राज चड्डा

जानता हूँ कि नक्कार खाने में तूती की कोई नहीं सुनता और वो तूती जो नक्कार खाने से बाहर कर दी गयी हो, उसका बजना अरण्यरोदन ही है। फिर भी तूती तो बोलेगी।तभी तो कहते हैं ” कभी उसकी तूती बोलती थी।”
यह कोई नहीं कहता कि उसका हारमोनियम बजता था या उसका ढोल पिटता था।
भाजपा के नव निर्वाचित पार्षद हरियाणा के रिसोर्ट में हैं।इनमें वे भी होंगे जिनके घर में कूलर तक नहीं था।प्रगति और किसे कहते हैं?शपथ लेते ही ac बस से सीधे रिसोर्ट। यहां भी वे तभी तक अपने हैं जब तक कोई 5 स्टार होटल ले जाने वाला उनका अपहरण नहीं कर लेता।सवाल निष्ठाओं का नहीं सुविधाओं का है।संस्कारों का नहीं कीमत का है। जो जितनी ज्यादा बोली लगाएगा, पट्ठा उसका हो जाएगा।
हम जब ग्वालियर भाजपा के जिलाध्यक्ष थे तभी हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी जी ने तिरंगा यात्रा निकाली थी जो श्रीनगर पर तिरंगा फहरा कर पूर्ण हुई थी। माननीय कुशा भाऊ ठाकरे जी ने हमसे पूछा, राज कितनी बसें लेकर तुम गए थे यात्रा में? मैंने कहा, ठाकरे जी दो बसें, चार जीपें और कुछ कार्यकर्ता सीधे रेल से पहुंचे थे।ठाकरे जी ने पूछा, क्या इसके लिए तुमने किसी अधिकारी से भी सहयोग लिया था? मैंने कहा केवल 5 हज़ार रुपये एक अधिकारी से चंदा लिया था।वो बोले क्या ही अच्छा होता अगर तुम 2 बसों की जगह एक ही बस लेकर जाते पर किसी अफसर से एक पैसा भी चंदा न लेते। तुम जानते हो, कल तुम्हारी सरकार बनने वाली है।क्या तब तुम उस अधिकारी के भ्र्ष्टाचार को रोक पाओगे, जिससे आज चंदा लिया है?
मैंने कहा, समझ गया, भाई साहब अब ऐसी गलती कभी नहीं होगी!
मैं नहीं जानता ग्वालियर से रिवाड़ी तक ac बस का किराया कहाँ से आया होगा।किसी धन्ना सेठ से? अफसर से? या पार्टी द्वारा प्रति वर्ष एकत्रित श्रद्धा निधि से।
यदि यह व्यय श्रद्धा निधि से हुआ है तो कार्यकर्ताओं की श्रद्धा को क्षीण हो करेगा।और किसी अधिकारी या व्यापारी से तो वो एक के 10 वसूल करेगा।
जैसे जैसे पैसे का महत्व बढ़ रहा है वैसे वैसे विचार और निष्ठा मात्र गोष्ठियों की चर्चा का विषय रह गयी है।किंतु विचार का विकल्प धन कभी नहीं हो सकता।सेवा और समर्पण की शून्यता रुपयों से नहीं भरी जा सकती।अन्यथा पार्षद या सरपंच का चुनाव कोई प्रत्याशी 25 हज़ार में जीत नहीं जाता और कोई 50 लाख खर्च करके भी हार नहीं जाता।
महाराज बाड़े पर साढ़े तीन रुपये में बने मंच पर अटल जी की सभा जो प्रभाव उतपन्न करती थी, वो अब साढ़े तीन करोड़ के अधिवेशन भी नहीं करते।
पंडित दीनदयाल जी की सादगी ने हजारों कार्यकर्ता तैयार कर दिए, जो गुड़ चने खाकर गांव गांव घूमते थे।आज होटलों से चलने वाला चुनाव प्रबंधन अपने कार्यकर्ताओं को उनके घरों से ही नहीं निकाल पाया।बूथ प्रमुख और पन्ना प्रमुख काग़ज़ों में लिखे रह गए।
अटल जी अपने भाषणों में कई बार कहते थे- “धन का अभाव तो कष्ट कारक होता ही है धन का प्रभाव विनाशकारी होता है।”
क्या आपको नहीं लगता कि आजकल धन का प्रभाव हमारे सिर पर चढ़ कर बोल रहा है?