प्रवीण दुबे
नागपुर 22 अगस्त /राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आयोजित श्री विजयादशमी उत्सव 2 अक्तूबर, 2025 को प्रातः 7.40 बजे रेशिमबाग, नागपुर में संपन्न होगा। इस अवसर पर भारत के महामहिम पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राम नाथ कोविंद प्रमुख अतिथि होंगे और सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का मार्गदर्शक उद्बोधन होगा।

आम तौर पर आरएसएस या संघ के नाम से जाना जाने वाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक हिंदू राष्ट्रवादी संगठन है, जिसकी स्थापना साल 1925 में महाराष्ट्र के नागपुर में डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी. इस प्रकार संघ इस वर्ष अपने गौरवशाली सौ वर्ष पूर्ण करने जा रहा है।

संघ को दुनिया का सबसे बड़ा स्वैच्छिक या वॉलंटरी संगठन कहा जाता है, लेकिन आरएसएस से कितने लोग जुड़े हुए हैं, इसकी कोई आधिकारिक संख्या उपलब्ध नहीं है.
हाल ही में संघ के एक नेता ने कहा था कि देश में क़रीब एक करोड़ स्वयंसेवक हैं. महत्वपूर्ण बात यह है कि आरएसएस एक ग़ैर-राजनीतिक सांस्कृतिक संगठन है
आरएसएस के मुताबिक़, वो एक सांस्कृतिक संगठन है जिसका मक़सद हिंदू संस्कृति, हिंदू एकता और आत्मनिर्भरता के मूल्यों को बढ़ावा देना है.
संघ का कहना है कि वो राष्ट्र सेवा और भारतीय परंपराओं और विरासत के संरक्षण जैसे विषयों पर ज़ोर देता है.
संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर अपनी किताब ‘आरएसएस: 21वीं सदी के लिए रोडमैप’ (पेज 9) में कहते हैं कि संघ समाज पर शासन करने वाली एक अलग शक्ति नहीं बनना चाहता और उसका मुख्य उद्देश्य समाज को मज़बूत करना है.
इसी किताब में आंबेकर लिखते हैं कि ‘संघ समाज बनेगा’ एक नारा है, जो आरएसएस में बार-बार लगाया जाता है.
मौजूदा सरसंघचालक मोहन भागवत कहते हैं कि संघ एक “कार्य प्रणाली है और कुछ नहीं”. उनके मुताबिक़, आरएसएस “व्यक्ति निर्माण का काम करता है”. (भविष्य का भारत – संघ का दृष्टिकोण, पेज 19).