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इतिहास छुपाने का महापाप क्यों

 

प्रवीण दुबे

१५ अगस्त अर्थात एक ऐसा दिन जब हमें परतंत्रता की बेडिय़ों से मुक्ति मिली थी, यह वही दिन है जब भारत की धरती पर दो सौ वर्षों तक लहराने वाले यूनियन जेक की जगह हमारे प्यारे तिरंगे ने ली थी। यह शान का दिन है, स्वभिमान का दिन है यह उन हुतात्माओं को स्मरण करने का दिन है जिनके बलिदान और संघर्ष के कारण हम स्वतंत्र हवा में सांस ले रहे हैं, लेकिन इस पावन दिवस को मनाने से पूर्व हमारे देश के नेता एक बड़ी भूल करते रहे हैं। कौन सी है वह भूल? वह भूल है हमारी आने वाली पीढ़ी को अंधेरे में रखने की, उन्हें स्वतंत्रता के सही इतिहास से अवगत न कराने की, उन्हें यह न बताने की कि १५ अगस्त १९४७ की स्वतंत्रता से पूर्व हमारा देश खंड खंड हो गया था। जो नेता १५ अगस्त १९४७ को भारत की स्वतंत्रता की उद्घोषणा करते और हमारे राष्ट्रीय ध्वज को फहराते दिखाई दिए, उन्होंने कभी भी हमारी नई पीढ़ी को यह नहीं बताया कि १५ अगस्त को जो स्वतंत्रता हमें मिली उस स्वतंत्रता में वो रावी का तट ही हमसे छिन गया जहां १९२९ में देश के बड़े नेताओं ने एकत्र होकर संपूर्ण स्वतंत्रता का संकल्प लिया था। इतना ही नहीं हमारा पवित्र लवपुर जिसे लाहौर कहा गया वह भी चला गया, चला गया दाहिर का सिंध और मां भवानी का प्रसिद्ध हिंगलाज मंदिर भी पराया हो गया, लवकुश ने जहां जन्म लिया वह भी भारत का नहीं रहा। यह सारा पाप हमारे नेताओं ने क्यों किया? आज इस पर ज्यादा चर्चा करना शायद ठीक नहीं होगा, लेकिन यह पाप किस दिन किया गया यह बताने का सबसे उपयुक्त समय आज से बेहतर कोई नहीं कहा जा सकता। १५ अगस्त से ठीक पहले अर्थात १४ अगस्त की रात्रि १२ बजे हमारी भारत माता के अंग खंड-खंड करने का यह महापाप हुआ। आज ही का वह दिन था जब धर्म के आधार पर भारत के टुकड़े हुए और पाकिस्तान अस्तित्व में आया।
क्या हमारी पीढ़ी को देश विभाजन की इस घटना से अवगत नहीं कराया जाना चाहिए? क्या उन्हें यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि जो पाकिस्तान आज हमारे लिए सबसे बड़ा नासूर बना हुआ है उसके अस्तित्व के लिए हमारे ही वह नेता जिम्मेदार हैं जिन्होंने भारत विभाजन को स्वीकार किया। यदि भारत विभाजन के उस कागज पर हस्ताक्षर नहीं किए जाते तो आज न पाकिस्तान होता और न ही कश्मीर समस्या हमारा सिरदर्द बनती। यह गलती हमारे नेताओं ने की इसके दुष्परिणाम पूरा देश आज तक भुगत रहा है, लेकिन इस कहानी को छुपाकर हम उससे भी बड़ी गलती कर रहे हैं।
देश में आज नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में प्रबल राष्ट्रवादी सरकार सत्तासीन है। आखिर फिर क्यों इस दिशा में विचार नहीं हो रहा। क्यों इस पर चिंतन नहीं हो रहा कि १४ अगस्त को अखंड भारत दिवस घोषित किया जाए? आखिर भारत के समृद्ध और वैभवशाली इतिहास से नई पीढ़ी को अवगत कराने का इससे बेहतर दिन और क्या हो सकता है? १४ अगस्त के दिन हम अपनी पीढ़ी को बड़े शान और गौरव से यह बता सकते हैं कि आज से १२५५ वर्ष पूर्व अखंड भारत की सीमा में अफगानिस्तान, पाकिस्तान, नेपाल, तिब्बत, भूटान, बांग्लादेश, वर्मा, इंडोनेशिया, कंबोडिया, वियतनाम, मलेशिया, जावा, सुमात्रा, मालदीव शामिल थे। हिन्दूकुश से लेकर अरुणाचल, कश्मीर से कन्याकुमारी और पूर्व में अरुणाचल से इंडोनेशिया तथा पश्चिम में हिन्दूकुश से लेकर अरब की खाड़ी तक भारत एक था। हमारे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के मन में भी भारत के इस अखंड स्वरूप की परिकल्पना थी और वह इस संपूर्ण भू क्षेत्र अपना प्यारा तिरंगा लहराते देखना चाहते थे, इसीलिए उन्होंने अपनी कविता में कहा था।
वह दिन दूर नहीं खंडित भारत को
पुन: अखंड बनाएंगे
गिलगिट से गारो पर्वत तक
तिरंगा झंडा फहराएंगे।
उपयुक्त राजनीतिक वातावरण और स्पष्ट बहुमत न होने के कारण अटल जी अपनी यह इच्छा पूरी नहीं कर सके, अब उनके विचारों वाली सरकार एक मजबूत बहुमत के साथ शासन में है अत: १४ अगस्त के दिन को अखंड भारत के गौरवशाली इतिहास से अवगत कराने की दिशा में प्रयास प्रारंभ होना चाहिए, यही वह समय है।
अब भारत का भूगोल
बदलने का वक्त है
अगर हमारे शरीर में
स्वाभिमान का रक्त है।

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