प्रवीण दुबे

हमारे देश में जब बापू के नाम पर दिखावटी गांधीवाद चर्मोत्कर्ष पर है और बापू के चरखे और खादी के सहारे कुछ कथित राजनीतिज्ञ समाजसेवी लेखक पत्रकार व बुद्धिजीवी अपनी खोई जमीन तलाशते नजर आते हैं ऐसे समय डॉ एस एन सुब्बाराव जैसे सौ टंच शुद्ध गांधीवादी का हमारे बीच से चला जाना अंतस मन को झकझोर कर रख देने वाली दुखद घटना है। मेरे जैसे छुटभैये पत्रकार के लिए आदरणीय सुब्बाराव पर कुछ लिखना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा है लेकिन जब दिखावटी गांधीवाद छाती पीट रुदाली करता दिखता है तो ऐसे समय एक सच्चे गांधीवादी के चले जाने पर श्रध्दांजलि स्वरूप कुछ न लिखूं तो यह भी ठीक नहीं है।
वास्तव में बापू की अहिंसा का संदेश आम जीवन में कितना सार्थक होता है इसको यदि साक्षात रूप में महसूस करना है या देखना है तो डॉ सुब्बाराव से बेहतर व्यक्तित्व कोई दूसरा नजर नहीं आता। मध्यप्रदेश से हजारों किलोमीटर दूर दक्षिण के बेंगलुरू में जन्म लेने वाले इस समाजसेवी ने आखिर चम्बल अंचल को अपनी कर्मस्थली के रूप में क्यों चुना ? यह विचार करते ही डॉ एस एन सुब्बाराव के अहिंसावादी होने के गांधी जी के संदेश को अपने जीवन में कृतिरुप में चरितार्थ करने की बात स्वतः उजागर हो जाती है।
जिस समय सुब्बाराव ने चम्बल के जौरा को अपना कार्यक्षेत्र चुना उस समय पूरे देश में चम्बल के इस इलाके अर्थात मुरैना ,भिण्ड,और इससे सटे जौरा,शौयपुर आदि का नाम सुनकर पूरा देश थर्रा उठता था। इस इलाके में डाकुओं का आतंक चरम पर था। सैकड़ों की संख्या में सक्रिय बागियों की गैंगे से चम्बलघाटी कंपकपाती थी। इतना ही नहीं यहां का तमाम वनवासी समाज न केवल भयभीत था बल्कि आतंकित भी था।
डा सुब्बा राव ने 14 अप्रैल 1972 काे गांधी सेवा आश्रम जाैरा में 654 डकैताें का समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण एवं उनकी पत्नी प्रभादेवी के सामने सामूहित आत्मसमर्पण कराया । इनमें से 450 डकैताें ने जाैरा के आश्रम में, जबकि 100 डकैताें ने राजस्थान के धाैलपुर में गांधीजी की तस्वीर के सामने हथियार डालकर समर्पण किया था।
यह थी इस मनीषी के सच्चे गांधीवाद की ताकत जिसे न केवल देश बल्कि विदेशों में भी आश्चर्यजनक प्रसंग के रूप में देखा गया। गांधी को समर्पित सेवा आश्रम की स्थापना ,अहिंसा के सहारे डाकुओं की दुर्दान्तता से कांप रही चम्बलघाटी में शांति के सफल प्रयास, यहां के वनवासियों के बीच तमाम सेवा कार्य व बापू की खादी को बढ़ावा देने के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए उन्हें भारत सरकार ने पदमश्री से सम्मानित किया ।
डॉ एसएन सुब्बा राव का पूरा जीवन समाजसेवा काे समर्पित रहा ग्वालियर चंबल संभाग में डा सुब्बा राव साथियाें के बीच भाईजी के नाम से प्रसिद्ध थे। डा सुब्बा राव ने जाैरा में गांधी सेवा आश्रम की नींव रखी थी, जो अब श्योपुर तक गरीब व जरूरतमंदों से लेकर कुपोषित बच्चों के लिए काम कर रहा है। डा सुब्बा राव ने श्याेपुर के त्रिवेणी संगम घाट पर गांधी जी की तेरहवी का आयाेजन शुरू करवाया था। वनवासियों काे मूल विकास की धारा में लाने के लिए वह अपनी टीम के साथ लगातार काम करते रहे है।
आज वे हमारे बीच नहीं रहे विश्वास है उनके द्वारा शुरू किए सेवा कार्य सतत जारी रहेंगे यही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी। शब्दशक्तिन्यूस न्यूज़ की ओर से उन्हें सत सत नमन।