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	<title>हिन्दू मन्दिर &#8211; Shabd Shakti News</title>
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	<description>Every News Speaks</description>
	<lastBuildDate>Sun, 07 Jan 2018 08:38:41 +0000</lastBuildDate>
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		<title>प्रसिद्ध तिरुपति मन्दिर ने  44 गैर हिंदू कर्मचारियों के खिलाफ नोटिस जारी किया</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 07 Jan 2018 08:38:41 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दू मन्दिर]]></category>
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					<description><![CDATA[तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) ने अपने 44 गैर हिंदू कर्मचारियों के खिलाफ नोटिस जारी किया है. और सभी कर्मचारियों को &#8220;थिरु- नामम&#8221; अनिवार्य करने का आदेश दिया है. तिरुपति देवस्थानम आंध्र प्रदेश के तिरुमाला स्थित भगवान श्री वेंकटेश्वर के मंदिर की देख-रेख करती है. हालांकि, टीटीडी ने पहले उनसे इस बारे में सफाई पेश करने [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) ने अपने 44 गैर हिंदू कर्मचारियों के खिलाफ नोटिस जारी किया है. और सभी कर्मचारियों को &#8220;थिरु- नामम&#8221; अनिवार्य करने का आदेश दिया है. तिरुपति देवस्थानम आंध्र प्रदेश के तिरुमाला स्थित भगवान श्री वेंकटेश्वर के मंदिर की देख-रेख करती है.</p>
<p>हालांकि, टीटीडी ने पहले उनसे इस बारे में सफाई पेश करने को कहा है. इस बीच टीटीडी बोर्ड जो दुनिया के सबसे बड़े हिंदू मंदिर का प्रबंधन करता है, वह &#8216;थिरू-नामम&#8217; को अनिवार्य करने का आदेश दिया है.</p>
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</div>
<p><b>क्या है &#8216;थिरू- नामम&#8217;</b></p>
<p>&#8216;थिरू-नामम&#8217; माथे के मध्य पर लगने या बनाए जाने वाला एक निशान है, जिसमें एक पतली ऊपर की ओर उठी लाइन होती है, इसका आकार अंग्रेजी के शब्द &#8216;यू&#8217; के समान होता है. यह सफेद चंदन की मोटी रेखा से घिरा होता है.</p>
<p>आपको बता दें कि मंदिर के दिशा- निर्देशों के अनुसार कोई भी गैर हिंदू इस मंदिर में ना तो काम कर सकता है और ना ही किसी सर्विस का हिस्सा बन सकता है. यहां तक कि अगर वे मंदिर में प्रवेश भी करना चाहते हैं, तो उन्हें पहले हस्ताक्षर कर ये साबित करना होगा कि उनके मन में हिंदू भगवान के प्रति सच्ची श्रद्धा है.</p>
<p>1989 तक टीटीडी में भर्ती प्रक्रिया पर कोई प्रतिबंध नहीं था. 1989 से 2007 तक जो भी व्यक्ति हिंदू धर्म को खुलकर स्वीकार करता था उन व्यक्तियों की भर्ती गैर-शिक्षण श्रेणी में की जा सकती थी. लेकिन 2007 में नियम के संशोधन के बाद, गैर-हिंदुओं को टीटीडी की अध्यापन या गैर-शिक्षण श्रेणियों में भी नियोजित नहीं किया जा सकता.</p>
<p>हाल ही में, टीटीडी जागरुकता एवं प्रवर्तन के मुख्य अधिकारी रविशंकर ने एक रिपोर्ट दी, जिसके अनुसार 44 गैर-हिंदू महिला और पुरुष कार्यरत पाए गए. जो कि मंदिर की अलग- अलग विंग में काम कर रहे हैं. मुख्य अधिकारी अनिल कुमार सिंघल के अनुसार उन 44 लोगों में से 39 कर्मचारी 1989-2007 के बीच भर्ती हुए हैं. ये लोग बड़ी संख्या में दयालु वर्ग में कार्यरत हुए हैं.</p>
<p>अब टीटीडी ने उन्हें आंध्र प्रदेश के अन्य सरकारी विभागों में बाकी कार्यकर्ताओं के समान भेजने की योजना बना रही है.</p>
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		<title>जामा मस्जिद पहले माँ भद्र काली और यमनोत्री देवी का हिन्दू मंदिर था</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Praveen Dubey]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 25 Oct 2017 04:50:30 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[जामा मस्जिद]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दू मन्दिर]]></category>
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					<description><![CDATA[आजकल ताजमहल को लेकर पूरे देश में यह बहस छिड़ी हुई है कि वह मुगलों के भारत मे आक्रमण और शासन करने से पूर्व तेजोमहालय नाम का शिव मंदिर था। इस पर तर्क वितर्क का दौर जारी है। दूसरी और अब देश की तमाम मुगलकालीन इमारतों को लेकर भी यह कहा जा रहा है कि [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h3>आजकल ताजमहल को लेकर पूरे देश में यह बहस छिड़ी हुई है कि वह मुगलों के भारत मे आक्रमण और शासन करने से पूर्व तेजोमहालय नाम का शिव मंदिर था। इस पर तर्क वितर्क का दौर जारी है। दूसरी और अब देश की तमाम मुगलकालीन इमारतों को लेकर भी यह कहा जा रहा है कि पूर्व में वह हिन्दू धर्मस्थल थे। इसमें कितनी सत्यता है यह शोध का विषय हो सकता है लेकिन देश का माहौल इसपर गर्माया हुआ है। इसी संदर्भ में अब सोशल मीडिया पर इतिहास के पन्नों का हवाला देकर एक ऐसा लेख सामने आया है जिसमें तर्क सहित यह कहा गया है कि दिल्ली की जामा मस्जिद हिन्दू देवी मंदिर था। पाठकों के लिए हम श्री राघवेन्द्र तोमर की इस फ़ेसबुक पोस्ट को साभार प्रकाशित कर रहे हैं</h3>
<p>&nbsp;</p>
<p>मित्रो लालकिला शाहजहाँ के जन्म से सैकड़ों साल पहले “महाराज अनंगपाल तोमर द्वितीय” द्वारा दिल्ली को बसाने के क्रम में ही बनाया गया था जो कि महाभारत के अभिमन्यु के वंशज तथा महाराज पृथ्वीराज चौहान के नाना जी थे।</p>
<p>इतिहास के अनुसार लाल किला का असली नाम “लाल कोट” है,</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>“लाल कोट” को जिसे महाराज अनंगपालद्वितीय द्वारा सन 1060 ईस्वी में दिल्ली शहर को बसाने के क्रम में ही बनवाया गया था जबकि शाहजहाँ का जन्म ही उसके सैकड़ों वर्ष बाद 1592 ईस्वी में हुआ है। इसके पूरे साक्ष्य “प्रथवीराज रासोसे” ग्रन्थ में मिलते हैं।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>लाल कोट जिसे लोग लाल किले के नाम से जानते हैं</p>
<p>किले के मुख्य द्वार पर बाहर हाथी की मूर्ति अंकित है जबकि इस्लाम मूर्ति के विरोधी होते हैं और राजपूत राजा लोग हाथियों के प्रेम के लिए विख्यात थे। इसके अलावा लाल किले के महल मे लगे सुअर (वराह) के मुह वाले चार नल अभी भी हैं यह भी इस्लाम विरोधी प्रतीक चिन्ह है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>महाराज अनंगपाल तोमर द्वितीय माँ भद्र काली के उपासक थे तथा भगवान श्री कृष्ण की पत्नी देवी यमनोत्री उनकी कुल देवी थी। इन्ही के लिये उन्होने अपने आवास “लाल कोट” (लाल किला) के निकट ही सामने भगवा पत्थर (हिंदुओं का पवित्र रंग ) से भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था तथा प्रत्येक राजउत्सव उसी परिसर में हुआ करते थे।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>यहाँ की इमारतों में उपस्थित अष्टदलीय पुष्प, जंजीर, घंटियां, आदि के लक्षण वहां हिंदू धर्म चिन्हों के रूप में आज भी मौजूद हैं। हिंदुओं के मंदिर हिंदू सन्यासियों के भगवा रंग के अनुरूप भगवा पत्थरों ( लाल पत्थर ) से बनाए जाते थे जबकि मुसलमानों के इमारतें सफेद चूने से बनी होती थी और उन पर हरा रंग का प्रयोग किया जाता था।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>दिल्ली के जामा मस्जिद में कोई भी मुस्लिम प्रतीक चिन्ह निर्माण काल से प्रयोग नहीं हुआ था बल्कि इस मस्जिद की बनावट इसके आकार वास्तु आदि हिंदुओं के भव्य मंदिर के अनुरुप है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>शाहजहां 1627 में अपने पिता की मृत्यु होने के बाद वह गद्दी पर बैठा तो वह चाहता था कि खुदा का दरबार उसके दरबार से ऊंचा हो। खुदा के घर का फर्श उसके तख्त और ताज से ऊपर हो,</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>इसीलिए उसने महाराज अनंगपाल तोमर द्वितीय स्थापित माँ भद्र काली तथा भगवान श्री कृष्ण की पत्नी देवी यमनोत्री जो कि महाराज अनंगपाल कुल देवी थी उसे तुड़वा कर मंदिर से जुड़ी हुई भोजला नामक छोटी सी पहाड़ी जहां महाराज अनंगपाल राजकीय उत्सव के समय उत्सव देखने आने वालों के घोड़े बांधते थे उसे भी मस्जिद परिसर में मिलाने के लिये चुना और 6 अक्टूबर 1650 को मस्जिद को बनाने का काम शुरू हो गया।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>मस्जिद बनाने के लिए 5000 मजदूरों ने छह साल तक काम किया।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>आखिरकार दस लाख के खर्च करके और हजारों टन नया पत्थर की मदद से माँ भद्र काली मंदिर के स्थान पर ये आलीशान मस्जिद बनवाई गयी। 80 मीटर लंबी और 27 मीटर चौड़ी इस मस्जिद में तीन गुंबद बनाए गए। साथ ही दोनों तरफ 41 फीट उंची मीनारे तामीर की गईं। इस मस्जिद में एक साथ 25 हजार लोग नमाज अदा कर सकते हैं।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>इस बेजोड़ मस्जिद का नाम भगवान श्री कृष्ण की पत्नी देवी “यमनोत्री” के नाम के कारण मुसलमान “य” की जगह “ज” शब्द का उच्चारण करते हैं अत: मस्जिद ए जहांनुमा रखा गया। जिसे फिर लोगों ने जामा मस्जिद कहना शुरू कर दिया।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>मस्जिद के तैयार होते ही उज्बेकिस्तान के एक छोटे से शहर बुखारा के सैय्यद अब्दुल गफूर शाह को दिल्ली लाकर उन्हें यहाँ का इमाम घोषित किया गया और 24 जुलाई 1656 को जामा मस्जिद में पहली बार नमाज अदा की गई।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>इस नमाज में शाहजहां समेत सभी दरबारियों और दिल्ली के अवाम ने हिस्सा लिया। नमाज के बाद मुगल बादशाह ने इमाम अब्दुल गफूर को इमाम-ए-सल्तनत की पदवी दी और ये ऐलान भी किया कि उनका खानदान ही इस मस्जिद की इमामत करेंगे।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>उस दिन के बाद से आजतक दिल्ली की जामा मस्जिद में इमामत का सिलसिला बुखारी खानदान के नाम हो गया। सैय्यद अब्दुल गफूर के बाद सय्यद अब्दुल शकूर इमाम बने। इसके बाद सैय्यद अब्दुल रहीम, सैय्यद अब्दुल गफूर, सैय्यद अब्दुल रहमान, सैय्यद अब्दुल करीम, सैय्यद मीर जीवान शाह, सैय्यद मीर अहमद अली, सैय्यद मोहम्मद शाह, सैय्यद अहमद बुखारी और सैय्यद हमीद बुखारी इमाम बने।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>एक वक्त ऐसा भी था जब 1857 के बाद अंग्रेजों ने जामा मस्जिद में नमाज पर पाबंदी लगा दी और मस्जिद में अंग्रेजी फौज के घोड़े बांधे जाने लगे।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>आखिरकार 1864 में मस्जिद को दोबारा नमाजियों के लिए खोल दिया गया। नमाजियों के साथ-साथ दुनिया के कई जाने माने लोगों ने जामा मस्जिद की जमीन पर सजदा अदा किया है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>चाहे वो सऊदी अरब के बादशाह हों या फिर मिस्त्र के नासिर। कभी ईरान के शाह पहलवी तो कभी इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्नो, सबने यहां सजदा किया।</p>
<p>लेकिन इनमें से कोई भी यह नहीं जानता था कि जामा मस्जिद वास्तव में महाराज अनंगपाल तोमर द्वितीय स्थापित माँ भद्र काली तथा भगवान श्री कृष्ण की पत्नी देवी यमनोत्री का मंदिर था जिसे शाहजहां ने तुड़वा कर जामा मस्जिद बनवाया था</p>
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