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	<title>मीडिया &#8211; Shabd Shakti News</title>
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	<description>Every News Speaks</description>
	<lastBuildDate>Thu, 02 Jul 2026 14:03:45 +0000</lastBuildDate>
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		<title>क्या स्क्रॉलिंग कल्चर बदल रहा है लोगों की न्यूज पढ़ने की आदत?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 02 Jul 2026 14:03:45 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[मीडिया]]></category>
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					<description><![CDATA[आज की युवा पीढ़ी के लिए खबरों का सबसे बड़ा माध्यम अब अखबार नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन बन गई है। आज की युवा पीढ़ी के लिए खबरों का सबसे बड़ा माध्यम अब अखबार नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन बन गई है। Instagram Reels पर कुछ ही सेकंड में न्यूज अपडेट मिल जाती है, WhatsApp पर खबरों [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: left;" data-start="46" data-end="398"><strong>आज की युवा पीढ़ी के लिए खबरों का सबसे बड़ा माध्यम अब अखबार नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन बन गई है।</strong></p>
<p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align: left;" data-start="46" data-end="398">आज की युवा पीढ़ी के लिए खबरों का सबसे बड़ा माध्यम अब अखबार नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन बन गई है। Instagram Reels पर कुछ ही सेकंड में न्यूज अपडेट मिल जाती है, WhatsApp पर खबरों के लिंक और फॉरवर्ड लगातार आते रहते हैं, जबकि YouTube पर पॉडकास्ट और एक्सप्लेनर वीडियो आसानी से उपलब्ध हैं। ऐसे में घर के दरवाजे पर आने वाला अखबार पहले जैसी अहमियत नहीं रखता।</p>
<p data-start="403" data-end="749" data-is-last-node="">यह बदलाव सिर्फ खबरें पढ़ने के तरीके का नहीं, बल्कि पूरी मीडिया खपत में आए बड़े बदलाव का संकेत है। BCG-Snapchat Report 2024 के मुताबिक, भारत की 37.7 करोड़ Gen Z आबादी का बड़ा हिस्सा अब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए खबरें देख और समझ रहा है। यही वजह है कि प्रिंट मीडिया के सामने आज युवा पाठकों को अपने साथ जोड़कर रखने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।</p>
<p><strong>सुबह की आदत बदल चुकी है</strong></p>
<p>Reuters Institute for the Study of Journalism की Digital News Report 2025  (जो करीब एक लाख लोगों पर 48 देशों में किए गए सर्वे पर आधारित है) में यह बात साफ सामने आई है। वैश्विक स्तर पर 18-24 आयु वर्ग के 44% युवा सोशल मीडिया और वीडियो नेटवर्क को अपना मुख्य न्यूज सोर्स मानते हैं। 25-34 आयु वर्ग में यह आंकड़ा 38% है।</p>
<p>भारत के लिए यह तस्वीर और भी साफ है। उसी रिपोर्ट के भारत-केंद्रित विश्लेषण के अनुसार, 18-34 आयु वर्ग के 41% भारतीय सोशल मीडिया और YouTube को अपना मुख्य न्यूज सोर्स बताते हैं, जबकि इसी उम्र के केवल 24% लोग पब्लिशर्स वेबसाइट पर जाते हैं। मतलब साफ है- खबर मिल रही है, लेकिन अखबार के जरिए नहीं और यह बदलाव सिर्फ &#8220;पढ़ने बनाम स्क्रॉल करने&#8221; तक सीमित नहीं है। Reuters की रिपोर्ट यह भी बताती है कि भारत उन देशों में शामिल है जहां लोग खबर पढ़ने की बजाय देखना ज्यादा पसंद करते हैं। सोशल वीडियो न्यूज की वैश्विक खपत 2020 में 52% थी, जो 2025 में 65% पर पहुंच चुकी है।</p>
<p><strong>Gen Z </strong><strong>न्यूज ले कहां से रही है?</strong></p>
<p>DataReportal India 2025 के अनुसार, जनवरी 2025 तक भारत में 49.1 करोड़ सोशल मीडिया यूजर आइडेंटिटी हैं, जो कुल आबादी का 33.7% है। Gen Z (13-24 वर्ष) इस तबके में करीब 40% की हिस्सेदारी रखती है और रोजाना 3 घंटे से ज्यादा सोशल मीडिया पर बिताती है।</p>
<p>इनकी पसंदीदा प्लेटफॉर्म्स हैं:</p>
<ul>
<li><strong>WhatsApp</strong> — 80.8% भारतीय इंटरनेट यूजर्स की पहुंच</li>
<li><strong>Instagram</strong> — 77.9% भारतीय इंटरनेट यूजर्स की पहुंच; भारत में 39.2 करोड़ यूजर</li>
<li><strong>YouTube</strong> — 50 करोड़ से ज्यादा यूजर, हर महीने 29 घंटे 37 मिनट की औसत खपत</li>
<li><strong>Telegram </strong><strong>और X</strong> — ब्रेकिंग न्यूज के लिए प्रमुख</li>
</ul>
<p>यहां एक बड़ा सवाब उठता है: क्या ये प्लेटफॉर्म अब पब्लिशर बन चुके हैं? जवाब है- काफी हद तक, हां। Reuters की 2025 रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 50% से ज्यादा अंग्रेजी भाषी इंटरनेट यूजर कभी-कभी खबरों से बचते हैं (news avoidance), और इसकी बड़ी वजह डिजिटल मीडिया का overwhelming volume है।</p>
<p><strong>&#8220;</strong><strong>हेडलाइंस&#8221; का दौर, &#8220;</strong><strong>डीप रीडिंग&#8221; खत्म?</strong></p>
<p class="isSelectedEnd">जब खबरें 15-30 सेकंड की Reels और Shorts में सिमटने लगें, तो गहराई से पढ़ने और समझने की आदत अपने आप कम होने लगती है। यही बड़ा बदलाव आज प्रिंट मीडिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।</p>
<p class="isSelectedEnd">Reuters Institute की मार्च 2026 में प्रकाशित रिपोर्ट ‘Understanding Young News Audiences’ के मुताबिक, दुनिया भर में 18-24 साल के करीब 73% युवा हर हफ्ते कम से कम एक शॉर्ट वीडियो के जरिए न्यूज देखते हैं। भारत में TikTok भले ही बंद हो, लेकिन Instagram Reels और YouTube Shorts ने उसकी जगह काफी हद तक ले ली है।</p>
<p>इसका असर साफ दिख रहा है। युवा अब खबरों को पढ़ने से ज्यादा “स्क्रॉल” कर रहे हैं। कौन-सी खबर लोगों तक पहुंचेगी, यह अब एडिटोरियल टीम से ज्यादा सोशल मीडिया एल्गोरिदम और व्यूज-लाइक्स तय कर रहे हैं।</p>
<p><strong>प्रिंट के आंकड़े क्या कहते हैं?</strong></p>
<p>FICCI-EY Media &amp; Entertainment Report 2026 के मुताबिक, भारत का प्रिंट मीडिया सेक्टर 2025 में करीब ₹25,900 करोड़ पर लगभग स्थिर रहा। विज्ञापनों से होने वाली कमाई में सिर्फ 2% की मामूली बढ़त दर्ज की गई, जिसकी बड़ी वजह luxury products, real estate और सरकारी विज्ञापन रहे। वहीं अखबारों की बिक्री यानी circulation revenue में 1% की गिरावट आई। लगातार दूसरे साल ऐसा हुआ जब प्रिंट सर्कुलेशन से होने वाली कमाई घटी।</p>
<p>दूसरी तरफ डिजिटल मीडिया तेजी से आगे बढ़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में डिजिटल विज्ञापन बाजार 26% बढ़कर ₹94,700 करोड़ तक पहुंच गया। कुल विज्ञापन खर्च में इसकी हिस्सेदारी 63% रही।</p>
<p>प्रिंट मीडिया की घटती हिस्सेदारी dentsu-e4m Digital Advertising Report के आंकड़ों में भी साफ दिखती है। 2024 में कुल विज्ञापन बाजार में प्रिंट की हिस्सेदारी 17% थी, जो 2025 में घटकर 15% रह गई। 2026 में इसके 13% तक आने का अनुमान है। dentsu-e4m Report 2026 के मुताबिक, 2025 में प्रिंट विज्ञापन बाजार ₹16,594 करोड़ का रहा, जो कुल विज्ञापन बाजार का करीब 14% है।</p>
<p>हालांकि सर्कुलेशन के आंकड़े एक मिली-जुली तस्वीर दिखाते हैं। Audit Bureau of Circulations (ABC) के जनवरी-जून 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, देश में अखबारों की कुल दैनिक सर्कुलेशन करीब 2 करोड़ 97 लाख प्रतियां रही, जो पिछले छह महीनों की तुलना में 2.77% ज्यादा थी। इसमें Dainik Bhaskar सबसे आगे रहा, जिसके बाद Dainik Jagran और Amar Ujala का स्थान रहा। यह बढ़त मुख्य रूप से छोटे शहरों और Tier-2/Tier-3 बाजारों से आई।</p>
<p>लेकिन ABC के जुलाई-दिसंबर 2025 के नए आंकड़े बताते हैं कि Dainik Jagran, Amar Ujala और Rajasthan Patrika जैसे बड़े अखबारों की सर्कुलेशन में गिरावट देखने को मिली। वहीं Dainik Bhaskar और Hindustan को मामूली बढ़त मिली।</p>
<p><strong>युवा अखबार से क्यों दूर हो रहे हैं?</strong></p>
<p>इसके पीछे सिर्फ मोबाइल नहीं है-  कंटेंट मिसमैच भी एक बड़ी वजह है।</p>
<p><strong>पहली बात</strong>, अखबारों की भाषा और लेआउट पुरानी पीढ़ी के लिए डिजाइन है। Gen Z को क्रिएटर इकनॉमी, पॉप कल्चर, मेंटल हेल्थ, क्लाइमेट और गेमिंग जैसे विषयों में ज्यादा रुचि है- अखबार इन्हें गहराई से कवर नहीं करते।</p>
<p><strong>दूसरी बात</strong>, मॉर्निंग हैबिट का टूटना। जिस पीढ़ी ने घर में अखबार देखते हुए बड़े होने का अनुभव नहीं किया, वह इस आदत को खुद क्यों शुरू करेगी?</p>
<p><strong>तीसरी बात</strong>, तीसरी बड़ी वजह है पर्सनलॉइजेशन। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिदम हर यूजर को उसकी पसंद और रुचि के हिसाब से खबरें दिखाते हैं। किसी को स्पोर्ट्स ज्यादा दिखता है, किसी को एंटरटेनमेंट, तो किसी को बिजनेस या पॉलिटिक्स। वहीं अखबार हर पाठक को लगभग एक जैसा कंटेंट देता है। Gen Z की बड़ी आबादी को यही बात अब कम जुड़ाव वाली और कई बार “इर्रेलिवेंट” लगने लगी है।</p>
<p><strong>चौथी बात</strong>, AI की बढ़ती भूमिका। Reuters Institute Digital News Report 2025 के अनुसार भारत में 44% लोग AI से पर्सनलाइज्ड न्यूज पाने में सहज हैं- यह वैश्विक औसत से कहीं ज्यादा है (तुलना के लिए ब्रिटेन में सिर्फ 11%)। साथ ही, 18% भारतीय हर हफ्ते AI चैटबॉट्स के जरिए खबर पढ़ते हैं- वैश्विक स्तर पर यह औसत महज 7% है।</p>
<p><strong>क्या खुद अखबार भी जिम्मेदार हैं?</strong></p>
<p>एक हद तक हां। भारत के अधिकांश बड़े अखबार समूहों ने डिजिटल-फर्स्ट थिंकिंग को देर से अपनाया। जब तक वे Instagram Reels, podcasts और WhatsApp न्यूजलेटर्स पर सक्रिय हुए, तब तक क्रिएटर इकनॉमी के नए चेहरे लाखों सब्सक्राइबर्स बना चुके थे।</p>
<p>Reuters Institute की अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट &#8216;मैपिंग न्यूज क्रिएटर्स व इन्फ्लुएंसर्स&#8217; (24 देशों पर आधारित) यह बताती है कि न्यूज क्रिएटर्स और इन्फ्लुएंसर्स अब कई ट्रेडिशनल न्यूज ब्रैंड्स से ज्यादा ध्यान खींच रहे हैं, खासकर सोशल और वीडियो नेटवर्क्स पर। इसी रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में 21% वयस्क और 30 साल से कम उम्र के 37% युवा अब रेगुलेट्री क्रिएटर्स या इन्फ्लुएंसर्स से खबर लेते हैं।</p>
<p>भारत में भी तस्वीर कुछ ऐसी ही है। YouTube पर ध्रुव राठी जैसे क्रिएटर्स के करोड़ों सब्सक्राइबर्स हैं। वहीं Instagram पर न्यूज एक्सप्लेनर और शॉर्ट न्यूज कंटेंट बनाने वाले कई अकाउंट्स की पहुंच अब कई रीजनल अखबारों के बराबर या उससे भी ज्यादा हो चुकी है। आसान भाषा, तेज फॉर्मेट और मोबाइल-फ्रेंडली कंटेंट की वजह से युवा तेजी से इन प्लेटफॉर्म्स की तरफ बढ़ रहे हैं। एक तरह से क्रिएटर इकनॉमी ने युवाओं के बीच वह जगह भर दी है, जहां प्रिंट मीडिया खुद को समय के साथ उतनी तेजी से नहीं बदल पाया।</p>
<p><strong>लेकिन क्या सच में अखबार खत्म हो रहे हैं?</strong></p>
<p class="isSelectedEnd">हालांकि कहानी का दूसरा पहलू भी है। Urban Gen Z यानी बड़े शहरों के युवा पूरे भारत की तस्वीर नहीं हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">TAM AdEx, RCS India और Excellent Publicity के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 की पहली छमाही में प्रिंट विज्ञापनों में 26% की अच्छी बढ़त दर्ज की गई। इसमें छोटे शहरों और नॉन-मेट्रो मार्केट्स का बड़ा योगदान रहा। यानी देश के कई हिस्सों में अखबार अब भी मजबूत माध्यम बने हुए हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">वहीं WARC के आंकड़े बताते हैं कि 72% भारतीय उपभोक्ता डिजिटल विज्ञापनों की ज्यादा संख्या से परेशान महसूस करते हैं। इतना ही नहीं, 60% से ज्यादा लोग आज भी डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म्स के मुकाबले प्रिंट और टीवी खबरों पर ज्यादा भरोसा करते हैं।</p>
<p>यही भरोसा प्रिंट मीडिया की सबसे बड़ी ताकत बन सकता है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि प्रिंट मीडिया समय के साथ खुद को बदले और नए दौर के पाठकों की जरूरतों के हिसाब से खुद को फिर से तैयार करे।</p>
<p><strong>Trust </strong><strong>की लड़ाई: सोशल मीडिया बनाम अखबार</strong></p>
<p class="isSelectedEnd">AI और एल्गोरिदम से चलने वाली न्यूज की दुनिया में सबसे बड़ी चुनौती यह बनती जा रही है कि सही और गलत खबर में फर्क करना मुश्किल होता जा रहा है। Reuters की 2025 रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में 58% लोग ऑनलाइन गलत जानकारी और फेक न्यूज को लेकर चिंतित हैं। भारत में यह चिंता और ज्यादा गंभीर है। करीब 11% भारतीय यूजर्स मानते हैं कि कई बार दोस्त और परिवार के लोग भी अनजाने में गलत जानकारी आगे बढ़ा देते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">WhatsApp ग्रुप्स के जरिए फैली अफवाहों को लेकर पहले भी कई गंभीर घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिनमें हिंसा तक देखने को मिली। ऐसे माहौल में प्रिंट मीडिया की सबसे बड़ी ताकत उसकी एडिटोरियल अकाउंटबिलिटी, फैक्ट-चेकिंग और बाइलाइन जर्नलिज्म है, जहां खबरों की जिम्मेदारी तय होती है और जानकारी जांच-परख के बाद प्रकाशित की जाती है।</p>
<p>चुनौती बस इतनी है कि प्रिंट मीडिया इस भरोसे और विश्वसनीयता को नई पीढ़ी तक किस तरह पहुंचाता है।</p>
<p><strong>प्रिंट मीडिया की नई रणनीति</strong></p>
<p>अब न्यूजपेपर और मीडिया कंपनियां भी यह समझ चुकी हैं कि सिर्फ छपे हुए अखबार के जरिए Gen Z तक पहुंचना आसान नहीं है। यही वजह है कि अब कई न्यूजपेपर ब्रैंड्स शॉर्ट्स वीडियोज बना रहे हैं, AI आधारित वॉयस बुलेटिन शुरू कर रहे हैं, WhatsApp Channels पर सब्सक्राइबर्ट बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं और पॉडकास्ट स्टूडियो भी तैयार कर रहे हैं। इसके अलावा इवेंट्स और ब्रैंडेट कंटेंट भी कमाई का नया जरिया बनते जा रहे हैं।</p>
<p>FICCI-EY 2026 की रिपोर्ट भी बताती है कि प्रिंट पब्लिशर्स अब सिर्फ अखबारों पर निर्भर नहीं रहना चाहते। वे इवेंट्स, ब्रैंडेट कंटेंट और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए अपनी कमाई के नए रास्ते बना रहे हैं।</p>
<p><strong>भविष्य क्या है?</strong></p>
<p class="isSelectedEnd">आने वाले समय में भारत का प्रिंट मीडिया तीन रास्तों में से किसी एक दिशा में जाता दिख सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd"><strong>पहला रास्ता</strong> यह है कि प्रिंट धीरे-धीरे एक niche product बन जाए, यानी ऐसा माध्यम जो सिर्फ खास वर्ग के पाठकों तक सीमित रह जाए। इसमें premium readers, high-income वर्ग या UPSC और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले पाठक प्रमुख हो सकते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd"><strong>दूसरा रास्ता</strong> हाइब्रिड मॉडल का है, जहां अखबार सिर्फ प्रिंट तक सीमित न रहे, बल्कि वीडियो, ऑडियो, पॉडकास्ट्स, इवेंट्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के साथ मिलकर एक नया मीडिया इकोसिस्टम तैयार करे।</p>
<p><strong>तीसरा और सबसे मजबूत रास्ता</strong> हाइपर लोकल जर्नलिज्म का माना जा रहा है। यानी जिला, शहर और तहसील स्तर की खबरों पर फोकस करने वाले रीजनल अखबार अपनी अहमियत बनाए रख सकते हैं। वजह साफ है- नेशनल न्यूज अब लोगों को मोबाइल पर मुफ्त में मिल जाती है, लेकिन स्थानीय खबरों के लिए आज भी बड़ी संख्या में लोग अखबारों पर भरोसा करते हैं।</p>
<p>आंकड़े बताते हैं कि Gen Z ने खबर पढ़ना नहीं छोड़ा — बस फॉर्मेट बदल दिया है। Reuters Digital News Report 2025 के मुताबिक वैश्विक स्तर पर 18-24 आयु वर्ग के 44% और भारत में 18-34 आयु वर्ग के 41% युवा सोशल मीडिया को मुख्य न्यूज सोर्स मानते हैं। FICCI-EY 2026 बताती है कि प्रिंट का सर्कुलेशन रेवेन्यू लगातार दूसरे साल घटा है। dentsu-e4m के अनुसार 2025 में प्रिंट की कुल विज्ञापन हिस्सेदारी सिमटकर 14% पर आ गई।</p>
<p>लेकिन इस सबके बीच एक उम्मीद की किरण भी है- WARC के अनुसार 60% से ज्यादा भारतीय उपभोक्ता अभी भी प्रिंट को डिजिटल से ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं। जिस दिन प्रिंट मीडिया इस ट्रस्ट को Gen Z की भाषा में ट्रांसलेट कर पाएगा- चाहे वो Reels हो, Podcast हो या WhatsApp न्यूजलेटर, उस दिन शायद अखबार फिर से दरवाजे से उठाया जाएगा।</p>
<p>फिलहाल तो यह कहना गलत नहीं होगा कि युवा पीढ़ी अखबार छोड़ रही है, लेकिन खबरों की भूख खत्म नहीं हुई, बस उसका फॉर्मेट बदल गया है।</p>
<p>समाचार 4 मीडिया. कॉम से साभार</p>
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			</item>
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		<title>आतंकवाद पर पश्चिमी मीडिया की दोहरी ज़ुबान: शब्द भी चुनिंदा और संवेदना भी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 16 Dec 2025 13:20:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[प्रमुख खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[आतंकवाद]]></category>
		<category><![CDATA[मीडिया]]></category>
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					<description><![CDATA[सुदेश गौड़ आतंकवाद की परिभाषा क्या होती है—यह पश्चिमी मीडिया को तब पूरी तरह याद आ जाती है, जब हमला न्यूयॉर्क, लंदन या सिडनी में होता है। लेकिन वही हिंसा जब भारत की धरती पर होती है, तो शब्दकोश अचानक बदल जाता है। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सोची-समझी प्रवृत्ति है। पहलगाम में इसी [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;">सुदेश गौड़</p>
<p>आतंकवाद की परिभाषा क्या होती है—यह पश्चिमी मीडिया को तब पूरी तरह याद आ जाती है, जब हमला न्यूयॉर्क, लंदन या सिडनी में होता है। लेकिन वही हिंसा जब भारत की धरती पर होती है, तो शब्दकोश अचानक बदल जाता है। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सोची-समझी प्रवृत्ति है।</p>
<p>पहलगाम में इसी साल 22 अप्रैल को पाकिस्तानी आतंकियों ने 26 निर्दोष नागरिकों की नृशंस हत्या की थी जो कश्मीर में घूमने आए थे। यह हमला पूरी तरह आतंकवादी था—डर पैदा करने, संदेश देने और अस्थिरता फैलाने के इरादे से किया गया। इसके बावजूद ऑस्ट्रेलिया के प्रतिष्ठित अख़बार Daily Telegraph ने अपनी शुरुआती रिपोर्टिंग में इस घटना को सीधे “terror attack” कहने के बजाय “deadly attack” और “gunmen attack” जैसे शब्दों में प्रस्तुत किया। फोकस आतंकियों की विचारधारा या नेटवर्क पर नहीं, बल्कि “टूरिस्ट्स के भागने” और “क्षेत्र में तनाव” पर रहा। Daily Telegraph, 23 April 2025 का शीर्षक था &#8220;Tourists flee Pahalgam after deadly attack in India&#8217;s Kashmir&#8221;.</p>
<p>इसके ठीक उलट, सिडनी में हुई हिंसक घटना के बाद यही Daily Telegraph बिना किसी हिचक के ‘terrorist’, ‘extremist violence’ और ‘attack on Australian values’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करता है। इतना ही नहीं और शीर्षक भी दिया &#8216;You Bastards&#8217;.<br />
इस घटना की रिपोर्टिंग में न कोई संदर्भ खोजा गया, न सामाजिक पृष्ठभूमि की व्याख्या, न ही यह कहा गया कि “मामला जटिल है”। क्योंकि तब पीड़ित पश्चिमी थे।<br />
यह दोहरा मापदंड सिर्फ Daily Telegraph तक सीमित नहीं है।ब्रिटेन के BBC की रिपोर्टिंग में अक्सर भारत में हुए आतंकी हमलों को “militant attack” या “insurgency-related violence” कहा जाता है, जबकि ब्रिटेन या यूरोप में इसी तरह की घटनाओं पर वह खुलकर “terrorism” शब्द का प्रयोग करता है।<br />
अमेरिकी अख़बार New York Times भारत में हुए हमलों को बार-बार “disputed region” और “long-running conflict” के फ्रेम में रखता है—मानो बंदूक उठाकर निर्दोषों को मार देना किसी राजनीतिक बहस का स्वाभाविक परिणाम हो।<br />
Al Jazeera जैसे चैनल तो कई बार हमलावरों की पहचान और मकसद पर इतना “संतुलन” साधते हैं कि पीड़ित हाशिये पर चले जाते हैं।</p>
<p>यह भाषा सिर्फ पत्रकारिता की लापरवाही नहीं है; यह एक खतरनाक नैरेटिव है। जब आतंकवाद को सॉफ्ट शब्दों में ढका जाता है, तो अपराध की क्रूरता कम नहीं होती—बल्कि उसे वैचारिक छूट मिलती है। यह पीड़ितों के साथ दूसरा अन्याय है।</p>
<p>सवाल सीधा है—<br />
अगर सिडनी में निर्दोषों की हत्या आतंकवाद है,अगर लंदन में चाकू से हमला “टेरर” है,<br />
तो फिर पहलगाम में गोलियों से मारे गए लोग किस अपराध के शिकार थे?क्या आतंकवाद की पहचान पासपोर्ट देखकर तय की जाएगी?</p>
<p>भारत दशकों से आतंकवाद झेल रहा है। यह हमारे लिए कोई “ब्रेकिंग न्यूज़” नहीं, बल्कि रोज़ की सच्चाई है। लेकिन जब पश्चिमी मीडिया शब्दों में हेरफेर करता है, तो वह केवल भारत को नहीं, बल्कि वैश्विक आतंकवाद-विरोधी संघर्ष को कमजोर करता है।</p>
<p>आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई ईमानदार तभी होगी, जब शब्दों में भी ईमानदारी होगी। वरना इतिहास यही कहेगा कि पश्चिमी मीडिया ने आतंकवाद को तब तक आतंकवाद नहीं माना, जब तक उसकी आग खुद उनके घर तक नहीं पहुँची।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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