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अपने हितों के लिए पूरी दुनिया का चौधरी बनने की कोशिश में अमेरिका

  प्रवीण दुबे

ऐसा लगता है कि अपने पूंजीवादी चरित्र और हथियारों की दम पर अमेरिका अपने हितों के लिए पूरी दुनिया में एक खतरनाक हिस्ट्रीशीटर अपराधी जैसा भय पैदा करना चाहता है एक लोकतंत्रात्मक देश में घुसकर उसके राष्ट्रपति और उनकी पत्नी का बलपूर्वक अपहरण तथा अब अंतरिम राष्ट्रपति रोड्रिग्ज डेल्सी को लेकर यह कहना कि उनकी टीम उनके रोड्रिग्ज के संपर्क में है, लेकिन अगर उन्होंने अमेरिका की बात नहीं मानी तो उनका अंजाम भी मादुरो जैसा हो सकता है. यह साबित करता है कि अमेरिका अपनी हरकतों से बाज आने वाला नहीं है।
विश्व राजनीति में अमेरिका स्वयं को लोकतंत्र, मानवाधिकार और स्वतंत्रता का सबसे बड़ा संरक्षक बताता है, लेकिन व्यवहार में उसका रुख अक्सर इसके ठीक उलट दिखाई देता है। शीतयुद्ध के दौर से लेकर आज तक अमेरिका ने अपने आर्थिक, सामरिक और राजनीतिक हितों की रक्षा के लिए दुनिया के अनेक देशों में प्रत्यक्ष या परोक्ष हस्तक्षेप किया है। सरकारें गिराई गईं, तख्तापलट कराए गए, आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए और सैन्य हस्तक्षेप किए गए। इस “वैश्विक दादागिरी” का एक प्रमुख और समकालीन उदाहरण है—वेनेजुएला।
दादागिरी का इतिहास और तरीका
अमेरिकी विदेश नीति का एक स्थायी पैटर्न रहा है—जहां उसके हितों को चुनौती दिखी, वहां “लोकतंत्र की रक्षा” या “राष्ट्रीय सुरक्षा” का तर्क देकर हस्तक्षेप। ईरान (1953), ग्वाटेमाला (1954), चिली (1973), इराक, अफगानिस्तान, लीबिया—सूची लंबी है। कहीं तख्तापलट को समर्थन मिला, कहीं सैन्य कार्रवाई हुई, तो कहीं कठोर आर्थिक प्रतिबंधों से देश की अर्थव्यवस्था को पंगु बना दिया गया।
अमेरिका की यह नीति संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय मंचों की अवहेलना करती दिखती है। अंतरराष्ट्रीय कानून और देशों की संप्रभुता की बात तब तक ही की जाती है, जब तक वे अमेरिकी हितों के अनुकूल हों।
वेनेजुएला: तेल, सत्ता और हस्तक्षेप
वेनेजुएला के पास दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार हैं। यही तथ्य उसे अमेरिका की नजर में रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है। 1999 में ह्यूगो चावेज़ के सत्ता में आने के बाद वेनेजुएला ने संसाधनों पर राज्य का नियंत्रण बढ़ाया और अमेरिकी प्रभाव से दूरी बनाई। यहीं से टकराव की शुरुआत हुई।
अमेरिका ने वेनेजुएला पर लगातार आर्थिक प्रतिबंध लगाए, जिनका सीधा असर आम जनता पर पड़ा—दवाइयों और खाद्यान्न की कमी, महंगाई और बेरोज़गारी। इन प्रतिबंधों को “लोकतंत्र बहाली” के नाम पर जायज़ ठहराया गया, लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी देश की जनता को भूखा रखकर लोकतंत्र लाया जा सकता है?
साफ है विश्व राजनीति में स्वयं को लोकतंत्र, मानवाधिकार और नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था का सबसे बड़ा पैरोकार बताने का उसका दावा पूरी तरह झूठा है , व्यवहार में उसकी विदेश नीति अक्सर अपने संकीर्ण हितों के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है। शीतयुद्ध से लेकर आज तक अमेरिका ने अपनी आर्थिक, सामरिक और रणनीतिक प्राथमिकताओं के लिए अनेक देशों में हस्तक्षेप किया है। वेनेजुएला इसका ज्वलंत उदाहरण है, लेकिन यह दादागिरी केवल लैटिन अमेरिका तक सीमित नहीं रही—भारत जैसे संप्रभु और लोकतांत्रिक देश भी समय-समय पर इसके दबाव और दोहरे मापदंडों का अनुभव करते रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, पाकिस्तान जैसे देशों से उसकी निकटता इस पूरी नीति के विरोधाभास को उजागर करती है।
वेनेजुएला में संसाधनों के लिए वह दबाव की राजनीति पर उतारू है
वेनेजुएला के विशाल तेल भंडार उसे अमेरिका की रणनीतिक दृष्टि में अत्यंत महत्वपूर्ण बनाते हैं। ह्यूगो चावेज़ और बाद में निकोलस मादुरो की सरकारों ने जब अमेरिकी प्रभाव से दूरी बनाई और संसाधनों पर राष्ट्रीय नियंत्रण बढ़ाया, तो अमेरिका ने “लोकतंत्र बहाली” के नाम पर कठोर आर्थिक प्रतिबंध थोप दिए। इन प्रतिबंधों का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव आम जनता पर पड़ा—महंगाई, दवाइयों और खाद्यान्न की कमी, और सामाजिक संकट।
यह प्रश्न आज भी प्रासंगिक है कि क्या किसी देश की संप्रभुता को कमजोर कर, उसकी जनता को आर्थिक रूप से दंडित करके लोकतंत्र लाया जा सकता है, या फिर यह संसाधनों पर नियंत्रण पाने की रणनीति भर है?
भारत की बात करें तो यहां भी अमेरिका का दोहरा चरित्र सामने आया है कल ही आए उनके ताजा बयान ने भी यही सिद्ध किया है उन्होंने कहा है कि भारत ने हमारी बात नहीं मानी तो ‘हम उन पर बहुत जल्दी टैरिफ़ बढ़ा’ सकते ट्रम्प का यह लहजा
भारत पर दादागिरी और दबाव को दर्शाता है।भारत और अमेरिका के संबंधों को अक्सर “रणनीतिक साझेदारी” कहा जाता है, लेकिन इस साझेदारी में बराबरी का भाव हमेशा नहीं दिखता। अमेरिका समय-समय पर भारत पर दबाव डालता रहा है—चाहे वह रक्षा सौदों में शर्तें हों, ऊर्जा नीति पर आपत्तियां, या फिर भारत-रूस और भारत-ईरान संबंधों को लेकर धमकियां।
भारत की स्वतंत्र विदेश नीति—जो राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देती है—अमेरिका को कई बार असहज करती रही है। कश्मीर जैसे संवेदनशील आंतरिक मुद्दों पर बयानबाजी, मानवाधिकार के नाम पर चुनिंदा आलोचना और व्यापारिक प्रतिबंधों की धमकी, यह सब उसी दादागिरी की झलक है, जिसमें अमेरिका स्वयं को वैश्विक निर्णायक समझता है।
पाकिस्तान से निकटता दोहरा मापदंड
अमेरिका की नीति का सबसे बड़ा विरोधाभास पाकिस्तान के प्रति उसके रवैये में दिखता है। एक ओर वह आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई की बात करता है, वहीं दूसरी ओर लंबे समय तक पाकिस्तान को सैन्य और आर्थिक सहायता देता रहा है। भारत लगातार सीमा पार आतंकवाद का सामना करता रहा, लेकिन अमेरिकी नीतियों में पाकिस्तान के प्रति नरमी और भारत के प्रति “संयम बरतने” की सलाह देखने को मिली।
यह दोहरा मापदंड स्पष्ट करता है कि अमेरिका के लिए मूल्य नहीं, बल्कि हित सर्वोपरि हैं। जहां रणनीतिक लाभ देखता है, वहां लोकतंत्र और मानवाधिकार के सिद्धांत पीछे छूट जाते हैं।
वैश्विक व्यवस्था पर असर
अमेरिका की यह दादागिरी केवल वेनेजुएला, भारत या पाकिस्तान तक सीमित नहीं है। यह पूरी वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित करती है। जब एक महाशक्ति अपने नियम स्वयं तय करने लगे, तो संयुक्त राष्ट्र जैसे संस्थानों की विश्वसनीयता कमजोर होती है और छोटे-बड़े देशों की संप्रभुता खतरे में पड़ती है।
भारत जैसे देशों के लिए यह चुनौती और अवसर दोनों है—चुनौती इसलिए कि दबाव का सामना करना पड़ता है, और अवसर इसलिए कि बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में अपनी स्वतंत्र भूमिका को और मजबूत किया जा सकता है।
निष्कर्ष
वेनेजुएला पर प्रतिबंध, भारत पर रणनीतिक दबाव और पाकिस्तान से निकटता—ये तीनों पहलू मिलकर अमेरिका की वैश्विक नीति का असली चेहरा दिखाते हैं। लोकतंत्र और मानवाधिकार की भाषा अक्सर केवल आवरण होती है; भीतर छिपा लक्ष्य होता है—संसाधन, वर्चस्व और भू-राजनीतिक नियंत्रण।
आज जरूरत है कि दुनिया, विशेषकर भारत जैसे आत्मविश्वासी लोकतंत्र, अमेरिकी दादागिरी को समझें, संतुलित लेकिन दृढ़ रुख अपनाएं और अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता व समानता के सिद्धांतों की मजबूती से रक्षा करें। क्योंकि यदि ऐसा नहीं हुआ, तो आज वेनेजुएला है—कल कोई और देश।

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