Homeसम्पादकीयक्या सिंधिया राजवंश की राजनीतिक परम्परा याद है ज्योतिरादित्य को ?

क्या सिंधिया राजवंश की राजनीतिक परम्परा याद है ज्योतिरादित्य को ?

प्रवीण दुबे

 

क्या मुख्यमंत्री कमलनाथ की दो टूक का जवाब देंगे ज्योतिरादित्य सिंधिया ? क्या सड़कों पर उतरकर जनता की आवाज को बुलंद करेंगे सिंधिया ?आजकल मध्यप्रदेश की राजनीति में रूचि रखने वाले हर व्यक्ति के मस्तिष्क में यह सवाल कौंध रहा है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने तो सिंधिया की सड़कों पर उतरने की धमकी को सीधे यह कहकर हवा में उड़ा दिया है की वे सड़कों पर उतरना चाहते हैं तो उतर जाएं। अपरोक्ष रूप से मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अपनी इस गर्वोक्ति से यह संदेश दे दिया की वे सिंधिया को कोई तवज्जो नहीं देते हैं यदि ऐसा नहीं होता तो कमलनाथ उन्हें सीधे ललकारने के बजाए यह भी कह सकते थे की उन्हें वचनपत्र के वादे याद हैं और वे समय रहते उन्हें पूरा करेंगे। लेकिन कमलनाथ ने न केवल वार पर पलटवार किया बल्कि इस मामले को दिल्ली दरबार तक ले जाकर और गरमा दिया । निसन्देह यह कहा जा सकता है की सिंधिया की सार्वजनिक सक्रीयता और जनता के बीच उनकी मुखर होती आवाज के खिलाफ मुख्यमंत्री कमलनाथ टकराव के मूड में नजर आ रहे हैं। यह टकराव फिलहाल थमता नहीं दिख रहा ऐसा इसलिए क्योंकि ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी रविवार की रात पत्रकारों के सामने एकबार फिर सड़कों पर उतरने वाला अपना पुराना बयान दोहरा दिया। आखिर कांग्रेस के इन दो दिग्गजों के टकराव का क्या परिणाम होगा यह तो समय के गर्भ में छिपा है। लेकिन कमलनाथ की दो टूक को सिंधिया हलके में लेंगे और इस बेइज्जती को यूं ही चुपचाप स्वीकार कर लेंगें इसमें थोड़ा संदेह है।ऐसा इसलिए क्योंकि सिंधिया राजपरिवार का इतिहास इस बात का सा क्षी रहा है की उसने कभी भी राजसत्ता के सामने अपने राजश्री वजूद को कभी भी फीका नहीं पड़ने दिया है। कौन भूल सकता है ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी और सिंधिया राजवंश की राजमाता विजयाराजे सिंधिया के उस संघर्ष को जिसमें उन्होंने मध्यप्रदेश की जनता के हितों के लिए कैसे द्वारकाप्रसाद मिश्र की सत्ता को सडको पर उतरकर उखड़ने के लिए मजबूर कर दिया था। बात यहीं समाप्त नहीं होती सिंधिया के पिता माधवराव सिंधिया ने सत्तातंत्र के आगे झुके बगैर कैसे खुद का राजनीतिक दल बनाकर कांग्रेस के होश उड़ा दिए थे। उनके पिता ने कभी भी कांग्रेस के दिग्विजयसिंह जैसे क्षत्रपों के सामने हथियार नहीं डाले औऱ जबतक वे जीवित रहे दिल्ली और चम्बल अंचल में अपनी दमदार धमक का अहसास मध्यप्रदेश के सत्तातंत्र को कराते रहे। माधवराव सिंधिया का भी जीवनपर्यंत संघर्ष जनता जनार्दन की समस्याओं के समाधान और विकास केंद्रित ही रहा और अब उनके पुत्र व सिंधिया राजवंश के महाराज ज्योतिरादित्य ने भी जनहित के लिए ही मध्यप्रदेश के सत्तातंत्र को चुनौती दी है। अब देखना दिलचस्प होगा की उनकी चुनौती पर मिले मुख्यमंत्री कमलनाथ के दम्भपूर्ण जवाब के प्रतिउत्तर में ज्योतिरादित्य सिंधिया क्या कुछ करते हैं। उनके सामने अपने पिता माधवराव सिंधिया की तरह अलग क्षेत्रीय दल बनाने का रास्ता भी है तो दूसरी ओर अपनी दादी और बुआ के रास्ते भाजपा का दामन थामकर अपनी महल की धमक का अहसास सत्तातंत्र को कराने का रास्ता भी खुला है। अब यह तो सिंधिया को ही तय करना होगा की वे कांग्रेस के भीतर रहकर अपने लगातार हो रहे अपमान को सहन करते रहेंगे या फिर अपने राजनीतिक कद को बढ़ाने के लिए कुछ नया करेंगे।

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