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	<title>मथुरा वृंदावन से ग्वालियर तक थी भगवान कृष्ण की कर्मस्थली &#8211; Shabd Shakti News</title>
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	<description>Every News Speaks</description>
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		<title>जन्माष्टमी पर बड़ा खुलासा : मथुरा वृंदावन से ग्वालियर तक थी भगवान कृष्ण की कर्मस्थली, उज्जैन में की थी पढ़ाई</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 04 Sep 2026 10:32:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म कर्म]]></category>
		<category><![CDATA[मथुरा वृंदावन से ग्वालियर तक थी भगवान कृष्ण की कर्मस्थली]]></category>
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					<description><![CDATA[प्रवीण दुबे मथुरा, गोकुल, वृंदावन, गोवर्धन और यमुना के साथ ग्वालियर-चंबल की धरती से भी भगवान कृष्ण को था बेहद लगाव यहां, बिखरे तमाम साक्ष्य और ग्वालियर गोहद का नाम हैं सबसे बड़े प्रमाण  कृष्ण की गोचारण लीला से जुड़ी थी यहां की माटी भागवत के श्लोकों से लेकर गोपाचल, गोहद और कुंतलपुर की लोकपरंपराओं [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h4 dir="auto" style="text-align: center;">प्रवीण दुबे</h4>
<h4 dir="auto"><strong><span style="color: #993300;">मथुरा, गोकुल, वृंदावन, गोवर्धन और यमुना के साथ ग्वालियर-चंबल की धरती से भी भगवान कृष्ण को था बेहद लगाव यहां, बिखरे तमाम साक्ष्य और ग्वालियर गोहद का नाम हैं सबसे बड़े प्रमाण </span></strong></h4>
<h4 dir="auto"><strong><span style="color: #993300;">कृष्ण की गोचारण लीला से जुड़ी थी यहां की माटी </span></strong><strong><span style="color: #993300;">भागवत के श्लोकों से लेकर गोपाचल, गोहद और कुंतलपुर की लोकपरंपराओं तक—धर्म, इतिहास और आस्था का अद्भुत संगम</span></strong></h4>
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<div dir="auto">ग्वालियर। भगवान श्रीकृष्ण का नाम आते ही सबसे पहले मथुरा, गोकुल, वृंदावन, गोवर्धन और यमुना का स्मरण होता है। लेकिन क्या श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का प्रभाव वर्तमान मध्यप्रदेश के ग्वालियर-चंबल अंचल और उज्जैन  तक भी पहुंचता था?</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">क्या आज का ग्वालियर कभी गोपों और गायों की भूमि &#8216;गोपाचल&#8217; के नाम से जाना जाता था?</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">क्या गोहद की पहचान भी कृष्ण की गोचारण परंपरा से जोड़ी जाती है?</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">और क्या मुरैना का कुंतलपुर महाभारतकालीन कुंती और कर्ण की कथा को अपने भीतर समेटे हुए है?</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">इन सवालों के जवाब में धर्मग्रंथ, स्थानीय परंपराएं और इतिहास—तीनों अलग-अलग रोचक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।</div>
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<div dir="auto">भागवत में कृष्ण के गोचारण की स्पष्ट कथा</div>
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<div dir="auto">श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में श्रीकृष्ण के बाल्यकाल और गोचारण की लीलाओं का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है।</div>
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<div dir="auto">भागवत 10.15.1 में शुकदेव जी बताते हैं कि जब श्रीकृष्ण और बलराम पौगण्ड अवस्था में पहुंचे तो उन्हें गायों को चराने की जिम्मेदारी दी गई और वे अपने सखाओं के साथ वन में गायें चराने लगे।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">इसके अगले ही श्लोक 10.15.2 में श्रीकृष्ण के हाथ में बांसुरी, साथ में बलराम और गोप बालकों तथा आगे चलती गायों का चित्र सामने आता है। वे गायों को लेकर वन में प्रवेश करते हैं।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">इतना ही नहीं, भागवत 10.15.9 में स्पष्ट कहा गया है कि श्रीकृष्ण अपने साथियों के साथ पर्वत और नदियों के किनारे पशुओं को चराते हुए विहार करते थे।</div>
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<div dir="auto">यानी यह बात धर्मग्रंथ से पुष्ट है कि श्रीकृष्ण की गोचारण लीला केवल किसी एक गांव तक सीमित नहीं थी, बल्कि व्रज क्षेत्र के विभिन्न वन, नदी-तट और पर्वतीय क्षेत्रों में उनकी गोचारण यात्राओं का वर्णन मिलता है।</div>
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<div dir="auto">फिर सवाल उठता है—क्या ये यात्राएं आज के ग्वालियर-चंबल तक पहुंचती थीं?</div>
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<div dir="auto">यहीं से इतिहास और स्थानीय परंपरा का एक रोचक अध्याय शुरू होता है।</div>
<div dir="auto">वर्तमान ग्वालियर को मध्यप्रदेश शासन के आधिकारिक जिला इतिहास में गोपाचल, गोपगिरि, गोप पर्वत और गोपाद्रि जैसे पुराने नामों से जोड़ा गया है।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto"> जिला प्रशासन की वेबसाइट के अनुसार, इसी नाम-परंपरा से आगे चलकर &#8216;ग्वालियर&#8217; शब्द के बनने की व्याख्या की जाती है।</div>
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<div dir="auto">दूसरी ओर ग्वालियर की प्रसिद्ध लोककथा आठवीं शताब्दी के शासक सूरजसेन और संत ग्वालिपा से जुड़ती है। मान्यता के अनुसार ग्वालिपा ने सूरजसेन को रोगमुक्त किया और उनके सम्मान में नगर का नाम ग्वालियर पड़ा। यही कथा आज ग्वालियर के प्रचलित ऐतिहासिक परिचय का महत्वपूर्ण हिस्सा है।</div>
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<div dir="auto">इसलिए &#8216;ग्वालियर नाम सीधे श्रीकृष्ण के कारण पड़ा&#8217; कहना प्रमाणित इतिहास नहीं है। लेकिन &#8216;गोपाचल&#8217; नाम में गोपालन और गोप संस्कृति का संबंध अवश्य दिखाई देता है।</div>
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<div dir="auto">गोहद और कृष्ण की गायों की लोककथा</div>
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<div dir="auto">ग्वालियर से लगभग 45 किलोमीटर दूर स्थित गोहद आज भिंड जिले का महत्वपूर्ण ऐतिहासिक नगर है। सरकारी इतिहास के अनुसार गोहद नगर की नींव बाद के ऐतिहासिक काल में पड़ी और इसका राजनीतिक इतिहास मध्यकालीन जाट शासकों से जुड़ता है।</div>
<div dir="auto">लेकिन स्थानीय धार्मिक परंपरा में एक अलग कथा प्रचलित है।</div>
<div dir="auto">एक प्रकाशित स्थानीय विवरण में यह मान्यता सामने आती है कि ग्वालियर-चंबल का यह भूभाग प्राचीन समय में गौपालन के लिए अत्यंत अनुकूल था और ब्रज क्षेत्र की गायें चरने के लिए इस ओर आती थीं।</div>
<div dir="auto">इसी परंपरा में गोहद को गायों के चरने की सीमा से जोड़कर देखा जाता है।</div>
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<div dir="auto">ग्वालियर-मुरैना क्षेत्र में उटीला के जंगलों से जुड़ी एक प्रचलित धार्मिक मान्यता श्रीकृष्ण और पूतना-वध की भी है।</div>
<div dir="auto">लेकिन यहां भी तथ्य को ठीक ढंग से समझना जरूरी है।</div>
<div dir="auto">श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध, अध्याय 6 में पूतना-वध का स्थान गोकुल बताया गया है। कथा के अनुसार कंस द्वारा भेजी गई पूतना गोकुल पहुंची और बालक कृष्ण को विष लगा हुआ स्तन पिलाने का प्रयास किया। वह आकाश में उड़ने लगी तभी   श्रीकृष्ण ने उसका प्राण हर लिया और उसका विशाल शरीर गोपों की भूमि में गिरा।</div>
<div dir="auto">भागवत 10.6.13 में भी उसके शरीर के गोपों की चरागाह में गिरने का वर्णन है और 10.6.14 में कहा गया है कि उसका शरीर इतना विशाल था कि गिरने पर बहुत से वृक्ष नष्ट हो गए। वह स्थान यही था।</div>
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<div dir="auto">कुंतलपुर—जहां आज भी जीवित है महाभारत की स्मृति</div>
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<div dir="auto">ग्वालियर-मुरैना अंचल का एक और महत्वपूर्ण धार्मिक-ऐतिहासिक स्थल है कुंतलपुर, जिसे वर्तमान में कुतवार/कोतवाल क्षेत्र से जोड़ा जाता है।</div>
<div dir="auto">स्थानीय परंपरा के अनुसार यह क्षेत्र राजा कुंतिभोज से जुड़ा था और यहीं माता कुंती का मायका माना जाता है। आसन नदी के किनारे कुंती मंदिर और सूर्यदेव के रथ के घोड़ों के पदचिह्न जैसी आकृतियां भी स्थानीय आस्था का हिस्सा हैं।</div>
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<div dir="auto">और सबसे पक्का प्रमाण—उज्जैन में कृष्ण की शिक्षा</div>
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<div dir="auto">जहां ग्वालियर-चंबल से जुड़ी कृष्ण कथाओं में लोकपरंपरा का बड़ा योगदान है, वहीं मध्यप्रदेश के उज्जैन से श्रीकृष्ण का संबंध श्रीमद्भागवत में सीधे मिलता है।</div>
<div dir="auto">श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध, अध्याय 45, श्लोक 30-31 में स्पष्ट उल्लेख है कि सर्वज्ञ भगवान कृष्ण और बलराम मानव लीला करते हुए गुरु के आश्रम में रहने की इच्छा से अवन्तीपुर निवासी सांदीपनि मुनि के पास गए।</div>
<div dir="auto">अवन्तीपुर की पहचान प्राचीन उज्जयिनी अर्थात वर्तमान उज्जैन से की जाती है। मध्यप्रदेश के महाकालेश्वर मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट भी परंपरा के अनुसार उज्जैन स्थित सांदीपनि आश्रम को वही स्थान बताती है जहां श्रीकृष्ण, बलराम और सुदामा ने शिक्षा ग्रहण की।</div>
<div dir="auto">इसलिए मध्यप्रदेश में श्रीकृष्ण की उपस्थिति का सबसे मजबूत ग्रंथीय आधार उज्जैन का सांदीपनि आश्रम है।</div>
<div dir="auto">तो क्या ग्वालियर-चंबल भी कृष्ण की धरती है?</div>
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<div dir="auto">इतिहास यह प्रमाणित करता है कि ग्वालियर की प्राचीन पहचान &#8216;गोपाचल/गोपगिरि&#8217; जैसे नामों से जुड़ी रही है।</div>
<div dir="auto">स्थानीय परंपराएं गोहद, उटीला और कुंतलपुर को कृष्ण तथा महाभारतकालीन कथाओं से जोड़ती हैं।</div>
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<div dir="auto">शायद यही इस पूरे अंचल की सबसे बड़ी खूबसूरती है—जहां ग्रंथ, पुरातत्व, इतिहास और लोकविश्वास एक-दूसरे से संवाद करते दिखाई देते हैं।</div>
<div dir="auto">ग्वालियर का &#8216;गोपाचल&#8217;, गोहद की गौ-परंपरा, मुरैना का कुंतलपुर और उज्जैन का सांदीपनि आश्रम—इन सभी को एक साथ देखने पर मध्यप्रदेश की धरती पर कृष्ण और महाभारतकालीन परंपराओं की एक ऐसी सांस्कृतिक यात्रा सामने आती है, जिसकी तह में आज भी अनेक अनसुलझे प्रश्न छिपे हुए हैं।</div>
<div dir="auto">और शायद यही प्रश्न इस अंचल को केवल इतिहास का भूगोल नहीं, बल्कि आस्था और स्मृति का जीवंत भूगोल बनाते हैं।</div>
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