प्रवीण दुबे
दिल्ली की जनता ने अपने मताधिकार का उपयोग करके यह तय कर दिया है की राजधानी का ताज किसके सिर बंधने वाला है। जैसा की एग्जिटपोल संकेत दे रहे हैं उसके मुताबिक केजरीवाल ने एकबार फिर सभी दलों की उम्मीदों पर झाड़ू फेर दी है। यदि यह सच साबित होता है तो इस लिहाज से यह एक अच्छे संकेत हैं की देश की राजधानी की जनता ने उस दल को तवज्जो दी जिसने चुनाव प्रचार में केवल और केवल विकास को ही मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ा। यदि दूसरे नजरिए से देखा जाए तो केजरीवाल ने प्रधानमंत्री के विकास आधारित चुनाव प्रचार पर जोर देकर विपक्ष को धराशायी करने की कला को बखूबीअंगीकार करके उन्हीं के तीर से उन्हें मात देने की तरकीब का सही इस्तेमाल किया। भाजपा ने शाईन बाग को केंद्र में रखकर आक्रामक चुनाव प्रचार की रणनीति अपनाई लेकिन उसके रणनीतिकार यह बात भूल गए की पिछले सत्तर वर्षों में तृष्टीकरण की राजनीति ने बहुत सारे देशहित के मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने में अहम भूमिका निभाई और भाजपा पूर्व में लगातार इसका शिकार भी होती रही है। केजरीवाल ने बड़ी चतुराई से इस बात को चुनाव से काफी पहले ही भांप लिया था और यही कारण था की उन्होंने दिल्ली की जनता का तृष्टीकरण करने की तरकीब अपनाई बस ,बिजली, पानी ,स्वास्थ्य, शिक्षा आदि के क्षेत्र में केजरीवाल ने दिल्लीवासियों को फ्री का तोहफा देकर जमकर तृष्टीकरण किया और इसके सामने दिल्ली के लोगों को न तो भाजपा का राष्ट्रवाद पसन्द आया न उन्होंने शाईन बाग में शरजील इमाम जैसे नासूरों की देशद्रोही गतिविधियों पर ध्यान दिया। वह यह भी भूल गए की वह देश की राजधानी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और यहां जो कुछ भी हो रहा है पूरी दुनिय तक पहुँच रहा है । उन्हें यह भी याद नहीं रहा की हमारा पड़ोसी दुश्मन देश शाईन बाग के समर्थन में खड़े केजरीवाल की जीत को पूरी दुनिया में गलत ढंग से प्रचारित करेगा और इससे देशविरोधी तत्वों और टुकड़े टुकड़े गैंग के खिलाफ सख्ती से लड़ रही भारत सरकार की छवि खराब होगी जो की वैश्विक स्तर पर दमदारी से आगे बढ़ रहे भारत के लिए परेशानी खड़ा कर सकती है। अब जबकी चुनाव हो चुके हैं और सभी एग्जिटपोल के नतीजे केजरीवाल की वापसी निरूपित कर रहे हैं बहुत सारे सवाल देश की जनता के मस्तिष्क में कौंध रहे हैं आखिर देश की राजधानी में मोदी सरकार की हार के क्या मायने हैं ? क्या एक के बाद एक लगातार मिल रही हार ने विपक्षी एकता को बल दिया है ? क्या इससे प्रबल राष्ट्रवाद को केंद्र में रखकर आगे बढ़ने की नीति को झटका लगेगा ?
इन सवालों पर विचार किया जाए तो निश्चित ही लगातार मिल रही हार भाजपा के लिए चिंता का विषय कही जा सकती है ,वह भी ऐसे समय जब केंद्र सरकार ने साफ तौर पर यह संकेत दे दिए हैं की वह 70 वर्षों के दौरान ठंडे बस्ते में डाल दिये गए उन सभी विवादित मुद्दों का समाधान खोजने की दिशा में काम करेगी । धारा 370 का हटाया जाना,राममन्दिर निर्माण की दिशा में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को लागू करने की ओर तेजी से कदम बढ़ाना,घुसपैठ की समस्या , पूर्वोत्तर के तमाम विवादित विषयों का समाधान , समान नागरिक कानून लागू किए जाने की वकालत आदि विषयों पर सरकार ने ऐसा करके भी दिखाया है। निःसंदेह यह एक बड़ा काम है लेकिन इसके साथ यह भी बेहद जरूरी है की देश की जनता न केवल सरकार के साथ खड़ी रहे बल्कि पूरी दुनिया में भी यह संदेश पहुंचे की भारत सरकार जो निर्णय ले रही है देश की जनता उसके साथ खड़ी है। देश में CAA का विरोध , सड़कों पर खुलेआम लगते भारत विरोधी नारे, विविध वर्गो से जुड़े नामचीन लोगों के सरकार विरोधी बयान और एक के बाद एक मिलती हार तो इस बात के विपरीत जा रहे हैं। ऐसी स्थिति में आने वाली चुनोतियाँ कम नहीं कही जा सकती हैं। यह सही है की बिखरा हुआ विपक्ष तथा देश में पनपता प्रबल राष्ट्रवाद मोदी सरकार का मजबूत पक्ष बना हुआ है लेकिन यह भी उतना ही सही है की अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए बिखरा हुआ विपक्ष यदि एक हो जाता है और केजरीवाल की तर्ज पर तृष्टीकरण की राजनीति मोहपाश मैं आकर जनता भृमित हो जाती है तो सरकार की मुसीबतें बढ़ते देर नहीं लगेगी। आने वाले समय में पश्चिम बंगाल जैसे बड़े व संवेदनशील रराज्य में चुनाव होने हैं। मोदी सरकार के सामने यहां भी वही चुनौती होगी जो दिल्ली में दिखाई दी है । बड़ी संख्या में पश्चिम बंगाल में मुस्लिम मुस्लिम घुसपैठिए मौजूद हैं ममता बनर्जी खुलकर इन घुसपैठियों का इस्तेमाल वोटबैंक के रूप में करती रही हैं , यहां भी तमाम शरजील इमाम मौजूद हैं जिन्हें टुकड़े टुकड़े गैंग का समर्थन प्राप्त है। यहां ममता बनर्जी इन सभी का खुलकर तृष्टीकरण करती रही है। भाजपा खासकर मोदी सरकार को अभी से यह बातें ध्यान में रखना होंगी यह बारीकी से विचार करना होगा की अब केवल प्रबल राष्ट्रवाद के सहारे सीधे प्रहार करके चुनावी रण क्षेत्र में उतरना खतरनाक हो सकता है इसके साथ विकास की बात और उचित रणनीति भी बेहद आवश्यक है। यह भी जरूरी है की अपने तमाम क्षत्रपों की लगाम भी संगठनात्मक रूप से कसकर रखी जाए तथा ऐसे नेताओं को चुनाव प्रचार में उतारा जाए जो तेजतर्रार तो हों लेकिन बड़बोले और मर्यादाहीन नहीं ।