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अपने व्यवहार से संघ सिखाते थे शरद जी

अर्चना प्रकाशन की ओर से आयोजित ‘शरद स्मृति व्याख्यान’ में आरएसएस के अखिल भारतीय सह-प्रचारक प्रमुख श्री अरुण जैन ने स्वर्गीय शरदचंद्र मेहरोत्रा के व्यक्तित्व एवं जीवन के प्रेरक प्रसंग सुनाए

भोपाल 30 जनवरी 2026/ शाखा लगाने के लिए कितना परिश्रम लगता है और सतत प्रक्रिया अपनानी होती है, यह शरद जी ने अपने व्यवहार से कार्यकर्ताओं को सिखाया। संघ की शाखाएं बढ़ें लेकिन उनकी गुणवत्ता भी बढ़े, शरद जी का हमेशा यह प्रयास रहता था। वे संघकार्य के कुशल शिल्पी थे। एक-एक कार्यकर्ता को गढ़ना और उनका ध्यान रखना, शरद जी की कुशलता थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचारक प्रमुख श्री अरुण जैन ने यह विचार ‘शरद स्मृति व्याख्यान’ में व्यक्त किए। कार्यक्रम का आयोजन अर्चना प्रकाशन की ओर से अपने संस्थापक स्वर्गीय शरदचंद्र मेहरोत्रा की पुण्यतिथि के प्रसंग पर मानस भवन, भोपाल में किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता मध्यभारत प्रान्त के संघचालक श्री अशोक पांडेय ने की। इस अवसर पर मंच पर अर्चना प्रकाशन न्यास के अध्यक्ष श्री लाजपत आहूजा भी उपस्थित रहे।

इस अवसर पर श्री अरुण जैन ने कहा कि जब मध्यभारत में शरद जी प्रचारक होकर आये तो संघकार्य को नया आयाम मिला। उनके प्रयासों से शिवपुरी और ग्वालियर में आवासीय विद्यालय शुरू हुए। गोविंदनगर में शिक्षा और सेवा का जो प्रकल्प आज दिखाई दे रहा है, उसकी नींव में शरद जी थे। वे धुन के पक्के थे, जिस काम की ठान लेते, उसे करके ही मानते थे। वे बहुत व्यवहारिक थे। धरातल पर कार्य करने के अभ्यासी थी।

श्री जैन ने बताया कि साहित्य के क्षेत्र में राष्ट्रीय विचारों को स्थान मिले, इसके लिए अर्चना प्रकाशन की नींव उन्होंने रखी। इसी प्रकार, देवपुत्र पत्रिका को वृहद स्वरूप देने का कार्य शरद जी ने किया। शुरुआत में देवपुत्र ग्वालियर से प्रकाशित होती थी। शरद जी ने उसे भोपाल और इंदौर से प्रकाशित करना शुरू किया। आज देश में सबसे अधिक प्रसार संख्या वाली बाल पत्रिका देवपुत्र है।

इस अवसर पर कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रान्त के संघचालक श्री अशोक पांडेय ने कहा कि किसी भी महापुरुष को याद करके हम अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं करते हैं। वे दीपस्तंभ हैं, जो हमें मार्ग दिखाते हैं। शरद जी अपने अंतिम समय तक देश-समाज की चिंता करते रहे। अपने ध्येय के लिए पूर्ण समर्पित शरद जी का जीवन हम सबके लिए अनुकरणीय है।

कार्यक्रम के प्रारंभ में अर्चना प्रकाशन के निदेशक श्री ओमप्रकाश गुप्ता ने प्रकाशन की स्थापना की पृष्ठभूमि एवं वर्तमान गतिविधियों की जानकारी दी। आभार ज्ञापन श्री अरुण उपाध्याय ने किया। कार्यक्रम में शहर के प्रबुद्धजन, लेखक, शिक्षाविद्, शोधार्थी एवं सामाजिक संगठनों से जुड़े लोग बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

इन पुस्तकों का हुआ विमोचन 

कार्यक्रम के दौरान अर्चना प्रकाशन न्यास की वार्षिक स्मारिका “शताब्दी के निहितार्थ” का लोकार्पण किया गया, जिसका संपादन प्रो. उमेश कुमार सिंह ने किया है। इसके साथ ही डॉ. विकास दवे की ‘भारत का जय घोष – वंदे मातरम्’, लाजपत आहूजा की ‘धर्म की ढाल – गुरु गोविंद बहादुर’ तथा रमेश शर्मा की ‘भगवान बिरसा मुंडा’ पुस्तक का विमोचन भी किया गया।

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