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कहीं मध्यप्रदेश भाजपा के लिए बड़ा सिरदर्द तो नहीं बनती जा रही है ज्योतिरादित्य की सशर्त एंट्री

संपादकीय

एक तरफ शिवराज सरकार की सत्ता वापसी के सौ दिन और दूसरी ओर भोपाल से दिल्ली  तक जोरदार राजनीतिक गहमा गहमी , पहले मुख्यमंत्री शिवराज का मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर तीन दिनों तक दिल्ली में डेरा डालना फिर अचानक नरोत्तम मिश्रा का दिल्ली कूच मध्यप्रदेश के सत्ता व संगठन के शीर्ष नेतृत्व की जगह भाजपा के कर्णधार प्रधानमंत्री मोदी,अमितशाह ओर नड्डा तक बात पहुंचना और अब देर रात मुख्यमंत्री का वापस भोपाल लौटना तथा मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर जितने मुंह उतनी बातें सामने आना। आखिर इस सब घटनाक्रम का क्या संकेत है ?  क्या ज्योतिरादित्य सिंधिया की भाजपा में हुई सशर्त एंट्री अब उसके भीतर कलह का कारण बन गई है ? या फिर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने मध्यप्रदेश की सत्ता हासिल करने के लिए यह कदापि मंथन करने का दूरगामी सोच नहीं दिखाया की आगे क्या होगा ? यही वजह है की अब मध्यप्रदेश में भाजपा के लिए कोई भी निर्णय लेना टेड़ी खीर साबित हो रहा है। एक तरफ उपचुनाव में जनता के बीच जाने का टेंशन है तो दूसरी ओर ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ सशर्त आये विधायकों से किया वादा बड़ी समस्या है। इस सबके बीच पार्टी के भीतर तमाम नेताओं को संतुष्ट रखना सबसे बड़ी चुनौती है। शायद यही वे सब कारण हैं की तीन दिन दिल्ली में इधर से उधर भटकने के बाद शिवराज फिलहाल भोपाल लौट आये हैं।  मंत्रिमंडल को लेकर क्या निर्णय हुआ इसपर वे चुप हैं कोई कह रहा है नाम तय होगये हैं तो कोई कह रहा है की अब मंत्रिमंडल 1 जुलाई को शपथ लेगा। अभी अधिकृत रूप से इसबारे में कोई घोषणा नहीं हुई है। जो होगा कुछ समय में यह सामने आ जाएगा लेकिन तेजी से घूमते मध्यप्रदेश के इस राजनीतिक घटनाक्रम के बीच ऐसी कुछ ताजी बातें हैं जिनकी वजह से मुख्यमंत्री शिवराज का तनाव बढ़ गया है। इनमें पहली बात यह है की प्रदेश के दमदार नेता में शामिल नरोत्तम मिश्रा का अभी भी दिल्ली में रुकना और दूसरी बात यह की मध्यप्रदेश भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं के सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी व्यक्त करना। प्रमाण के रूप में आठ बार के विधायक रह चुके पूर्वमंत्री गोपाल भार्गव का नाम लिया जा सकता है। उन्होंने हाल ही में मीडिया से सार्वजनिक रूप से अपने गुस्से का इजहार करते हुए कहा है की भाजपा की हालत भी कहीं कांग्रेस जैसी नहीं हो जाए। यहां बताना उपयुक्त होगा की मध्यप्रदेश भाजपा संगठन इस बात पर ज्यादा जोर दे रहा है की सरकार में मंत्रीपद युवा व नए नेताओं को दिए जाएं। इसको लेकर गोपाल भार्गव जैसे कई अन्य नेताओं की त्योरियां चढ़ी हुई हैं। अब भाजपा नेतृत्व के सामने यह समस्या खड़ी हो गई है की किसको मनाएं ओर किसको छोड़ें। ज्योतिरादित्य सिंधिया व उनके समर्थक विधायकों को  वादे के अनुसार हर हाल में कृतार्थ करना ही होगा ,बचे हुए स्थानों पर मुख्यमंत्री शिवराज की पसंद को भी ध्यान रखने की मजबूरी सामने है। जैसी की जानकारी आ रही है संगठन उत्तरप्रदेश की तर्ज पर एक या दो उपमुख्यमंत्री के फार्मूले पर भी विचार कर रहा है सम्भावना है की शायद इसी लिए नरोत्तम मिश्रा को अचानक दिल्ली बुलाया गया। खैर जो भी हो एक बात तो खुली किताब की तरह सामने है। मध्यप्रदेश भाजपा ज्योतिरादित्य सिंधिया के आने व पार्टी के अंदर कई छत्रपों के जन्म लेने से इतनी भारी भरकम हो चली है की वो अब  अपनों के लिए ही मुसीबत बन गई है। देखना दिलचस्प होगा की पार्टी के नीतिनिर्धारक इस समस्या कैसे निपटते हैं।

dubeypraveen8152@gmail.com

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