प्रवीण दुबे
अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूर्ण कर चुके संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्य पद्धति से पूरी दुनिया के सैकड़ो देश न केवल प्रभावित हैं बल्कि उसके ऊपर शोध (रिसर्च ) भी किये जा रहे हैं। इससे जुड़ा एक बड़ा खुलासा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ कृष्ण गोपाल ने ग्वालियर में अपने एक व्याख्यान के दौरान किया उन्होंने बताया कि संघ की व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण की कार्य कार्यप्रणाली पर आज जर्मनी, रूस सहित दुनिया के 50 देश शोध कर रहे हैं।
आज जबकि भारत में कांग्रेस, कम्युनिस्ट सहित तमाम मुस्लिम संगठन आरएसएस को साम्प्रदायिक और कट्टरवादी हिन्दू संगठन कहकर बदनाम करने में जुटे दिखाई देते हैं ऐसे समय में किसी अधिकृत मंच से संघ के किसी बड़े पदाधिकारी द्वारा यह बताया जाना कि संघ की व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण की कार्य कार्यप्रणाली पर जर्मनी, रूस सहित दुनिया के 50 देश शोध कर रहे हैं, उन लोगों और संगठनों के मुंह पर करारा तमाचा कहा जा सकता है जो संघ को बदनाम करने की दृष्टि से उसकी कार्यपद्धति पर अंगुली उठाते हैं।
इस बड़े खुलासे के बाद पूरी तरह से यह सिद्ध हो जाता है कि भारत का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन माना जाने वाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अब केवल देश के भीतर ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी शोध और विश्लेषण का महत्वपूर्ण विषय बन चुका है। संगठन की कार्यपद्धति, शाखा व्यवस्था, नेटवर्क संरचना और प्रवासी भारतीय समाज में इसकी भूमिका को लेकर दुनिया के कई देशों में अकादमिक और स्वतंत्र अध्ययन किए जा रहे हैं और कई देशों में ऐसे रिसर्च पूर्ण भी हो चुके हैं, कई देशों में इससे जुड़े विषयों पर पीएचडी भी कराई जा रही हैं।
वैश्विक नेटवर्क पर सबसे बड़ा अध्ययन
हाल के वर्षों में संघ की कार्यप्रणाली पर सबसे व्यापक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन 2025 में सामने आया। यह शोध फ्रांस के प्रतिष्ठित संस्थान Sciences Po और पत्रिका The Caravan के सहयोग से किया गया। लगभग छह वर्षों तक चले इस अध्ययन में संघ से जुड़े 2500 से अधिक संगठनों के वैश्विक नेटवर्क का विश्लेषण किया गया।
शोधकर्ताओं ने पाया कि विभिन्न देशों में सक्रिय इन संगठनों के बीच नेतृत्व, कार्यक्रमों और संरचनात्मक कार्यशैली में स्पष्ट समानताएँ दिखाई देती हैं। यह अध्ययन RSS के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की पहली व्यापक मैपिंग माना जाता है।
संघ की कार्यपद्धति पर “कितने देशों में शोध हुआ” इसका कोई एक आधिकारिक आंकड़ा तो उपलब्ध नहीं है, क्योंकि कई अध्ययन अलग-अलग स्वरूप में किए गए हैं।
हालांकि शाखाओं और संबद्ध संगठनों की उपस्थिति के आधार पर किए गए प्रमुख विश्लेषणों के अनुसार संघ से प्रेरित गतिविधियों पर कम से कम 39 देशों में शोध और अध्ययन हुए हैं। इन देशों में अमेरिका, ब्रिटेन, नेपाल, अफ्रीकी राष्ट्र और मध्य-पूर्व के कुछ देश प्रमुख हैं। लेकिन अब जबकि संघ ने खुद अधिकृत रूप से 50 देशों में शोध की बात कही है अतः इसे बड़ा प्रमाण माना जा सकता है।
विदेशों में विस्तार का इतिहास
इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के अनुसार संघ से प्रेरित गतिविधियों का प्रारंभिक विस्तार स्वतंत्रता से पहले ही विदेशों तक पहुँच चुका था। शुरुआती चरण में केन्या, म्यांमार (तत्कालीन बर्मा) और मॉरीशस जैसे देशों में प्रवासी भारतीयों के बीच संगठनात्मक गतिविधियों का उल्लेख मिलता है।
किन विषयों पर होता है शोध
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर RSS की कार्यपद्धति पर होने वाले अध्ययन मुख्य रूप से चार प्रमुख विषयों पर केंद्रित रहते हैं—
संगठनात्मक संरचना – शाखा प्रणाली, प्रशिक्षण मॉडल और नेतृत्व पद्धति।
सामाजिक नेटवर्क – शिक्षा, सेवा और सांस्कृतिक गतिविधियों का विस्तार।
प्रवासी भारतीय समाज में भूमिका – विभिन्न देशों में भारतीय समुदायों के बीच संगठन की भागीदारी।
वैश्विक समन्वय – अलग-अलग देशों में कार्यरत संबद्ध संगठनों के बीच तालमेल।
विश्वविद्यालयों में भी विषय बना RSS
अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के कई विश्वविद्यालयों में संघ की कार्यप्रणाली पर केस स्टडी आधारित शोध भी किए गए हैं। इनमें संगठन की संरचना, विचारधारा और सामाजिक प्रभाव का विश्लेषण प्रमुख रूप से शामिल रहता है।
निष्कर्ष
विशेषज्ञों के अनुसार RSS आज विश्व स्तर पर अध्ययन का एक महत्वपूर्ण सामाजिक-राजनीतिक उदाहरण बन चुका है। इसकी शाखा आधारित संगठन प्रणाली और दीर्घकालिक कार्यपद्धति ने इसे वैश्विक शोध जगत में एक अलग पहचान दिलाई है।
कुल मिलाकर, विभिन्न प्रकार के अध्ययनों को देखते हुए कहा जा सकता है कि संघ की कार्यपद्धति पर शोध विश्व स्तर पर हुआ है, जबकि शाखा उपस्थिति आधारित विश्लेषणों में लगभग 39 देशों को प्रमुख अध्ययन क्षेत्र माना जाता है।