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	<title>ज्योतिरादित्य सिंधिया &#8211; Shabd Shakti News</title>
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	<description>Every News Speaks</description>
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		<title>ग्वालियर में विकास की दौड़ या वर्चस्व की जंग?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 21 Sep 2026 16:13:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[त्वरित टिप्पणी]]></category>
		<category><![CDATA[ज्योतिरादित्य सिंधिया]]></category>
		<category><![CDATA[वर्चस्व की लड़ाई]]></category>
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					<description><![CDATA[प्रवीण दुबे सिंधिया के साथ नहीं दिखे तोमर-भारत सिंह, फिर उठे संगठन पर सवाल; भाजपा की अंदरूनी सियासत सड़कों तक आने लगी? &#160; ग्वालियर21 सितंबर 2026/ग्वालियर के विकास की तस्वीर बदलने वाली बड़ी-बड़ी परियोजनाओं पर काम चल रहा है, लेकिन इन परियोजनाओं के साथ शहर की राजनीति की एक दूसरी तस्वीर भी दिखाई देने लगी [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;">प्रवीण दुबे</p>
<p><strong><span style="color: #993300;">सिंधिया के साथ नहीं दिखे तोमर-भारत सिंह, फिर उठे संगठन पर सवाल; भाजपा की अंदरूनी सियासत सड़कों तक आने लगी?</span></strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<p>ग्वालियर21 सितंबर 2026/ग्वालियर के विकास की तस्वीर बदलने वाली बड़ी-बड़ी परियोजनाओं पर काम चल रहा है, लेकिन इन परियोजनाओं के साथ शहर की राजनीति की एक दूसरी तस्वीर भी दिखाई देने लगी है। सवाल यह है कि क्या ग्वालियर के विकास की राजनीति अलग-अलग राजनीतिक खेमों में बंटती जा रही है?</p>
<p>इसे ग्वालियर का दुर्भाग्य कहा जाए या राजनीतिक संयोग, शहर में जब केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया विकास कार्यों का निरीक्षण करने निकलते हैं तो उनके साथ भाजपा के वरिष्ठ नेता नरेंद्र सिंह तोमर और स्थानीय सांसद भारत सिंह कुशवाह दिखाई नहीं देते। दूसरी ओर, जब स्थानीय सांसद भारत सिंह अपने स्तर पर क्षेत्रीय मुद्दों और विकास कार्यों को लेकर सक्रिय नजर आते हैं, तब सिंधिया अथवा उनके निकट माने जाने वाले मंत्री-विधायकों की मौजूदगी उसी अनुपात में नजर नहीं आती।</p>
<p>यह महज संयोग है या इसके पीछे ग्वालियर भाजपा की अंदरूनी राजनीति का कोई बड़ा समीकरण काम कर रहा है—यह सवाल अब राजनीतिक गलियारों के साथ-साथ आम शहरवासियों के बीच भी चर्चा का विषय बन रहा है।</p>
<p><strong>आज फिर दिखा अलग-अलग चलने का दृश्य</strong></p>
<p>सोमवार को केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ग्वालियर में दिनभर विभिन्न विकास परियोजनाओं के निरीक्षण और कार्यक्रमों में सक्रिय नजर आए। उन्होंने महाराज बाड़े पर निर्माणाधीन मल्टीलेवल पार्किंग का निरीक्षण किया। बेसमेंट में लगातार जमा हो रहे पानी को लेकर उन्होंने प्रशासन और निर्माण कंपनी से पूरी स्टडी के बाद ही निर्णय लेने की बात कही। पार्किंग को फरवरी-मार्च तक पूरा करने का लक्ष्य बताया गया है।</p>
<p>इसके बाद सिंधिया ने ग्वालियर की महत्वपूर्ण चंबल-कोतवाल जल परियोजना का भी निरीक्षण किया। परियोजना के विभिन्न हिस्सों की प्रगति देखने के दौरान वे निर्माणाधीन पाइपलाइन के अंदर तक पहुंचे और काम की गुणवत्ता तथा मजबूती का जायजा लिया।</p>
<p>एलिवेटेड रोड के दूसरे चरण का निरीक्षण भी उनके कार्यक्रम का हिस्सा रहा। इस परियोजना को ग्वालियर के यातायात दबाव को कम करने वाली महत्वपूर्ण परियोजना के रूप में देखा जा रहा है।</p>
<p>लेकिन इतने बड़े विकास कार्यक्रमों के बीच राजनीतिक रूप से जो बात चर्चा में रही, वह थी—ग्वालियर की राजनीति के दूसरे बड़े चेहरों की गैरमौजूदगी।</p>
<p><strong>सवाल सिर्फ मौजूदगी का नहीं, संदेश का भी है</strong></p>
<p>राजनीति में किसी नेता का किसी कार्यक्रम में मौजूद होना या नहीं होना अपने आप में किसी गुटबाजी का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। कार्यक्रमों की व्यस्तता, प्रशासनिक प्रोटोकॉल, विभागीय जिम्मेदारियां और अलग-अलग राजनीतिक कार्यक्रम भी इसके कारण हो सकते हैं।</p>
<p>लेकिन जब यही स्थिति बार-बार अलग-अलग मौकों पर दिखाई देती है तो सवाल स्वाभाविक रूप से उठते हैं।</p>
<p>ग्वालियर में भाजपा के पास एक साथ कई बड़े राजनीतिक चेहरे हैं—केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और स्थानीय सांसद भारत सिंह कुशवाह। इसके अलावा राज्य सरकार और संगठन में भी ग्वालियर से जुड़े कई प्रभावशाली नेता हैं।</p>
<p>ऐसे में आम शहरवासी यह जानना चाहता है कि जब शहर के भविष्य से जुड़ी बड़ी परियोजनाओं की समीक्षा हो रही हो, तब क्या इन सभी नेताओं की सामूहिक मौजूदगी शहर के लिए बेहतर संदेश नहीं दे सकती?</p>
<p><strong>क्या ग्वालियर भाजपा में चल रही है वर्चस्व की राजनीति?</strong></p>
<p>ग्वालियर की राजनीति में अलग-अलग नेताओं के प्रभाव क्षेत्र और समर्थक समूहों की चर्चा लंबे समय से होती रही है। लेकिन किसी नेता के समर्थकों की मौजूदगी अथवा गैरमौजूदगी के आधार पर अंदरूनी मतभेद को निश्चित तथ्य मान लेना उचित नहीं होगा।</p>
<p>फिर भी मौजूदा घटनाक्रम ने एक पुराना सवाल फिर सामने ला दिया है—क्या ग्वालियर भाजपा में राजनीतिक वर्चस्व को लेकर अलग-अलग ध्रुव सक्रिय हैं?</p>
<p>यदि ऐसा है तो इसका सबसे बड़ा नुकसान राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि शहर के विकास से जुड़े समन्वय का हो सकता है।</p>
<p>क्योंकि विकास परियोजनाएं किसी एक नेता की निजी उपलब्धि नहीं होतीं। उनमें केंद्र सरकार, राज्य सरकार, स्थानीय प्रशासन, नगर निगम, जनप्रतिनिधियों और संगठन—सभी की भूमिका होती है।</p>
<p><strong>भाजपा जैसे अनुशासित संगठन के सामने बड़ा सवाल</strong></p>
<p>भाजपा स्वयं को अनुशासित और संगठन आधारित राजनीतिक दल के रूप में प्रस्तुत करती रही है। ऐसे में ग्वालियर जैसे महत्वपूर्ण राजनीतिक केंद्र में यदि बड़े नेताओं के बीच दूरी का संदेश लगातार जनता तक पहुंचता है तो यह संगठन के लिए भी सवाल खड़ा करता है।</p>
<p><strong>क्या संगठन ने सभी नेताओं को एक मंच पर लाने की पर्याप्त कोशिश नहीं की?</strong></p>
<p>क्या संगठन के स्तर पर कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है जिसके माध्यम से ग्वालियर के विकास से जुड़े महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में सभी प्रमुख जनप्रतिनिधियों के बीच बेहतर समन्वय बनाया जा सके?</p>
<p>या फिर ऐसा कोई गंभीर मतभेद है ही नहीं और जो कुछ दिखाई दे रहा है वह अलग-अलग कार्यक्रमों की सामान्य राजनीतिक व्यस्तता मात्र है?</p>
<p>इन सवालों का जवाब भाजपा संगठन के वरिष्ठ नेताओं को देना चाहिए, क्योंकि राजनीतिक दलों के भीतर होने वाली खींचतान यदि जनता को दिखाई देने लगे तो उसका असर संगठन की छवि पर भी पड़ता है।</p>
<p><strong>विकास के मुद्दे पर एक साथ क्यों नहीं दिखते बड़े नेता?</strong></p>
<p>ग्वालियर आज कई बड़ी परियोजनाओं के दौर से गुजर रहा है। चंबल-कोतवाल जल परियोजना, एलिवेटेड रोड, महाराज बाड़े की मल्टीलेवल पार्किंग और प्रस्तावित टेलीकॉम मैन्युफैक्चरिंग जोन जैसी योजनाएं शहर के भविष्य से सीधे जुड़ी हैं। टेलीकॉम मैन्युफैक्चरिंग जोन के लिए लगभग 5,500 करोड़ रुपये के निवेश और 18 हजार से अधिक प्रत्यक्ष रोजगार की संभावना बताई गई है।</p>
<p>ऐसे समय में ग्वालियर के सभी बड़े भाजपा नेताओं को एक साथ खड़े होकर यह संदेश देना चाहिए कि राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन शहर का विकास सर्वोपरि है।</p>
<p>क्योंकि जनता यह नहीं देखना चाहती कि किस नेता का प्रभाव कितना है। वह यह देखना चाहती है कि सड़क कब बनेगी, पानी की समस्या कब दूर होगी, यातायात कब सुधरेगा और शहर को रोजगार के नए अवसर कब मिलेंगे।</p>
<p><strong>सिंधिया की सक्रियता और उससे पैदा हुआ राजनीतिक सवाल</strong></p>
<p>पिछले दो दिनों में सिंधिया की ग्वालियर क्षेत्र में सक्रियता स्पष्ट रूप से दिखाई दी है। उन्होंने टेलीकॉम मैन्युफैक्चरिंग जोन से लेकर चंबल-कोतवाल जल परियोजना और एलिवेटेड रोड तक विभिन्न परियोजनाओं का निरीक्षण किया है।</p>
<p>लेकिन जितनी चर्चा इन परियोजनाओं की हो रही है, उतनी ही चर्चा इस बात की भी हो रही है कि इन मौकों पर ग्वालियर भाजपा के सभी बड़े चेहरे एक साथ क्यों नजर नहीं आते।</p>
<p>यही वह बिंदु है जहां विकास और राजनीति एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई देते हैं।</p>
<p><strong>क्या संगठन हस्तक्षेप करेगा?</strong></p>
<p>सबसे बड़ा सवाल अब भाजपा संगठन की भूमिका को लेकर है।</p>
<p>यदि वास्तव में नेताओं के बीच किसी प्रकार की राजनीतिक दूरी है तो उसे समय रहते दूर करना संगठन की जिम्मेदारी है। और यदि कोई मतभेद नहीं है तो संगठन और नेताओं को मिलकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जनता के बीच ऐसा संदेश न जाए कि ग्वालियर भाजपा अलग-अलग खेमों में बंटी हुई है।</p>
<p>क्योंकि शहर में यह धारणा मजबूत होना किसी के लिए भी लाभदायक नहीं होगी।</p>
<p>ग्वालियर को ऐसे नेताओं की जरूरत है जो विकास के सवाल पर एक-दूसरे के साथ खड़े दिखाई दें—चाहे राजनीतिक मंच अलग हों।</p>
<p>आज जरूरत इस बात की है कि केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, सांसद भारत सिंह कुशवाह और ग्वालियर से जुड़े अन्य भाजपा नेता व्यक्तिगत या राजनीतिक समीकरणों से ऊपर उठकर शहर के विकास के मुद्दों पर एक साझा मंच तैयार करें।</p>
<p>आखिरकार जनता ने नेताओं को आपस में राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई देखने के लिए नहीं, बल्कि ग्वालियर के विकास के लिए चुना है।</p>
<p>सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि कौन किसके साथ खड़ा है। बड़ा सवाल यह है कि ग्वालियर के लिए ये सभी बड़े नेता कब एक साथ खड़े दिखाई देंगे?<br />
Praveen dubey @shabd shakti news. in</p>
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		<title>महाआर्यमन ने अमेरिका से पूरा किया  ग्रेजुएशन, इसी वजह से चुनाव बीच में छोड़ चले गए थे सिंधिया</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 20 May 2019 08:04:09 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[ज्योतिरादित्य सिंधिया]]></category>
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					<description><![CDATA[भोपाल&#124; देश में लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण के लिए मतदान समाप्त होने के साथ ही प्रत्याशियों का भविष्य EVM में कैद हो गया है&#124; 23 मई को परिणाम आएंगे। इससे पहले एग्जिट पोल के नतीजों की चर्चा जोरो पर है और बीजेपी और कांग्रेस अपने अपने दावे कर रही है&#124; अंतिम चरण में जमकर [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>भोपाल| देश में लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण के लिए मतदान समाप्त होने के साथ ही प्रत्याशियों का भविष्य EVM में कैद हो गया है| 23 मई को परिणाम आएंगे। इससे पहले एग्जिट पोल के नतीजों की चर्चा जोरो पर है और बीजेपी और कांग्रेस अपने अपने दावे कर रही है| अंतिम चरण में जमकर घमासान देखने को मिला| लेकिन इस बीच मध्य प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पार्टी महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया का चुनावी मैदान से गायब होना सुर्खिया बना| सिंधिया अमेरिका यात्रा पर हैं और बेटे महाआर्यमन सिंधिया के दीक्षांत समारोह शामिल हुए| इस दौरान सिंधिया ने ट्वीट कर अपने विदेश जाने की जानकारी शेयर की है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>सिंधिया ने ट्वीट कर लिखा- &#8216;मुझे बहुत हर्ष है की मेरे बेटे महाआर्यमन सिंधिया का आज &#8216;येल यूनिवर्सिटी&#8217; से दीक्षांत समारोह सम्पन्न हुआ। ये हमारे परिवार के लिए एक बहुत अहम दिन है। आज के दिन तुम्हारे साथ होना मेरे लिए गर्व की बात है&#8217;।  दरअसल, सिंधिया के बेटे महाआर्यमन सिंधिया ने येल यूनिवर्सिटी से अपना ग्रेजुएशन पूरा किया है। सिंधिया अपनी पत्नी प्रियदर्शनी राजे सिंधिया के साथ बेटे के दीक्षांत समारोह में शामिल होने के लिए अमेरिका गए हुए थे</p>
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		<title>सिंधिया के लिए उल्टा पड़ा दांव हाथी हुआ बेलगाम</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 30 Apr 2019 16:31:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[ज्योतिरादित्य सिंधिया]]></category>
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					<description><![CDATA[अशोकनगर &#124; गुना लोकसभा सीट से बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी लोकेंद्र सिंह धाकड़ के द्वारा कांग्रेस का दामन थामने के बाद बसपा ने नई रणनीति के तहत इस सीट से बिना प्रत्याशी के ही चुनाव लड़ने  की घोषणा कर दी है। बसपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रामसिंह गौतम ने अशोकनगर में तीनों जिलों के कार्यकर्ताओं [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>अशोकनगर | गुना लोकसभा सीट से बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी लोकेंद्र सिंह धाकड़ के द्वारा कांग्रेस का दामन थामने के बाद बसपा ने नई रणनीति के तहत इस सीट से बिना प्रत्याशी के ही चुनाव लड़ने  की घोषणा कर दी है। बसपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रामसिंह गौतम ने अशोकनगर में तीनों जिलों के कार्यकर्ताओं के साथ बैठक के बाद पत्रकारो से चर्चा करते हुये कहा कि पार्टी अब और ज्यादा ताकत से चुनाव लड़ेगी।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>सोमवार को शिवपुरी में कांग्रेस उम्मीदवार ज्योतिरादित्य सिंधिया के सामने बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार लोकेंद्र सिंह राजपूत ने कांग्रेस की सदस्यता लेते हुये अपना समर्थन सिंधिया को दे दिया था। अपनी जीत को निश्चित करने के लिये शायद सिंधिया ने बसपा उम्मीदवार को अपने पाले में मिलाया था। उनको उम्मीद थी कि लोकेंद्र के मैदान से हटने के बाद बसपा का वोट बैंक उनके पास आ जायेगा। लेकिन कांग्रेस की यह जोड़तोड़  बसपा को अखर गई है। बसपा सुप्रीमो मायावती की म प्र  सरकार को समर्थन वापसी की धमकी के बाद बसपा के कार्यकर्ता और आक्रमक हो गये है। अशोकनगर में बसपा की बैठक के बाद पार्टी के कार्यकर्ताओ ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ जमकर नारेबाजी की है। अशोकनगर ,गुना एवं शिवपुरी के बसपा कार्यकर्ताओ ने बैठक में तय किया है पार्टी अब भी चुनाव लड़ेगी। पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ने घोषणा की है गुना सीट पर बसपा अब अपने चुनाव चिन्ह हाथी का प्रचार करते हुये वोट मांगेगी।</p>
]]></content:encoded>
					
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		<title>सिंधिया ने दिया भाजपा को जोरदार झटका</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 30 Apr 2019 12:24:45 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[ज्योतिरादित्य सिंधिया]]></category>
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					<description><![CDATA[शिवपुरी।मध्यप्रदेश में पहले चरण की वोटिंग हो चुकी है और अगले तीन चरण की वोटिंग होना है। इससे पहले नेताओं का दल-बदलने का सिलसिला जारी है।अब भाजपा आदिवासी मोर्चा के जिला अध्यक्ष डॉ महेश आदिवासी ने अपने समर्थकों के साथ कांग्रेस का दामन थाम लिया है। उन्होंने गुना सांसद ज्योतिरादित्य की मौजूदगी में कांग्रेस की [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>शिवपुरी।मध्यप्रदेश में पहले चरण की वोटिंग हो चुकी है और अगले तीन चरण की वोटिंग होना है। इससे पहले नेताओं का दल-बदलने का सिलसिला जारी है।अब भाजपा आदिवासी मोर्चा के जिला अध्यक्ष डॉ महेश आदिवासी ने अपने समर्थकों के साथ कांग्रेस का दामन थाम लिया है। उन्होंने गुना सांसद ज्योतिरादित्य की मौजूदगी में कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की। इस अवसर पर सिंधिया ने पार्टी का दुपट्टा पहना कर कांग्रेस परिवार में उनका स्वागत किया।इससे पहले भी कई बीजेपी नेता कांग्रेस में शामिल हो गए है।</p>
<p>दरअसल, आज सिंधिया शिवपुरी विधानसभा क्षेत्र के नावली में जनसभा को संबोधित करने पहुंचे थे। जहां उन्होंने गुना-शिवपुरी के विकास, प्रगति और उन्नति का अपना संकल्प पुनः दोहराया। जहां भाजपा आदिवासी मोर्चा के जिला अध्यक्ष डॉ महेश आदिवासी ने अपने समर्थकों के साथ कांग्रेस ज्वाइन कर ली।  वही भाजपा पर हमला बोलते हुए कहा कि भाजपा के शासन में- राशन की दुकान पर भ्रष्टाचारी, गरीबी रेखा की लिस्ट में गरीबो के  नाम काटे गए भाजपाईयो के नाम जोड़े गए, मैं तो कहता हूँ इन गरीबो के निवालों को छीनने वालो आपको ऊपर वाला भी माफ नही करेगा।</p>
<p>सिंधिया ने कहा कि जिस सड़क की कोई कल्पना नही कर सकता था कोलारस के राजस्थान बॉर्डर के गांव मेघनबाड़ा से विदिशा के पास अमरोद गांव तक 90km की 110 करोड़ की लागत की सड़क आपको दिलवाई जो आज 60 गांव और 4 विधानसभाओ को जोड़ती है।जो कहा सो कर के दिखाया।</p>
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		<title>प्रियंका की चकाचौंध में खुद को साबित करने की चुनौती से जूझते ज्योतिरादित्य सिंधिया</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 13 Feb 2019 15:45:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[ज्योतिरादित्य सिंधिया]]></category>
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					<description><![CDATA[                        प्रवीण दुबे &#160; पहले मध्यप्रदेश में सरकार गठन के बाद अनदेखी और अब प्रियंका गांधी की चकाचौंध भरी राजनीति के बीच उपस्थिति न दर्ज करा पाने के संकट ने यदि सबसे ज्यादा किसी का नुकसान किया है तो वह है कांग्रेस की नई [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="padding-left: 30px;">                        <strong><span style="color: #0000ff;">प्रवीण दुबे</span></strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong><span style="color: #000000;">पहले मध्यप्रदेश में सरकार गठन के बाद अनदेखी और अब प्रियंका गांधी की चकाचौंध भरी राजनीति के बीच उपस्थिति न दर्ज करा पाने के संकट ने यदि सबसे ज्यादा किसी का नुकसान किया है तो वह है कांग्रेस की नई पीढ़ी के सबसे प्रभावी और स्वच्छ छवि वाले नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया , पहले गांधी परिवार  और दिग्विजय सिंह जैसे चालक नेताओं ने इस युवा नेता का चेहरा आगे कर विधानसभा चुनाव में ग्वालियर अंचल की 34 में से 26 सीटें जीतकर भाजपा को सत्ता से दूर करने में सफलता हासिल की,अकेले ग्वालियर अंचल में ही नहीं पूरे मध्यप्रदेश में  चुनाव संचालन समिति के अध्यक्ष के नाते इस युवा नेता ने अपनी भूमिका में पूरे सौ प्रतिशत अंक हासिल किए पूरे देश ने देखा कि ज्योतिरादित्य की आक्रामक प्रचार शैली के कारण भाजपा निरुत्तर सी नजर आई।</span></strong></p>
<p><strong><span style="color: #000000;"> लेकिन सत्ता में आते ही  कैसे कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ने ज्योतिरादित्य को दरकिनार करते हुए पीछे ढकेल दिया सबने देखा कि इस अनदेखी को कैसे राहुल गांधी ने अपनी मोन स्वीकृति प्रदान की। </span></strong></p>
<p><strong><span style="color: #000000;">जो ज्योतिरादित्य चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद का सबसे सशक्त चेहरा माने जा रहे थे उनको अपने समर्थक विधायकों तक को मंत्रीपद व अच्छे मंत्रालय  दिलाने तक में भोपाल से लेकर दिल्ली तक मशक्कत करनी पड़ी थी। बावजूद इसके सिंधिया पर दिग्गीराजा और कमलनाथ भारी पड़े उनके समर्थकों को हल्के मंत्रालय से ही संतोष करना पड़ा। </span></strong></p>
<p><strong><span style="color: #000000;">विधानसभा चुनाव के बाद सरकार के गठन तक श्री सिंधिया को दोयम दर्जे का नेता निरूपित किये जाने के बाद अब लोकसभा चुनाव में उनका जादू मध्यप्रदेश में न चल सके इसके लिए एक ओर बड़ी चतुराई से उन्हें मध्यप्रदेश से दूर कर राष्ट्रीय महासचिव का झुनझुना पकड़ाया गया तो दूसरी ओर उन्हें प्रियंका गांधी के साथ जोड़कर उत्तरप्रदेश के एक हिस्से तक सीमित कर दिया गया।</span></strong></p>
<p><strong><span style="color: #000000;"> साफ है जिन सिंधिया के पास विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश चुनाव संचालन समिति के अध्यक्ष की कमान थी वे सिंधिया अब लोकसभा चुनाव के दौरान उत्तरप्रदेश के एक हिस्से तक सिमट कर रह जाएंगे। </span></strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong><span style="color: #000000;">इससे भी विचारणीय पक्ष   यह है कि उत्तरप्रदेश जैसे बड़े राज्य में जहां कांग्रेस के सबसे चमकदार और प्रभावी चेहरे के रूप में प्रियंका गांधी पूरी तरह सक्रीय हैं सिंधिया को आखिर कौन पूछेगा ?</span></strong></p>
<p><strong><span style="color: #000000;"> मीडिया से लेकर कांग्रेस हाईकमान तक सब प्रियंका के इर्दगिर्द ही नजर आएंगे ऐसे में सिंधिया के सामने खुद के कार्यों को प्रदर्शित करने का संकट खड़ा होगा। इसकी बानगी पिछले कुछ दिनों में दिखाई भी दे रही है, जब मीडिया हो या कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व सब जगह प्रियंका प्रियंका की ही धूम है और श्री सिंधिया इस चकाचौंध में कहीं खो से गये हैं।</span></strong></p>
<p><strong><span style="color: #000000;">यहां बताना उपयुक्त होगा कि कांग्रेस हाईकमान अर्थात गांधी परिवार द्वारा सिंधिया परिवार की राजनीतिक अनदेखी करना कोई नई बात नहीं है। ज्योतिरादित्य के पिता स्व. माधवराव सिंधिया भी इसका शिकार होते रहे तमाम राजनीतिक योग्यता और जनता के बीच अत्यंत लोकप्रिय नेता की छवि होने के बावजूद गांधी परिवार ने कभी भी माधवराव सिंधिया को न तो मुख्यमंत्री बनने दिया और न ही प्रधानमंत्री। इतना ही नहीं जैसा कि वर्तमान में भी ज्योतिरादित्य के सामने हो रहा है वैसा ही उनके पिता माधवराव की खिलाफत करने वाले दिग्विजयसिंह को गांधी परिवार ने जमकर समर्थन किया। एकबार तो हालात यहां तक जा पहुंचे थे कि माधवराव को अपनी अलग पार्टी बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा था।</span></strong></p>
<p><strong><span style="color: #000000;">फिलहाल ज्योतिरादित्य ऐसा कुछ करेंगे इसकी सम्भावना दिखाई नहीं देती लेकिन जबसे विधानसभा चुनाव के परिणाम सामने आए हैं और सरकार का गठन हुआ है वे सार्वजनिक रूप से खिन्न और गुस्से का प्रदर्शन अवश्य कर चुके हैं। देखना दिलचस्प होगा कि वे अपनी ही पार्टी में सम्पूर्ण राजनीतिक योग्यता के बावजूद खुद को लगातार हासिये पर डालने और अपने प्रभाव वाले प्रदेश से दूर रखने की कुटिल चालों का कैसे जवाब देते हैं  ?</span></strong></p>
<p>&nbsp;</p>
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