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ग्वालियर में आसान नहीं भाजपा की राह,टिकिट काटने के बाद स्थिति सम्भालने वालों का टोटा

 

प्रवीण दुबे

पार्टी अध्यक्ष अमित शाह हों या फिर संगठनमंत्री रामलाल उन्होंने अबतक मध्यप्रदेश में हुए अपने चुनावी प्रवास के दौरान साफ तौर पर यह संकेत दिए हैं कि इसबार बड़ी संख्या में पार्टी विधायकों के टिकट काटे जाएंगे। यह संख्या 130 तक बताई जा रही है। साफ है कि ऐसी स्थिति में पार्टी को बड़े पैमाने पर आक्रोश का सामना भी करना पड़ेगा। यानि की एक तरफ कुआं और एक तरफ खाई जैसे हालात बनते दिख रहे हैं । पार्टी नेतृत्व पशोपेश में है यदि नाकारा विधायकों को पुनः मैदान में उतारते हैं तो आफत और सिटिंग एमएलए की जगह नए चेहरे को टिकट दिया जाता है तो भीतरघात का डर। अब आखिर समस्या का समाधान क्या ?

भले ही भाजपा का शीर्ष नेतृत्व मध्यप्रदेश में रायशुमारी में व्यस्त है लेकिन उसके लिए सबसे बड़ी मुसीबत इस बात की है कि रूठे कार्यकर्तओं को कैसे मनाया जाए। अकेले ग्वालियर की ही बात करें तो पार्टी से जुड़े तमाम ऐसे नेता सक्रिय दिखाई दे रहे हैं जो पार्टी टिकट दे न दे उन्होंने ताल ठोंकने का मन बना लिया है।

कुछ ऐसे नाम भी हैं जिन्होंने विधायक रहते पिछले पांच वर्ष में ऐसा कुछ नहीं किया कि जनता उन्हें फिर से विधायक चुने, बावजूद इसके वे भी टिकट के दावेदार हैं और यह तय  है कि पार्टी इनका टिकट काटती है तो यह अधिकृत उम्मीदवार के लिए समस्या खड़ी करेंगे।

पार्टी अध्यक्ष अमित शाह हों या फिर संगठनमंत्री रामलाल उन्होंने अबतक मध्यप्रदेश में हुए अपने चुनावी प्रवास के दौरान साफ तौर पर यह संकेत दिए हैं कि इसबार बड़ी संख्या में पार्टी विधायकों के टिकट काटे जाएंगे। यह संख्या 130 तक बताई जा रही है। साफ है कि ऐसी स्थिति में पार्टी को बड़े पैमाने पर आक्रोश का सामना भी करना पड़ेगा। यानि की एक तरफ कुआं और एक तरफ खाई जैसे हालात बनते दिख रहे हैं । पार्टी नेतृत्व पशोपेश में है यदि नाकारा विधायकों को पुनः मैदान में उतारते हैं तो आफत और सिटिंग एमएलए की जगह नए चेहरे को टिकट दिया जाता है तो भीतरघात का डर।
अब आखिर समस्या का समाधान क्या ?
ऐसा नहीं कि पार्टी ने पूर्व में कभी ऐसी स्थिति का सामना नहीं किया हां इतना जरूर है कि आज इसका पैमाना पूर्व के समय से कहीं बड़ा दिखाई देता है। स्पष्ट है समस्या जितनी बड़ी सरदर्द भी उतना ही ज्यादा।
आज पार्टी के पास न तो कुशाभाऊ ठाकरे जैसा सर्वमान्य और कार्यकर्ताओं के बीच लोकप्रिय नेता है और न प्यारेलाल खण्डेलवाल सुंदरलाल पटवा, राजमाता विजयाराजे  डॉ गण  फुले कैलाश जोशी,अनिल दवे  जैसे कुशल संगठक दिखाई देते है। आज शीतला सहाय , नरेश जौहरी ,गंगाराम बांदिल, जगदीश गुप्ता जैसे नेता भी नहीं जिनमें कार्यकर्ताओं को समझाने की कला बखूबी आती थी।
मध्यप्रदेश के दौरे पर निकले पार्टी के संगठनमंत्री रामलालजी ने भोपाल में विधायक दल की बैठक में जो कुछ कहा उसपर गौर करना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि विधायक अपने क्षेत्र में पार्टी पदाधिकारियों से सम्बंध बेहतर रखें तथा कार्यकर्ताओं से अगर कोई खटपट है तो उसे सुलझा लें। पार्टी शीर्ष नेतृत्व की यह सीख उनके स्तर पर बिल्कुल सही कही जा सकती है। लेकिन आज कार्यकर्तओं और विधायकों के बीच जो दूरियां और मतभेद हैं वे बिना किसी कुशल संगठक के हस्तक्षेप के ठीक हो जाएंगे यह सम्भव नहीं है ।  इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि आज जब मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में भाजपा अपने राजनीतिक जीवन के चरम पर है तब पार्टी में कुशल संगठक नेतृत्व की बेहद कमी सी दिखाई देती है।ऐसे में यह कार्य कौन करेगा रूठों को समझाने उन्हें पुनः काम पर लगाने वाले वात्सल्यमय नेताओं का आज भारी टोटा दिखाई देता है।
ग्वालियर के चुनावी हालात
आज अकेले ग्वालियर की विधानसभा सीटों पर नजर दौड़ाई जाए तो रोंगटे खड़े कर देने वाली तस्वीर उभरकर सामने आती है। आखिर किसे टिकट दिया जाए और किसका टिकट काटा जाए इस कार्य को अंजाम देना पार्टी नेतृत्व के लिए बहुत मुश्किल लगता है। अलग अलग विधानसभा पर नजर दौड़ाने पर पता चलता है कि सब कुछ उतना आसान नहीं कि केवल रायशुमारी या एक दो दिन के प्रवास  अथवा टिकट काटने मात्र से हल हो जाएगा।
ग्वालियर पूर्व विधानसभा
ग्वालियर पूर्व विधानसभा की बात करें तो यहां सिटिंग एमएलए मायासिंह के अलावा  आधा दर्जन के लगभग नेता टिकिट के लिए ताल ठोंकते दिख रहे हैं। वर्तमान एमएलए मायासिंह की बात की जाय तो कार्यकर्ताओं के बीच वह पूरी तरह सर्वमान्य नहीं कही जा सकती पिछले चुनाव का रिकार्ड देखें तो वह मात्र 1147 मतों से ही जीत सकीं थीं। गौर करने वाली बात यह है कि 2112 मत नोटा के सामने आए थे यदि यह वोट कांग्रेस को मिल जाते तो परिणाम उसके पक्ष में होता।
सिटिंग एमएलए की अलोकप्रियता के अलावा पार्टी के लिए दूसरी बड़ी चुनौती है टिकिट मांगने वालों की भीड़। सबसे बड़ी समस्या तो पार्टी के एक युवा नेता सतीश सिंह सिकरवार ने खड़ी कर दी है। जिस तरह की जानकारी सामने आई है उसके मुताबिक श्री सिकरवार ने साफ तौर पर यह संकेत दिए हैं कि पार्टी टिकट देती है तो ठीक नहीं तो वह निर्दलीय अथवा किसी अन्य दल (बसपा) से चुनाव में उतर सकते हैं। इसके अलावा यहां से मुरैना सांसद अनूप मिश्रा, पूर्व साडा अध्यक्ष जयसिंह कुशवाह जैसे दमदार पार्टी नेता भी टिकट की लाइन में हैं ।
ग्वालियर दक्षिण विधानसभा
 इस विधानसभा की बात की जाए तो सामाजिक वजनदारी के आधार पर वर्तमान विधायक नारायण सिंह टिकट की दौड़ में हैं लेकिन बीते पांच वर्षों में कोई भी ऐसी उपलब्धि उनके नाम नहीं है जिसको आधार बनाकर वे जनता से वोट मांग सकें । इस विधानसभा में भी टिकिट की चाह रखने वालों में कई बड़े नाम पार्टी के लिए समस्या बने हुए हैं जिनमें पूर्व महापौर समीक्षा गुप्ता, जी डी ए अध्यक्ष अभय चौधरी वर्तमान महापौर विवेक शेजवलकर, रविंद्र राजपूत आदि शामिल है।
मुरार विधानसभा
मुरार विधानसभा से सिटिंग विधायक भारत सिंह में पुनः चुनाव जीतने का दमखम दिखाई नहीं देता बड़ा इलाका किसान बाहुल्य होने से भी पार्टी को समस्या आएगी सबसे बड़ी समस्या तो यहां से पार्टी के पुराने किसान नेता महेंद्र यादव ने खड़ी कर दी है वे मुखर होकर टिकट की मांग कर रहे हैं। वे लम्बे समय से अपनी अनदेखी से नाराज हैं पार्टी नेतृत्व को उन्हें समझाना एक बड़ी समस्या कही जा सकती है। इनके अलावा एक दो नाम ओर भी हैं जो टिकट मांग रहे हैं।
उपनगर ग्वालियर विधानसभा

यहां से पार्टी के दिग्गज नेता जयभान सिंह विधायक हैं। वे वर्तमान में प्रदेश सरकार में केबिनेट मंत्री का ओहदा सम्भाल रहे हैं क्षेत्र में लोकप्रियता और काम दोनों ही दृष्टि से टिकट की दावेदारी उनके पक्ष में है बावजूद इसके गुटबाजी और नरेंद्र सिंह तोमर से रिश्तों की खटास उनके  व पार्टी नेतृत्व दोनों के लिए ही परेशानी बन गई है। इस विधानसभा से भी टिकट के दावेदार कम नहीं है यहां से वेदप्रकाश शर्मा , सुनीता शिवहरे, राकेश जादौन, वेदप्रकाश शिवहरे जैसे नेता टिकट की दौड़ मैं कहे जा सकते हैं।
भितरवार विधानसभा
विशुद्ध ग्रामीण इलाकों में शुमार यह विधानसभा पार्टी के लिए खासा सिरदर्द कही जा सकती है। पिछले चुनाव  में भाजपा के ही एक बागी प्रत्याशी बृजेंद्र तिवारी के कारण भाजपा के दिग्गज नेता अनूप मिश्रा को यहां से हार का मुंह देखना पड़ा था और कांग्रेस जीत गई थी। इस बार भी भाजपा के लिए यहां की राह इस कारण आसान नहीं क्योंकि वोटों का गणित बिगाड़ने मैं माहिर बृजेन्द्र तिवारी को पार्टी मना नहीं सकी है। वे इसबार भी चुनाव में कूदने का मन बनाते दिख रहे हैं। जो भाजपा के लिए घातक है। दूसरी और यहां से टिकिट की चाह रखने वालों में कई बड़े नाम हैं जिनमें बालेंदु शुक्ल, अनूप मिश्रा,लोकेंद्र पाराशर, अशोक पटसारिया  आदि शामिल है। यहां बसपा का भी वोटबैंक मौजूद होने से मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है यह बात भाजपा नेतृत्व को ध्यान रखना होगी।
डबरा विधानसभा
ग्वालियर से दूर होने और अधिकांश इलाका ग्रामीण होने के कारण इस विधानसभा का नेचर ग्वालियर से अलग है रिजर्व सीट का भी इसपर ब्यापक असर रहता है। भाजपा के लिए यहां बसपा सबसे बड़ी मुसीबत कही जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होना चाहिए यहाँ दमदार प्रत्याशी की खोज भाजपा नेतृत्व के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द होगा।
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