“सांची कहौं”:राज चड्ढा

जब दलबदलुओं को सर पर बिठाओगे तो तुम्हारे निष्ठावान भी दल बदलू बन सकते हैं
ग्वालियर दक्षिण में तलवारें भांजना शुरू हो चुका है
भांजे जी कह रहे हैं, मैं तो लड़ूंगा, पार्टी टिकिट दे न दे।किसी को आश्चर्य भी नहीं है।वे कुछ भी कर सकते हैं
परम्परागत रूप से लड़ते चले आ रहे पूर्व मंत्री जी अपना अधिकार क्यों छोड़ेंगे, उनका जातीय आधार किसी भी दूसरे को हराने के लिए पर्याप्त है
पूर्व महापौर जी तो निर्दलीय लड़ कर उसी पार्टी की राह में सबसे बड़ी रोड़ा बन चुकी हैं, जिसने उसे महापौर बनाया था।पार्टी को हराने के बाद पुनः शामिल हो गईं और प्रदेश कार्य समिति की सदस्य भी।अब जिसके बिना पार्टी का मन ही न लगता हो, वो क्यों न लड़े?
अनेक वरिष्ठ और कनिष्ठ भी कतार में हैं
अब किसी नेता में कुशा भाऊ ठाकरे जैसा नैतिक बल तो है नहीं कि उनकी आंख के एक इशारे पर कार्यकर्ता बैठ जाये
सारे कुए में भांग घोलने वाले जब निष्ठा और त्याग की बात करेंगे तो अपने लत्ते ही फड़वाएँगे
खून पसीने से सींचने वालों को घर बिठाओ और कुर्सी की लालच में बेपेंदी के लोटों को हमारे सर पर चढ़ाओ।उन्हें विधान सभा का टिकिट दो और हार जाने पर निगम बोर्ड का अध्यक्ष बना कर मंत्री पद का दर्जा भी।लेकिन पार्टी के लिए जीवन खपा देने वालों से कहो कि तुम पन्ना प्रमुख बन कर ही प्रसन्न रहो, तो ऐसा उतिया अब कोई नहीं बचा
सिंहासन और माल मलाई गैरों को और अपनों को घास की चटाई?
फटे की तुरपाई से अब कुछ नहीं होगा, फाड़ी क्यों , यह बतलाओ!