Homeप्रमुख खबरेंआखिर अपनों को आहत कर क्या संदेश देना चाहती है भाजपा ?

आखिर अपनों को आहत कर क्या संदेश देना चाहती है भाजपा ?

 त्वरित  टिप्पणी
    प्रवीण दुबे 
आज भाजपा की 19 राज्यों में सरकारें हैं केन्द्र में भाजपा सत्तासीन है निश्चित ही यह पार्टी के नीतिनिर्माताओं के लिए बेहद गर्व का विषय है,लेकिन इसके साथ जब यह बात सामने आती है कि पार्टी को जिन नेताओं ने पाला पोसा उसे यहां तक पहुंचाने में जिनका खून पसीना लगा है उनकी अनदेखी हो रही है, तो मन ग्लानि से भर उठता है। यह सच है कि इसका श्रेय किसी एक दो नेता को नहीं दिया जा सकता लाखों लाख कार्यकर्ताओं का इसके पीछे श्रम और सर्वस्व समर्पण का भाव निहित है। लेकिन यह जरूरी है कि कार्यकर्ता निर्माण के लिए कुछ आदर्श प्रस्तुत किया जाना बेहद आवश्यक है। तभी उनका निर्माण होगा और तभी उनके भीतर यह भाव जागृत होगा कि यह सफर केवल सत्ता प्राप्ति के लिए शूरू नहीं हुआ था इसके पीछे अंतिम छोर पर खड़े मानव की सेवा और सहयोग का भाव निहित था।
इस परिप्रेक्ष्य में यदि भोपाल की  अहम पार्टी बैठक में राजमाताजी के चित्र को न लगाए जाने और उसको लेकर उनकी पुत्री यशोधरा राजे के नाराज होने के घटनाक्रम को देखा जाए तो बहुत सारे सवाल खड़े होते हैं । सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि जिस बैठक में सत्ता और संगठन का शीर्ष नेतृत्व उपस्थित था उसमें इतनी बड़ी और गम्भीर चूक की ओर किसी का ध्यान क्यों नहीं गया ? 
आआश्चर्य की बात है कि मध्यप्रदेश ही नहीं पूरे देश में पार्टी को तन मन धन के साथ खड़ी करने वाली राजमाताजी की याद किसी को क्यों नहीं आयी ?
 जैसा कि यशोधरा राजे ने कहा कि राजमाताजी को पार्टी का काम करते पैरों में छाले पड़ जाते थे । निःसन्देह राजमाताजी का जीवन संगठन के लिए राजश्री सुख सुविधाएं छोड़ सर्वस्व समर्पण की प्रेरणादायक जीवनगाथा है जिसका स्मरण कराकर पार्टी कार्यकर्ताओं को बहुत कुछ सन्देश दिया जा सकता है। 
जब ऐसे व्यक्तित्व की अनदेखी होती है तो गुस्सा जायज है।  सर्वविदित है कि पिछले कुछ वर्षों में भाजपा के तमाम पार्टी नेताओं जिसमें खुद मुख्यमंत्री का नाम भी शामिल है एक ऐतिहासिक घटनाक्रम को लेकर  सिंधिया राज परिवार निशाने पर रहा है। इसने पूरे परिवार को आहत भी किया है। वह पार्टी जिसे खड़ा करने में सिंधिया परिवार खासकर राजमाताजी का बड़ा योगदान रहा हो उसी पार्टी से जब अपनों द्वारा ही खानदान को आहत करने वाले शब्दबाण आ रहे हों तो मन का दुखी और आहत होना लाजमी है।
ऐसी स्थिति में  ऐसा लगता है भाजपा की अहम बैठक से राजमाताजी के चित्र को गायब देखकर यशोधरा ने यह अर्थ लगाया कि यह सिंधिया परिवार को नीचा दिखाने की मानसिकता का ही एक अंग है और उनका गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा। यह सच है कि यशोधरा राजे को कईबार बहुत जल्दी गुस्सा आ जाता है वह यह भूल जाती हैं कि उन्हें खुद भी राजमाताजी के व्यक्तित्व कॄतित्व को आत्मसात करने की जरूरत है। यदि आज शांत चित्त होकर वह अपनी बात रखतीं तो ज्यादा अच्छा होता। उधर पार्टी को भी यशोधरा की नाराजगी जल्द से जल्द दूर करना होगी उन्हें विश्वास दिलाना होगा कि राजमाताजी के त्याग को पार्टी कभी भूल नहीं सकती।
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