क्रिकेट की आड़ मेंओद्योगिक घरानों,बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के विज्ञापनों अनुबंधों का फलता फूलता काला साम्राज्य
प्रवीण दुबे
भारत ही नहीं अब पूरी दुनियां की नजरें टिकी हैं टी20 विश्वकप 2026 पर, 8 जनवरी से शुरु होने जा रहे फटाफट क्रिकेट के इस सबसे बड़े आयोजन की मेज़बानी भारत और श्रीलंका संयुक्त रूप से करने जा रहे हैं यही वजह है कि पूरे भारतीय उप महाद्वीप में इसकी चर्चाएं हैं। बड़ा सवाल है कि क्रिकेट की तुलना में अन्य खेलों को इतना प्रोत्साहन क्यों नहीं मिलता ? ओलम्पिक सहित अन्य स्पर्धाओं में शानदार रिकॉर्ड के बावजूद हमारे राष्ट्रीय खेल हॉकी के विश्वकप से लेकर बड़े अंतर्राष्ट्रीय मुकाबलों की भी न तो मीडिया में चर्चा होती है न उस पर देशवासी भी कोई ज्यादा रूचि नहीं दिखाते?
इन सारे सवालों का एकमात्र जवाब है कि क्रिकेट अब खाली खेल नहीं अरबों रूपये का आर्थिक कारोबार बन चुका है जहां खिलाड़ियों की खरीद फरोक्त से लेकर,सट्टेबाजी,मैच फ़िक्सिंग और बड़े बड़े ओद्योगिक घरानों की सहभगिता तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के विज्ञापनों अनुबंधों का काला साम्राज्य फलफूल रहा है।
एक खेल की दृष्टि से क्या यह सब सकारात्मक कहा जा सकता है?
आईसीसी टी20 विश्वकप आज दुनिया के सबसे बड़े खेल आयोजनों में से एक बन चुका है लेकिन इस इसके आड़ में सीमा से परे किए जा रहे व्यापार के साथ कई नकारात्मक असर भी जुड़े हैं।
सर्वविदित है कि आईसीसी और बीसीसीसीआई दुनियां की सबसे धनवान संस्थाएं हैं क्रिकेट के सहारे अरबों डॉलर की ‘आर्थिक साम्राज्य इन्होने खड़ा कर लिया है लेकिन असली मुनाफा किसका?
टी20 विश्वकप 2024 की बात करें तो स्थानीय स्तर पर टूर्नामेंट का आर्थिक मुनाफा लगभग $1.66 बिलियन लगभग ₹14,000+ करोड़ दर्ज किया गया था
दूसरी ओर, ICC ने 2024 टी20 विश्वकप से लगभग $691 मिलियन अर्थात करीब ₹5,800+ करोड़ की आमदनी की रिपोर्ट दी थी।
यह भी सामने आया कि इस “बिज़नेस” का सबसे अधिक लाभ मीडिया अधिकार और स्पॉन्सरशिप करने वाली बड़ी बड़ी कंपनियों को गया, न कि छोटे हितधारकों को।
यह भी सामने आ चुका है कि ICC के मुनाफे का सबसे बड़ा हिस्सा भारत जैसे बड़े बाजारों से आता है,
इसका मतलब पूरे अरबों का ‘सफल आयोजन’ केवल क्रिकेट बोर्ड और मीडिया कंपनियों के लिए मुनाफे का स्त्रोत है, जो विश्व भर में टी20 ब्रांड को बेचते हैं।
खेल नहीं, विज्ञापन का मंच बनी क्रिकेट
टी20 विश्वकप में आज जो सबसे बड़ा पैसा कमाया जाता है, वह मीडिया राइट्स (टेलीविजन/डिजिटल) स्पॉन्सरशिप पैकेज कॉर्पोरेट प्रमोशन और विज्ञापन स्लॉट से आता है। 2024 के आँकड़ों के अनुसार स्पॉन्सरशिप राजस्व लगभग $61 मिलियन तक गया, जबकि मीडिया के अधिकारों की कुल संख्या और मूल्य इससे कहीं ऊपर बताया गया है।यानी साफ है अब क्रिकेट खेल से कहीं अधिक “विज्ञापन और ब्रांडिंग प्लेटफ़ॉर्म” बन चुका है।
जनता से ही कमाई और जनता को ही नहीं देखने दिया जाता मैच
“विज्ञापन और ब्रांडिंग से इस करोड़ों की कमाई के बावजूद डिजिटल,टीवी और अन्य मीडिया प्लेटफार्म पर मैच देखने के लिए जनता से पैसे वसूले जाते हैं स्थिति यहां तक जा पहुंची है कि किसी भी देश के सरकारी टेलीविज़न जैसे कि भारत में दूरदर्शन को भी मैच का सीधा प्रसारण करने का अधिकार नहीं होता इसके लिए उसको पैकेज का पैसा भरना जरूरी होता है साफ है जिन क्रिकेट प्रेमियों के पास पैसा नहीं वे डिजिटल या दूरदर्शन पर भी मैच नहीं देख पाते।
स्थानीय अर्थव्यवस्था को फायदे का सफेद झूठ
कहा जाता है कि इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को फायदा पहुँचता है पर कड़वा सच है कि इससे स्थानीय स्तर पर दीर्घकालिक बोझ बढ़ता है होस्ट शहरों में होटल, ट्रैवल और खाद्य खर्च बढ़ता है
इन खर्चों को अक्सर महंगे टिकट दाम और महंगी सेवाएँ बना देते हैं, जिससे स्थानीय लोग महंगाई झेलते हैं। सबसे बड़ी बात बड़े कॉर्पोरेट पैकेज स्थानीय छोटी दुकानों को वह हिस्सा नहीं देते जो प्रायोजकों को मिलता है। अतः स्थायी विकास में निवेश अक्सर कम रह जाता है, जबकि आयोजन खर्च अधिक हो जाता है।
खेल से पुरस्कार कम कारोबार से बहुत अधिक मुनाफा
भले ही आयोजन का कुल व्यापार अरबों का हो रहा है, खिलाड़ियों को मिलने वाला वास्तविक पुरस्कार राशि अपेक्षाकृत कम है।
उदाहरण के लिए, विश्व स्तर के टी20 विश्वकप में टीम को मिलने वाली प्राइज मनी सैकड़ों करोड़ रुपये तक नहीं पहुँचती इसका एक हिस्सा लाखों/करीब $1.6 मिलियन तक ही होता है। मतलब
खिलाड़ी और देश कुल आर्थिक कारोबार के लिए कम हिस्सेदारी पाते हैं, जबकि बाकी का पैसा बड़े मध्यस्थ ICC, मीडिया कंपनियां, कॉर्पोरेट प्रायोजक ले जाते हैं।