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	<title>नवरात्रि &#8211; Shabd Shakti News</title>
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	<description>Every News Speaks</description>
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		<title>कण्डों की होली जलाकर की जा सकती है गायों की रक्षा, इन्दौरवासी प्रस्तुत कर चुके हैं यह आदर्श</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 21 Feb 2018 07:59:11 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[अच्छा काम]]></category>
		<category><![CDATA[नवरात्रि]]></category>
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					<description><![CDATA[कंडों की होली जलाकर इंदौरवासियों ने पिछले साल जिस सामाजिक सरोकार की शुरुआत की थी, उसका बड़ा असर हुआ था। होली के दौरान हुई कंडों की बिक्री से इंदौर के आसपास की 60 गोशालाओं की लगभग 6000 गायों का सालभर का खर्च निकल आया था। साथ ही मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ के पांच बड़े शहरों इंदौर, भोपाल, जबलपुर, [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>कंडों की होली जलाकर इंदौरवासियों ने पिछले साल जिस सामाजिक सरोकार की शुरुआत की थी, उसका बड़ा असर हुआ था। होली के दौरान हुई कंडों की बिक्री से इंदौर के आसपास की 60 गोशालाओं की लगभग 6000 गायों का सालभर का खर्च निकल आया था। साथ ही मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ के पांच बड़े शहरों इंदौर, भोपाल, जबलपुर, ग्वालियर और रायपुर में लगभग 411 टन लकड़ियां जलने से और लगभग 35 हजार किलो कार्बन भी हवा घुलने से बच गय</p>
<p>गोशालाओं से 14 लाख कंडे बिके, जिससे 2.75 करोड़ रुपए की आमदनी हुई थी। हम और आप चाहें तो यह अभियान इस वर्ष इन आंकड़ों को और भी बड़ा कर सकता है। पर्यावरण सुधार और पशुधन बचाने की दिशा में नईदुनिया के अभियान का मप्र सरकार के पशुपालन और गोसंवर्धन बोर्ड ने समर्थन दिया है।</p>
<p><strong>एक दिन में दो करोड़</strong></p>
<p>चार साल पहले इंदौर के पचास व्यापारियों और कारोबारियों ने एक फॉर्मूला तैयार किया था। इसके तहत एक कंडे का मूल्य 10 रुपए लगाया गया। दो रुपए कंडा बनाने वाले और 2 रुपए ट्रांसपोर्ट का निकाल दें तो गोशाला के हिस्से में आता है 6 रुपए। गोसेवा विभाग के प्रमुख मनोज तिवारी, राजेश गुप्ता, गोपाल अग्रवाल के मुताबिक शहर में 400-500 बड़ी होलिका दहन होता है। यदि कंडों की होली में 20 लाख कंडों की खपत हो सकती है। इस तरह सिर्फ इंदौर से एक दिन में गोशालाओं को 2 करोड़ रुपए की राशि मिल सकती है।</p>
<p><em>पूरे प्रदेश में कंडों की होली जलाकर एक दिन में ही गोशालाओं को काफी हद तक स्वाबलंबी बनाया जा सकता है।</em> <strong>-महामंडलेश्वारानंद स्वामी अखिलेश्वरानंद गिरी, अध्यक्ष कार्यपरिषद, मप्र गोपालन व पशुसंवर्धन बोर्ड</strong></p>
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		<title>नवरात्रि के छठवें दिन की जाती है माँ कात्यायनी की पूजा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 25 Sep 2017 18:35:33 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म कर्म]]></category>
		<category><![CDATA[नवरात्रि]]></category>
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					<description><![CDATA[आज नवरात्र का छठवां दिन हैं और आज मां कात्यायनी की आराधना की जाती है । नवरात्र के पावन समय में छठवें दिन अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष को प्रदान करने वाली भगवती कात्यायनी की पूजा वंदना का विधान है। आज के दिन मां कात्यायनी की पूजा होती है, जो अपने भक्त की हर मुराद पूरी [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div class="content-block">
<p>आज नवरात्र का छठवां दिन हैं और आज मां कात्यायनी की आराधना की जाती है । नवरात्र के पावन समय में छठवें दिन अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष को प्रदान करने वाली भगवती कात्यायनी की पूजा वंदना का विधान है। आज के दिन मां कात्यायनी की पूजा होती है, जो अपने भक्त की हर मुराद पूरी करती हैं। नवरात्र का छठा दिन भगवती कात्यायनी की आराधना का दिन है।</p>
<p>श्रद्धालु भक्त व साधक अनेक प्रकार से भगवती की अनुकंपा प्राप्त करने के लिए व्रत-अनुष्ठान व साधना करते हैं। मां का यह रूप बेहद सरस, सौम्य और मोहक है। नवरात्र के दिनों में मां की सच्चे मन से पूजा की जानी चाहिए। लोग घट स्थापित करके मां की उपासना करते हैं जिससे खुश होकर मां हमेशा अपने बच्चों की झोली भर देती है।</p>
<p>मां कात्यायनी की भक्ति से मनुष्य को अर्थ, कर्म, काम, मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।  छठे दिन कलश स्थापित करें माता के परिवार में शामिल देवी देवता की पूजा करें जो देवी की प्रतिमा के दोनों तरफ विरजामन हैं। इनकी पूजा के पश्चात देवी कात्यायनी जी की पूजा कि जाती है।</p>
</div>
<div class="content-block">
<p>बताया जाता है कत नाम के एक प्रसिद्ध महर्षि थे, उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए। इन्हीं कात्य के गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे। इन्होंने भगवती की उपासना करते हुए बहुत वर्षों तक बड़ी कठिन तपस्या की थी। उनकी इच्छा थी मां भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें।मां भगवती ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली, जिसके बाद से मां का नाम कात्यायनी पड़ा । सबसे पहले मां कात्यायनी की मूर्ति या तस्वीर को लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर स्थापित करें। तदुपरांत चौकी पर मनोकामना गुटिका रखें। दीपक प्रज्जवलित रखें। तदुपरांत हाथ में लाल पुष्प लेकर मां का ध्यान करें।</p>
<p>ध्यान मंत्र<br />
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवर वाहना।</p>
<p>कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥</p>
</div>
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		<title>नवरात्रि का आज पांचवा दिन,की जाती है स्कन्दमाता की पूजा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 25 Sep 2017 02:29:57 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म कर्म]]></category>
		<category><![CDATA[नवरात्रि]]></category>
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					<description><![CDATA[नवरात्रि में मां दुर्गा के नवस्वरूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रि के पांचवें दिन माता स्कंदमाता की पूजा करने का विधान है। भगवान स्कंद की माता होने के कारण देवी को स्कंदमाता कहा जाता है। सच्चे मन से मां की पूजा करने से मां अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर उन्हें मोेक्ष प्रदान करती हैं। [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div class="content-block">नवरात्रि में मां दुर्गा के नवस्वरूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रि के पांचवें दिन माता स्कंदमाता की पूजा करने का विधान है। भगवान स्कंद की माता होने के कारण देवी को स्कंदमाता कहा जाता है। सच्चे मन से मां की पूजा करने से मां अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर उन्हें मोेक्ष प्रदान करती हैं। माता के पूजन से व्यक्ति को संतान प्राप्त होती है। मां स्कंदमाता भगवान स्कंद को गोद में लिए हुए हैं। मां का ये स्वरूप दर्शाता है कि वात्सल्य की प्रतिमूर्ति मां स्कंदमाता अपने भक्तों को अपने बच्चे के समान समझती है। मां स्कंदमाता की पूजा करने से भगवान स्कंद की पूजा भी स्वत: हो जाती है।</div>
<div class="content-block">स्कंदमाता की चार भुजाएं हैं। माता दाहिनी तरफ की ऊपर वाली भुजा से भगवान स्कन्द को गोद में पकड़े हुए हैं। बाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा वरमुद्रा में तथा नीचे वाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी है, उसमें कमल-पुष्प लिए हुए हैं। कमल के आसन पर विराजमान होने के कारण इन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है। सिंह इनका वाहन है। शेर पर सवार होकर माता दुर्गा अपने पांचवें स्वरुप स्कन्दमाता के रुप में भक्तजनों के कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहती हैं।</p>
<p>माता को कल्याणकारी शक्ति की अधिष्ठात्री कहा जाता है। देवी स्कंदमाता सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं तथा इनकी मनोहर छवि पूरे ब्रह्मांड में प्रकाशमान होती है। सच्चे मन से मां की पूजा करने से व्यक्ति को दुःखों से मुक्ति मिलकर मोक्ष अौर सुख-शांति की प्राप्ति होती है। नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की विधि-विधान से पूजा करने के बाद इस मंत्र का जाप करने से भक्त पर मां का कृपा सदैव बनी रहती है।</p>
<p>या देवी सर्वभू‍तेषु मां स्कंदमाता रूपेण संस्थिता।<br />
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।</p>
<p>जो व्यक्ति मां स्कंदमाता की पूजा अर्चना करता है मां उसकी गोद हमेशा भरी रखती हैं। नवरात्र के पांचवे दिन लाल वस्त्र में सुहाग चिन्ह् सिंदूर, लाल चूड़ी, महावर, नेल पेंट, लाल बिंदी तथा सेब और लाल फूल एवं चावल बांधकर मां की गोद भरने से भक्त को संतान का प्राप्ति होती है।</p></div>
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		<title>नवरात्रि के तीसरे दिन की जाती है माँ चन्द्रघण्टा की पूजा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 23 Sep 2017 08:00:46 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म कर्म]]></category>
		<category><![CDATA[नवरात्रि]]></category>
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					<description><![CDATA[मां दुर्गाजी की तीसरी शक्ति का नाम ‘चन्द्रघंटा’ है. नवरात्र उपासना में तीसरे दिन इन्हीं के विग्रह का पूजन-आराधन किया जाता है. पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैयरुता. प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता.. इनका यह स्वरूप परम शान्तिदायक और कल्याणकारी है. इनके मस्तक में घण्टे के आकार का अर्धचन्द्र है, इसी कारण से इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है. [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h4></h4>
<div class="content-block">मां दुर्गाजी की तीसरी शक्ति का नाम ‘चन्द्रघंटा’ है. नवरात्र उपासना में तीसरे दिन इन्हीं के विग्रह का पूजन-आराधन किया जाता है.</div>
<div></div>
<div class="content-block">पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैयरुता.<br />
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता..</div>
<div></div>
<div class="content-block">
<p>इनका यह स्वरूप परम शान्तिदायक और कल्याणकारी है. इनके मस्तक में घण्टे के आकार का अर्धचन्द्र है, इसी कारण से इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है. इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है. इनके दस हाथ हैं. इनके दसों हाथों में खड्ग आदि शस्त्र तथा बाण आदि अस्त्र विभूषित हैं. इनका वाहन सिंह है.</p>
<p>नवरात्र की दुर्गा उपासना में तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व है. इस दिन साधक का मन ‘मणिपूर’ चक्र में प्रविष्ट होता है. मां चंद्रघंटा की कृपा से उसे अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं.</p>
<p>मां चंद्रघंटा की कृपा से साधक के समस्त पाप और बाधाएं विनष्ट हो जाती हैं. इनकी आराधना सद्य: फलदायी हैं.  हमें निरन्तर उनके पवित्र विग्रह को ध्यान में रखते हुए साधना की ओर अग्रसर होने का प्रयत्न करना चाहिए. उनका ध्यान हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिए परमकल्याणकारी और सद्गति को देने वाला है.</p>
</div>
<div></div>
<div class="content-block">माँ का स्वरूप अत्यंत सौम्यता एवं शांति से परिपूर्ण रहता है. इनकी आराधना से वीरता-निर्भयता के साथ ही सौम्यता एवं विनम्रता का विकास होकर मुख, नेत्र तथा संपूर्ण काया में कांति-गुण की वृद्धि होती है.</div>
<div class="wl-ad"></div>
<div>या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।<br />
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और चंद्रघंटा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है. या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ. हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें.</p>
</div>
<div></div>
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		<title>नवरात्रि के दूसरे दिन की जाती है माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 22 Sep 2017 04:07:05 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म कर्म]]></category>
		<category><![CDATA[नवरात्रि]]></category>
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					<description><![CDATA[शारदीय नवरात्र के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी का अर्थ है आचरण करने वाली। इससे ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली। नवरात्रि में दुर्गा पूजा के नौ रूपों की पूजा-उपासना की जाती है। मां ने भगवान शंकर को पति रूप में [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>शारदीय नवरात्र के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी का अर्थ है आचरण करने वाली। इससे ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली। नवरात्रि में दुर्गा पूजा के नौ रूपों की पूजा-उपासना की जाती है। मां ने भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इस देवी को तपश्चारिणी अर्थात् ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया।</p>
<p><strong>देवी के पूजन का मंत्र</strong></p>
<p>दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥</p>
]]></content:encoded>
					
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