सम्पादकीय
मध्यप्रदेश में उपचुनाव से ठीक पहले सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी ने संगठनात्मक रूप से एक बड़ी नियुक्ति करके साफतौर पर यह संकेत दे दिया है की पार्टी हर मोर्चे पर कांग्रेस को पटखनी देने के लिए कमर कस चुकी है। उल्लेखनीय है की भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह ने एक पत्र जारी करके हितानंद शर्मा को मध्यप्रदेश भाजपा का सह संगठनमंत्री नियुक्त किया था। इस नियुक्ति को लेकर एक प्रमुख बात यह है की इस बारे में मध्यप्रदेश भाजपा के संगठन से जुड़े शीर्ष के एक दो नेताओं को ही इसकी जानकारी दी गई थी। मतलब स्पष्ट है भाजपा के पितृ संगठन ने इस नियुक्ति पर सीधे अपने वीटो पावर का इस्तेमाल किया है। यही वजह है की इस नियुक्ति की न तो पार्टी और न ही मीडिया को भनक लगी। निःसंदेह यह संघ का अपना कार्य करने का तरीका है लेकिन इसका मतलब यह कदापि नहीं लगाया जाना चाहिए की संघ या फिर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व बिना विचारे ही कोई भी निर्णय ले लेता है। मध्यप्रदेश में सह संगठनमंत्री की नियुक्ति की ही बात करें तो यह बिना सोचे विचारे लिया गया निर्णय कतई नहीं कहा जा सकता । इसे समझने के लिए पिछले एक माह से पार्टी और संगठन के भीतर चल रही गतिविधियों पर नजर डालना होगी । भाजपा को समझने वाले इस बात को साफ तौर पर यह महसूस कर रहे थे की पार्टी में जो कुछ हो रहा है वह ठीक नहीं है और संगठन खासकर के संघ की इस पर पैनी नजर है।इस बात का प्रमाण इस बात से लगाया जा सकता है की भाजपा में संगठन के सबसे ताकतवर चेहरा माने जाने वाले राष्ट्रीय संगठनमंत्री बी एल संतोष ने पिछले दिनों प्रदेश की राजधानी भोपाल में डेरा डाला था। सूत्रों के मुताबिक श्री संतोष का यह भोपाल प्रवास आगामी उपचुनाव के मद्देनजर सत्ता और संगठन में बेहतर तालमेल बनाने के उद्देश्य पर केंद्रित था। भाजपा के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष ने भोपाल में 27 सीटों का रिव्यू किया। एक-एक सीट के लिए उन्होंने 5-5 मिनट दिए। इस दौरान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा और संगठन महामंत्री सुहास भगत मौजूद रहे। सभी सीटों के जातिगत समीकरणों के साथ पार्टी की तैयारियों पर उन्होंने बात की। साथ ही कहा कि चुनावी गतिविधियों के साथ कार्यकर्ताओं के मोबलाइजेशन के लिए केंद्रीय नेतृत्व से मिले कार्यक्रमों को भी तेजी से किया जाए। इससे पहले संतोष ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समिधा कार्यालय पहुंचकर क्षेत्रीय प्रचारक दीपक विस्पुते से भी मुलाकात की थी भाजपा और संघ से जुड़े सूत्रों की माने तो समिधा से श्री संतोष को जो कुछ फीडबैक मिला वह बेहद चौकाने वाला था। श्री संतोष के ध्यान में जो बातें लाई गई वे सत्ता और संगठन के बीच समन्वय की कमी को इंगित कर रहे थे। महत्वपूर्ण
बात यह थी की उपचुनाव के दौर में इस मनमुटाव ओर समन्वय की कमी ने श्री संतोष को परेशान कर दिया। इस बात से उन्होंने पार्टी अध्यक्ष को अवगत कराया । भाजपा शीर्ष नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती चुनाव के मद्देनजर किसी भी संगठनात्मक पद से परिवर्तन न करते हुए हालात में बदलाव का रास्ता निकालने की थी। और ऐसी स्थिति में किसी को हटाए बिना ऐसी नियुक्ति का रास्ता निकालने का तय किया गया जो मध्यप्रदेश में भाजपा और शीर्ष नेतृत्व के बीच रहकर स्थिति खासकर समन्वय के बिगड़ते तानेबाने को ठीक कर सके। और इसके लिए ही सह संगठनमंत्री के रूप में संघ से जुड़े प्रचारक हितानंद शर्मा का नाम तय किया गया। देखना दिलचस्प होगा की शर्मा अपनी कसौटी पर कितना खरे उतरते हैं ,ऐसा इसलिए क्यों की मध्यप्रदेश भाजपा में इस समय तमाम बड़े राजनीतिक प्रभाव वाले नेताओं का बोलबाला है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को खुद सत्ता का पन्द्रह सालों का तजुर्बा है वहीं नरेंद्र सिंह तोमर, ज्योतिरादित्य सिंधिया, नरोत्तम मिश्रा जैसे तमाम दिग्गज सक्रीय हैं उधर संगठन की बात करें तो अध्यक्ष वीडी शर्मा और प्रदेश संगठनमंत्री सुहास भगत सहित हाल ही में तैनात चार महामंत्री हैं। चुनाव के समय जहां सत्ता के अपने स्वार्थ लाभ होते हैं वहीं संगठन को भी अपनी मर्यादा में रहकर अच्छे समन्वय व तालमेल के बीच हँसमुख वातावरण का निर्माण बनाने की चुनौती होती है । निःसंदेह राष्ट्रीय संगठनमंत्री संतोष ने इसमें कहीं न कहीं कोई कमी महसूस की इसी के फलस्वरूप मध्यप्रदेश भाजपा को हितानंद शर्मा के रू में एक नया चेहरा मिला है। फ़िलहाल उपचुनाव के कारण संगठन ने भले ही अभी किसी को पद से हटाने का निर्णय न लिया हो लेकिन यदि हितानंद शर्मा उपचुनाव में अपनी नियुक्ति को सार्थकता प्रदान करने में सफल रहे तो चुनाव बाद मध्यप्रदेश में संगठन में बड़ा परिवर्तन देखने को मिल सकता है। हितानंद की नियुक्ति को इसकी शुरुआत कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होना चाहिए।
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