प्रवीण दुबे
चुनाव आयोग द्वारा मतदान की तारीख घोषित करने के साथ ही मध्यप्रदेश में राजनीति का हाईवोल्टेज ड्रामा शुरू हो गया है। चन्द घण्टे बाद ही प्रदेश की राजधानी में एक सोशल एक्टीविस्ट ने प्रदेश सरकार के एक निर्णय के खिलाफ चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाकर इस बात के संकेत दे दिए कि अब न सरकार की और न विपक्ष की मनमानी चलेगी, चलेगा तो सिर्फ चुनाव आयोग का डंडा, और जिसने भी आयोग द्वारा निर्धारित आचरण सहिंता की अनदेखी की उसे परिणाम भुगतने को तैयार रहना होगा।
सभी राजनीतिक दलों की यह जिम्मेदारी है कि वे चुनाव आयोग द्वारा तय दिशानिर्देशों का पालन करें जिससे लोकतंत्र के इस महाकुम्भ को बिना किसी तनाव और अशांति के पूर्ण किया जा सके।
यह सच है कि वर्तमान विधानसभा चुनाव की तुलना 2013 या उससे पूर्व के विधानसभा चुनावों से की जाए तो बहुत कुछ बदला हुआ है। एक तरफ जहां राजनीति के चाल चेहरे और चरित्र में तेजी से परिवर्तन आया है वहीं राजनेताओं की भाषा, कार्य व्यवहार राजनीति के मूल सिद्धांतों को मुंह चिढ़ाते से नजर आते हैं। मर्यादा की लक्षमण रेखा को मानने कोई भी तैयार नहीं है। ऐसी स्थिति में आदर्श चुनाव आचरण सहिंता का पालन करना और कराना दोनों ही बेहद कठिन कार्य कहा जा सकता है।
इस चुनाव में चुनाव आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती यदि कोई है तो वह सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव कहा जा सकता है। कब किस क्षण कोई फेक खबर समाज में विषवमन कर आग लगा देगी यह किसी को भी नहीं मालूम। इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि हमारे देश में चुनाव के समय सोशल मीडिया का इस्तेमाल माहौल को खराब करने में ज्यादा किया जाता रहा है।
इसे नियंत्रित करना चुनाव आयोग के लिए सबसे बड़ी चुनौती कहा जा सकता है। पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में इस चुनाव में सोशल मीडिया का सर्वाधिक उपयोग होने जा रहा है।
इससे पहले हुए विधानसभा चुनाव में और इस चुनाव में मोबाइल इंटरनेट के सहारे सोशल मीडिया का प्रयोग करने वालो की संख्या चार गुना हो गई है ।यह भी जगजाहिर तथ्य है की देश में इंटरनेट प्रयोग करने वालों की संख्या में सर्वाधिक वृद्धि हिंदी भाषी क्षेत्रों में हुई है।यही वजह है कि सभी राजनीतिक दलों ने अपने सोशल मीडिया और तकनीक के बूते प्रचार करने वालों की बड़ी फौज मैदान में उतारी है।
यह फ़ौज चुनाव आदर्श आचरण सहिंता का पालन करे यह सबसे बड़ी चुनौती कही जा सकती है। जैसे जैसे सोशल मीडिया की ताकत बढ़ी है वैसे वैसे मर्यादा उल्लंघन के मामले भी बड़ी संख्या सामने आ रहे है। हमारे देश की यह एक कड़वी सच्चाई है कि आई टी नियमों के तहत इस वर्ग को उसके उत्तदायित्वों के प्रति जागरूक करने में चुनाव आयोग जैसी संस्थाएं बहुत पीछे हैं।
सोशल मीडिया के अलावा इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया की भूमिका भी चुनावी माहौल में बेहद अहम हो जाती है। इस मौसम में तमाम राजनीतिक दल अपने मन माफिक समाचार छपवाने के लिए पैकेज का सहारा लेते हैं। बड़ी चतुराई से पेड न्यूज प्रकाशित की जाती हैं। जोकि स्वस्थ लोकतंत्र निर्माण के लिए बेहद नुकसानदेह है। हालांकि इसको लेकर चुनाव आयोग सख्त हुआ है और राजनीतिक दलों उनके नेताओं पर कार्यवाही भी की गई हैं बावजूद इसके इसमें और बहुत कुछ किये जाने की आवश्यकता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
कुल मिलाकर चुनाव की रणभेरी बज चुकी है,अब चुनावी मौसम में राजनीतिज्ञों में जोश है हर कीमत पर अपने प्रतिद्वंद्वी को परास्त करने की चतुर चालें हैं ।ऐसे वातावरण में जनता भृमित न हो सब कुछ नियंत्रण में रहे सीमा उल्लंघन न हो इसकी जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है। हां इस समय हमारी और आपकी अर्थात जनता जनार्दन की भूमिका भी बहुत बढ़ जाती है। हमारे चारों तरफ शोर शराबा होगा, नेता चरणवंदन कर चक्कर लगाएंगे , तमाम नारे गुंजायमान होंगे सबसे बड़ी बात तो प्रलोभन की चाशनी भी हमें परोसी जाएगी । यही समय है हमारी परीक्षा का और इसमें खरा उतरने में ही हमारे लोकतंत्र की सफलता होगी।