जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।
हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है,
पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं।
पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं।
कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है।
यह चन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है,
यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है।
इसका कंकर-कंकर शंकर है,
इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है।
हम जियेंगे तो इसके लिये
मरेंगे तो इसके लिये”।
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं,
गीत नया गाता हूं.
हिंदी भाषा पर अटलजी की काफी अच्छी पकड़ थी। राष्ट्रीय और वैश्विक राजनीति पर पकड़ और जोरदार भाषणों ने उन्हें संसद में चर्चित कर दिया था। अटलजी सत्ता की नीतियों के विरोध में प्रभावी भाषण देते थे और इन्हीं का जिक्र नेहरू जी ने अटलजी का परिचय करवाते वक्त किया। नेहरू जी ने कहा था- ये मेरा विरोध करते रहते हैं, लेकिन इनमें मैं काफी संभावनाएं देखता हूं। नेहरू जी स्वयं अच्छे वक्ता थे और उन्होंने राजनीतिक मतभेदों से परे जाकर अटलजी की भाषण कला को सराहा था।
जरा सोचिये उस कालखण्ड के बारे में जब देश में कांग्रेस और नेहरू की तूती बोलती थी उनके खिलाफ एक शब्द वो भी संसद में बोलने की कोई सोच भी नहीं सकता था। ऐसे समय
1962 में चीन से हुई जंग में भारत की हार के बाद अटलजी ने एक बार नेहरू जी से पूछा था, ‘‘जब चीन ने सितम्बर और अक्टूबर 1962 में आक्रामक रुख साफ कर दिया था तो कांग्रेस ने कदम क्यों नहीं उठाया? क्या इन सब से सरकार अनजान थी? क्या सरकार इस स्थिति में है कि यह विश्वास दिला सके कि इस तरह की गलतियां भविष्य में नहीं होंगी?’’ इसके बाद वाजपेयी ने केंद्र सरकार से इस्तीफा देने को कहा था। बड़ी बात यह है की इस वैचारिक हमले के बाद भी अटलजी न केवल राजनीति में बने रहे बल्कि कांग्रेस को कमजोर भी किया।इतना होने के बावजूद अटलजी ने वैचारिक मतभेदों के सामने महान सनातनी परम्पराओं को सदैव अंगीकार रखा यही वजह थी की
नेहरू जी के निधन के बाद अटलजी ने अपने मतभेदों को दरकिनार करते हुए नेहरू जी की विचारधारा और नीतियों की प्रशंसा की थी। उन्होंने कहा, ‘‘नेता चला गया है, लेकिन उनके अनुयायी हैं। सूरज डूब चुका है तो हमें सितारों की रोशनी में अपना रास्ता ढूंढना होगा। यह परीक्षा का वक्त है। हमें खुद को लक्ष्य के लिए समर्पित करना होगा, जिससे भारत मजबूत, सक्षम और समृद्ध हो सके।’’
अटलजी की इस शोकांजली का नेहरूजी के राजनीतिक दल कांग्रेस के लोगों ने कितना पालन किया यह तो नहीं मालूम लेकिन अटलजी ने अवश्य मरते दम तक अपना जीवन भारत को मजबूत सछम और समृद्ध करने में लगा दिया। आज उज्ज्वल व सशक्त भारत की जो तस्वीर हमारे सामने नजर आती है उसके पीछे अटलजी का बहुत बड़ा योगदान है। कौन भूल सकता है अटलजी के उस अदम्य साहस को जब उन्होंने विश्व की महाशक्ति की धमकियों की चिंता किये बिना न केवल परमाणु परीक्षण किया बल्कि देश के सोये स्वाभिमान को इतना अधिक जागृत कर दिया की भारत के खिलाफ लगाए आर्थिक प्रतिबंध औंधे मुंह धड़ाम हो गए।वह अटलजी ही थे जिन्होंने पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाकर पहले शांति का संदेश दिया और जब पाकिस्तान नहीं माना तो कारगिल युध्द में ऐसा सबक सिखाया की उसे आजतक याद है।
वास्तव में अटलजी का जीवन उस समुद्र की तरह धीर गम्भीर और विशालता लिए हुए था जो अपने भीतर सबको समाविष्ट करने की क्षमता रखता था वे शुचिता, देशभक्ति ईमानदारी जनकल्याण आदि के विषयों को लेकर भीतर से जितने मजबूत थे वहीं दूसरी ओर वे दया करुणा सेवा के लिए भीतर से मोम की तरह मुलायम व करुणा से परिपूर्ण थे। उनकी बालसुलभ निश्छल मुस्कान व भावुकता आज भी देशवासियों को भूली नहीं है। वे अपने देशवासियों के लिए कितने उदार थे यह बात उनकी ही कविता के शब्दों में मेहसूस की जा सकती है।
“मेरे प्रभु, मुझे इतनी ऊंचाई मत देना, गैरों को गले न लगा सकूँ, इतनी रुखाई कभी मत देना”
सच पूछा जाए तो अटलजी के लिए कभी कोई गैर नहीं था उन्होंने एक ओर अपने धुर विरोधी रहे नेहरू की तारीफ की तो इंदिरा गांधी को दुर्गा की संज्ञा से महिमा मंडित करने में भी वे नहीं हिचके दूसरी ओर आज के प्रधानमंत्री और अटलजी के समय गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी को राजधर्म पालन की सीख भी बिना किसी की चिंता किए बिना अटलजी ने देकर राजनीति में उच्च मानदंड स्थापित किए। आज कलुषित व छल कपट झूठ से घिरे राजनीतिक माहौल में अटलजी जैसे महापुरुषों की बेहद आवश्यकता है। वे भले ही हमारे बीच नहीं है लेकिन उन्होंने अपने जीवन के विविध क्षेत्रों में जो उच्च आदर्श स्थापित किए वो देशवासियों के लिए आधुनिक गीता के समान हैं उसपर जितना लिखा व पढ़ा जाए कम है । ऐसे महामानव को उनके जन्मदिन पर सादर नमन।
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