महामना जगदीश गुप्त
तृणमूल कांग्रेसमहामना जगदीश गुप्त की एक महिला कार्यकर्ता रोशन अली की याचिका पर बंगाल हाई कोर्ट ने दीपावली पर आतिशबाजी चलाने पर प्रतिबंध लगा दिया है। पर बाजार और जनउत्साह बता रहा है_ कि जन भावनाओं की उपेक्षा करने वाली संस्थाएं अपना प्रभाव खोती जा रही है ।
सच भी यही है की जन भावनाओं के ज्वार को कोई शासन प्रशासन नहीं रोक सकता। लोकतंत्र का मूल आधार ही जन भावनाओं का सम्मान है। इसीलिए बहुमत की भावना जिस प्रत्याशी अथवा दल के पक्ष में होती है उसे ही सरकार माना जाता है। अतः यह प्रश्न सहज ही मन में उठता है कि अनुभव से निर्मित जन भावनाओं के विरुद्ध यह संवैधानिक संस्थाएं अन्ततः क्यों जा रही हैं? लोकतंत्र के मूलाधार के विरुद्ध जाकर यह संस्थाएं अपने अस्तित्व पर कुठाराघात क्यों कर रही हैं? क्या इसके पीछे कोई षड्यंत्र है? और यदि है तो इसे कौन और क्यों संचालित कर रहा है? उन्हें क्या लाभ है?
यदि हम इसे समझना चाहते हैं तो हमें इतिहास में जाना होगा। 18 65 में सेलेक्ट कमेटी ने इंग्लैंड की महारानी को मानपत्र भेजकर बड़े गर्व से उल्लेख किया कि हमने 40000 व्यक्तियों को धर्मांतरण करा लिया है। इसी मान पत्र में यह भी लिखा गया ईस्ट इंडिया के कुछ अधिकारी बुतपरस्तों के कार्यक्रम में जाते हैं। इससे बुतपरस्तों(अर्थात हिंदुओं) का मनोबल बढ़ता है। इससे बुतपरस्ती को बढ़ावा मिलता है।
उस समय कंपनी ने मंदिरों की संपत्ति पर कब्जा करना आरंभ कर दिया था। और इससे जब जनता में रोष पैदा हुआ तो कंपनी ने जनाक्रोश से बचने के लिए घोषणा की थी कि हम मंदिरों को अनुदान देंगे।
कितना हास्यास्पद है कि आप को लूट कर आपको ही अनुदान देने की उदारता का नाटक किया गया? और यह नाटक आज तक चल रहा है। इस विषय का उल्लेख भी मान पत्र में करते हुए सिलेक्ट कमेटी ने महारानी से मांग की कि मंदिरों का अनुदान बंद किया जाए अन्यथा जीसस कभी भी मिशनरियों को माफ नहीं करेंगे।
इस क्रम में सबसे पहले जगन्नाथ मंदिर को बदनाम करने का षड्यंत्र करने की कहानियां गढ़ी । सबसे पहली कहानी गढ़ी गई कि रथयात्रा में प्रतिवर्ष दो लाख से अधिक तीर्थयात्री उपस्थित होते हैं और इनमें से एक तिहाई रथ के पहिए के नीचे आकर मर जाते हैं।
यह झूठ फैलाने का षड्यंत्र चलाने के पीछे एकमात्र कारण यही है कि भारतीय संस्कृति और जीवन पद्धति में आत्मनिर्भरता एवं स्वतंत्रता का महत्व विदेशी शक्तियों की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने में उनकी बड़ी बाधा बनता है। हिंदू मंदिर आस्था और अनुभव को कराने में एक महत्वपूर्ण संस्था के रूप में काम करते हैं। भारतीयों का अनुभव आधारित अर्थात वैज्ञानिक एवं तर्कपूर्ण संवाद युक्त दैनिक जीवन व्यवहार उन्हें आसान शिकार बनने से बचाता है।
जबकि इस्लाम और ईसाइयत विश्वास आधारित मजहब है। जिन को मानने वाले पोप पादरी या मौलवी के कहने पर कुछ भी ऐसा करने के लिए भी तैयार हो जाते हैं जो समाज और संसार के लिए अकल्याणकारी है हानिकारक है। या कुछ बिशेष लोगां को लाभ देने वाला है ।
भारतीयों को धर्म से दूर करने की चेष्टा कर उन्हें मजहब में लाने का प्रयास इसीलिए किया जाता है ताकि वह भी किसी एक व्यक्ति ( पादरी/ मौलवी )के कहने से बिना तर्क किए कुछ भी करने को तैयार हो जाएं। विशेषकर उनके उत्पादों को खरीदने के लिए तैयार हो जाएं या उनकी अधीनता स्वीकार करने के लिए तैयार हो जाएं । इसके लिए उन्हें कोई सशस्त्र संघर्ष न करना पड़े। कोई जनधन दाव पर न लगाना पड़े।
आर्थिक हितों को साधने का सिलसिला अंतहीन है _यही कारण है धार्मिकता से दूर ले जाने के षङ्यंत्रों का कुचक्र निरंतर चलाना भी विधर्मियों की विवशता है।
जबकि धर्म हर विकट परिस्थिति में एक कवच की तरह सामने आता है। एक औषधि के रूप में उपचार करता है। साथ ही अग्रिम सावधानी जिसे अंग्रेजी में केअर इज बेटर देन क्योर कहते हैं या दुर्घटना से सावधानी भली कहकर व्यवहार ,बातचीत में करते हैं। हमारे लिए काम आता है।
धर्म का यह स्वभाव व्यापारिक हितों के विरुद्ध ही होता है क्योंकि आतिशबाजी में गंधक का धुआं पर्यावरण से दूसरों को मुक्त करता है तो लोग बीमार कैसे पड़ेंगे ?और बीमारी न फैली तो सेवा का व्यापार और सेवा का ढोंग दोनों कैसे साथ चलेंगे?
अतः दीपावली सहित अनेक हिंदू त्योहारों के धार्मिक प्रभाव अर्थातजीवनोपयोगी वैज्ञानिक लाभ से अपरिचित रखने के लिए दुःप्रयास किए जाते हैं । हिंदुओं को बीमारी और विश्वास की ओर धकेलने का प्रयास किए जाते हैं।
किंतु सुखद यही है कि देवभूमि भारत पर धर्म रक्षा के लिए कोई न कोई अवतरण “होता रहता है। इस समय सोशल मीडिया इस अवतारी भूमिका में है। धार्मिकता के व्यापक प्रभाव का परस्पर परिचय समाज को हो जाने से हिंदुओं का उत्साह लौट आया है। फलस्वरूप हिंदू विरोधी षड़यंत्रकारियों के हाथों का खिलौना बन गए पर्यावरण एजेंसियों के कर्ताधर्ता अपनी विश्वसनीयता खोते जा रहे हैं। लोग उनकी धर्म विरोधी सलाह की उपेक्षा कर धूम से आतिशबाजी कर पर्यावरण को विषाणु मुक्त करने में जुटे हैं । भारत का हिंदू समाज अपनी वैज्ञानिक परंपराओं की श्रेष्ठता का उद्घोष इस दीपावली भी करने को उद्यत है ।
आतिशबाजी की चमक, आकाश में उसके धार्मिक व्यवहार का उद्घोष करते देखी जा सकती है । शुभ दीपावली।
महामना जगदीश गुप्त