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भाजपा और शिवराज के खिलाफ भड़कता सवर्ण समाज का गुस्सा, ‘माई के लाल’ वाला बयान बनता गले की हड्डी

 

 

प्रवीण दुबे 

 

एस सी एस टी एक्ट में देश के सर्वोच्च न्यायालय की मंशा के विरुध्द मोदी सरकार द्वारा किए संशोधन तथा मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह व सत्ता और संगठन से जुड़े तमाम शीर्ष नेताओं की सवर्ण समाज को उत्तेजित करने वाली भड़काऊ बयानबाजी अब भाजपा के लिए बड़ा सिरदर्द बनती दिखाई दे रही है ।

चुनावी राज्यों की बात करें तो सवर्ण समाज का सर्वाधिक गुस्सा मध्यप्रदेश में देखने को मिल रहा है। साफ तौर पर कहा जा सकता है कि सवर्ण समाज यहां शिवराज के विरोध में सड़कों पर उतरने का मन बनाता दिख रहा है।

निसन्देह इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि नरेंद्र मोदी ने अपने चार वर्ष से कुछ अधिक कार्यकाल में भारत ही नहीं पूरी दुनिया में देश की आन बान शान बढ़ाने के तमाम काम किये हैं।
लेकिन इन कार्यों के बीच उनका एक नासमझी भरा कदम ऐसा भी रहा है जिसने न केवल देश के सवर्ण समाज का गुस्सा उनके प्रति भड़का दिया है बल्कि देश में वर्ग संघर्ष जैसे हालात पैदा कर दिए हैं।
यह नासमझी भरा कदम था देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एससी एसटी एक्ट में किये संशोधन में पुनः उन्ही प्रावधानों को लागू करवाने का जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय ने संशोधन का निर्णय लिया था।
वे प्रावधान क्या थे हम अभी उसपर चर्चा नहीं कर रहे इस समय हमारा उद्देश्य इस निर्णय से खड़े हुए बवंडर की ओर सरकार और खासकर बड़बोले बयान जारी रखकर देश प्रदेश के शांत माहौल में आग लगा रहे नेताओं को आगाह करना है। तो अब विषय पर आते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने जब एससी एसटी एक्ट में संशोधन करने का निर्णय लिया तो देशभर में एससी एसटी वर्ग से जुड़े लोगों ने हिंसक आंदोलन किया मोदी सरकार इसके दवाब मैं आई और इस संशोधन को संसद में रदद् करवा दिया गया।
सबसे बड़ा सवाल क्या मोदी सरकार का यह कदम सही था ? दूसरा सवाल क्या सरकार को देश की शीर्ष अदालत द्वारा लिए किसी निर्णय में इस प्रकार हस्तक्षेप करना जायज था ?
यदि मोदी सरकार चाहती तो इस सम्पूर्ण घटनाक्रम से यह कहते हुए खुद को अलग कर सकती थी कि यह देश के सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय है,इसमें हमारा बोलना उचित नहीं। लेकिन सरकार ने इस न करते है सर्वोच्च न्यायालय की मंशा के विरुद्ध संशोधन कराने की पहल की।
ऐसी स्थिति में देश के एक बड़े वर्ग को जो पहले से ही आरक्षण के दुष्परिणाम से त्रस्त था, ऐसा लगा मोदी सरकार भी समरसता की जगह एक वर्ग विशेष को खुश करने में जुटी है। परिणाम बहुत बड़े वर्ग में गुस्सा फूट पड़ा है।
इस गुस्से को हवा देने का काम शिवराज, कल्याण सिंह जैसे नेताओं के बयानों ने किया है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने तो खरगौन की सार्वजनिक सभा में चुनौती भरे लहजे में यह चेतावनी तक दे डाली कि देखें कौन माई का लालआरक्षण हटवाता है।
इतना ही नहीं भाजपा के एक और बड़े नेता कल्याण सिंह जो कि वर्तमान में राज्यपाल हैं ने भी भड़काऊ बयान देते हुए कहा कि आरक्षण  यदि नहीं मिले तो अपना हक चांटा मारकर लेलो।
बात यहीं नहीं रुकती उत्तरप्रदेश मैब भाजपा की एक महिला सांसद के आग बुझे शब्दबाण ने भी देश का माहौल गन्दा करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है।
इन सारे घटनाक्रम ने देश के सवर्ण समाज का गुस्सा अब चरम पर जाता दिख रहा है। तमाम अच्छे कार्य करने के बावजूद मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव से पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह जनता के निशाने पर आ गए हैं।
पिछ्ले एक दो माह के दौरान तो तमाम सांसदों विधायकों केंद्रीय मंत्रियों को आरक्षण के खिलाफ पनप रहे गुस्से का सामना करना पड़ रहा है। मुख्यमंत्री शिवराज को भी अपनी जन आशीर्वाद यात्रा हो या फिर हाल ही में हुए तमाम सार्वजनिक कार्यक्रमों में माई का लाल नारे लगी टोपी पहने उनके खिलाफ नारे लगाते प्रदर्शनकारियों ने तनाव में डाला है। भोपाल के एक कार्यक्रम में तो मुख्यमंत्री को बीच में ही से लौटना पड़ा था।
 यह हालात शिवराज ही नहीं पूरी की पूरी भाजपा के लिए अच्छे नहीं कहे जा सकते मध्यप्रदेश में तो  स्थिति इस कारण और भयावह होती जा रही है क्यों कि आरक्षण के खिलाफ तमाम सामाजिक ,धार्मिक, कर्मचारी, छात्र संगठन एक होकर बड़ा आंदोलन छेड़ने की योजना बनाते दिख रहे है। यदि यह सड़कों पर उतरते है तो शिवराज के लिए चुनाव में जीत हासिल करना एक बड़ी चुनौती बन जाएगी।
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