Homeश्रद्धाजंलिकौन कहता है हमारे बीच नहीं हैं अटलजी

कौन कहता है हमारे बीच नहीं हैं अटलजी

                         प्रवीण दुबे
अटल बिहारी वाजपेयी आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन जनमानस को प्रभावित करने वाला उनका बहुमुखी व्यक्तित्व ऊंचा कद चरैवेति चरैवेति को कृतार्थ करती उनकी काया समय के अनुसार बदलती उनकी मुखाकृति कभी खिलखिलाता तो कभी स्थिर समुद्र जैसा गाम्भीर्य और देश काल परिस्थितियों को भांपकर तेजोमय भाल पर खिंच आई चिंता की लकीरें और सरस्वती युक्त वाणी के बीच थोड़ा ठहरकर तर्कसंगत शाब्दिक प्रहार करने वाली छवियों को आजतक देश भूल नहीं पाया है। ऐसा लगता है की ऊंचे कद पर पटलीदार धोती कुर्ता और जवाहर जैकेट पहने हमारे अटल प्यारे अटल अभी सामने से ही चले आ रहे हैं।
 वैसे भी हमारे धर्मग्रंथों में लिखा है महान व्यक्तित्व कभी मरते नहीं हैं केवल शरीर छोड़ते हैं इस दृष्टि से भी अटलजी ने केवल शरीर छोड़ा है वे आज भी इस भरत भू पर विचरण कर रहे हैं जरूरत तो केवल हमें और आपको उन्हें पहचानने की है।
 जब भी सामाजिक राजनीतिक क्षेत्र में कोई अच्छा कार्य होता है अटलजी को महसूस करिए ऐसा लगेगा वह हमारे सामने खड़े है। जब भी कोई अपनी लेखनी से कुछ अच्छा लिखने की कोशिश करता है,जब भी कोई अपनी वाणी से सच बोलकर दिशा देते दिखाई देता है जब भी कोई दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सच बोलने का साहस करता दिखाई देता है जब भी कोई भारत माता के लिए इस देश के लिए सर्वस्व समर्पण करने का संकल्प लेता है जब भी कोई राजनीति की रपटीली राहों में शुचिता के आदर्श स्थापित करता है तो अटलजी जरूर जीवंत दिखाई देते हैं। 
अटलजी जैसे व्यक्तित्व कालजयी होते हैं उनका जहां भी जन्म होता है वो धरा धन्य हो जाती है ,वो अपने कर्मों से ऐसा इतिहास लिख जाते हैं की पूरी दुनिया उन्हें महापुरुष के रूप में याद करती है।
 जरा विचार करिए अटलजी ने जिस परिवार में जन्म लिया उसका न तो कोई राजनीतिक वजूद था न ही उस परिवार की गिनती धनवानों में थी ,राजे रजवाड़ों से भी उस परिवार का कोई दूर दूर तक का रिश्ता नहीं था। हां इतना जरूर था अटलजी ने जिस परिवार में जन्म लिया वह उच्च सनातनी परम्पराओं को धारण करने वाला बिप्र मान्यताओं को अंगीकार कर पठन पाठन को सर्वोपरि मानने वाला था।
शायद यही वह प्रमुख कारण रहा की अटलजी के जीवन पर पहले आर्यसमाज फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रभाव दिखाई दिया। 
जैसा की सर्वविदित है की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को व्यक्ति निर्माण की पाठशाला कहा जाता है । अटलजी का जीवन उस उक्ति को सौ प्रतिशत चरितार्थ करता है। सामान्य परिवेश में पढ़ाई लिखाई पूरी करने के बाद। अटलजी ने अपना सम्पूर्ण जीवन भारत माता के श्री चरणों में अर्पित करने का निश्चय किया । जैसा की उन्होंने खुद कहा 
“भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,
जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।
हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है,
पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं।
पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं।
कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है।
यह चन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है,
यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है।
इसका कंकर-कंकर शंकर है,
इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है।
हम जियेंगे तो इसके लिये
मरेंगे तो इसके लिये”।
 
घरबार छोड़ना,सारी सुख सुविधाओं के त्याग का संकल्प लेकर उसे जीवनभर कृति रूप में चरितार्थ करना यह कोई सामान्य पुरूष के वश की बात नहीं है। अपने लक्ष्य के लिए इस प्रकार के संकल्प को धारण करना भीष्म प्रतिज्ञा जैसा है और अटलजी ने भीष्म जैसी प्रतिज्ञा को पूर्ण करके दिखाया । जिस समय देश में सनातनी परम्पराओं को कायम रखने एकात्म मानववाद के उच्च आदर्श स्थापित करने व इस राष्ट्र को परमवैभव पर पहुंचाने के लिए राजनीतिक क्षेत्र में प्रतिभाशाली व्यक्तियों  की तलाश संघ को थी उस समय पंडित दीनदयाल उपाध्याय के समकक्ष सबसे पहले अटलजी का नाम ही सबकी ध्यान में आया। 
अटलजी भी इस कसौटी पर पूरी तरह से खरे उतरे। जिस महान उद्देश्यों की स्थापना के लिए गुरु गोलवलकरजी व संघ के अन्य लोगों ने अटलजी को राजनीतिक क्षेत्र में भेजा था अटलजी ने प्राण त्यागते समय तक उन्हें कायम करके दिखाया। कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होना चाहिए की जनसंघ की स्थापना फिर भारतीय जनता पार्टी  की शुरुआत से आज पूरे देश में जो भगवा लहर दिखाई देती है उसके पीछे अटलजी का अनन्त योगदान है। या यूं कहा जाए की बहुत बड़ी तपस्या है तो ज्यादा उपयुक्त होगा। 
अटलजी राजनीति में इसलिए नहीं गए थे की उनके परिवार की या फिर उनके स्वंय की कोई प्लानिंग थी उनके परिवार का राजनीति से दूर दूर तक का कोई सरोकार नहीं था राजनीति में कदम रखने से पूर्व अटलजी अपनी बहुमुखी प्रतिभा को स्थापित कर चुके थे। वे एक सफल पत्रकार थे,उनकी कविताएं पूरे देश में राष्ट्रवाद की अलख जगा रही थीं उनकी वक्तृत्व कला के सामने अच्छे अच्छे वक्ता भी नतमस्तक थे। वे पढ़े लिखे भी थे चाहते तो अच्छी नोकरी भी पा सकते थे। 
लेकिन अटलजी ने अपने संगठन के आदेश को सर्वोपरि मानते हुए एक ऐसे नए नवेले राजनीतिक दल में सामान्य कार्यकर्ता के रूप में काम करना स्वीकार किया जिसके पास न तो धन था न नेटवर्क था और न ही कोई संसाधन ।  जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी के गठन और उसके बाद अटलजी जब तक सक्रीय राजनीति में रहे तमाम कालखंड ऐसे आए जब  उन्होंने अपने संकल्प अपने उद्देश्य अपने विचारों के लिए जोरदार संघर्ष किया लेकिन हार नहीं मानी उन्होंने बखूबी खुद के द्वारा लिखी कविता को अपने जीवन में कार्य रूप में सिध्द किया।
 
हार नहीं मानूंगा, रार नई ठानूंगा,
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं,
गीत नया गाता हूं.
 
वो अटलजी ही थे  देश में दूसरा लोकसभा चुनाव 1957 में हुआ था। उस दौरान अटल बिहारी वाजपेयी बलरामपुर सीट (उत्तर प्रदेश) से सांसद बने थे। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने दिल्ली में एक ब्रिटिश राजनेता से अटलजी की मुलाकात करवाई थी। तब नेहरू जी ने कहा था- इनसे मिलिए। यह युवा एक दिन देश का प्रधानमंत्री बनेगा। 

हिंदी भाषा पर अटलजी की काफी अच्छी पकड़ थी। राष्ट्रीय और वैश्विक राजनीति पर पकड़ और जोरदार भाषणों ने उन्हें संसद में चर्चित कर दिया था। अटलजी सत्ता की नीतियों के विरोध में प्रभावी भाषण देते थे और इन्हीं का जिक्र नेहरू जी ने अटलजी का परिचय करवाते वक्त किया। नेहरू जी ने कहा था- ये मेरा विरोध करते रहते हैं, लेकिन इनमें मैं काफी संभावनाएं देखता हूं। नेहरू जी स्वयं अच्छे वक्ता थे और उन्होंने राजनीतिक मतभेदों से परे जाकर अटलजी की भाषण कला को सराहा था।

जरा सोचिये उस कालखण्ड के बारे में जब देश में कांग्रेस और नेहरू की तूती बोलती थी उनके खिलाफ एक शब्द वो भी संसद में बोलने की कोई सोच भी नहीं सकता था। ऐसे समय

  1962 में चीन से हुई जंग में भारत की हार के बाद अटलजी ने एक बार नेहरू जी से पूछा था, ‘‘जब चीन ने सितम्बर और अक्टूबर 1962 में आक्रामक रुख साफ कर दिया था तो कांग्रेस ने कदम क्यों नहीं उठाया? क्या इन सब से सरकार अनजान थी? क्या सरकार इस स्थिति में है कि यह विश्वास दिला सके कि इस तरह की गलतियां भविष्य में नहीं होंगी?’’ इसके बाद वाजपेयी ने केंद्र सरकार से इस्तीफा देने को कहा था।  बड़ी बात यह है की इस वैचारिक हमले के बाद भी अटलजी न केवल राजनीति में बने रहे बल्कि कांग्रेस को कमजोर भी किया।इतना होने के बावजूद अटलजी ने वैचारिक मतभेदों के सामने महान सनातनी परम्पराओं को सदैव अंगीकार रखा यही वजह थी की

  नेहरू जी के निधन के बाद अटलजी ने अपने मतभेदों को दरकिनार करते हुए नेहरू जी की विचारधारा और नीतियों की प्रशंसा की थी। उन्होंने कहा, ‘‘नेता चला गया है, लेकिन उनके अनुयायी हैं। सूरज डूब चुका है तो हमें सितारों की रोशनी में अपना रास्ता ढूंढना होगा। यह परीक्षा का वक्त है। हमें खुद को लक्ष्य के लिए समर्पित करना होगा, जिससे भारत मजबूत, सक्षम और समृद्ध हो सके।’’

अटलजी की इस शोकांजली का नेहरूजी के राजनीतिक दल कांग्रेस के लोगों ने कितना पालन किया यह तो नहीं मालूम लेकिन अटलजी ने अवश्य मरते दम तक अपना जीवन भारत को मजबूत सछम और समृद्ध करने में लगा दिया। आज उज्ज्वल व सशक्त भारत की जो तस्वीर हमारे सामने नजर आती है उसके पीछे अटलजी का बहुत बड़ा योगदान है। कौन भूल सकता है अटलजी के उस अदम्य साहस को जब उन्होंने विश्व की महाशक्ति की धमकियों की चिंता किये बिना न केवल परमाणु परीक्षण किया बल्कि देश के सोये स्वाभिमान को इतना अधिक जागृत कर दिया की भारत के खिलाफ लगाए आर्थिक प्रतिबंध औंधे मुंह धड़ाम हो गए।वह अटलजी ही थे जिन्होंने पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाकर पहले शांति का संदेश दिया और जब पाकिस्तान नहीं माना तो कारगिल युध्द में ऐसा सबक सिखाया की उसे आजतक याद है। 

वास्तव में अटलजी का जीवन उस समुद्र की तरह धीर गम्भीर और विशालता लिए हुए था जो अपने भीतर सबको समाविष्ट करने की क्षमता रखता था  वे शुचिता, देशभक्ति ईमानदारी जनकल्याण आदि के विषयों को लेकर भीतर से जितने मजबूत थे वहीं दूसरी ओर  वे दया करुणा सेवा के लिए भीतर से मोम की तरह मुलायम व करुणा से परिपूर्ण थे। उनकी बालसुलभ निश्छल मुस्कान व भावुकता आज भी देशवासियों को भूली नहीं है। वे अपने देशवासियों के लिए कितने उदार थे यह बात उनकी ही कविता के शब्दों में मेहसूस की जा सकती है।

“मेरे प्रभु, मुझे इतनी ऊंचाई मत देना, गैरों को गले न लगा सकूँ, इतनी रुखाई कभी मत देना”

सच पूछा जाए तो अटलजी के लिए कभी कोई गैर नहीं था उन्होंने एक ओर अपने धुर विरोधी रहे नेहरू की तारीफ की तो इंदिरा गांधी को दुर्गा की संज्ञा से महिमा मंडित करने में भी वे नहीं हिचके दूसरी ओर आज के प्रधानमंत्री और अटलजी के समय गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी को राजधर्म पालन की सीख भी बिना किसी की चिंता किए बिना अटलजी ने देकर राजनीति में  उच्च मानदंड स्थापित किए। आज कलुषित व छल कपट झूठ से घिरे राजनीतिक माहौल में अटलजी जैसे महापुरुषों की बेहद आवश्यकता है। वे भले ही हमारे बीच नहीं है लेकिन उन्होंने अपने जीवन के विविध क्षेत्रों में जो उच्च आदर्श स्थापित किए वो देशवासियों के लिए आधुनिक गीता के समान हैं उसपर जितना लिखा व पढ़ा जाए कम है । ऐसे महामानव को उनके जन्मदिन पर सादर नमन।

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