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देश को अटलबिहारी जैसा सफल प्रधानमंत्री देने वाली ग्वालियर लोकसभा सीट का क्या है ताजा राजनीतिक हालचाल

देश को अटलबिहारी वाजपेयी जैसा सफल प्रधानमंत्री देने वाली ग्वालियर लोकसभा सीट का इतिहास बड़ा अटपटा रहा है कहने वाले भले ही यह कहें कि ग्वालियर संसदीय सीट सिंधिया राजपरिवार के दबदबे वाली रही है लेकिन इतिहास इस बात का गवाह है कि सिंधिया राजपरिवार के बाहर के राजनीतिज्ञों ने भी यहां से जीत का परचम लहराकर अपनी राजनीति का लोहा मनवाया है। यहां तक कि अटलबिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री पद तक सफलता के झंडे गाड़ते रहे।

ग्वालियर संसदीय सीट की एक विशेषता यह भी रही कि  यहां कभी भी किसी एक पार्टी का दबदबा नहीं रहा आजादी के बाद दो चुनावों में हिंदू महासभा जीती तो उसके बाद कांग्रेस फिर  जनसंघ  भारतीय लोकदल ,उसके बाद कांग्रेस  भारतीय जनता पार्टी फिर कांग्रेस तथा फिर लगातार भारतीय जनता पार्टी जीतती रही है। 

पिछले तीन लोकसभा चुनावों जिसमें एक उपचुनाव भी शामिल है लगातार भाजपा का कब्जा बरकरार है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस ग्वालियर लोकसभा सीट से माधवराव सिंधिया 1984 से लगातार चार चुनाव जीतते रहे वहां से उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कभी कोई चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं दिखाई और स्थिति को भांपते हुए गुना को अपना संसदीय क्षेत्र बना लिया।. मध्यप्रदेश की यह सीट राज्य ही नहीं देश की वीवीआईपी सीटों में से एक है।

 

भाजपा व कांग्रेस प्रत्याशियों की सामाजिक राजनीतिक पृष्ठभूमि

 

वर्तमान लोकसभा चुनाव की बात करें तो एकबार फिर मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही है। भाजपा की ओर से ग्वालियर के महापौर विवेक नारायण शेजवलकर मैदान में हैं तो कांग्रेस की तरफ से लगातार तीन चुनाव हारने वाले अशोक सिंह सामने हैं। दोनों प्रत्याशियों की राजनीतिक पृष्ठभूमि देखी जाए तो विवेक शेजवलकर के परिवार की राजनीतिक शुरुआत आरएसएस पृष्ठभूमि से आती है। इनके दादा ग्वालियर में संघचालक रहे, पिता  दो बार सांसद रहे तथा एकबार सांसद का चुनाव हारे भी, विवेक शेजवलकर दो बार महापौर रहे हैं वे एकबार विधानसभा का चुनाव भी लड़े लेकिन हार गए।

दूसरी ओर कांग्रेस प्रत्याशी अशोक सिंह का परिवार भी आजादी की लड़ाई के समय से ही कांग्रेस से जुड़ा रहा है। इनके दादा कक्का डोंगर सिंह स्वतंत्रता सेनानी रहे और सहज सरल समाजसेवी के रूप में ग्वालियर सहित ग्रामीण अंचल में भी उनकी खासी पकड़ रही। अशोक सिंह के पिता राजेंद्र सिंह कांग्रेस सरकार में लंबे समय तक मंत्री रहे। अशोक सिंह को दिग्विजयसिंह गुट का माना जाता है। पिछले लगातर तीन लोकसभा चुनाव में हारने के बावजूद कांग्रेस ने उन्हें पुनः टिकट दिया है।

2014 में बीजेपी ने यहां से नरेंद्र सिंह तोमर को मैदान में उतारा उन्होंने भाजपा की जीत को आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस के अशोक सिंह को हराया.  पिछले 3 चुनावों से यहां पर बीजेपी को जीत मिलती आ रही है.ग्वालियर लोकसभा में ग्वालियर और शिवपुरी जिले के अंतर्गत विधानसभा की 8 सीटें आती हैं. ग्वालियर के अंदर ग्वालियर ग्रामीण, ग्वालियर, ग्वालियर पूर्व, ग्वालियर दक्षिण, भितरवार, डबरा सीटें आती हैं तो वहीं करेरा और पोहरी सीटें शिवपुरी में आती हैं. यहां की 8 विधानसभा सीटों में से 7 पर कांग्रेस और 1 पर बीजेपी का कब्जा है.

2014 का जनादेश

2014 के चुनाव में नरेंद्र सिंह तोमर ने कांग्रेस के अशोक सिंह को शिकस्त दी थी. इस चुनाव में तोमर को जहां 442796(44.69 फीसदी) वोट मिले थे तो वहीं अशोक सिंह को 413097(41.69 फीसदी) वोट मिले थे. दोनों के बीच हार जीत का अंतर 29699 वोटों का था. वहीं बसपा 6.88 फीसदी वोटों के साथ तीसरे स्थान पर थी. इससे पहले 2009 के चुनाव में राजस्थान की पूर्व सीएम वसुंधरा राजे सिंधिया की बहन यशोधरा राजे सिंधिया यहां से चुनाव जीती थीं.

उन्होंने कांग्रेस के अशोक सिंह को हराया था. इस चुनाव में सिंधिया को 252314(43.19 फीसदी) वोट मिले थे तो वहीं अशोक सिंह को 225723(38.64 फीसदी) वोट मिले थे. सिंधिया ने अशोक सिंह को 26591 वोटों से मात दी. वहीं बसपा 13.09 फीसदी वोटों के साथ इस बार भी तीसरे स्थान पर रही थी.

सामाजिक ताना-बाना

 

 यहां की 51.04 फीसदी आबादी ग्रामीण क्षेत्र और 48.96 फीसदी आबादी शहरी क्षेत्र में रहती है. ग्वालियर में 19.59 फीसदी लोग अनुसूचित जाती के हैं और 5.5 फीसदी लोग अनुसूचित जनजाति 50के हैं.0ई. 2014 के चुनाव में इस सीट पर 52.79 फीसदी वोटिंग हुई थी.

दोनों प्रत्याशियों की स्थिति

ग्वालियर लोकसभा सीट पर ग्रामीण मतदाता निर्णायक भूमिका में कहे जा सकते हैं। यहां की पोहरी करैरा, भितरवार, डबरा व ग्वालियर ग्रामीण सीटों पर ग्रामीण वोटों की बहुलता है। जहां तक भाजपा प्रत्याशी विवेक शेजवलकर की बात है उनकी पकड़ ग्रामीण वोटरों पर कम रही है। उनका पूरा राजनीतिक जीवन ग्वालियर नगरनिगम छेत्र के इर्दगिर्द ही सिमटा रहा है। वो दो बार महापौर रहे अतः शहर में ही राजनीति करते रहे ग्रामीण इलाका उनसे अछूता रहा। यही उनके लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन गया है।  बात यहीं समाप्त नहीं होती। दो बार महापौर रहने के कारण कोई बड़ी उपलब्धि को अंजाम न देना भी विवेक शेजवलकर को परेशानी में डाल रहा है,एक अन्य कारण एंटीइंकम्बेंसी का भी उनके विपरीत जाने से भाजपा को मुसीबत का सामना करना पड़ सकता है।

जहांतक कांग्रेस प्रत्याशी अशोक सिंह का सवाल ही उनकी पारवारिक राजनीतिक पृष्ठभूमि पिछली तीन पीढ़ियों से ग्रामीणों के बीच समाजसेवा की रही है। जिसका की लाभ अशोक सिंह को फिलहाल मिलता दिखाई दे रहा है। लेकिन जमीन कारोबार के  तमाम दुष्परिणाम परेशान कर सकते हैन। अशोक सिंह के के सामने सबसे बड़ी परेशानी कांग्रेस के भीतर से ही खड़ी हो रही वह यह है कि ग्वालियर लोकसभा सीट पर सबसे ज़्यादा प्रभाव रखने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थकों का सहयोग अशोक सिंह को नहीं मिल रहा है क्योंकि वे दिग्विजयसिंह गुट से ताल्लुकात रखते हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि फिलहाल दोनों प्रत्याशियों में कांग्रेस का पलड़ा मामूली रूप से शेजवलकर पर भारी है। भाजपा को आशा है कि 5 तारीख को प्रधानमंत्री मोदी के ग्वालियर में होने वाली आमसभा के बाद स्थिति में बदलाव होगा । अब यह तो वक्त ही बताएगा की 23 मैं को ग्वालियर का सांसद कौन बनेगा।

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