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	<title>फैसला &#8211; Shabd Shakti News</title>
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		<title>सर्वोच्च न्यायालय का बड़ा फैसला, दीपावली पर केवल 2 घण्टे आतिशबाजी चलाने की अनुमति</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 23 Oct 2018 07:19:17 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Breaking]]></category>
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					<description><![CDATA[नई दिल्ली: पूरे देश में पटाखे बनाने, बेचने और जलाने पर प्रतिबंध को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने आज (मंगलवार) फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि पूर्ण प्रतिबंध नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने शर्त के साथ पटाखे बेचने और जलाने की अनुमति दी। प्रदूषण की वजह से पटाखों की बिक्री पर बैन लगाने की मांग की गई [&#8230;]]]></description>
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<article class="storyContent">नई दिल्ली: पूरे देश में पटाखे बनाने, बेचने और जलाने पर प्रतिबंध को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने आज (मंगलवार) फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि पूर्ण प्रतिबंध नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने शर्त के साथ पटाखे बेचने और जलाने की अनुमति दी। प्रदूषण की वजह से पटाखों की बिक्री पर बैन लगाने की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट फैसला सुनाते हुए कहा, केवल लाइसेंस धारक ही पटाखे बेच सकते हैं। पटाखों में हानिकारक केमिकल का इस्तेमाल ना हो। कम प्रदूषण वाले पटाखे फोड़े जाएं। दिवाली पर मात्र दो घंटे पटाखे जाने की मंजूरी दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, दिवाली पर आठ बजे से 10 बजे तक ही पटाखे जला सकते हैं। क्रिसमस और न्यू ईयर पर सिर्फ 20 मिनट ही पटाखे फोड़ सकते हैं। 11. 55 रात से 12.00 बजे रात तक ही पटाखे जला सकते हैं।</p>
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		<title>नमाज सम्बन्धी मामला पुनर्विचार के लिए पांच सदस्यीय संविधान पीठ के पास भेजने से इनकार</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 27 Sep 2018 17:40:25 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[फैसला]]></category>
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					<description><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद में नमाज पढ़ने को इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं बताने वाले 1994 के फैसले को पुनर्विचार के लिए पांच सदस्यीय संविधान पीठ के पास भेजने से इनकार कर दिया है। 1994 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मस्जिद में नमाज इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है। गुरुवार को [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद में नमाज पढ़ने को इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं बताने वाले 1994 के फैसले को पुनर्विचार के लिए पांच सदस्यीय संविधान पीठ के पास भेजने से इनकार कर दिया है। 1994 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मस्जिद में नमाज इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पुनर्विचार के लिए बड़ी बेंच के पास भेजने से इनकार कर दिया।</p>
<p>1. शीर्ष अदालत ने कहा कि मस्जिद में नमाज पढ़ने का फैसला संविधान पीठ में नहीं भेजा जाएगा।</p>
<p>2. इस केस पर फैसले का असर अयोध्या और फारुकी मामले पर नहीं पड़ेगा। अयोध्या केस की सुनवाई नहीं टलेगी। अयोध्या राम मंदिर- बाबरी मस्जिद विवाद मामले की सुनवाई 29 अक्टूबर से तथ्यों के आधार पर फिर से शुरू होगी।</p>
<p>3. प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति अशोक भूषण तथा न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर की पीठ ने ये फैसला सुनाया। जस्टिस भूषण ने पुराने मामले का जिक्र किया। और कहा- हर फैसला अलग हालात में होता है। पिछले फैसले के संदर्भ को समझना होगा।</p>
<p>4. सुप्रीम कोर्ट ने कहा- हर धर्म के लिए उसके प्रार्थना स्थल अहम है। लेकिन अगर सरकारी अधिग्रहण जरूरी हो तो ये इसके आड़े नहीं आ सकता। किसी खास जगह का विशिष्ट धार्मिक महत्व हो तो यह अपवाद हो सकता है।</p>
<p>5. न्यायमूर्ति भूषण ने कहा- हमें वह संदर्भ देखना होगा जिसमें पांच सदस्यीय पीठ ने इस्माइल फारूकी मामले में 1994 में फैसला सुनाया था कि मस्जिद इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है।</p>
<p>6. राष्ट्र को सभी धर्मों का समान रूप से सम्मान करना होगा।</p>
<p>7. संविधान पीठ का फैसला भूमि अधिग्रहण तक ही समिति था।</p>
<p>8. दीवानी वाद का फैसला सबूतों के आधार पर करना होगा और पिछले फैसले की इसमें कोई प्रासंगिकता नहीं है।</p>
<p>9. न्यायमूर्ति एस. ए. नजीर संबंधित मामले पर प्रधान न्यायाधीश और न्यायमूर्ति भूषण से सहमत नहीं। न्यायमूर्ति नजीर ने कहा- मस्जिद इस्लाम का अभिन्न अंग है इस विषय पर फैसला धार्मिक आस्था को ध्यान में रखते हुए होना चाहिए, उसपर गहन विचार की जरूरत है।</p>
<p>10.  वर्तमान में यह मुद्दा उस वक्त उठा जब प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ अयोध्या मामले में 2010 के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। अदालत ने राम जन्म्भूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद पर अपने फैसले में जमीन को तीन हिस्से में बांट दिया था। अदालत की तीन सदस्यीय पीठ ने 2:1 के बहुमत वाले फैसले में कहा था कि 2.77 एकड़ जमीन को तीनों पक्षों सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लल्ला में बराबर-बराबर बांट दिया जाये।</p>
<p><em><strong>(इनपुट न्यूज एजेंसी से भी)</strong></em></p>
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		<title>मध्यप्रदेश में दलित शब्द के इस्तेमाल पर रोक</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 23 Jan 2018 12:28:02 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[फैसला]]></category>
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					<description><![CDATA[मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर बेंच ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए &#8216;दलित&#8217; शब्द के इस्तेमाल पर रोक लगाने के आदेश दिए हैं। दरअसल, डॉ. मोहन लाल माहौर ने दलित शब्द पर आपत्ति जताते हुए हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी जिसमें कहा गया था कि संविधान में इस शब्द [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div dir="ltr">
<div>मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर बेंच ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए &#8216;दलित&#8217; शब्द के इस्तेमाल पर रोक लगाने के आदेश दिए हैं। दरअसल, डॉ. मोहन लाल माहौर ने दलित शब्द पर आपत्ति जताते हुए हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी जिसमें कहा गया था कि संविधान में इस शब्द का कोई उल्लेख नहीं है। इस वर्ग से जुड़े लोगों को अनुसूचित जाति अथवा जनजाति के रूप में ही संबोधित किया गया है। ऐसे में सरकारी दस्तावेजों और दूसरी जगहों पर दलित शब्द का इस्तेमाल संविधान के विपरीत किया जा रहा है</div>
<div><b>संविधान में नहीं है दलित शब्द का जिक्र </b></div>
<div>हाई कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए आदेश जारी किए कि दलित शब्द का इस्तेमाल किसी भी सरकारी और गैर सरकारी विभागों में नहीं किया जाए। उसके लिए संविधान में बताएं शब्द ही इस्तेमाल में लाए जाएं। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अभिषेक पाराशर ने बताया कि यह आदेश पूरे मध्य प्रदेश में लागू होगा।</div>
<div>दलित शब्द का संविधान में कोई जिक्र नहीं है। 2008 में नेशनल एससी कमीशन ने सारे राज्यों को निर्देश दिया था कि राज्य अपने आधिकारिक दस्तावेजों में दलित शब्द का इस्तेमाल न करें।हालांकि इस शब्द का इस्तेमाल डॉ भीमराव अंबेडकर, कांशीराम सहित देशभर के दलित चिंतकों से आम जन तक करते रहे हैं।</div>
</div>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>नाबालिग पत्नी से शारीरिक संबंध को माना जायेगा बलात्कार</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 11 Oct 2017 06:07:20 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[निर्णय]]></category>
		<category><![CDATA[फैसला]]></category>
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					<description><![CDATA[   सुप्रीम कोर्ट ने  आज अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि 15-18 साल की नाबालिग पत्‍नी से पति के शारीरिक संबंध को बलात्‍कार माना जाएगा. दरअसल सुप्रीम कोर्ट में याचिका के माध्‍यम से जिसमें बलात्कार कानून में अपवाद के एक प्रावधान की वैधता को चुनौती दी गई थी. इस अपवाद के जरिये कहा गया [&#8230;]]]></description>
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<header class="mdl-layout__header--scroll biz-layout-header page-header off-canvas fixed">
<div id="header">
<div class="mdl-layout__header-row biz-header-row">   सुप्रीम कोर्ट ने  आज अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि 15-18 साल की नाबालिग पत्‍नी से पति के शारीरिक संबंध को बलात्‍कार माना जाएगा. दरअसल सुप्रीम कोर्ट में याचिका के माध्‍यम से जिसमें बलात्कार कानून में अपवाद के एक प्रावधान की वैधता को चुनौती दी गई थी. इस अपवाद के जरिये कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति 15 साल से अधिक उम्र की अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाता है तो यह बलात्कार नहीं है. आईपीसी की धारा 375 बलात्कार के अपराध को परिभाषित करती है. इस धारा के अपवाद में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति अपनी 15 साल से अधिक उम्र की पत्नी से यौन संबंध बनाता है तो यह बलात्कार नहीं है. हालांकि, सहमति की आयु 18 साल ह<span style="font-size: 16px;">न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने छह सितंबर को याचिका पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था. पीठ ने केंद्र से सवाल किया था कि कैसे संसद कानून में कोई अपवाद बना सकती है जिसमें घोषणा की गई हो कि किसी व्यक्ति द्वारा 15 साल से अधिक और 18 साल से कम उम्र की अपनी पत्नी के साथ बनाया गया यौन संबंध बलात्कार नहीं है, जबकि रजामंदी की आयु 18 साल है. शीर्ष अदालत ने कहा था कि वह वैवाहिक बलात्कार के पहलू में नहीं जाना चाहती है, लेकिन जब सभी उद्देश्यों के लिये सहमति की आयु 18 साल है तो भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में इस तरह का अपवाद क्यों बनाया गया.</span></div>
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<div id="jsp345748" class="article-row" data-url="/hindi/india/supreme-court-verdict-over-15-18-aged-wife-case/345748" data-title="सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला- नाबालिग पत्‍नी से शारीरिक संबंध रेप माना जाएगा">
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<p>इस सवाल का जवाब देते हुए केंद्र के वकील ने कहा था कि अगर आईपीसी के तहत यह अपवाद समाप्त हो जाता है तो यह वैवाहिक बलात्कार के क्षेत्र को खोल देगा, जिसका भारत में अस्तित्व नहीं है. उन्होंने विवाह के उद्देश्य के लिये मुस्लिमों के बीच यौवनारंभ की उम्र की अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा था कि संसद ने निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले इन पहलुओं पर विचार किया है.</p>
<p>सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा था कि सिर्फ इसलिये कि इस अवैध प्रथा को कानूनी माना गया है और यह वर्षों से चल रही है इसलिये बाल विवाह इस तरह से नहीं चल सकता है. याचिकाकर्ताओं ने आईपीसी की धारा 375 के अपवाद 2 को संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का इस हद तक उल्लंघन करने वाला घोषित करने की मांग की है कि यह 15 और 18 साल के बीच की लड़की के साथ सिर्फ इस आधार पर यौन संबंध की अनुमति देता है कि वह विवाहित है.</p>
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