरानी तंत्र में बदलने की आशंका पैदा करता है।</div>
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<div dir="auto">क्या हर असहमति भेदभाव है?</div>
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<div dir="auto">आलोचकों का तर्क है कि उच्च शिक्षा में मूल्यांकन, चयन और शोध स्वाभाविक रूप से प्रतिस्पर्धी प्रक्रियाएँ हैं</div>
<div dir="auto">यदि हर असफलता या असहमति को सामाजिक भेदभाव से जोड़ दिया गया, तो मेधा (Merit) की अवधारणा कमजोर होगी</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto"> इस अध्यादेश के बाद शिक्षा संस्थानों का वातावरण आपसी सदभावना समरसता को खतरा भी बढ़ गया है कई बड़े शिक्षाविद तो यहां तक कह रहे हैं कि इस अध्यादेश के कारण शिक्षक–छात्र संबंध अविश्वास के वातावरण में बदल सकते हैं</div>
<div dir="auto">यह अध्यादेश कहीं न कहीं डर का वातावरण पैदा कर सकता है, जहाँ निर्णय योग्यता से अधिक कानूनी आशंकाओं से प्रभावित होंगे।</div>
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<div dir="auto">राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव</div>
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<div dir="auto">कुछ सामाजिक संगठनों का मानना है कि यह अध्यादेश शिक्षा के क्षेत्र में राजनीतिक विचारधारा को प्रवेश देने का माध्यम बन सकता है जैसा कि पहले से ही JNU जैसे संस्थानों में दिखाई देता रहा है लेकिन अभी कहीं न कहीं उनपर लगाम का रास्ता भी बना हुआ हैं लेकिन इस तरह के अध्यादेश के बाद विदेशों से संचालित देश विरोधी ताकतों को सुनियोजित तरीके से वातावरण बिगाड़ने का मौका मिलेगा,यह सामाजिक संतुलन की जगह वर्गीय विभाजन को और गहरा कर सकता है,सामान्य वर्ग के छात्रों में असुरक्षा की भावना बढ़ा सकता है</div>
<div dir="auto">राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में इसका विरोध इस बात का संकेत है कि यह नियम सर्वसम्मति से स्वीकार्य नहीं है।</div>
<div dir="auto">यह सही है कुछ संस्थानों में भेदभाव की घटनाएँ हुई हैं वंचित वर्गों को संरक्षण मिलना चाहिए लेकिन सवाल यह है कि क्या कठोर केंद्रीय नियंत्रण ही इसका समाधान है? या फिर संस्थागत सुधार, संवाद और संवेदनशील प्रशासन अधिक प्रभावी रास्ता हो सकता था?  लिखने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि इस अध्यादेश के बाद विश्वविद्यालयों पर नौकरशाही का दबाव</div>
<div dir="auto">शिक्षकों की स्वतंत्र सोच पर अंकुश</div>
<div dir="auto">नियमों के दुरुपयोग की संभावना बढ़ जाएंगी</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">यूजीसी का नया अध्यादेश 2026 अपने उद्देश्य में सामाजिक न्याय की बात करता है, लेकिन अपने स्वरूप में केंद्रीकरण और नियंत्रण का संकेत देता है।</div>
<div dir="auto">यदि इसे बिना संतुलन और विवेक के लागू किया गया  तो यह शिक्षा सुधार से अधिक शिक्षा पर नियंत्रण का औज़ार बन सकता है। समानता ज़रूरी है, लेकिन स्वतंत्रता की कीमत पर नहीं,भारत की उच्च शिक्षा को ऐसे नियमों की आवश्यकता है जो न्याय और मेधा दोनों को साथ लेकर चलें, न कि उन्हें आमने-सामने खड़ा करें।</div>
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